Friday, 28 December 2018

मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी - शिरीष सप्रे


 मनोरंजक है कैलेंडर की कहानी  
शिरीष सप्रे

संसार में आज अनेक प्रकार के कैलेंडर्स प्रचलित हैं | उनमें रोमन, भारतीय, यहूदी और इस्लामी कैलेंडर प्रमुख हैं | इनमें ३६५ दिन का रोमन कैलेंडर ही विश्व में अधिकाधिक उपयोग में लाया जाता है | कैलेंडर दो प्रकार के होते हैं - चान्द्र वर्ष और सौर वर्ष आधारित | भारत का हर परंपरागत किसान सौर वर्ष चन्द्र मास दोनों को जानता है |

सौर वर्ष ३६५ दिन से एक चौथाई अधिक का होता है | चन्द्र वर्ष ३५४ दिन का होता है | इसीलिए चन्द्र वर्ष गणना में तीन वर्षों में एक अधिक मास की व्यवस्था है | मुसमानों में वह नहीं है, तो इससे चन्द्र तिथि की उनकी गिनती तो ठीक ही रहती है | बस, धार्मिक पर्व भिन्न-भिन्न ऋतुओं एवं महीनों में पड़ते रहते हैं | जिसमें उन्हें कोई हर्ज नहीं दिखता | रमजान या मुहर्रम कभी गर्मी में होगा, कभी वर्षा, कभी शरद, कभी हेमंत, कभी शिशिर में |

ईसाइयों में चन्द्रमा से जुडा एक ही विशेष पर्व है – ईस्टर, जो कि २१ मार्च की पूर्णिमा या कि उसके बाद जब भी पहली पूर्णिमा पड़े, उसके बाद आने वाले पहले रविवार को पड़ता है और यह ईस्टर का त्यौहार सन १५८२ ईस्वी के पहले, जब जूलियन कैलेंडर बहुत दोषपूर्ण था तब तो भिन्न-भिन्न तारीखों में पड़ता ही था अब भी वह २२ मार्च से २५ अप्रैल के बीच भिन्न-भिन्न तारीखों में पड चूका है सुधारे हुए ग्रेगोरियन कैलेंडर के बावजूद | भारत में तो अधिक मास की व्यवस्था ऋग्वेद काल से भी पहले से है | इसलिए यहां चान्द्र और सौर वर्ष में सामंजस्य रखा जाता रहा है |
 
सभी प्राचीन संस्कृतियों में ‘काल गणना’ प्रमुखता से चन्द्र भ्रमण पर आधारित थी | क्योंकि,  पूर्ण चन्द्र से पूर्ण चन्द्र यह काल निरीक्षण की दृष्टी से बहुत सुविधाजनक था | बेबोलियन संस्कृति में भी चन्द्र वर्ष से सम्बंधित कैलेंडर अस्तित्व में थे, इतना ही नहीं तो उस काल में चन्द्र वर्ष का सौर वर्ष से सम्बन्ध लगाने के लिए अधिक महिना रखने की परिपाटी थी इस प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं |

इजिप्शियन संस्कृति में भर व्याध तारे को केंद्रीभूत मानकर कैलेंडर बनाए जाते थे | क्योंकि पूर्व दिशा में सूर्योदय के पूर्व व्याध तारे के दर्शन होने लगने के बाद कुछ समय में ही नाईल नदी में बाढ़ आ जाती थी | इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि व्याध का उदय और नाईल नदी में बाढ़ इसको कैलेंडर की दृष्टी से महत्त्व प्राप्त हो गया | ‘व्याध का पूर्व दिशा में उदय’ से पुनः व्याध का पूर्व में उदय यह काल लगभग ३६५ दिन का था, इस कारण ईजिप्शियन कैलेंडर ३६५ दिन का था | वर्ष में ३६५ दिन यह ईजिप्शियन संस्कृति की एक देन ही है |

प्राचीनकाल में यहूदी खगोल शास्त्रीय अध्ययन में अधिक रूचि नहीं लेते थे | कहा जाता है कि उन्होंने अपने पड़ोसी देश बेबीलोनिया का कैलेंडर ही अपनाया | सप्ताह सर्वप्रथम यहूदियों द्वारा ही समय की ईकाई के रूप में चलन में आया | यूनान के निवासियों ने भी चान्द्र वर्ष पर आधारित कैलेंडर बनाया था | इस कैलेंडर में भी बाद में कई सुधार किए गए |

