Saturday, 19 January 2019

धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर - शिरीष सप्रे


धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर
शिरीष सप्रे

 रामायण-महाभारत में इन्हें धन के देवता के रूप में वर्णित किया गया है | इस पृथ्वी पर जितना भी धन है उसका अधिपति इन्ही को बतलाया गया है | भूगर्भ में जितना भी धन है उसका स्वामी भी इन्हीं को बतलाया गया है | यह सारी संपती इन्हें ब्रह्माजी द्वारा प्राप्त हुई है | इनकी उत्पत्ति महर्षि पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा और महर्षि भरद्वाज की पुत्री इलाविला के विवाह से हुई | कठोर तपश्चर्या से इन्होंने लोकपाल का पद प्राप्त किया |

श्वेत वर्ण, तुंदिल शरीर अष्ट दन्त गदाधारी कुबेर अपनी सत्तर योजन में फैली विस्तृत नगरी वैश्रवणी में विराजते हैं | इनके पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा नारदजी के शाप से मुक्त होने के पश्चात इन्हीं के समीप रहते हैं और अनुचर सदैव इनकी सेवा में रहते हैं | भगवान् कुबेर मनुष्य के अधिकार के अनुरूप कोष का प्रादुर्भाव या विरोभाव करते हैं | भगवान् शंकर ने कुबेर को अपना नित्य सखा माना है | प्रत्येक यज्ञ के अंत में इन वैश्रवण राजाधिराज को पुष्पांजलि दी जाती है | जो इस प्रकार है –
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने | नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ||

इस धन देवता कुबेर की नगरी का नाम अलकापुरी है | इनकी कृपा से ही भूगर्भ निधि प्राप्त होती है | निधि विद्या में निधि सजीव मानी गई है, जो स्वतः स्थानान्तरित होती है | योग्य और पुण्यात्मा शासक के समय में मणि - रत्नादी स्वतः प्रगट होते हैं | वर्तमान में जो स्वतः प्रगट रत्न विश्व में नहीं है इसका कारण अधिकांश मणि, रत्न लुप्त हो गए हैं क्योंकि, आज का मानव इन्हें उपभोग्य मानता है | यज्ञ दान के अवशेष का उपभोग हो यह वृति लुप्त हो गई है |

 एक बार देवी भगवती उमा पर इनकी कुदृष्टि गई तो इनका एक नेत्र जाता रहा और दूसरा पीला हो गया | अतः कुबेर एकाक्ष; एक आंखवाले पिंगली कहलाते हैं | इनका शरीर कुबडा होकर; अस्त्र गदा होकर वाहन पालकी है | कुबेर अपने पिता ऋषि विश्रवा को छोड़कर पितामह ब्रह्मा के पास चला गया और उनकी सेवा करने लगा | इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया साथ ही धन का स्वामी बनाकर लंका का अधिपति भी बना दिया और पुष्पक विमान प्रदान किया | इनकी पत्नी दानव मुरका की बेटी थी |

रावण इनका सौतेला भाई था उसने तपश्चर्या से ब्रह्मा को प्रसन्न कर मनचाहे रूप धारण करने एवं सिर कटने पर पुन्ह सिर उग आने का वरदान प्राप्त किया | वर पाकर वह लंका आया और कुबेर को लंका से निकाल बाहर किया | कुबेर निष्काषित होकर गंधमादन पर्वत पर आ गए |बौद्ध ग्रन्थ दीर्घ निकाय के अनुसार कुबेर पूर्व जन्म में ब्राह्मण होकर ईख के खेत के स्वामी थे और एक कोल्हू की आय दान कर देते थे | इस प्रकार २० हजार वर्षों तक वह दान करते रहे इसके फलस्वरूप इनका जन्म देवों के वंश में हुआ |

सतपथ ब्राह्मण में कुबेर को राक्षस बतलाया गया है और दुष्टों तथा चोरों का एवं यक्षों का नेता |  जैन, ब्राह्मण और वैदिक साहित्य में इनका उल्लेख कुबेर नाम से ही है | कुबेर उत्तर दिशा के दिगपाल हैं और इन्हें सोना निकालने की कला का जानकार भी बतलाया जाता है |

इनकी नगरी अलकापुरी कैलाश पर्वत पर होकर वहां उद्यान, झीलें एवं सुन्दर महल हैं | यहां से अलकनंदा निकली है | कौटिल्य ने लिखा है कुबेर की मूर्ती खजाने में स्थापित की जाना चाहिए | कुबेर का निवास वटवृक्ष कहा गया है | वराह पुराण के अनुसार कुबेर की पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को की जाती है, लेकिन आजकल दीपावली पर धन की पूजा की जाती है | इनको प्रसन्न करने के लिए महामृत्युन्जय के जप की कम से कम दस हजार आवृतियां जरुरी हैं | वैदिक साहित्य में इनका स्थान बहुत ऊँचा है | 

    
   


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