Friday, 25 January 2019

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान - शिरीष सप्रे

स्वाधीनता की लड़ाई में महिलाओं का योगदान
शिरीष सप्रे

भारत में स्वाधीनता की लड़ाई हिंसक और अहिंसक दोनों ही तरीकों से लड़ी गई और इतिहास साक्षी है कि, अवसर मिलने पर भारत की महिलाऐं किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रही हैं और स्वाधीनता आन्दोलन कोई अपवाद नहीं | भारत के स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं ने पुरुषों के साथ महत्वपूर्ण भाग लिया है |

सन १७५७ में प्लासी की हार के बाद १७५७ से १८५७ तक पूरी एक शताब्दी का इतिहास इन विद्रोहों से भरा पड़ा है | इन सभी विद्रोहों में स्त्रियों की भी न केवल व्यापक भागीदारी रही, बल्कि कई बड़े विद्रोहों में उनका कुशल नेतृत्व रहा है | जैसे सन्यासी विद्रोहों का संचालन देवी चौधरानी ने, चुआड विद्रोह का रानी शिरोमणि ने, कित्तूर विद्रोह का रानी चेन्नमा ने किया |

१८५७ के विद्रोह में रानी लक्ष्मीबाई तथा बेगम हजरत महल का नाम विशेष उल्लेखनीय है | यों रानी रामगढ, रानी तुलसीपुर, रानी तेज बाई, बेगम जमानी आदि अन्य कई रानियों, बेगमों ने अपने जौहर कम नहीं दिखाए थे | महारानी तपस्विनी का भूमिगत क्रांति संगठन तो गजब का था |


इन सभी विद्रोही, क्रांतियों के दौरान हजारों हजार स्त्रियां फांसी, गोली का शिकार हुई | कई घर बर्बाद हुए पर क्रूर दमन के बावजूद, विद्रोह दबे नहीं, यहां - वहां फूटते रहे, जिनमें निचले तबकों की गरीब स्त्रियों की भागीदारी भी कम नहीं रही | कुका आंदोलन प्रसिद्ध है इस आंदोलन में हुकमी और इंदकौर नामक औरतों ने सक्रिय भाग लिया | महारानी तपस्विनी को कुछ समय के लिए जेल में बंद रखा गया था, वह महारानी लक्ष्मीबाई की भतीजी लगती थी | लक्ष्मीबाई की दो दासियों मुंदरा और काशीबाई ने भी अंत तक युद्ध में साथ दिया और वीरगति प्राप्त की |

पर अभी तक के इन विद्रोहों का स्वरुप व महत्त्व प्रायः क्षेत्रीय या स्थानीय था | इसलिए आगे चलकर राष्ट्रिय मुक्ति संघर्ष के रूप में देश व देश के बाहर जो क्रांतिकारी संगठन बने तरुण भारत सभा, भारत मेला, अभिनव भारत समिति, मित्र मेला, युगांतर दल, अनुशीलन समिति, दीपाली संघ, श्री संघ, ग़दर पार्टी, हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी, भारत नौजवान सभा, आदि | उनकी गुप्त कार्यवाहियों में बिखराव के बावजूद, उनका उददेश्य समान था और स्वरुप राष्ट्रिय |

इन संगठनों के संपर्क सूत्र न केवल पूरे भारत में फैले थे अपितु देश के बाहर ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, जापान, इटली तक प्रवासी भारतीय क्रांतिकारी इनसे जुड़े थे | बहुत से लोग तो अहिंसक लड़ाई लड़नेवाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहकर भी कांग्रेस के भीतर गरम दल की गरम जोश गतिविधियों और कांग्रेस से बाहर गुप्त क्रांति गतिविधियों से एक साथ जुड़े थे |

महिलाएं भी इन गतिविधियों में न केवल शामिल थी कई जगह नेतृत्व भी संभाल रही थी | गरम दल की एक अग्रणी कार्यकर्ती डा. ऐनी बेसंट ने होम रूल लीग का गठन कर होम रूल आंदोलन का नेतृत्व किया | प्रवासी भारतीयों में भीकाजी कामा ने क्रांति का शंख फूंकने में अग्रणी भूमिका निभाई | सरफरोश प्रीतिलता ने एक्शन ग्रुप का नेतृत्व कर स्वयं आगे बठकर शहादत को गले लगाया | गवर्नर के बंगले में चालाकी से प्रवेश कर दो छोटी लडकियों शांती और सुनीति ने गवर्नर पर गोली चलाकर सारे देश में तहलका मचा दिया | पूरा क्रांति इतिहास अनेक किशोरियों और युवतियों के इस प्रकार के साहसी कारनामों से भरा पड़ा है | यहां तक कि क्रांतिकारियों को गुप्त सहायता करने के आरोप में भी पकड़ी जाकर उन्हें दो से आठ साल तक की लम्बी सजाएं हुई हैं |

