Thursday, 22 August 2019

श्रीकृष्ण जयंती साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक - गोवर्धन पूजा शिरीष सप्रे

श्रीकृष्ण जयंती
साढ़े तीन मुहूर्तों में से एक - गोवर्धन पूजा
शिरीष सप्रे

उत्तर भारत में गोवर्धन पूजा का बड़ा महत्त्व है | प्रत्येक व्यक्ति के घर में पूजा की जाती है | सुबह ही गोबर लेकर घर के चौक में गोबर के गोवर्धन बनाए जाते हैं | इसे छोटे पेड़, वृक्ष की शाखाओं से और फूलों, रोली, आटे की बिंदी लगाकर शृंगार किए जाने के पश्चात् पूजन किया जाता है | पूजन करते समय इस श्लोक का उच्चारण किया जाता है – ‘गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक | विष्णुबाहु कृतोच्छाय गवां कोतिप्रदो भाव |’ सुबह अन्नकूट प्रसाद लगाया जाता है | शाम को दीपक जलाकर गोवर्धन महाराज के पैर दबाए जाते हैं और आशीर्वाद लिया जाता है |

गोवर्धन पूजा यानी अन्नकूट पर्व यानी दीपावली का अगला दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का दिन | इस पर्व का भारतीय लोक जीवन में बड़ा महत्त्व है | इस दिन गायों यानी गौ-धन की पूजा की जाती है | यह साढ़े तीन मुहूर्तों में गिना जाता है | यानी अबूझ मुहूर्त ये हें – चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात् गुढीपाडवा (हिन्दू नववर्ष), विजयादशमी (दशहरा), अक्षय तृतीया (आखातीज), कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का आधा भाग | किसी भी कार्य की शुभ शुरुआत इस दिन से की जा सकती है | आर्थिक दृष्टी से व्यापारी इस दिन से साल की नई शुरुआत मानते हैं | लक्ष्मी प्राप्ति की कामना करते हुए हिसाब-किताब की बहिओं की हल्दी-कुमकुम और फूल चढ़ा कर पूजा की जाती है और नई बहियों में हिसाब-किताब लिखना आरम्भ किया जाता है |

वृंदावन से लगभग तीस की. मी. पूर्व एवं नन्दगांव से लेकर यमुना के किनारे क्रमशः आठ, पांच और दो योजन लम्बे, चौड़े और ऊंचे पर्वत विशेष का नाम है गोवर्धन | यह नाम गोवंश की वृद्धि अर्थात् संवर्धन कारण पडा | गोवर्धन यमुना की तरह ही ब्रज का साक्षी है | गोवर्धन की पूजा-परंपरा, ब्रज, बुंदेलखंड आदि में अत्यंत प्राचीन है, जिसमें निम्न मन्त्र से प्रार्थना की जाती है – “गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक | विष्णुबाहु कृतोच्छाय गवां कोटिप्रदो भव |’ अंत में – लक्ष्मिर्या लोकपालानाधेनुरुपेण संस्थिता | घृतं बहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु |” मन्त्र पढ़ा जाता है | (हेमाद्रि) और नैवेद्य अर्पित करते हैं | नैवेद्य में मिष्ठान का अहम स्थान होता है, जो गायों को खिलाया जाता है | सायंकाल को इन पूजित गायों से पूजित गोवर्धन पर्वत का मर्दन कराना अच्छा माना जाता है | इस गोबर से घर-आंगन को लीपा जाना शुभ माना जाता है |

गोवर्धन पूजा का उल्लेख ‘विष्णुपुराण’, ‘नारदपुराण’, ‘गर्ग संहिता’ के वृन्दावन खंड के द्वितीय अध्याय आदि में मिलता है | ‘विष्णुपुराण’ के अनुसार नंदजी से इन्द्रपूजा के प्रसंग में सुनकर भगवान् कृष्ण ने अपने कुलदेवता गाय और पर्वत की घोषणा की तथा शरत ऋतु में इन्द्र को दी जानेवाली बलि को रुकवा दिया, जिससे अप्रसन्न होकर इन्द्र मूसलाधार मेह बरसाने लगे, लेकिन जनता-जनार्दन के रक्षार्थ सात वर्षीय श्रीकृष्ण ने सात दिनों तक गोवर्धन को अपनी कनिष्का उंगली पर उठाए रखा |