चीनी कैलेंडर का साल आमतौर पर बारह चन्द्र-मासों का होता था | सौर वर्ष से सामंजस्य बिठाने के लिए जिस वर्ष तेरहंवा महीना जोड़ा जाता, उसे पूर्ण वर्ष कहा जाता था |  
           
आज जिस कैलेंडर से हम तारीख और महीने का हिसाब लगाते हैं उसे ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं | क्योंकि, पोप ग्रेगोरी तेरहवें ने इस कैलेंडर में कई क्रांतिकारी सुधार किए थे | अंग्रेजी ‘कैलेंडर’ यह शब्द कैलेंडर्स इस रोमन शब्द पर से आया है | इसका अर्थ होता है महीने का प्रथम दिन | वैसे कैलेंडरों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और रोचक इतिहास रोमन रिपब्लिकन कैलेंडर का है | जो एक अलग लेख का विषय है | इनका ‘कैलेंडर’ चान्द्र कैलेंडर है |

लैटिन भाषा के शब्द ‘कलेंडे’ से कैलेंडर शब्द आया है | हिन्दी में कैलेंडर का अर्थ पंचांग-पत्रा या तिथि-पत्रक होता है | किसी भी कैलेंडर को देखने से हमें यह पता चलता है कि साल के किस महीने में कौन सा दिन किस तारीख या तिथि को पड़ता है या कौन सी तिथि या तारीख किस दिन पड़ती है | अधिकतर कैलेंडरों से त्यौहारों, पर्वों, ऐतिहासिक महत्त्व के दिनों का भी पता चलता है |

वैसे यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि ‘कैलेंडर’ शब्द भी पूर्णतः भारतीय है | वास्तव में कैलेंडर शब्द ‘कालांतर’ शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है | विश्व  की किसी भी अन्य भाषा में समय को काल या कैलेंडर से मिलते-जुलते नाम से संबोधित नहीं किया जाता है | कैलेंडर शब्द की रोमन उत्त्पत्ति की कथा अविश्वसनीय और अजीब है | रोम में साहूकार लोग ब्याज का हिसाब लगाने की जिस पद्धति का उपयोग करते थे, उसे कैलेंडियम कहा जाता था | जिस दिन से नया वर्ष शुरू होता था, उस दिन पूरे नगर में ढोलक पीटकर, आवाजें लगाकर यह बताया जाता था कि नया वर्ष शुरू हो गया है |  
     
भारत में सृष्टि संवत्, विक्रम संवत्, कृत संवत्, मालव संवत्, शक संवत्, वर्धमान संवत्, बुद्ध निर्वाण संवत्, सप्तर्षि अथवा लौकिक संवत्, परशुराम संवत्’, आदि कैलेंडर्स प्रचलित हैं | ई. स. पूर्व ५४५ वर्ष पहले बौद्ध धर्म का आरम्भ वैशाख पूर्णिमा को हुआ था | विक्रम संवत् का उपयोग विशेष कर उत्तर भारत, राजस्थान और गुजरात में किया जाता है |

विक्रम संवत् को सानंद विक्रम संवत्, संवत् विक्रम, श्रीनृप विक्रम संवत् और मालव संवत् के नाम से भी जाना जाता है | इस संवत् का प्रारम्भ ई. पू . ५७ व ५८ के मध्य राजा विक्रमादित्य के द्वारा किया गया | यह संवत् धार्मिक महत्त्व का है तथा भारतीय वर्ष की शुरुआत ‘गुढीपाडवा’ से मानते हैं |

भले ही विक्रम संवत् सारे भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो भी वह सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार वर्ष के दिनों में हमेशा कम या अधिक होते रहने के कारण दिन और महीनों की ठीक से गिनती करना सर्वसाधारण लोगों के लिए संभव हो नहीं पाता | इसी कारण से सारे देश में एकरूपता लाने के लिए भारत सरकार ने शक, संवत् में योग्य प्रकार से संशोधन कर ‘राष्ट्रीय कैलेंडर’ (पंचांग) ई.स. १९५७ में २२ मार्च से शुरू किया | (उस दिन भी संवत् १८२७ की चैत्र शुद्ध प्रतिपदा ही थी)

