Sunday, 23 December 2018

२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री - शिरीष सप्रे


२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री
शिरीष सप्रे

क्रिसमस का वृक्ष जर्मनी के संत निकोलस से सम्बद्ध माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष की ऐतिहासिकता के विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं | तथापि, क्रिसमस वृक्ष की परंपरा का उद्गम जर्मनी से माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष का वर्णन सर्वप्रथम १६०५ में मिलता है | इसका प्रचलन सर्वप्रथम जर्मनी में हुआ जिसका शुभारम्भ मार्टिन लूथर ने किया | क्रिसमस वृक्ष को सजाने की परंपरा आठवीं सदी में जर्मन धर्म प्रचारक बोनिप्रेस ने शुरू की थी, जबकि बहुत से लोग इसका श्रेय मार्टिन लूथर को भी देते हैं |

क्रिसमस का त्यौहार ईसा मसीह के जन्मोत्सव के रूप में विश्व के समस्त केथोलिक एवं प्रोटेस्टंट ईसाई धूमधाम से मनाते हैं | ईसाइयों का यह लोकप्रिय उत्सव है | जितना यह व्यापक तौर पर मनाया जाता है उतना धनी उत्सव और कोई नहीं | क्रिसमस वृक्ष की पहचान संभवतः बर्फीले प्रदेशों में  उत्पन्न होनेवाले ‘पाइन ट्री’ से की गई है | इसकी विशेषता यह है कि ठंड में भी यह वृक्ष न तो कुम्हलाता है ना ही मुरझाता है | इस वृक्ष को सदाबहार मानकर जर्मनी के धार्मिक जगत में इसके प्रति श्रद्धा, भक्ति, और निष्ठा प्रदर्शित की जाती है | पहले यह वृक्ष परंपरा का द्योतक था किन्तु, बाद में इसे धार्मिक आस्था का चोला पहनाकर होली क्राइस्ट के साथ सम्बद्ध कर दिया गया |

वृक्ष की पूजा करना यूरोप के मूर्तीपूजकों में एक सामान्य बात थी | ईसाई धर्म ग्रहण करने के बाद भी यह प्रथा उन लोगों में प्रचलित थी | स्केन्डेनविया के लोग क्रिसमस के अवसर पर पक्षियों के वृक्ष लगाते थे | यह प्रथा काफी समय तक प्रचलित रही | इसके पीछे उनकी यह धारणा थी कि ऐसा करने से घर में बुरी आत्मा प्रवेश नहीं करती | जर्मन के लोगों में मध्यशीत के अवकाश में अपने घरों के प्रवेशद्वार पर थेल ट्री लगाने की प्रथा का प्रचलन था |

क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा का सबंध जर्मनी की सेक्सको बर्ग नामकी रियासत के राजकुमार अल्बर्ट (१८४०-१८६१) से भी जोड़ा जाता है | ई. १८४० में राजकुमार अल्बर्ट ने इंगलैंड की महारानी विक्टोरिया से विवाह किया था | राजकुमार अल्बर्ट ने ही सर्वप्रथम १८४१ में विन्डसर केसले में क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा को समारोहपूर्वक आरंभ किया था | राजकुमार अल्बर्ट द्वारा स्थापित इसी परंपरा को तदुपरांत अंग्रेज ईसाईयों ने अपना लिया | 

 जर्मनवासी २४ दिसंबर को आदम और ईव्ह (हव्वा) के भोज के उपलक्ष्य में स्वर्ग के पेड़ (पैराडाईज ट्री) को सजाते थे |  जिस पर वेफर लटके रहते थे | यह मेजबानी के प्रतीक और ईसाइयों के उद्धार का संकेत था | बाद में विविध प्रकार की कूकीज ने वेफर का स्थान ले लिया | क्राइस्टके प्रतीक के रुप में मोमबतियां सजाई जाती थी |

हरियाली सदा खुशहाल जीवन का प्रतीक क्रिसमस ट्री सभी के लिए खुशी की मंगल कामना का धोतक है | क्रिसमस ट्री के बारे में यह कथा प्रचलित है कि एक लकड़हारा जंगल में अपने परिवार के साथ रहता था | जाड़े की एक रात में वह आग ताप रहा था की तभी किसी ने उसका दरवाजा खटखटाया | उसने दरवाजा खोला तो उसे बर्फ में खड़ा एक लड़का दिखाई दिया | वह उसे घर के भीतर ले आया | उसने उस लडके को भोजन कराया और फिर सब सो गए |

आधी रात को सारा जंगल नाच गाने से गूंज उठा | लकड़हारे के घर के सब लोग जाग गए | उन्होंने देखा कि वही लड़का नाच गा रहा है तथा परियां और देवदूत भी उसका साथ दे रहे हैं | लकड़हारा समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है | वे स्वयं प्रभु थे | जाते समय वही बालक लकड़हारे के घर के आगे एक पेड़ लगा गया, जो लकड़हारे की हर इच्छा पूरी करने लगा | यही बाद में क्रिसमस ट्री के नाम से मशहूर हो गया और बाद में हर क्रिसमस पर उस दिन की स्मृति में क्रिसमस ट्री घर के आगे लगाने की प्रथा चलन में आई |

क्रिसमस वृक्ष को अपनाएं जाने की यह परंपरा धीरे धीरे योरोपीय राष्ट्रों में पनपने लगी | कुछ समय पश्चात् डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे के उत्तरी भागों में रहनेवालों लोगों ने इस वृक्ष को प्रतिष्ठा दी | चूंकि डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे में पर्याप्त और घने जंगल थे अतः वहां के लोगों ने इन जंगलों से क्रिसमस वृक्षों के छोटे-छोटे पौधों को अपने आवासों में स्थान दिया | साथ ही आवासों में इस वृक्ष को सजाने-संवारने की प्रथा आरंभ की | चीन और जापान में इसका प्रचलन १८वीं और १९वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ | यहां क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी कागजों की सुन्दर डिज़ाइन द्वारा सजाया जाता है |

अमेरिका में सत्रहवीं शताब्दी में इस प्रथा का शुभारम्भ जर्मनवासियों के अमेरिका में बसने से हुआ | इस संबंध में यह भी कहा जाता है कि सम्राट जार्ज तृतीय के समय जर्मन सैनिकों की एक टुकड़ी ने क्रिसमस की रात क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया | इसके बाद वहां के लोग इसका अनुसरण करने लगे | जिससे यह परंपरा एक प्रथा बन गई |

इंगलैंड के केल्ट जाति के पुरोहितों ने क्रिसमस वृक्ष की परंपरा को धार्मिक उत्सव के रूप में जीवित किया और इन्हीं से संसार के ईसाई जगत को इस क्रिसमस वृक्ष की धार्मिक परंपरा विरासत में प्राप्त हुई | कैथलिक पादरियों के अनुसार यह वृक्ष पूजनीय एवं वन्दनीय होकर आशा, शांति और ज्ञान का प्रतीक है |          

     


          

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