Friday, 26 April 2019

श्रेष्ठ आदर्श भारतीय ईसाई महिला – कार्नेलिया सोराबजी शिरीष सप्रे


श्रेष्ठ आदर्श भारतीय ईसाई महिला – कार्नेलिया सोराबजी
शिरीष सप्रे

कार्नेलिया सोराबजी १९वी शताब्दी के उत्तरार्ध में महाराष्ट्र से शिक्षा ग्रहण करने के लिए समुद्र पार गई प्रसिद्ध पंडिता रमाबाई, डा. आनंदीबाई जोशी, जो पहली भारतीय डाक्टर थी जिनकी स्मृति में २६ फरवरी महिला आरोग्य दिवस मनाया जाता है, डा. रखमाबाई, अना उर्फ़ अनसूया तर्खड इनकी समकालीन थी | पंडिता रमाबाई, डा. आनंदीबाई जोशी इनकी जीवन यात्रा सामाजिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टीसे कठिनाई भरी थी उसमे डा रखमाबाई की तो सामाजिक दृष्टी से अपूर्व | रखमाबाई के सम्बन्ध में तो उसने आगे जाकर लिखा था “कितनी शांत महिला, दुनिया ने उसके विरुद्ध कितना शोर मचाया परन्तु कितनी शांति से वह अपने व्यवसाय में लीन रही | उसने विवाह नहीं किया परन्तु स्त्री स्वातंत्र्य का ढोल भी नहीं पीटा |” परन्तु अना तर्खड और कार्नेलिया दोनों ही सम्पन्न घरानों से ताल्लुकात रखनेवाली | अना आंग्ल संस्कृति से प्रभावित परिवार से थी | कार्नेलिया के पिता रेव्हरंड खुर्सेदजी सोराबजी नाशिक के एक खानदानी अमीर पारसी परिवार के होकर युवावस्था में धर्मान्तरित होकर ईसाई बने थे | उसकी मां नाशिक के निकट देवलालीके आर्मी कमांडर लार्ड फोर्ड और लेडी फोर्ड की दत्तक कन्या फ्रांसिस्का थी |

कार्नेलिया का जन्म १८६६ में हुआ था ६ भाई-बहनों में उसका क्रम छठा था | उसकी मां पुणे की विक्टोरिया स्कूल की संस्थापक होकर सतत मिशनरी कार्य में मग्न रहती थी | आज भले ही हमारे बच्चों को अंग्रेजी सीखाने के नाम पर हम कॉन्व्हेंट में भेजते हों उस ज़माने में मिशनरी भारतीय भाषा सीखा करते थे | कार्नेलिया के घर की आचार-पद्धति भारतीय थी | अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ पारसी और गुजराती सीखाने शिक्षक घर पर आया करते थे | पुणे के उदारमतवादी सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्ध रखनेवाला यह परिवार स्वयं को पूरी तरह भारतीय समझता था |


उनकी मां नारी शिक्षा की प्रबल पक्षधर थी | कार्नेलिया को बैरिस्टर बनाने में उनके पिता ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |  उनकी मां ने पुणे में लड़कियों और महिलाओं को सशक्त और शिक्षित करने के लिए अंग्रेजी के साथ-साथ मराठी और हिंदी स्कूल भी शुरू किए थे | पंडिता रमाबाई रानडे को विदेश भेजने में जो अग्रसर थी वे शिक्षिका हरफ़र्ड इन्हीं के स्कूल की थी |

 परन्तु ऐसे परिवार की होने के बावजूद उनका स्त्री होना उनके आड़े आया | कारण एक ही था उनका स्त्री होने के बावजूद परिधि के बाहर कदम रखना | परन्तु १८८३ में डेक्कन कॉलेज से सभी लड़कों को पीछे छोड़ पदवी परीक्षा में कार्नेलिया सर्वप्रथम आई | उस समय उसकी आयु थी केवल सत्रह | उस समय सर्वप्रथम आनेवाले छात्र को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लेंड जाने के लिए छात्रवृती  मिलती थी | परन्तु स्त्री होने के कारण उसे नकार दिया गया | उसका आन्गल-पारसी परिवार से होना या ईसाई मजहब का होना कुछ काम न आया | केवल उसका स्त्री होना ही महत्वपूर्ण तय हुआ |

