Wednesday, 17 July 2019

काशी जहां हर कंकर शंकर का प्रतिरूप है - शिरीष सप्रे


काशी जहां हर कंकर शंकर का प्रतिरूप है
शिरीष सप्रे

काशी विश्व का प्राचीनतम नगर होकर मंदिरों की नगरी है | भारतीय संस्कृति की धड़कन, अस्मिता का प्रतीक है काशी | हर घर शिवालय और हर चौराहा किसी देवी-देवता का देवरा या चौरा है | भूत भावन, भगवान् शंकर को दो स्थान काशी और कैलाश अत्यंत प्रिय हैं | काशी का इतिहास अत्यंत विराट है | प्राचीन नगरों दमिश्क, रोम, एथेन्स और ऑक्सफ़ोर्ड से भी अधिक प्राणवान है | काशी अनादिकाल से अक्षुण होकर काशी में ज्ञान का अपार भण्डार है | काशी यानी शिवपुरी | भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विख्यात है |

काशी उसे कहते हैं जो प्रकाश देता है, काशते प्रकाशते इति काशी | काशी को वाराणसी (बनारस) भी कहते हैं | असि एवं वरुणा दो नदियों के मध्य वाराणसी स्थित है | काशी का विनाश किसी भी युग के अंत में नहीं होता है | काशी भूतभावन शंकर के त्रिशूल पर अवस्थित है | यह पृथ्वी पर स्थित नहीं है, अपितु पृथ्वी के ऊपर अवस्थित है | ऐसा उपाख्यान पुराण में है | इसकी गणना सात पुरियों में भी है | परन्तु इन सभी से यह पुरी अनुपम एवं उच्च है | यहां शिव और माता अन्नपूर्ण का वास है |

काशी को स्वयं विश्वेश्वर ने निर्मित किया है | इसी आनंदकानन में वे निवास करते हैं | काशी का प्रत्येक कंकर शिवस्वरूप एवं शिवमय है | यहां साक्षात शिवजी गुरु हैं | शिवजी स्वयं यहां जीवों को उपदेश देते हैं और पुराण के अनुसार उन्हें तारक मन्त्र का उपदेश कानों में देते हैं | इस प्रकार जीव जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है | (काशी मरणांमुक्ति) काशी में जीव के मरने पर उसकी मुक्ति हो जाती है | काशी में मरना मोक्ष होता है |

तुलसीदासजी ने स्वरचित रामायण में लिखा है ज्ञानहि भक्तिहि नहीं कछु भेदा अर्थात ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिलती | यह ज्ञान ईश्वर के विषय में होता है | जीव माया को ठगिनी जानता है और ईश्वर के अंश को आत्मारूप में समझता है | ऐसा ज्ञान जब प्राणी को हो जाता है तभी वह ज्ञानी कहा जाता है | पुराणों से भी स्पष्ट है कि काशी अद्वितीय है और ज्ञान की राशि है | जिसे ज्ञान हो जाता है, वह भवबंधन का उच्छेद कर मोक्ष को प्राप्त करता है और पुनः उसका जन्म मरण नहीं होता है | आत्म ज्ञान ईश्वर ज्ञान है | काशी में जीवों को शिव महेश्वर की कृपा से यह सहज ही प्राप्त होता है |

यह काशी की महिमा का ही प्रभाव है कि पुरुषोत्तम मास में लोग सम्पूर्ण काशी खण्ड की परिक्रमा करते हैं | इसे ‘पंचक्रोशी’ यात्रा कहते हैं | यह यात्रा मणिकर्णिका से प्रारंभ होती है और यहीं समाप्त भी होती है | हिंदुओं की त्रिस्थली यात्राओं के तीर्थ काशी, गया और प्रयाग विशेष रूप से काशी अपने कब्जे में हो यह मराठों का प्रिय स्वप्न था परन्तु, वह कभी साकार न हो सका |  
    