शक संवत् शक राजाओं के काल में शुरू हुआ था | दक्षिण की ओर के ब्राहमण ज्योतिष की गणना करने के लिए अथवा जन्म पत्रिका बनाने के लिए इसको उपयोग में लाते हैं | ई.स. की अपेक्षा शक संवत् ७८ वर्षों से पीछे (कम) है |

आजकल प्रायः सभी देशों में व्यवहारिक रूप से ही सही ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है | धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हिन्दू, मुस्लिम और कुछ अन्य धर्मावलम्बी धार्मिक पारिवारिक कार्यों के लिए अपने-अपने पंचांग या तिथि पत्रक उपयोग में लाते हैं | इसी तरह वित्त वर्ष पहली अप्रैल से ३१ मार्च तक बहुत से स्थानों पर माना जाता है |  
                           

Sunday, 23 December 2018

२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री - शिरीष सप्रे


२५ दिसंबर क्रिसमस ट्री
शिरीष सप्रे

क्रिसमस का वृक्ष जर्मनी के संत निकोलस से सम्बद्ध माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष की ऐतिहासिकता के विषय में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं | तथापि, क्रिसमस वृक्ष की परंपरा का उद्गम जर्मनी से माना जाता है | क्रिसमस वृक्ष का वर्णन सर्वप्रथम १६०५ में मिलता है | इसका प्रचलन सर्वप्रथम जर्मनी में हुआ जिसका शुभारम्भ मार्टिन लूथर ने किया | क्रिसमस वृक्ष को सजाने की परंपरा आठवीं सदी में जर्मन धर्म प्रचारक बोनिप्रेस ने शुरू की थी, जबकि बहुत से लोग इसका श्रेय मार्टिन लूथर को भी देते हैं |

क्रिसमस का त्यौहार ईसा मसीह के जन्मोत्सव के रूप में विश्व के समस्त केथोलिक एवं प्रोटेस्टंट ईसाई धूमधाम से मनाते हैं | ईसाइयों का यह लोकप्रिय उत्सव है | जितना यह व्यापक तौर पर मनाया जाता है उतना धनी उत्सव और कोई नहीं | क्रिसमस वृक्ष की पहचान संभवतः बर्फीले प्रदेशों में  उत्पन्न होनेवाले ‘पाइन ट्री’ से की गई है | इसकी विशेषता यह है कि ठंड में भी यह वृक्ष न तो कुम्हलाता है ना ही मुरझाता है | इस वृक्ष को सदाबहार मानकर जर्मनी के धार्मिक जगत में इसके प्रति श्रद्धा, भक्ति, और निष्ठा प्रदर्शित की जाती है | पहले यह वृक्ष परंपरा का द्योतक था किन्तु, बाद में इसे धार्मिक आस्था का चोला पहनाकर होली क्राइस्ट के साथ सम्बद्ध कर दिया गया |

वृक्ष की पूजा करना यूरोप के मूर्तीपूजकों में एक सामान्य बात थी | ईसाई धर्म ग्रहण करने के बाद भी यह प्रथा उन लोगों में प्रचलित थी | स्केन्डेनविया के लोग क्रिसमस के अवसर पर पक्षियों के वृक्ष लगाते थे | यह प्रथा काफी समय तक प्रचलित रही | इसके पीछे उनकी यह धारणा थी कि ऐसा करने से घर में बुरी आत्मा प्रवेश नहीं करती | जर्मन के लोगों में मध्यशीत के अवकाश में अपने घरों के प्रवेशद्वार पर थेल ट्री लगाने की प्रथा का प्रचलन था |

क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा का सबंध जर्मनी की सेक्सको बर्ग नामकी रियासत के राजकुमार अल्बर्ट (१८४०-१८६१) से भी जोड़ा जाता है | ई. १८४० में राजकुमार अल्बर्ट ने इंगलैंड की महारानी विक्टोरिया से विवाह किया था | राजकुमार अल्बर्ट ने ही सर्वप्रथम १८४१ में विन्डसर केसले में क्रिसमस वृक्ष की इस परंपरा को समारोहपूर्वक आरंभ किया था | राजकुमार अल्बर्ट द्वारा स्थापित इसी परंपरा को तदुपरांत अंग्रेज ईसाईयों ने अपना लिया | 