अंततः इन्द्र को क्षमायाचना करनी पड़ी | ‘श्रीमद्भागवत’ के दशम स्कंध, पूर्वार्ध २४-२७ अध्याय और ‘सनत्कुमारसंहिता’ के अनुसार इस दिन इन्द्र का दर्प चूर्ण कर दीवाली के दूसरे दिन जनता को श्रीकृष्ण ने उद्योग और कर्मठता का पाठ पठाया | तब श्रीकृष्ण को क्षीरसागर से उत्पन्न सुरभि गौ की दुग्धधाराओं से इस पर्वत पर स्नान कराया गया और अभिषेक किया ऐरावत ने अपनी चार शुंडो से | यहां आकाशगंगा से मानसीगंगा प्रकट हुई, जो वर्तमान में विशाल और पक्का सरोवर है | इसके किनारे अर्थात् जतीपुर में मुखारविंद नाम से गिरिराजजी का प्रसिद्ध मंदिर है | ‘गिरिराज’ का गोवर्धन का भी एक नाम है, जो प्रायः श्रीकृष्ण के सान्निध्य के कारण पड़ा | इसका पूजन-अर्चन दूध से किया जाता है | इसकी परिक्रमा का बहुत माहात्म्य है | यहां से दूर के लोग ‘गर्गसंहिता’ के गिरिराजखंड में श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए विचारानुसार गाय के गोबर से शिखरप्रयुक्त, वृक्ष-शाखादि संयुक्त तथा पुष्पादि से सुशोभित गोवर्धन निर्मित कर इस पर लावा की वर्षा करते हुए पूजा-अर्चना करते हैं |

गोवर्धन के निकट ही अन्नकूट की पूजा-अर्चना की जाती है, जो वस्तुतः गोवर्धन पूजा का समारोह है | (भागवत एवं ‘व्रतोत्सव’), गोवर्धन में ‘हरदेव मंदिर’, ‘दानघाटी मंदिर’ ‘मनसादेवी मंदिर’ आदि अन्य धार्मिक स्थल हैं | यहां सबसे बड़ा मेला मुडियो पूनो का लगता है | गोवर्धन कर ही समीप गोविन्द कुंड, राधा कुंड, पूछरी का लौंग आदि अन्य दर्शनीय स्थल हैं, जो गोवर्धन-परिक्रमा के अन्तर्गत आ जाते हैं |

एक अन्य कथा में गोवर्धन पूजा के विषय में कहा गया है – श्रीकृष्ण ने इंद्र का दंभ दूर करने के लिए गोवर्धन का रूप धारण किया था | प्रचलित कथा के अनुसार - शरद काल के आने पर भगवान् कृष्ण ने समस्त ब्रजवासियों को इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए उत्सव मनाते देखा | भगवान् कृष्ण ने बड़े-बूढों से बड़े उत्साह से पूछा आप लोग जिसके लिए फूले नहीं समाते वह इंद्र-यज्ञ क्या है ? इस पर नन्द गोप , कृष्णजी से बताने लगे, देवराज इन्द्र जल के स्वामी हैं और बिना जल के हमारी फसलें गउएँ, हम सभी निष्प्राण हो जाते हैं | इसलिए हम यदि इन्द्र उत्सव मनाते हैं तो इन्द्र देवता प्रसन्न होकर हमारे अन्न-धन-गौ आदि की रक्षा वर्षा करके करते हैं | अतः इसलिए यह उत्सव मनाया जाता है |         
श्रीकृष्ण बोले, हे, तात हम तो गोप हैं हमारी गौएं ही धन है, खेतों के अंत में वन हैं | वनों के अंत में पर्वत हैं – वे पर्वत ही हमारी परमगति हैं – सुना जाता है कि, वन के पर्वतगण कामरूपी (इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले) हैं | वे मनोवांछित रूप धारण करके अपने-अपने शिखरों पर विहार किया करते हैं | हमे इंद्र यज्ञ नहीं अपितु गिरी यज्ञ अथवा गौ यज्ञ करना चाहिए | हमें इंद्र से क्या प्रयोजन? अतः आज समस्त ब्रजवासी दूध एकत्र कर लो और गोवर्धन की पूजा कर लो आप इस प्रकार मेरे कहे अनुसार करोगे तो गायों गिरिराज को एवं मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी | गोपों ने वैसा ही किया |