रानी मां के रूप में जानी जाने वाली रानी गेडीनिल्यु ने १९२० और १९३० के दशक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और औपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष किया | उन्हें अक्टूबर १९३२ में गिरफ्तार किया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई | वे १४ साल जेल में रही | उनके भाई जदोनांग को १९३१ में फांसी पर लटका दिया  गया | रानी मां कट्टर गांधीवादी थी और उन्होंने कहा था
- ‘महात्मा गांधी एक बार गुवाहाटी आए थे | तब उन्हें माला पहनाने का सम्मान मुझे मिला था | तब से मैं अहिंसा और महात्मा गांधी के सभी संदेशों की अनुयायी बन गई |’ गेडीनिल्यु को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने १९३७ में उस समय रानी की उपाधि दी थी, जब उन्हें पूर्वोत्तर क्षेत्र के दौरे के समय इस साहसी महिला के बारे में पता चला था | 
                                     

सन 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में देश की महिलाओं ने घुंघट और बुरका उतारकर आजादी की लड़ाई में बढ-चढ़ कर हिस्सा लिया | १९४२ के भारत छोडो आंदोलन में भी महिलाओं ने बढ-चढ़ कर भाग लिया | इसी तरह स्वतंत्रता-आंदोलन में दक्षिण भारतीय महिलाओं की न तो भूमिका कम रही ना ही बलिदान |  

Saturday, 19 January 2019

धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर - शिरीष सप्रे


धन – धान्य और समृद्धि के देवता – कुबेर
शिरीष सप्रे

 रामायण-महाभारत में इन्हें धन के देवता के रूप में वर्णित किया गया है | इस पृथ्वी पर जितना भी धन है उसका अधिपति इन्ही को बतलाया गया है | भूगर्भ में जितना भी धन है उसका स्वामी भी इन्हीं को बतलाया गया है | यह सारी संपती इन्हें ब्रह्माजी द्वारा प्राप्त हुई है | इनकी उत्पत्ति महर्षि पुलत्स्य के पुत्र विश्रवा और महर्षि भरद्वाज की पुत्री इलाविला के विवाह से हुई | कठोर तपश्चर्या से इन्होंने लोकपाल का पद प्राप्त किया |

श्वेत वर्ण, तुंदिल शरीर अष्ट दन्त गदाधारी कुबेर अपनी सत्तर योजन में फैली विस्तृत नगरी वैश्रवणी में विराजते हैं | इनके पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा नारदजी के शाप से मुक्त होने के पश्चात इन्हीं के समीप रहते हैं और अनुचर सदैव इनकी सेवा में रहते हैं | भगवान् कुबेर मनुष्य के अधिकार के अनुरूप कोष का प्रादुर्भाव या विरोभाव करते हैं | भगवान् शंकर ने कुबेर को अपना नित्य सखा माना है | प्रत्येक यज्ञ के अंत में इन वैश्रवण राजाधिराज को पुष्पांजलि दी जाती है | जो इस प्रकार है –
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने | नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ||

इस धन देवता कुबेर की नगरी का नाम अलकापुरी है | इनकी कृपा से ही भूगर्भ निधि प्राप्त होती है | निधि विद्या में निधि सजीव मानी गई है, जो स्वतः स्थानान्तरित होती है | योग्य और पुण्यात्मा शासक के समय में मणि - रत्नादी स्वतः प्रगट होते हैं | वर्तमान में जो स्वतः प्रगट रत्न विश्व में नहीं है इसका कारण अधिकांश मणि, रत्न लुप्त हो गए हैं क्योंकि, आज का मानव इन्हें उपभोग्य मानता है | यज्ञ दान के अवशेष का उपभोग हो यह वृति लुप्त हो गई है |

 एक बार देवी भगवती उमा पर इनकी कुदृष्टि गई तो इनका एक नेत्र जाता रहा और दूसरा पीला हो गया | अतः कुबेर एकाक्ष; एक आंखवाले पिंगली कहलाते हैं | इनका शरीर कुबडा होकर; अस्त्र गदा होकर वाहन पालकी है | कुबेर अपने पिता ऋषि विश्रवा को छोड़कर पितामह ब्रह्मा के पास चला गया और उनकी सेवा करने लगा | इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया साथ ही धन का स्वामी बनाकर लंका का अधिपति भी बना दिया और पुष्पक विमान प्रदान किया | इनकी पत्नी दानव मुरका की बेटी थी |