 पुराविदों के अनुसार ईसा पूर्व आठ से भी पूर्व काशी का अस्तित्व था | प्राचीनकाल से काशी ज्ञान की पुरी रही है | गौतम बुद्ध आदि तीर्थंकर आदिनाथ, पार्श्वनाथ से लेकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानन्द, संत कबीर, महाप्रभु वल्लभाचार्य, संत तुलसीदास, संत रैदास, गुरुनानक आदि ने यहां साधना की और तत्वज्ञान प्राप्त किया | उन्नीसवी सदी के संत मनीषियों की परंपरा में तैलंग स्वामी, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, मां आनंदमयी और स्वामी करपात्री उल्लेखनीय हैं | गंगा तट पर बसा यह नगर हर-हर बम महादेव काशी विश्वनाथ गंगे और विश्व गंगे’ की वाणी और विश्वनाथ मंदिर का पट खुलने से जागता है |

अनादि काल से काशी सर्वविद्या की राजधानी रही है | सत्यार्थ प्रकाश के रचयिता स्वामी दयानंद सरस्वती भी काशी आए थे | यहां पर उन्होनें काशी के सनातनी पंडितों से शास्त्रार्थ किया था | कहा जाता है कि इस शास्त्रार्थ में पंडितों ने बुद्धि बल के साथ-साथ बाहुबल का भी प्रदर्शन भी किया था | दुर्गाकुंड के पूर्वी छोर पर इस शास्त्रार्थ का स्मारक बना हुआ है |

आधुनिक युग की विभूतियों में महात्मा गांधी और महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी काशी से जुड़े थे | महामना मालवीयजी ने भारत के कोने – कोने से चंदा एकत्रित करके समस्त विद्या की राजधानी काशी में अद्वितीय विश्वविद्यालय की स्थापना की |
हिंदी साहित्य के क्षेत्र में काशी की उपलब्धि कम नहीं है | भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, देवकीनंदन खत्री , प्रेमचंद्र, रामचंद्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद, आदि | हास्य कविता के क्षेत्र में बेधड़क बनारसी के नाम भुलाए नहीं जा सकते | उपन्यास के क्षेत्र में प्रेमचंद के बाद शिवप्रसाद का ही नाम आता है | रामकथा में नवीन शैली के प्रवर्तक रामकिंकर काशी की धरती की ही उपज हैं | काशी के संतों की जाज्वल्यमान परंपरा में करपात्रीजी महाराज और देवरहा बाबा भी दो स्तम्भ रहे हैं | 

काशी की भूमि ने राजनेता भी दिए हैं | लालबहादुर शास्त्री और डाक्टर संपूर्णानंद काशी की पवित्र भूमि में ही पले-बढे | पंडित कमलापति त्रिपाठी काशी के सपूत थे | आधुनिक चिंतको में आचार्य नरेन्द्र देव उल्लेखनीय हैं, प्रसिद्ध तत्वचिंतक जे. कृष्णमूर्ती और अचुत्यपटवर्धन का काशी से गहरा सम्बन्ध रहा | विख्यात विचारक डा. राधाकृष्णन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में वर्षों यहाँ रहे | कला के क्षेत्र में भी काशी किसी से पीछे नहीं रही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कत्थक नर्तक बिरजू महाराज और सिने कलाकार लीला मिश्र भी इसी माटी की उपज हैं | 
       
काशी में ही महर्षि वेदव्यास ने वेदों को चार भागों में बाटा था और श्रीमद्भागवत् तथा अठारह पुराणों की रचना की थी | महर्षि अगस्त्य, महर्षि पातंजलि की तपोभूमि इस परंपरा को आज भी जीवित किए हुए है | जितने साधू-संत, तीर्थ, मठ, आश्रम, मंदिर काशी में हैं उतने देश के किसी भी धार्मिक नगरी में नहीं हैं | काशी में लघु भारत का सहज ही दर्शन होता है |        
                           

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