इधर इंद्र अत्यंत क्रोधित हो गए, उन्होंने क्रोधित होकर संवर्तक नामक नामक मेघों के एक दल से इस प्रकार कहा – अरे, मेघों ! मेरा वचन सुनो, गोपों ने मेरा यज्ञ नहीं किया | मेरी आज्ञा से वर्षा द्वारा उनकी जीविका गायों को पीड़ित करो | मैं भी पर्वत शिखर के समान अत्यंत ऊंचे अपने ऐरावत हाथी पर चढ़कर वायु और जल छोडने के समय तुम्हारी सहायता करूंगा |

इन्द्र की आज्ञा से मेघों ने प्रचंड वायु एवं वर्षा करनी शुरू कर दी – इस प्रकार लगातार वर्षा होने से गाएं-बछड़े इधर-उधर भागने लगे | सभी श्रीकृष्ण के पास गए | भगवान् कृष्ण ने गो-पर्वत उखाडकर छत्र की भांति बना लिया एवं गोपों से बोले आओ शीघ्रता से इस पर्वत के नीचे आ जाओ, निर्भय होकर बैठो, सात रात तक महा भयंकर मेघ बरसते रहे किन्तु कुछ असर उस बारिश का न होते देख इन्द्र ने मेघों को रोक दिया – श्रीकृष्ण ने पुनः गोवर्धन पर्वत को जहां का तहां रख दिया | तबसे श्रीकृष्ण को गोवर्धनधारी कहा जाने लगा एवं गौओं की रक्षा करने के कारण उनको गोविन्द कहा जाने लगा | तबसे गोवर्धन पूजा आज तक जारी है |             
                   
   

Friday, 16 August 2019


भगवान् श्रीकृष्ण की आठ पत्नियां
शिरीष सप्रे

भगवान् श्रीकृष्ण एक आदर्श राजा थे और उनकी आठ पत्नियां थी | किसी भी राजा को नीति बन्धनों का पालन करना ही पड़ता है इस दृष्टि से श्रीकृष्ण ने स्वतः विवाहबद्ध होकर आठ पत्नियां की थी | श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों सम्बन्धी जानकारी आगे दी गई है –

विदर्भ देश के राजा भीष्मक की अत्यंत रूपवती कन्या रुक्मणी का स्वयंवर कुण्डिनपुर में होने वाला है की सूचना मथुरा पहुंची | भरतखंड के सभी क्षत्रिय राजाओं को स्वयंवर का निमंत्रण गया परन्तु, भीष्मक का पुत्र रुक्मी जरासंध का परम स्नेही होने के कारण उसने जरासंध आदि अनेक राजाओं को पराजित करनेवाले श्रीकृष्ण को जानबूझकर निमंत्रण नहीं दिया |

