Sunday, 5 May 2019

नई भूमि के निर्माता चिरंजीवी भगवान् परशुराम - शिरीष सप्रे


नई भूमि के निर्माता चिरंजीवी भगवान् परशुराम
शिरीष सप्रे


श्री परशुराम अवतार के सम्बन्ध में जनता में विलक्षण कुतूहल है | वैशाख शुक्ल तृतीया या आखातीज के दिन अदिति नक्षत्र पर परम ज्योति स्वरुप बालक ने ठीक सूर्यास्त के समय जन्म लिया | परशुराम का स्मरण होते ही कई बातों का स्मरण भी हो आता है | जैसे उनका चिरंजीवी होना – अश्वत्थामा बलिव्यार्सो हनुमांश्च विभीषण: | कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीवन: ||१||


परशुराम अवतार हुए लगभग दस लाख वर्ष से अधिक का समय बीत चूका है | परशुराम त्रेता युग का दूसरा अवतार और उनके बाद श्रीराम हुए | आगे जाकर द्वापरयुग के अंत में भगवान् श्रीकृष्ण अवतार हुआ | उस समय कौरव-पांडव हुए | उनमें से द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण आदि ने धनुर्विद्या उनसे सीखने के वर्णन महाभारत में हैं | इसी प्रकार भीष्म और परशुराम  का युद्ध हुआ था इसका वर्णन महाभारत् में है | इसी प्रकार कर्ण ने चोरी से परशुराम से धनुर्विद्या सीखी इस कारण परशुराम ने उसे शाप दिया यह कथा भी महाभारत् में है | बाद में कौरव-पांडवों के बीच मध्यस्थता के लिए परशुरामजी गए थे का वर्णन महाभारत में आता है |


सहत्रब्दियों वर्ष पूर्व सतयुग अर्थात कृतयुग के अंत में भगवान् परशुरामजी ने उत्तर और पूर्व के राजाओं का एक महासंघ बनाकर आज के गुजरात के हैहय राजाओं के विरुद्ध एक महासंग्राम को विजयी नेतृत्व प्रदान किया था | यही कारण है कि परशुराम के नेतृत्व में हैहयों के विरुद्ध सतयुग के अंत में हुए इस महायुद्ध के विजेता महानायक परशुराम सर्व लोकख्यात हो गए और स्थिति यह हो गई कि वशिष्ठों और विश्वामित्रों की वंश परंपरा की भांति ही परशुराम जिस भार्गव वंश के थे उसकी भी एक पूरी वंश परंपरा बनी जिसके सभी महापुरुष स्वाभाविक रूप से भार्गव या परशुराम कहलाए |


कश्यप ऋषि को दान की हुई भूमि पर नहीं रहना यह निश्चय करके परशुराम सह्याद्री पर आए | वहां महाबलेश्वर पर जाकर पर्वत की तलहटी से दूर क्षितिज तक विस्तृत समुद्र उनके सामने था | उन्होनें समुद्र से अपने लिए भूमि मांगी | कई बार प्रार्थना करने पर भी जब समुद्र ने अनसुनी कर दी तब क्रोधित हो परशुराम ने समुद्र को सुखा देने का निश्चय कर एक बाण निकाला | तुरंत समुद्र शरणागत हुआ | उन्होंने चौदह बाण छोड़े प्रत्येक बाण समुद्र में आगे और आगे गिरता गया समुद्र पीछे और पीछे हटता चला गया इस प्रकार दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में भृगुकच्छ (वर्तमान भडोच) तक एक नई भूमि समुद्र से ऊपर आई | इसी पश्चिमी घाट को परशुराम भूमि कहा जाता है |


“बीसवीं सदी में हालैंड के कुल क्षेत्रफल का सातवां हिस्सा समुद्र को हटाकर उससे प्राप्त भूमि का है | हालांकि ऐसा करने में दो सौ साल लगे परन्तु हालैंड में यह कहावत प्रसिद्ध हो गई कि, ‘पूरी दुनिया ईश्वर ने बनाई लेकिन हालैंड को हालैंडवासियों ने बनाया |’” इसी तरह भगवान् परशुराम ने हजारों वर्ष पूर्व समुद्र से परशुराम क्षेत्र प्राप्त किया | (भगवान् परशुराम-जयंत पोतदार)


आज का सम्पूर्ण केरल, कर्नाटक का धारवाड़ प्रदेश, तमिलनाडु का कन्याकुमारी क्षेत्र, सम्पूर्ण कोंकण, गोवा, भडोच तथा पश्चिम सह्याद्री के तीनों शिखरों तक का भाग परशुराम निर्मित भूमि है | नवनिर्मित भूमि निर्जन , उजाड़ और बंजर थी | वृक्ष-वनस्पतियों से रहित | परशुराम ने उसे योगबल से श्स्यश्यामलाम बनाया | उन्होंने उस पवित्र भूमि में बसने के लिए अगस्त्य, बोधायन, दाल्भ्य, सत्याषढ, बाषकल आदि ऋषियोंको निमंत्रित कर उनके आश्रम स्थापित किए | शंकर, पार्वती, गणेश और कार्तिकेय (स्कन्द) को सदैव के लिए निवास करने के लिए उन्होंने अपने इस नवनिर्मित क्षेत्र में आमंत्रित किया | आज भी इन्ही चारों की उपासना इस पुरे प्रदेश में सर्वाधिक प्रचलित है | इस खेत्र में परशुरामजी ने कई तीर्थ स्थापित किए | गोवा या गोमान्तक में इतने यज्ञ किए कि उन यग्नों की भस्म का एक पर्वत ही बन गया | भगवान् परशुराम द्वारा स्थापित तीर्थक्षेत्र  तो अनेक हैं | उनमे प्रमुख हैं – मुंबई का वालुकेश्वर, गोवा की शांता दुर्गा तथा कन्याकुमारी स्थान | इस पूरे परशुराम प्रदेश को  सप्तकोंकण या अपरांत कहते हैं |


अनेक स्थानों से जनसमूहों को लाकर नई बस्तियां बसाई | इस भूमि को आबाद करने के लिए उन्होंने मलयाली ब्राह्मणों को लाया, देवराष्ट्र से लाए हुए ब्राह्मणों के निर्वाह की व्यवस्था की | आवश्यकतानुसार वे ही ब्राह्मण चार वर्णों में बदल गए | कावेरी नदी की किनारे से वेद विद्या पारंगत ब्राह्मण परिवारों को लाकर उन्होंने वेदों के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की | सभी वर्णों को अग्नि उपासना एवं वेदाध्ययन के लिए प्रवृत किया | उन्होंने एक हजार कोलियों (मछुहारों) को शिक्षा देकर वेदों में पारंगत बना दिया |

वर्ण व्यवस्था का गुणकर्म के अनुसार वैदिक आदर्श स्थापित किया | आज भी यह परशुराम क्षेत्र शिक्षा-दीक्षा, विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान रखता है और भगवान् परशुराम के प्रति असाधारण पूज्य भाव इस प्रदेश के जन-जन में है | उन्हें आज भी इस पूरे प्रदेश का स्वामी माना जाता है |                       

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