Friday, 7 December 2018

मकड़ी का रहस्यमय जाला - भाग २ शिरीष सप्रे

मकड़ी का रहस्यमय जाला - भाग २
शिरीष सप्रे

 धरती पर सभी जीव-जन्तुओ और कीट-पतंगों के समान मकड़ी भी प्रकृति की अदभुत देन है | जो घर के कोने में जाला बुनते हुए देखी जा सकती है | उसका यह जाला रहस्यों से भरे किसी पिटारे से कम नहीं | मकड़ी के जिन जालों को आप यदाकदा झाड़ू से साफ़ कर देते हैं, वे वास्तव में असाधारण रूप से मजबूत होते हैं |
  
 एक दिलचस्प बात यह है कि मकड़ी के जाले में बुलेटप्रूफ जैकेट की तरह मजबूती होती है इसलिए कुछ विशेष जाति की मकड़ी के जाले चूहे या चिड़िया को भी पकड़ लेते हैं |

मकडी अंडे रखने के लिए कागज की तरह पतली सफेद तह बनाती है | चीनी वैद्यों के अनुसार इस तह को निकालकर गुड के साथ गोली बनाकर देने से किसी भी प्रकार का ज्वर उतरने के साथ आंखों से निकलनेवाला पानी भी बंद हो जाता है | 
  
हमारे जीवन से सम्बंधित प्राणी जगत से जुडी कई बातें मुहावरों-कहावतों और लोकोक्तियों के रूप में मान्यताएं प्रचलित हैं तथा मकड़ी भी इससे बच नहीं सकी है – विश्व के कुछ देशों में मकड़ी स्वस्थता एवं सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती है | अगर आपके पर्स से मकड़ी निकलती है तो निकट भविष्य में धन प्राप्त होगा, अगर पहने जानेवाले कपड़ों से मकड़ी निकलती है तो आप निकट भविष्य नए कपडे खरीदेंगे, इस प्रकार की मान्यताएं यूरोप में प्रचलित हैं | एक लोकोक्ति के अनुसार ब्राजील की महारानी बानू ने ब्रिटेन की महारानी को स्वस्थता एवं दीर्घायु के लिए मकड़ी के जाले से बनी विशेष ड्रेस भेजी थी |

योरप की एक नर मकड़ी अपने रेशम जैसे जाल में मक्खी को पकड़ कर अपनी पसंद की मादा को उपहार में देती है | लेकिन यह भेंट उसके जीवन की अंतिम भेंट होती है | क्योंकि, सहवास के बाद मादा नर को खा जाती है | ब्लैक विडो मकड़ी का उल्लेख पहले भी आ चूका है इसमें मादा सहवास के बाद नर को खा जाती है |

नेफिला प्रजाति की ‘वन सुंदरी’ (जंगल ब्यूटी) नाम से पुकारे जानेवाली मकड़ी सबसे मजबूत धागा निकालती है | इसका जाला करीब पांच फीट से अधिक व्यास का होता है | कांगो के जंगलों में मिलनेवाली कुछ प्रजातियां हवा में उड़ाते हुए भी जाला बन सकती हैं | मकड़ी एक बार में दो से लेकर तीन हजार तक अंडे देती है व अंडों को धागे से अच्छी तरह लपेट कर एक गुच्छे का रूप दे देती है | कुछ मकड़ियां अपने अंडे रेशम के कोकून में देती है | रेक्ट और आरजीरोनेटा प्रजाति की मकड़ियां पानी में रहती हैं | ये मकड़ियां पत्ते पर तैरती रहती हैं और जैसे ही कोई कीड़ा नजर आता है उसका शिकार कर लेती हैं | हिप्सा प्रजाति की मकड़ी घास के बीच जाला बनाकर रहती है |

मकडी के बच्चे शुरू से ही अपने माता-पिता जैसे दिखते हैं और तीन से लेकर बारह निर्मोचनो के बाद वयस्क बन जाते हैं | टरेनटुला नामक मकडी को पूर्ण वयस्क होने में ९-१० वर्ष लग जाते हैं | इस मकडी की आयु २५-३० वर्ष तक होती है | साधारणतया मकड़ी की आयु एक वर्ष से अधिक नहीं होती | टांगे टूट जाने पर इनकी दूसरी टांगें निकल आती हैं | इनकी एक से चार जोड़ी तक आंखें होती हैं |

विश्व में तीस हजार से भी अधिक प्रकार की मकड़ियां पाई जाती हैं | अंग्रेजी में इनमें से कई एक के नाम बड़े मनोरंजक रखे गए हैं – यथा ग्रीन स्पाइडर (हरी मकड़ी), ब्लैक विडो (काली विधवा), होम स्पाइडर (घरेलु मकड़ी), गार्डन स्पाइडर (कानन मकड़ी), वाटर स्पाइडर (जल मकड़ी), वुल्फ स्पाइडर ( भेडिया मकड़ी) और क्रैब स्पाइडर (केकड़ा मकड़ी) |

