Friday, 28 December 2018

मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी - शिरीष सप्रे


 मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी  
शिरीष सप्रे

संसार में आज अनेक प्रकार के कैलेंडर्स प्रचलित हैं | उनमें रोमन, भारतीय, यहूदी और इस्लामी कैलेंडर प्रमुख हैं | इनमें ३६५ दिन का रोमन कैलेंडर ही विश्व में अधिकाधिक उपयोग में लाया जाता है | कैलेंडर दो प्रकार के होते हैं - चान्द्र वर्ष और सौर वर्ष आधारित | भारत का हर परंपरागत किसान सौर वर्ष चन्द्र मास दोनों को जानता है |

सौर वर्ष ३६५ दिन से एक चौथाई अधिक का होता है | चन्द्र वर्ष ३५४ दिन का होता है | इसीलिए चन्द्र वर्ष गणना में तीन वर्षों में एक अधिक मास की व्यवस्था है | मुसमानों में वह नहीं है, तो इससे चन्द्र तिथि की उनकी गिनती तो ठीक ही रहती है | बस, धार्मिक पर्व भिन्न-भिन्न ऋतुओं एवं महीनों में पड़ते रहते हैं | जिसमें उन्हें कोई हर्ज नहीं दिखता | रमजान या मुहर्रम कभी गर्मी में होगा, कभी वर्षा, कभी शरद, कभी हेमंत, कभी शिशिर में |

ईसाइयों में चन्द्रमा से जुडा एक ही विशेष पर्व है – ईस्टर, जो कि २१ मार्च की पूर्णिमा या कि उसके बाद जब भी पहली पूर्णिमा पड़े, उसके बाद आने वाले पहले रविवार को पड़ता है और यह ईस्टर का त्यौहार सन १५८२ ईस्वी के पहले, जब जूलियन कैलेंडर बहुत दोषपूर्ण था तब तो भिन्न-भिन्न तारीखों में पड़ता ही था अब भी वह २२ मार्च से २५ अप्रैल के बीच भिन्न-भिन्न तारीखों में पड चूका है सुधारे हुए ग्रेगोरियन कैलेंडर के बावजूद | भारत में तो अधिक मास की व्यवस्था ऋग्वेद काल से भी पहले से है | इसलिए यहां चान्द्र और सौर वर्ष में सामंजस्य रखा जाता रहा है |
 
सभी प्राचीन संस्कृतियों में ‘काल गणना’ प्रमुखता से चन्द्र भ्रमण पर आधारित थी | क्योंकि,  पूर्ण चन्द्र से पूर्ण चन्द्र यह काल निरीक्षण की दृष्टी से बहुत सुविधाजनक था | बेबोलियन संस्कृति में भी चन्द्र वर्ष से सम्बंधित कैलेंडर अस्तित्व में थे, इतना ही नहीं तो उस काल में चन्द्र वर्ष का सौर वर्ष से सम्बन्ध लगाने के लिए अधिक महिना रखने की परिपाटी थी इस प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं |

इजिप्शियन संस्कृति में भर व्याध तारे को केंद्रीभूत मानकर कैलेंडर बनाए जाते थे | क्योंकि पूर्व दिशा में सूर्योदय के पूर्व व्याध तारे के दर्शन होने लगने के बाद कुछ समय में ही नाईल नदी में बाढ़ आ जाती थी | इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि व्याध का उदय और नाईल नदी में बाढ़ इसको कैलेंडर की दृष्टी से महत्त्व प्राप्त हो गया | ‘व्याध का पूर्व दिशा में उदय’ से पुनः व्याध का पूर्व में उदय यह काल लगभग ३६५ दिन का था, इस कारण ईजिप्शियन कैलेंडर ३६५ दिन का था | वर्ष में ३६५ दिन यह ईजिप्शियन संस्कृति की एक देन ही है |

प्राचीनकाल में यहूदी खगोल शास्त्रीय अध्ययन में अधिक रूचि नहीं लेते थे | कहा जाता है कि उन्होंने अपने पड़ोसी देश बेबीलोनिया का कैलेंडर ही अपनाया | सप्ताह सर्वप्रथम यहूदियों द्वारा ही समय की ईकाई के रूप में चलन में आया | यूनान के निवासियों ने भी चान्द्र वर्ष पर आधारित कैलेंडर बनाया था | इस कैलेंडर में भी बाद में कई सुधार किए गए |

चीनी कैलेंडर का साल आमतौर पर बारह चन्द्र-मासों का होता था | सौर वर्ष से सामंजस्य बिठाने के लिए जिस वर्ष तेरहंवा महीना जोड़ा जाता, उसे पूर्ण वर्ष कहा जाता था |  
           