रावण इनका सौतेला भाई था उसने तपश्चर्या से ब्रह्मा को प्रसन्न कर मनचाहे रूप धारण करने एवं सिर कटने पर पुन्ह सिर उग आने का वरदान प्राप्त किया | वर पाकर वह लंका आया और कुबेर को लंका से निकाल बाहर किया | कुबेर निष्काषित होकर गंधमादन पर्वत पर आ गए |बौद्ध ग्रन्थ दीर्घ निकाय के अनुसार कुबेर पूर्व जन्म में ब्राह्मण होकर ईख के खेत के स्वामी थे और एक कोल्हू की आय दान कर देते थे | इस प्रकार २० हजार वर्षों तक वह दान करते रहे इसके फलस्वरूप इनका जन्म देवों के वंश में हुआ |

सतपथ ब्राह्मण में कुबेर को राक्षस बतलाया गया है और दुष्टों तथा चोरों का एवं यक्षों का नेता |  जैन, ब्राह्मण और वैदिक साहित्य में इनका उल्लेख कुबेर नाम से ही है | कुबेर उत्तर दिशा के दिगपाल हैं और इन्हें सोना निकालने की कला का जानकार भी बतलाया जाता है |

इनकी नगरी अलकापुरी कैलाश पर्वत पर होकर वहां उद्यान, झीलें एवं सुन्दर महल हैं | यहां से अलकनंदा निकली है | कौटिल्य ने लिखा है कुबेर की मूर्ती खजाने में स्थापित की जाना चाहिए | कुबेर का निवास वटवृक्ष कहा गया है | वराह पुराण के अनुसार कुबेर की पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को की जाती है, लेकिन आजकल दीपावली पर धन की पूजा की जाती है | इनको प्रसन्न करने के लिए महामृत्युन्जय के जप की कम से कम दस हजार आवृतियां जरुरी हैं | वैदिक साहित्य में इनका स्थान बहुत ऊँचा है | 

    
   


Monday, 14 January 2019

मकर संक्रांति उत्सव - शिरीष सप्रे


मकर संक्रांति उत्सव
शिरीष सप्रे

जब एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं | इस तरह बारह संक्रांतियां होती हैं | मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होते हैं | वैदिक साहित्य में उत्तरायण के लिए उद्गयन, देवयान आदि शब्द देखने को मिलते हैं | उत्तरायण के काल को शुभ समझा जाता था | पितामह भीष्म तब तक शर शय्या पर लेटे रहे, जब तक उत्तरायण का आरम्भ नहीं हुआ |

 इस संक्रांति का विशेष महत्त्व है | इसे मोक्षकारक भी माना जाता है | कर्क राशि से सूर्य दक्षिणायन होते हैं | इस तरह मकर से मिथुन तक सूर्य उत्तरायण व कर्क से धनु राशि तक दक्षिणायन रहते हैं | प्रत्येक राशि का ग्रहों को प्रभारी बनाकर अधिपति बनाया है | सूर्य को सिंह, चन्द्रमा को कर्क, मंगल को मेष व वृश्चिक, बुध को कन्या व मिथुन गुरू को धनु व मीन, शुक्र को वृषभ व तुला तथा शनि को मकर व कुम्भ राशि का अधिपति बनाया है |
       
वस्तुतः पृथ्वी ही सूर्य की परिक्रमा करती है, पर हमें यही आभास होता है की आकाश मार्ग में सूर्य ही स्थिर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है | सूर्य के इस दिखाऊ आकाश मार्ग को क्रांतिवृत्त का नाम दिया गया है | इस क्रांतिवृत्त को १२ समान भागों में विभक्त करके इन्हें मेष, वृषभ, मिथुन, धनु, मकर, कुम्भ, आदि राशिनाम दिए गए हैं | सालभर में इन बारह राशियों में से सूर्य के बारह संक्रमण होते हैं यानी बारह संक्रांतियां होती हैं | 

सूर्य के उत्तरायण प्रवेश के साथ स्वागत पर्व के रूप में मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है | सूर्य का उत्तरायण प्रवेश अत्यंत शुभ माना जाता है | उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले की उर्ध्वगति होती है उसे गोलोक वास की प्राप्ति होती है | भारतीय संस्कृति में इस पर्व का विशेष महत्त्व है | संक्रांति काल को पुण्य काल माना जाता है | उस दिन समुद्र या प्रयाग  गंगासागर जैसे तीर्थों में स्नान किया जाता है और उस दिन इन स्थानों पर बड़े मेले लगते हैं | संक्रांति में तिल का काफी प्रयोग होता है, विशेषकर दक्षिण भारत में |