फिर भी अठरह वर्ष की आयु में उनकी नियुक्ति व्याख्याता के रूप में गुजरात कॉलेज में सभी पुरुष विद्यार्थियों की कक्षा पर हो गई | वह वहां किसी भी द्रष्टि से कमतर साबित नहीं हुई परन्तु, यह नियुक्ति तात्कालिक स्वरुप की होने के कारण यह न मालूम हो सका कि यह व्यवस्था दीर्घकालीन होती तो पुरुषप्रधान समाज इसे कितना हजम कर पाता |

यह नौकरी समाप्त होने के पश्चात् कार्नेलिया स्वयं के खर्च से आक्सफोर्ड गई | इंडिया आफिस ने संभालकर रखी हुई उसकी डायरी में यह दर्ज है कि किस प्रकार उसने यात्रा की, आक्सफोर्ड में किए हुए प्रयास, संपर्क में आए हुए मित्रों के साथ की हुई समाज विषयक उसकी चर्चा | कार्नेलिया आधी अंग्रेज थी, अमीर थी, ईसाई थी फिर भी आक्सफोर्ड जैसी विश्व - प्रसिद्ध संस्था पवित्र थी, वहां स्त्रियों को प्रवेश नहीं था | कार्नेलिया ने इन दरवाजों को खटखटाना शुरू किया |

अपने प्रयासों, परिचितों, मिशनरी लोगों की सहायता से उसने समरविल कॉलेज में प्रवेश प्राप्त कर ही लिया | पाश्चात्य संस्कृति की विशिष्टता यह की वहां मिशनरी लोगों का प्रभाव था और इधर बायबल पाठ के लिए तो सार्वत्रिक शिक्षा की आवश्यकता निर्मित हो गई थी | कार्नेलिया के प्रवेश के बाद तो समाज जाग गया, यह अपकृत्य कैसे घटित हो गया, किसने किया इस सम्बन्ध में सवाल खड़े किए गए | पार्लियामेंट के लार्ड्स की सभा में इसका मिला हुआ उत्तर बड़ा ही मार्मिक है – कार्नेलिया सोराबजी को दिया हुआ प्रवेश एक योग्य व्यक्ति को दिया हुआ प्रवेश है | यहां स्त्री शब्द के प्रयोग को टाला गया है मानो यह किया गया तो उस रास्ते से स्त्रीयों के झुंड के झुंड प्रवेश कर जाएंगे !

सामरविल कॉलेज से पहली डिग्री मिलने के बाद कार्नेलिया को अब कानून की उपाधि प्राप्त करनी थी | इसके पीछे एक विचार दिल की गहराइयों में कहीं सुप्त अवस्था में पड़ा था | जब वह छोटी थी तब उसकी मां के पास एक औरत रोते आई और अपनी दुखभरी कहानी सुनाने लगी | उसने अपनी मां से उस सम्बन्ध में पूछताछ की तब उसकी मां ने कहा कि वह जो सहायता चाहती है वह उसके लिए नामुमकिन है; हां जब वह बड़ी हो जाएगी तब यदि वह ऐसी महिलाओं को कानूनी सलाह देकर उनके दुःख दूर कर सके तो बड़ा भला होगा | वास्तव में वह महिलाओं के लिए किसी देवदूत से कम साबित नहीं हुई |

परन्तु अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था ने उसके मार्ग में बाधा खड़ी कर दी | कार्नेलिया ने समझोता करना स्वीकार कर “उपाधि ना तो ना सही परन्तु कम से कम उसे पाठ्यक्रम पूरा करने की अनुमति तो भी प्रदान की जाए |” यह उसका चंचु प्रवेश था | आय. सी. एस के विद्यार्थियों के साथ वह कक्षा में बैठने लगी | अभ्यासक्रम पूरा होने पर एक कदम आगे की ओर अब कार्नेलिया ने परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी | बड़ी मुश्किल से मिली वह भी सशर्त ! स्त्री के रूप में मेट्रन की देखरेख में अलग कक्षा बैठना | ऊपर से मल्लिनाथी यह की ‘इस पर तो तुम्हे कोई एतराज नहीं होगा’? क्यों नहीं होना चाहिए? वह यूनिवर्सिटी की परीक्षा लगेगी ही नहीं और बाद में जब कभी लडकियों को इस परीक्षा में बैठने की अनुमति मिलेगी तब मेरी यह उपाधि कम दर्जे की अवश्य कहलाएगी | 
कितनी यह दूरदृष्टि? यह आत्मनिष्ठा से पैदा हुई थी | 