आज जिस कैलेंडर से हम तारीख और महीने का हिसाब लगाते हैं उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं | क्योंकि, पोप ग्रेगोरी तेरहवें ने इस कैलेंडर में कई क्रांतिकारी सुधार किए थे | अंग्रेजी ‘कैलेंडर’ यह शब्द कैलेंडर्स इस रोमन शब्द पर से आया है | इसका अर्थ होता है महीने का प्रथम दिन | वैसे कैलेंडरों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और रोचक इतिहास रोमन रिपब्लिकन कैलेंडर का है | जो एक अलग लेख का विषय है | इनका ‘कैलेंडर’ चान्द्र कैलेंडर है |

लैटिन भाषा के शब्द ‘कलेंडे’ से कैलेंडर शब्द आया है | हिन्दी में कैलेंडर का अर्थ पंचांग-पत्रा या तिथि-पत्रक होता है | किसी भी कैलेंडर को देखने से हमें यह पता चलता है कि साल के किस महीने में कौन सा दिन किस तारीख या तिथि को पड़ता है या कौन सी तिथि या तारीख किस दिन पड़ती है | अधिकतर कैलेंडरों से त्यौहारों, पर्वों, ऐतिहासिक महत्त्व के दिनों का भी पता चलता है |

वैसे यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ‘कैलेंडर’ शब्द भी पूर्णतः भारतीय है | वास्तव में कैलेंडर शब्द ‘कालांतर’ शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है | विश्व  की किसी भी अन्य भाषा में समय को काल या कैलेंडर से मिलते-जुलते नाम से संबोधित नहीं किया जाता है | कैलेंडर शब्द की रोमन उत्त्पत्ति की कथा अविश्वसनीय और अजीब है | रोम में साहूकार लोग ब्याज का हिसाब लगाने की जिस पद्धति का उपयोग करते थे, उसे कैलेंडियम कहा जाता था | जिस दिन से नया वर्ष शुरू होता था, उस दिन पूरे नगर में ढोलक पीटकर, आवाजें लगाकर यह बताया जाता था कि नया वर्ष शुरू हो गया है |  
     
भारत में सृष्टि संवत्, विक्रम संवत्, कृत संवत्, मालव संवत्, शक संवत्, वर्धमान संवत्, बुद्ध निर्वाण संवत्, सप्तर्षि अथवा लौकिक संवत्, परशुराम संवत्’, आदि कैलेंडर्स प्रचलित हैं | ई. स. पूर्व ५४५ वर्ष पहले बौद्ध धर्म का आरम्भ वैशाख पूर्णिमा को हुआ था | विक्रम संवत् का उपयोग विशेष कर उत्तर भारत, राजस्थान और गुजरात में किया जाता है |

विक्रम संवत् को सानंद विक्रम संवत्, संवत् विक्रम, श्रीनृप विक्रम संवत् और मालव संवत् के नाम से भी जाना जाता है | इस संवत् का प्रारम्भ ई. पू . ५७ व ५८ के मध्य राजा विक्रमादित्य के द्वारा किया गया | यह संवत् धार्मिक महत्त्व का है तथा भारतीय वर्ष की शुरुआत ‘गुढीपाडवा’ से मानते हैं |

भले ही विक्रम संवत् सारे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो भी वह सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार वर्ष के दिनों में हमेशा कम या अधिक होते रहने के कारण दिन और महीनों की ठीक से गिनती करना सर्वसाधारण लोगों के लिए संभव हो नहीं पाता | इसी कारण से सारे देश में एकरूपता लाने के लिए भारत सरकार ने शक, संवत् में योग्य प्रकार से संशोधन कर ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ (पंचांग) ई.स. १९५७ में २२ मार्च से शुरू किया | (उस दिन भी संवत् १८२७ की चैत्र शुद्ध प्रतिपदा ही थी)

शक संवत् शक राजाओं के काल में शुरू हुआ था | दक्षिण की ओर के ब्राहमण ज्योतिष की गणना करने के लिए अथवा जन्म पत्रिका बनाने के लिए इसको उपयोग में लाते हैं | ई.स. की अपेक्षा शक संवत् ७८ वर्षों से पीछे (कम) है |

आजकल प्रायः सभी देशों में व्यवहारिक रूप से ही सही ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है | धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हिन्दू, मुस्लिम और कुछ अन्य धर्मावलम्बी धार्मिक पारिवारिक कार्यों के लिए अपने-अपने पंचांग या तिथि पत्रक उपयोग में लाते हैं | इसी तरह वित्त वर्ष पहली अप्रैल से ३१ मार्च तक बहुत से स्थानों पर माना जाता है |  
                           

No comments:

Post a Comment