 जर्मनवासी २४ दिसंबर को आदम और ईव्ह (हव्वा) के भोज के उपलक्ष्य में स्वर्ग के पेड़ (पैराडाईज ट्री) को सजाते थे |  जिस पर वेफर लटके रहते थे | यह मेजबानी के प्रतीक और ईसाइयों के उद्धार का संकेत था | बाद में विविध प्रकार की कूकीज ने वेफर का स्थान ले लिया | क्राइस्टके प्रतीक के रुप में मोमबतियां सजाई जाती थी |

हरियाली सदा खुशहाल जीवन का प्रतीक क्रिसमस ट्री सभी के लिए खुशी की मंगल कामना का धोतक है | क्रिसमस ट्री के बारे में यह कथा प्रचलित है कि एक लकड़हारा जंगल में अपने परिवार के साथ रहता था | जाड़े की एक रात में वह आग ताप रहा था की तभी किसी ने उसका दरवाजा खटखटाया | उसने दरवाजा खोला तो उसे बर्फ में खड़ा एक लड़का दिखाई दिया | वह उसे घर के भीतर ले आया | उसने उस लडके को भोजन कराया और फिर सब सो गए |

आधी रात को सारा जंगल नाच गाने से गूंज उठा | लकड़हारे के घर के सब लोग जाग गए | उन्होंने देखा कि वही लड़का नाच गा रहा है तथा परियां और देवदूत भी उसका साथ दे रहे हैं | लकड़हारा समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है | वे स्वयं प्रभु थे | जाते समय वही बालक लकड़हारे के घर के आगे एक पेड़ लगा गया, जो लकड़हारे की हर इच्छा पूरी करने लगा | यही बाद में क्रिसमस ट्री के नाम से मशहूर हो गया और बाद में हर क्रिसमस पर उस दिन की स्मृति में क्रिसमस ट्री घर के आगे लगाने की प्रथा चलन में आई |

क्रिसमस वृक्ष को अपनाएं जाने की यह परंपरा धीरे धीरे योरोपीय राष्ट्रों में पनपने लगी | कुछ समय पश्चात् डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे के उत्तरी भागों में रहनेवालों लोगों ने इस वृक्ष को प्रतिष्ठा दी | चूंकि डेनमार्क, स्वीडन  तथा नार्वे में पर्याप्त और घने जंगल थे अतः वहां के लोगों ने इन जंगलों से क्रिसमस वृक्षों के छोटे-छोटे पौधों को अपने आवासों में स्थान दिया | साथ ही आवासों में इस वृक्ष को सजाने-संवारने की प्रथा आरंभ की | चीन और जापान में इसका प्रचलन १८वीं और १९वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुआ | यहां क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी कागजों की सुन्दर डिज़ाइन द्वारा सजाया जाता है |

अमेरिका में सत्रहवीं शताब्दी में इस प्रथा का शुभारम्भ जर्मनवासियों के अमेरिका में बसने से हुआ | इस संबंध में यह भी कहा जाता है कि सम्राट जार्ज तृतीय के समय जर्मन सैनिकों की एक टुकड़ी ने क्रिसमस की रात क्रिसमस ट्री को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया | इसके बाद वहां के लोग इसका अनुसरण करने लगे | जिससे यह परंपरा एक प्रथा बन गई |

इंगलैंड के केल्ट जाति के पुरोहितों ने क्रिसमस वृक्ष की परंपरा को धार्मिक उत्सव के रूप में जीवित किया और इन्हीं से संसार के ईसाई जगत को इस क्रिसमस वृक्ष की धार्मिक परंपरा विरासत में प्राप्त हुई | कैथलिक पादरियों के अनुसार यह वृक्ष पूजनीय एवं वन्दनीय होकर आशा, शांति और ज्ञान का प्रतीक है |          

     


          

Sunday, 9 December 2018


प्राणी जगत का एक विलक्षण प्राणी है – मकड़ी – भाग ३

शिरीष सप्रे 




मकड़ियों के बुने हुए कलात्मक जाले इन्हें एक दक्ष इंजिनियर प्रमाणित करते हैं | शिल्पकार के रूप में मकड़ी कीट जगत का एक अद्भुत प्राणी है | दुनिया के लगभग हर हिस्से में मकड़ियां पाई जाती हैं | सबसे छोटी मकड़ी का आकार आलपिन के ऊपरी सिरे जितना बड़ा होता है, जबकि  दक्षिण अमेरिका में पाई जानेवाली माइगेल नामक मकड़ी सात  से. मी. लम्बी होती है | इसकी टांगे करीब अठराह  से. मी. लम्बी होती है | यह विशालकाय मकड़ी छिपकली और छोटी चिड़ियाओं तक को खा जाती हैं |