क्रैब स्पाइडर (केकड़ा मकड़ी) यह गिरगिट की तरह रंग बदलती है | सामान्यतया यह पीले रंग की होती है लेकिन परिस्थितियों के अनुसार अपना रंग बदल लेने की अद्भुत क्षमता इनमे होती है | यह आम तौर पर फूलों में छुपकर अपने शिकार की प्रतीक्षा करती हैं | यह मकड़ी जिस रंग के फूल पर बैठती है , उसका शरीर भी उस रंग का हो जाता है |

केथरीन क्रेग इस महिला संशोधिका ने मकड़ी के जालों का विशेषतौर पर अध्ययन किया है | सभी मकड़ियां धागे निर्मित करती हैं परन्तु , इन धागों में प्रथिनों के विविध प्रकार होते हैं | धागों की रचना विभिन्न प्रकार की और भिन्न कामों के लिए होती है | उदा. टरेंटूला जाति की मकड़ी रेशम का जो धागा तैयार करती है वह दो भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रथिनो से बना हुआ होता है | यह धागे घरों को अन्दर से अस्तर के रूप में लग जाते हैं | अंडों के आस-पास कोश तैयार करते हैं |

मकड़ी की एक जाति तो विशाल आकार के गोलाकार जाले निर्मित करती है | इन धागों की विशेषता यह है कि ये प्रकाश का परावर्तन विविध प्रकार से करते हैं | इस कारण ये जाल कुछ विशिष्ट परिस्थितियों के लिए और विशिष्ट कीटकों के लिए होना संभव है |
दक्षिण ब्राज़ील में नेफिला क्ले व्हिपेस जाति की मकड़ी विविध प्रकार के स्थानों पर बड़े गोलाकार जाल निर्मित करता है | यह संसार में सबसे बड़ा जाला बुननेवाली मकड़ी है | इस मकड़ी द्वारा बुना गया जाला, आदमी के कद के बराबर होता है | यह एक बड़े पहिये की शक्ल में होता है | नेफिला दिन-रात निरंतर जाले की निर्मिती ख़त्म होने तक भिड़ी रहती है | इसका जाल  वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना होता है और अत्यंत मजबूत भी होता है |       
यह मकड़ी धागों पर पीले रंग का द्रव्य डालती है | इस कारण यह जाले पीले रंग के नजर आते हैं और इस कारण कुछ लोग इन्हें सुनहरे जाले बुननेवाली मकड़ी कहते हैं | ये मकड़ियां पीले रंग के जाले क्यों निर्मित करती हैं इसका शोध करने के लिए एक विशिष्ट प्रकार की मधु मक्खी पर प्रयोग किया गया | तब यह पाया गया कि पीले जालों में सबसे अधिक मक्खियां फसी हुई मिली | दूसरी बात यह की जालों के धागों का पीला रंग विभिन्न स्थानों पर कम ज्यादा होता है और मधु मक्खियों को जाल का पता लगने नहीं देता |
  
 मधु मक्खियां फूलों के रंगों को पहचान लेती है | विशेष रूप से उनकी आंखें अति नीले रंग की किरणों के लिए संवेदनक्षम होने के कारण ये मक्खियां पंखुड़ियों की विविध पत्तियों की रचना को पहचान लेती हैं | मकड़ियों को मधुमक्खियों का यह गुण संभवतः मालूम है | कारण अर्जिओप नाम की मकड़ी स्वच्छ प्रकाश में अपना पारदर्शक जाल बनाती है | उस जाल का एक भाग टेढ़े मेढ़े धागों से बांधकर अलग किया हुआ होता है | सच कहें तो वह भाग एक फन्दा होता है |  क्योंकि,  उसकी रचना के कारण धागे सूर्य प्रकाश की अति नील किरणें परावर्तित करता है | यह फन्दा साधारणतया जाल के मध्य भाग में अधिक चिन्ह के समान तैयार किया हुआ होता है | स्वाभाविक ही है कि मधु मक्खियां धोखा जाती हैं और जाल में फस जाती हैं |

कुछ होशियार मक्खियां जाल को टाल सकती हैं | उन्हें पकड़ने के लिए यह मकड़ी प्रति दिन नए – नए फंदे तैयार करती है और इन्हें पकड़ती है | सिवाय इन जालों की अतिनील किरणें परावर्तित करने की क्षमता भी बदली जा सकती है जो मधुमक्खियां घास के फूलों का शोध अतिनील किरणों की सहायता से लेती हैं, वे मक्खियां इन मकड़ियों के जालों में विशेष रूप से फसती हैं | मानलो वे मक्खियां अतिनील किरणों को परावर्तित करनेवाली वस्तुओं को टालने लगी तो, उन्हें भोजन ही नहीं मिलेगा | प्रकृति में एकदूसरे को मात देने की कोशिशें चलती ही रहती हैं | मकड़ियों का जाल भी उन्हीं का एक भाग है | ......
        

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