एक बार फिर से गव्हर्निंग बोर्ड की बैठक हुई और उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति प्रदान की गई | उसे शानदार सफलता मिली और १८८५ में प्रतिष्ठित शिष्यवृत्तियां भी मिली | १८८८ में अंग्रेजी भाषा में वह सर्वप्रथम आई छः  विद्यार्थियों में वह एकमेव स्त्री थी |

अब उपाधि तो मिल गई पर सनद नहीं मिली | बड़े प्रयासों के बाद ली एंड पेबर्टन में काम तो मिल गया पर इस सर्टिफिकेट के लिए उसे फीस भरना पड़ी | काम करते करते एक टायटल डीड में हुई गलती उसने मेनेजर की नज़रों में ला दी | इससे कंपनी को बहुत लाभ हुआ, कंपनी के पैसे बचे | उन्होंने उदार होकर सर्टिफिकेट के लिए लगनेवाली फीस माफ़ कर दी | कितना यह औदार्य ! सर्टिफिकेट मिला वह भी केवल काम का | सनद का तो प्रश्न ही नहीं उठता |

लंदन में उसका उठना-बैठना बड़े लोगों में था जो उसके ऊंचे बौदधिक स्तर के कारण था | उनमें लार्ड मैक्समुलर, लेडी कार्लाइल, बर्नाडशा जैसे अनेक नाम थे | रानी विक्टोरिया की गार्डन पार्टी का आमंत्रण आया तो उसने भारतीय पोशाक का आग्रह किया और नौकरशाही से विवाद कर कर अंत में गुलाबी रंग की साडी पहनी जिसकी रानी ने भी बड़ी प्रशंसा की |

१८९४ में भारत लौटी तो उसे पहली नौकरी दी बड़ोदा महाराज ने | बडोदा में उसी समय सख्ती से सार्वत्रिक शिक्षा आरंभ हुई थी | उस प्रयोग की सफलता आजमाने के लिए कार्नेलिया की नियुक्ति हुई थी | महाराज को कार्नेलिया से बोटिंग सीखना था साथ ही उससे अंग्रेजी आचार पद्धति भी जानना थी | कार्नेलिया ने रिपोर्ट देते समय जरा कुछ अधिक साफगोई अपनाते हुए यह लिखा की किसान चिढ़े हुए हैं, उनके बच्चों को कपास निकालने के लिए समय नहीं मिलता | उनका कहना है कि व्यापारियों के बच्चों को शिक्षा दो हमें क्यों ? कार्नेलिया की नौकरी समाप्त हो गई |

उसे स्त्रियों के उत्तराधिकार, भूमि मालिकाना अधिकारों के मामलों में काम करना था | सिविल मुकदमों के काम करना हो तो सनद चाहिए | कार्नेलिया भारत में फिर से एल. एल. बी. की परीक्षा में बैठी और पास हुई फिर भी उसे सनद प्रदान नहीं की गई |

ब्रिटिश सरकार ने उसकी पर्दानशीन स्त्रियों की समस्याओं के लिए नियुक्ति की यह उसका पसंदीदा काम था | स्त्रियों के लिए काम कर उनके अधिकार उन्हें दिलवाना | परदानशीन औरते खुलकर पुरुष वकीलों से बात नहीं कर सकती इस कारण उनके अधिकारों का हनन होता है यह बात वह जानती थी | मालमत्ता, जीविका, उत्तराधिकार, स्त्रीधन इन विषयों में अपने ज्ञान का लाभ वह इन स्त्रियों को दे सकी | उसने ६०० से अधिक महिलाओं और अनाथ बच्चों को कानूनी लड़ाई लड़ने में सहायता की | इन विषयों पर उसने अनेक पुस्तकें लिखी |

बाद में वह कोलकाता में काम करने लगीं | १९०४ में कोर्ट ऑफ़ वर्ड्स के रूप में उसकी नियुक्ति कोलकाता में हुई | दायभाग पद्धति के कारण बंगाल में उत्तराधिकार प्रश्नों का बहुत महत्व था | १९०७ में बंग-भंग आंदोलन के बाद उनकी कोलकाता की नियुक्ति रद्द हो गई |