श्रीकृष्ण के पराक्रम की प्रसिद्धि रुक्मीणी ने भी सुनी थी | रूप-गुण; वीरता, संपत्ति आदि गुणों से संपन्न श्रीकृष्ण पर वह अनुरक्त होकर स्वयंवर के समय उसका ही वरण करने का निश्चय उसने किया होने की अंदरूनी जानकारी भीष्मक और रुक्मी को ज्ञात हुई थी | इसलिए उन्होंने श्रीकृष्ण राजा नहीं यह कारण बताकर निमंत्रितों की सूची से श्रीकृष्ण का नाम जानबूझकर हटा दिया था | उधर श्रीकृष्ण के कानों पर रुक्मणी की बुद्धि, औदार्य, सौंदर्य, आदि गुणों और अनेक शुभ लक्षणों से युक्त होने के वर्णन गए थे और वह अपनी भार्या होने के योग्य है, ऐसा उन्हें लगने लगा था | निमंत्रण नहीं होने पर भी स्वयंवर में एकत्रित सभी राजाओं के समक्ष उपवर कन्या का जबरदस्ती से हरण करने का क्षत्रियों को अधिकार है, यह मन में विचार श्रीकृष्णकर अपने अजिंक्य सुदर्शन पथक सहित कुण्डिनपुर में आ दाखिल हुए |

स्वयंवर में श्रीकृष्ण के होते रुक्मणी उनके सिवाय किसीका भी वरण नहीं करेगी और श्रीकृष्ण से युद्ध करने का सामर्थ्य स्वयंवर में उपस्थित किसी भी राजा में नहीं इसका विश्वास उन राजाओं को स्वयं था परन्तु, भीष्मक के सामने क्रोधित होने का दिखावा कर सारे राजा चलते बने | अर्थात स्वयंवर रद्द हो गया |

एक दिन एक तेजस्वी ब्राह्मण विदर्भ देश से श्रीकृष्ण से भेट के लिए द्वारका आया |  उसने रुक्मणी की पत्रिका श्रीकृष्ण को दी, उन्होंने खोलकर वह पढ़ी | रुक्मणी ने प्रारम्भ में स्वयंवर भंग होने के बाद से सारा वृतांत लिखा हुआ था | श्रीकृष्ण के भय से अब स्वयम्वर का आयोजन न करते उसके भाई रुक्मी ने जरासंध के आग्रह पर चेदी देश के शिशुपाल से उसका विवाह करना राजा भीष्मक की इच्छा के विरुद्ध तय किया है | इस प्रकार से श्रीकृष्ण को कहलाकर उसने आगे लिखा था – हे भुवन सुन्दर श्रीकृष्ण, तुम्हारे गुण, तुम्हारा अनुपम रूप-सौंदर्य का वर्णन सुनकर मेरा मन तुम पर आसक्त हो गया है | विवाह के एक दिन पहले हमारे कुलदेवता की बड़ी यात्रा होगी और उस समय वधू नगर के बाहर देवी पार्वती के दर्शनों के लिए जाती है | उस अवसर का लाभ उठाकर मौका देखकर तुम मेरा हरण कर लो |

विवाह के मुहूर्त में अब बहुत थोडा समय बचा था | विदर्भ देश के राज घराने के कुलाचार के अनुसार नववधू को देवी अम्बिका के दर्शनों के लिए ले जाने की तैयारी हो गई | नववधू द्वारा दर्शनों के लिए पैदल ले जाने की प्रथा थी | वयस्क ब्राह्मण सुवासिनी वस्त्र-अलंकारों से भूषित होकर वधू को लेकर देवी के मंदिर की ओर निकली |

