Thursday, 10 January 2019

स्वामी विवेकानंद – जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय - शिरीष सप्रे


स्वामी विवेकानंद –
 जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय
शिरीष सप्रे

स्वामी विवेकानंद भारतीय परंपरा की ऊर्जावान धारा के सर्वाधिक प्रगतिशील संत, विचारक और पुरोधा रहे हैं | कबीर के बाद धर्मान्धों, कर्मकांडवादियों, जातिवाद, शोषण, अत्याचार के विरुद्ध सक्रिय रचनात्मक अभियान चलानेवाले रहे हैं | भारत के नवनिर्माण के लिए स्वामीजी को देश के युवाओं से बड़ी अपेक्षाएं थी | वे भारतीय चिंतन, भारतीयता, हिन्दू धर्म पर जोर देते थे तो उसका अर्थ समूची मानव जाति के जीवन मूल्यों का अर्थ था | उन्होंने लिखा भी था कि ‘तुम हिन्दू कहलाने के अधिकारी हो, जब इस नाम को सुनते ही तुम्हारी रगों में शक्ति की विद्युत तरंग दौड़ जाए | लेकिन हिन्दू कहलाने के अधिकारी तब ही हो जब व्यक्ति का दुःख-दर्द तुम्हारे ह्रदय को इतना व्याकुल कर दे, मानो तुम्हारा अपना पुत्र संकट में हो |’

स्वामी विवेकानंद के पूरे जीवन दर्शन का प्रमुख वैचारिक बिंदु था कि, ‘भारतीय जीवन का मुख्य आधार धर्म है | हमारे देश का धर्म हिन्दू धर्म है | धर्म केवल वह धुरी मात्र नहीं है जिसके माध्यम से भारत में पुनर्जागरण हुआ है, बल्कि भारतीय ऋषियों ने जिस सत्य का साक्षात्कार किया है वह वही परम लक्ष्य है, जिसे पुनर्जाग्रत भारत को प्राप्त करना है | यह वह अमूल्य मणि है जिसके प्रकाश से हमें विश्व को प्रकाशित करना है |’

नवयुवकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था – ‘ए वीर साहस का अवलंबन करो, गर्व से कहो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, तुम चिल्लाकर कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी सब मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव-देवियां मेरे ईश्वर हैं, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है |’  

स्वामी विवेकानंद ने १८९७ ई. कहा था – ‘’सुदीर्घ रजनी अब समाप्त हुई जान पड़ती है | महादुख का प्राय: अंत ही प्रतीत होता है | महानिद्रा में निमग्न शव मानो जागृत हो रहा है | इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर अतीत के घनान्धकार को भेद करने में अनुश्रुतियां भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है | ज्ञान, भक्ति और कर्म के अनंत हिमालय स्वरुप  हमारी मातृभूमि भारत की हर एक चोटी पर प्रतिध्विनित होकर यह आवाज मृदु, दृढ़ परन्तु अभ्रांत स्वर में हमारे पास तक आ रही है | जितना समय बीतता है, उतनी ही वह और स्पष्ट तथा गंभीर होती जाती है और देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है | जड़ता धीरे-धीरे दूर हो रही है | जो अंधे हैं, वे देख नहीं सकते और जो विकृत बुद्धि हैं, वे ही समज नहीं सकते कि हमारी हमारी मातृभूमि अपनी निद्रा से जाग रही है | अब उसे कोई रोक नहीं सकता | अब यह फिर सो भी नहीं सकती | कोई बाह्यशक्ति इस समय इसे दबा नहीं सकती, क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जागकर खड़ा हो रहा है |’’

हे युवकों, सारे विश्व की दृष्टी आज भारत में लगी हुई है | तृतीय सहस्त्राताब्दी   में भारत को अपनी भूमिका निभानी है, विश्व को शांति, और अमृत्व के पथ पर नेतृत्व देना है | भारतीय संस्कृति और परम्पराओं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति की आज आवश्यकता है और वह भारत ही दे सकता है, क्योंकि आध्यात्मिकता भारत का मेरुदंड है, उसे तो जीने के लिए भी आध्यात्मिक होना ही पड़ेगा और ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ समस्त पृथ्वी के मानव को पथ दिखा कर अपना कर्तव्य निभाना होगा |

स्वामीजी कहते थे – ‘’अपने स्नायु बलवान बनाओ, आज हमें जिसकी आवश्यकता है, वह है, लोहे के पुट्ठे और फौलाद के स्नायु | हम लोग बहुत दिन रो चुके | अब और रोने की आवश्यकता नहीं | अब अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और ‘मर्द’ बनो | हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य बन सकें | हमें ऐसे सिद्धांतों की जरुरत है, जिससे हम मनुष्य हो सकें | हमें ऐसी सर्वांगसंपन्न शिक्षा चाहिए, जो हमें मनुष्य बना सके और यह रही सत्य की कसौटी, जो भी तुमको शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टी से दुर्बल बनाए उसे विष की तरह त्याग दो, उसमें जीवन शक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता | सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्रता है, वह ज्ञानस्वरूप है | सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो ह्रदय के अन्धकार को दूर कर दे, ह्रदय में स्फूर्ति भर दे | अपनेआप पर विश्वास रखो कि प्रत्येक की आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है | तभी तुम सारे भारतवर्ष को पुनर्जीवित कर सकोगे | फिर तो हम दुनिया के सभी देशों में खुले आम जाएंगे और आगामी १० वर्षों में हमारे भाव उन सब विभिन्न शक्तियों के एक अंशस्वरुप हो जाएंगे, जिनके द्वारा संसार का प्रत्येक राष्ट्र संगठित हो रहा है |”

स्वामी विवेकानंद ने हमें सीखाया है कि भारत का नवनिर्माण हम भारत के प्रति अगाध प्रेम रखकर ही कर सकते हैं | जिस किसीने स्वामीजी के अग्नि वचनों को सुना उसीमें राष्ट्रीयता की लहर आई है | भारत को यदि पुनर्जीवित करना है तो हमें अवश्य ही उसके लिए काम करना होगा |अनाथ, दरिद्र, निरक्षर और कृषक व श्रमिक ही हमारें लक्ष्य हैं, पहले उनके लिए काम करने के बाद अगर समय रहा तो कुलीन की बारी आएगी | विवेकानंद ने समाज की नब्ज पर हाथ रखा था | उनका तमाम चिंतन दरिद्र के झोपड़े से गुजरता था | शोषण के खात्मे से होकर अध्यात्म में जाता था |




No comments:

Post a Comment