महाराष्ट्र में तिल-गुड बांटा जाता है और कहा जाता है – ‘तिल-गुड लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए’ | बंगाल में तिल मिलाकर ‘तिलुआ’ नामक एक पदार्थ बनाया जाता है, इसलिए मकर संक्रांति को तिलुआ-संक्रांति भी कहते हैं | उत्तर भारत में दाल और भात की खिचड़ी पकाते हैं और दान देते हैं, इसलिए संक्रांति को खिचड़ी- संक्रांति भी कहते हैं |

कालिका पुराण के अनुसार उत्तरायण में सदैव तिल्ली का हवन करना श्रेष्ठ बताया है | जिस व्यक्ति का जन्म उत्तरायण में हुआ हो उसे भगवान् के मंदिर में और ब्राह्मण को स्वर्ण सहित तिल्ली दान करने पर कभी दुःख और शोक नहीं होगा | तिल्ली को ग्रंथों में पापनाशक बताया है | इसी दिन पवित्र नदियों में स्नान की भी परंपरा है | संक्रांति से ही सूर्योपासना प्रारम्भ करना शुभ फलदायक है |

इसी समय दक्षिण भारत में तीन दिवस चलनेवाला ‘पोंगल’ नामक महोत्सव मनाया जाता है | दूसरे दिन का उत्सव ‘सूर्य पोंगल’ कहलाता है | इस दिन दूध और चावल की खीर पकाई जाती है | पोंगल शब्द का अर्थ ही है पकाना | अर्थात् पोंगल एक प्रकार का पाकोत्सव है |

आज मकर संक्रांति एक सामाजिक उत्सव में रूपांतरित हो गई है और इसके साथ कुछ धार्मिक अंधविश्वास भी जुड़ गए हैं | वैसे तो वैदिक कृषक समाज ने इस उत्सव को जन्म दिया था और प्राचीनकाल से एक आनन्दोत्सव के रूप में इसको मनाया जाता रहा है | 
         

Thursday, 10 January 2019

स्वामी विवेकानंद – जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय - शिरीष सप्रे


स्वामी विवेकानंद –
 जिन्होंने भारत की उच्चतर सांस्कृतिक विरासत से कराया विश्व का परिचय
शिरीष सप्रे

स्वामी विवेकानंद भारतीय परंपरा की ऊर्जावान धारा के सर्वाधिक प्रगतिशील संत, विचारक और पुरोधा रहे हैं | कबीर के बाद धर्मान्धों, कर्मकांडवादियों, जातिवाद, शोषण, अत्याचार के विरुद्ध सक्रिय रचनात्मक अभियान चलानेवाले रहे हैं | भारत के नवनिर्माण के लिए स्वामीजी को देश के युवाओं से बड़ी अपेक्षाएं थी | वे भारतीय चिंतन, भारतीयता, हिन्दू धर्म पर जोर देते थे तो उसका अर्थ समूची मानव जाति के जीवन मूल्यों का अर्थ था | उन्होंने लिखा भी था कि ‘तुम हिन्दू कहलाने के अधिकारी हो, जब इस नाम को सुनते ही तुम्हारी रगों में शक्ति की विद्युत तरंग दौड़ जाए | लेकिन हिन्दू कहलाने के अधिकारी तब ही हो जब व्यक्ति का दुःख-दर्द तुम्हारे ह्रदय को इतना व्याकुल कर दे, मानो तुम्हारा अपना पुत्र संकट में हो |’

स्वामी विवेकानंद के पूरे जीवन दर्शन का प्रमुख वैचारिक बिंदु था कि, ‘भारतीय जीवन का मुख्य आधार धर्म है | हमारे देश का धर्म हिन्दू धर्म है | धर्म केवल वह धुरी मात्र नहीं है जिसके माध्यम से भारत में पुनर्जागरण हुआ है, बल्कि भारतीय ऋषियों ने जिस सत्य का साक्षात्कार किया है वह वही परम लक्ष्य है, जिसे पुनर्जाग्रत भारत को प्राप्त करना है | यह वह अमूल्य मणि है जिसके प्रकाश से हमें विश्व को प्रकाशित करना है |’

नवयुवकों को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा था – ‘ए वीर साहस का अवलंबन करो, गर्व से कहो कि मैं भारतवासी हूं, और प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, तुम चिल्लाकर कहो कि अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चांडाल भारतवासी सब मेरे भाई हैं, भारतवासी मेरे प्राण हैं, भारत के देव-देवियां मेरे ईश्वर हैं, भारत का समाज मेरे बचपन का झूला, मेरे जवानी की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है |’  