वापसी के लिए वह देवी के मंदिर के बाहर आई तो अचानक गरुड़ चिन्हांकित रथ आकर वहां रुका और उसमें से मनमोहक श्यामसुंदर श्रीकृष्ण नीचे उतरे और स्मित हास्य करते रुक्मणी के सामने आकार खड़े हो गए | रुक्मणी ने उनके गले में अपने हाथ में का हार तत्काल पहना दिया | नारदजी और महामुनि गर्ग अचानक वहां प्रकट हो गए उन्होंने श्रीकृष्ण के हाथ में दिव्य पुष्पों का हार दिया उसे श्रीकृष्ण ने रुक्मणी के गले में पहना दिया | नारदजी और महामुनि गर्ग ने वरवधू पर मंगल अक्षता डालकर तालियां बजाई | मंगल वाद्यों की गर्जना के बीच श्रीकृष्ण रुक्मणी को लेकर रथ में बैठे और रथ चल पड़ा | इस रथ के पीछे-पीछे एक और रथ आया उसमे नारदजी और महामुनि गर्ग के बैठते ही वे रथ विद्युत गति से दौड़ पड़े | इस प्रकार रुक्मणी हरण हुआ |

श्रीकृष्ण स्यमन्तक मणि के शोधार्थ जब भटक रहे थे तब जंगल की एक गुफा में जाम्बवन्त नामक एक रीछ राजा रहता था वहां वह मणि मिली | राम भक्त जाम्बवान के कुल में जन्मे और राम को पूज्य माननेवाले उस रीछ  राजा ने श्रीकृष्ण का आदर-सत्कार किया | जाम्बवान को जाम्बवती नामकी एक सुन्दर कन्या थी | श्रीकृष्ण की पूजा करने के उपरांत उसने नम्रतापूर्वक श्रीकृष्ण से कहा, ‘हे कृष्ण, हमारे राम के समान ही तुम भी पराक्रमी और सर्वगुण संपन्न हो | साक्षात भगवान् राम ही हमारे घर तुम्हारे रूप में प्रगट हुए हैं, ऐसा मुझे लगता है | हे कृष्ण, मैंने तुम्हारे साथ युद्ध किया, यह मेरा अपराध क्षमा कर तुमने मेरी पूजा स्वीकार की | अब एक और प्रार्थना करनी है | मेरी सुन्दर कन्या तुम्हेँ अर्पण कर वरदक्षिणा के रूप में यह स्यमन्तक मणि तुम्हे सौपना चाहता हूं | यह मेरी इच्छा पूर्ण कर कृपया मुझे धन्य करें |’

इस कन्या का स्वीकार किया तो भविष्य में जाम्बवान की यह सेना अपने काम आएगी, गरुडेश्वर के समान ही जाम्बवान से घनिष्ठता निर्मित होने पर अन्य जंगली राजा भी अपने वश होंगे, इस प्रकार का गम्भीर और दूरदर्शी विचार कर कृष्ण ने जाम्बवान की विनती को मान्य किया | जांबवान ने बड़े ठाट से विवाह समारोह करना तय किया | दुसरे दिन उसने विधिपूर्वक कृष्ण को जाम्बवंती स्यमन्तक मणि सहित अर्पण की |

इस स्यमन्तक मणि की जो मूलतः द्वारका के पराक्रमी सूर्योपासक सत्राजीत की थी और भगवान् सूर्यनारायण ने प्रसन्न होकर यह उसे दी थी एवं इसकी चोरी का आरोप भगवान् कृष्ण पर लगा था और श्रीकृष्ण इसी मणि की तलाश में वन में गए थे | कथा के अधिक विस्तार में हम न जाते | श्रीकृष्ण ने द्वारका नगरी लौटते ही यह मणि सत्राजीत को सौंप दी | सत्राजीत ने प्रसन्न होकर अपनी सुन्दर और सुशील कन्या सत्यभामा से उनका विवाह कर दिया और यह स्यमन्तक मणि भी भेटस्वरुप दे दी |

यमुना किनारे घने जंगल में एक तपस्वी रहते थे और इस वन के जंगली उन्हें ईश्वर का अवतार समझते थे और उनकी आज्ञा का पालन बड़े आदरपूर्वक करते थे | उस तपस्वी की कालिंदी नामकी एक सुन्दर कन्या थी | इस कालिंदी को सभी लोग मनुष्य रूप धारण करनेवाली पवित्र यमुना नदी ही समझते थे | इस वन में कृष्ण मृगया के लिए गए थे | वहां उन्होंने कालिंदी को देखा और देखते ही वे उस पर मोहित हो गए | तपस्वी ने कालींदी का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया | यह विवाह कर श्रीकृष्ण ने उस क्षेत्र में रहनेवाले सभी लोगों का आदर सम्पादन किया |  