कार्नेलिया का भाई परदेश से सनद लेकर लौटा और अहमदाबाद में वकालत करने लगा | कार्नेलिया को भी सनद मिले इसके लिए वह प्रयत्न करने लगा | हाईकोर्ट ने फिर से विचार किया और अंत में उत्तर दिया “जब तक इंगलैंड में स्त्री वकील नहीं तब तक भारत में वैसी प्रथा शुरू करना इंगलैंड का अपमान करने जैसा होगा |”

कार्नेलिया अब ऊब चुकी थी | जो उसे पसंद था, आता था, करना चाहती थी जिसके लिए अनथक प्रयास किए वह कर नहीं पा रही थी | अब बदलते ज़माने के साथ मिशनरी काम की ओर देखने की जनता की वृत्ति भी बदल गई थी | उसके माता-पिता भी नहीं रहे | खाली बैठी कार्नेलिया अपना मन दुनिया घुमने में लगाने लगी साथ ही लेखन द्वारा उसने अपने अनुभव लोगों के सामने रखे इसके द्वारा उसने अपने माता–पिता और अपनी बहन के कार्यों की प्रशंसा की | तत्कालीन सामाजिक जीवन से वे एकरूप हो गए थे | विषेशतः न्यायमूर्ती रानडे, रमाबाई रानडे, पंडिता रमाबाई इनके साथ उनका बहुत सम्बन्ध आया | उनकी अंग्रेजी पाठशाला में राजघरानो के बच्चे पढने आते थे | वहां अंग्रेजी संस्कृति, इतिहास आचार-विचार इस पर जोर रहता था | परन्तु इसी के साथ बराबरी से चल रहे गरीब हिन्दू और मुस्लिम लडके-लडकियों की स्कूलों में  भारतीय भाषाओँ में शिक्षा दी जाती थी | स्वच्छता, आरोग्य और आसपास के क्षेत्र का इतिहास-भूगोल वहां प्रमुखता से सीखाया जाता था |  
    
कार्नेलिया ने डा. रखमाबाई का अनुसरण किया उसने सारे दरवाजे खटखटाए परन्तु उसे न्याय नहीं मिला तो नहीं मिला ! उसने भी पुरुषों की पर्वाह नहीं की परन्तु, कटुता भी नहीं रखी | उसे जो यश मिला था उसका अहंकार न रख आनंदीबाई, रखमाबाई, काशीबाई कानिटकर, पंडिता रमाबाई की तरह शांत बनी रही |

स्त्रियों के बारे में लिखे गए कार्नेलिया के लेखों का बहुत महत्त्व है | परदे के पीछे रहनेवाली इन स्त्रियों के दुःख उसने समाज के सामने लाए | वे स्त्रियां हैं इसलिए परिवार, समाज और राज्यकर्ताओं ने उन पर हमेशा अन्याय ही किए थे | स्त्रियों के बारे में लिखे गए उसके लेखों का बड़ा महत्त्व है | परदे के पीछे रहनेवाली इन स्त्रियों के दुःख वह समाज के सामने लाई | इस सम्बन्ध में उसकी भूमिका किसी समाज सुधारक से कम नहीं रही | स्त्रियों के रूप में परिवार ने, समाज ने और राज्यकर्ताओं ने उन पर हमेशा जुल्म ही ढाए |
 जनाना डवेल्लर्स, बिटवीन द ट्वीलाइटस, इंडिया कालिंग इन तीन पुस्तकों में उसने इन अन्यायों की दास्ताँ बयां की है | अंग्रेजों ने उसके इन कार्यों की हमेशा प्रशंसा की है | भारतीय और आंग्ल दोनों ही संस्कृतियों द्वारा पुरुषी वर्चस्ववाले क्षेत्रों में स्त्रियों को प्रवेश नहीं करने देने की प्रवृतियों के विरुद्ध उसने सतत संघर्ष किया आवाज उठाती रही | अंत में यह जुनूनी भारत की पहली महिला वकील लन्दन में बस गई और ६ जुलाई १९५४ को उनका निधन हो गया |