स्वामी विवेकानंद ने १८९७ ई. कहा था – ‘’सुदीर्घ रजनी अब समाप्त हुई जान पड़ती है | महादुख का प्राय: अंत ही प्रतीत होता है | महानिद्रा में निमग्न शव मानो जागृत हो रहा है | इतिहास की बात तो दूर रही, जिस सुदूर अतीत के घनान्धकार को भेद करने में अनुश्रुतियां भी असमर्थ हैं, वहीं से एक आवाज हमारे पास आ रही है | ज्ञान, भक्ति और कर्म के अनंत हिमालय स्वरुप  हमारी मातृभूमि भारत की हर एक चोटी पर प्रतिध्विनित होकर यह आवाज मृदु, दृढ़ परन्तु अभ्रांत स्वर में हमारे पास तक आ रही है | जितना समय बीतता है, उतनी ही वह और स्पष्ट तथा गंभीर होती जाती है और देखो, वह निद्रित भारत अब जागने लगा है | जड़ता धीरे-धीरे दूर हो रही है | जो अंधे हैं, वे देख नहीं सकते और जो विकृत बुद्धि हैं, वे ही समज नहीं सकते कि हमारी हमारी मातृभूमि अपनी निद्रा से जाग रही है | अब उसे कोई रोक नहीं सकता | अब यह फिर सो भी नहीं सकती | कोई बाह्यशक्ति इस समय इसे दबा नहीं सकती, क्योंकि यह असाधारण शक्ति का देश अब जागकर खड़ा हो रहा है |’’

हे युवकों, सारे विश्व की दृष्टी आज भारत में लगी हुई है | तृतीय सहस्त्राताब्दी   में भारत को अपनी भूमिका निभानी है, विश्व को शांति, और अमृत्व के पथ पर नेतृत्व देना है | भारतीय संस्कृति और परम्पराओं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति की आज आवश्यकता है और वह भारत ही दे सकता है, क्योंकि आध्यात्मिकता भारत का मेरुदंड है, उसे तो जीने के लिए भी आध्यात्मिक होना ही पड़ेगा और ‘बहुजनहिताय बहुजनसुखाय’ समस्त पृथ्वी के मानव को पथ दिखा कर अपना कर्तव्य निभाना होगा |

स्वामीजी कहते थे – ‘’अपने स्नायु बलवान बनाओ, आज हमें जिसकी आवश्यकता है, वह है, लोहे के पुट्ठे और फौलाद के स्नायु | हम लोग बहुत दिन रो चुके | अब और रोने की आवश्यकता नहीं | अब अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और ‘मर्द’ बनो | हमें ऐसे धर्म की आवश्यकता है, जिससे हम मनुष्य बन सकें | हमें ऐसे सिद्धांतों की जरुरत है, जिससे हम मनुष्य हो सकें | हमें ऐसी सर्वांगसंपन्न शिक्षा चाहिए, जो हमें मनुष्य बना सके और यह रही सत्य की कसौटी, जो भी तुमको शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टी से दुर्बल बनाए उसे विष की तरह त्याग दो, उसमें जीवन शक्ति नहीं है, वह कभी सत्य नहीं हो सकता | सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्रता है, वह ज्ञानस्वरूप है | सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो ह्रदय के अन्धकार को दूर कर दे, ह्रदय में स्फूर्ति भर दे | अपनेआप पर विश्वास रखो कि प्रत्येक की आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है | तभी तुम सारे भारतवर्ष को पुनर्जीवित कर सकोगे | फिर तो हम दुनिया के सभी देशों में खुले आम जाएंगे और आगामी १० वर्षों में हमारे भाव उन सब विभिन्न शक्तियों के एक अंशस्वरुप हो जाएंगे, जिनके द्वारा संसार का प्रत्येक राष्ट्र संगठित हो रहा है |”

स्वामी विवेकानंद ने हमें सीखाया है कि भारत का नवनिर्माण हम भारत के प्रति अगाध प्रेम रखकर ही कर सकते हैं | जिस किसीने स्वामीजी के अग्नि वचनों को सुना उसीमें राष्ट्रीयता की लहर आई है | भारत को यदि पुनर्जीवित करना है तो हमें अवश्य ही उसके लिए काम करना होगा |अनाथ, दरिद्र, निरक्षर और कृषक व श्रमिक ही हमारें लक्ष्य हैं, पहले उनके लिए काम करने के बाद अगर समय रहा तो कुलीन की बारी आएगी | विवेकानंद ने समाज की नब्ज पर हाथ रखा था | उनका तमाम चिंतन दरिद्र के झोपड़े से गुजरता था | शोषण के खात्मे से होकर अध्यात्म में जाता था |