श्रीकृष्ण का पांचवा विवाह अवन्ती के राजा की कन्या ‘मित्रविंदा’ से हुआ था | मित्रविंदा श्रीकृष्ण की बुआ राजाधिदेवी की कन्या | राजाधिदेवी के पुत्र विंद और अनुविन्द दुर्योधन के स्नेही होने के कारण उसका मत था कि अपनी बहन श्रीकृष्ण ना वरे | अवन्ती के राजा ने जब अपनी कन्या का स्वयंवर रचा तब श्रीकृष्ण वहां गए थे उस समय मित्रविन्दा ने श्रीकृष्ण को ही वरमाला पहनाई | 

  कोसल देश का नग्नजीत नामका एक राजा था | उसकी कन्या सत्या अथवा नाग्नजीती अत्यंत रूपवती थी | उस राजा ने उसके विवाह के लिए एक विलक्षण शर्त रखी थी | उसके पास मस्ती पर आए हुए ऐसे बड़े सात जंगली बैल थे | जिनके सामने जाने का साहस किसी भी मनुष्य में नहीं था | उस बैल के सामने अकेले जाकर जो कोई उसे नकेल डालकर अपने कब्जे में लेगा उस पराक्रमी पुरुष को मेरी कन्या वरमाला पहनाएगी ऐसी घोषणा राजा ने की थी | परन्तु यह शर्त जीतने का प्रयत्न बहुत से राजाओं ने करके देखा परन्तु सफलता किसी के हाथ न लगी |

गोकुल में छोटे से बड़े हुए श्रीकृष्ण ने जब यह शर्त सुनी तब जंगलों में गाय बैलों को काबू में करने की कला मालूम होने के कारण उसने वह शर्त जीतने का निश्चय किया | श्रीकृष्ण अपने यशस्वी पथक को लेकर कोसल देश की ओर चल पड़े |
उस मत्त पशु को काबू में करने का अपूर्व कौशल्य देखकर सभी लोग चकित रह गए | नग्नजीत ने अपनी कन्या सत्या श्रीकृष्ण को बड़ी प्रसन्नतापूर्वक विवाह समारोह आयोजित कर अर्पण की | नग्नजीत ने श्रीकृष्ण को एक हजार गाएं, एक हजार घोड़े और पांच सौ हाथी भेंट के रूप में दिए | इनके अलावा सोना, हीरे, मोती-माणिकवगैरा संपति भी प्रदान की |

केकय देश के राजा की पत्नी श्रुतकीर्ति भी श्रीकृष्ण की बुआ थी | उसकी लड़की ‘भद्रा’ भी विवाह योग्य होते ही केकय देश के राजा ने श्रीकृष्ण से उसका विवाह बड़े ठाठ से कर दिया |

मद्र देश के पराक्रमी राजा की कन्या लक्ष्मणा अत्यंत लावण्यवती और शुभ लक्षणों से युक्त थी | स्वयंवर में श्रीकृष्ण को उसने वरमाला पहनाई | विवाह समारोह में मद्र्देशाधिपति ने श्रीकृष्ण को हजारों श्रेष्ठजाति के घोड़े, महाबलाढय हाथी, सैकडों रथ और अपरंपार युद्ध साहित्य भेंट के रूप में अर्पित किया |

इस प्रकार श्रीकृष्ण के आठ विवाह हुए | श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों के नाम आगे दिए हुए श्लोक में ग्रथित हैं  - ‘भैष्मी जाम्बवती भामा सत्या-भद्राच लक्ष्मणा | कालिंदी मित्रविंदा चेत्यष्टो पट्ट महा स्त्रिय: |’