मरुस्थलीय क्षेत्रों, दलदली जंगलों तक बर्फीले प्रदेशों में भयानक किस्म की जहरीली मकड़ियां पाई जाती हैं | उनमें से एक है मैक्सिकन टोरनटुला | यह छोटे-छोटे चूहों तक को खा जाती है और इसके घातक विष से मनुष्य की मृत्यु तक हो सकती है | इसी प्रकार अमेरिका में पाई जानेवाली ब्लैक विडो (काली विधवा) नामक मकड़ी इतनी जहरीली होती है कि यदि यह एक बार किसी को काट ले तो उसका बचना लगभग असंभव होता है | ब्लैक विडो के शरीर में विष बहुत कम मात्रा में बनता है |

मकडी की प्रणय क्रिया बहुत रोचक होती है | आकार में नर, मादा की अपेक्षा छोटा होता है | मादा को आकर्षित करने के लिए नर बहुत्त समय तक नृत्य करता है इसके पश्चात् नर और मादा क्रमशः जाले के एक-एक तार को एक के एक बाद खींचते जाते हैं | यह क्रम कार्य समाप्ति तक चलता रहता है फिर मादा अक्सर नर को खा जाती है | मकड़ियां दो से लेकर तीन हजार तक अंडे देती हैं | अंडों से बच्चे निकलने के बाद भूख के कारण यह एक दुसरे को खाने लगते हैं |

साधारण घरेलू मकडी को जैव वैज्ञानिक भाषा में थेरीडियोम कहा जाता है |  मकड़ियों का मुख्य भोजन कीट-पतंगे और कीडे-मकोडे है | जाला बनाकर शिकार को फसाने की कला में माहिर होने के कारण मकड़ियां आसानी से अपना पेट भर लेती हैं | कई मकड़ियां बिना खाए पिए साल डेढ़ साल तक जिन्दा रह सकती हैं | कुछ मकड़ियां घुमंतु अथवा पर्यटनप्रिय होती हैं | ये घोर आंधी में भी सहज भाव से सैंकड़ों-हजारों मील की उडान भरकर अपनी यात्रा बिना रुके तय कर लेती हैं | एक मकड़ी तो ऐसी भी होती है जो आकार में चींटी जैसी होती है और दीखती भी चींटी जैसी ही अधिकांश पक्षी मांस भक्षी पक्षियों को चींटी का मांस पसंद नहीं होता अतः इसका लाभ इसे मिल जाता है और चींटी बच जाती है | ट्रेपडोर मकड़ी के जाल में एक द्वार ऐसा होता है जिसमें से कीट, पतंगा, मक्खी, आदि अन्दर तो आ सकते हैं पर बाहर नहीं आ सकते |

मकड़ियों के जाल के तार इतने महीन होते हैं कि सैंकड़ों तारों को मिलाकर भी बाल जैसी मोटाई तैयार नहीं हो पाती | लेकिन महीन होने के बावजूद यह काफी मजबूत होते हैं | दरअसल यह जाल रहस्यों से भरे किसी पिटारे से कम आश्चर्यजनक नहीं, जिसका अस्तित्व लगभग २० करोड़ वर्षों से धरती पर बना हुआ है | इतने सालों में मकड़ी ने अपने जाले की बुनावट में जो सुधार किए हैं, उसकी कल्पनाशीलता को देखकर वैज्ञानिक तक आश्चर्य में पड गए हैं | मकड़ियों द्वारा तैयार की गई कुछ संरचनाएं ऐसी हैं कि मनुष्य के द्वारा अभियांत्रिकी के क्षेत्र में की जा रही खोजों को फीका साबित करने लायक सिद्ध हुई हैं |

 मकड़ी जाले के धागों में एक खास प्रकार का चिप-चिपा लगाती हैं, जिसके कारण जाल में फसा शिकार लाख कोशिशे करे छुट नहीं पाता, बल्कि और अधिक फसता चला जाता है | दरअसल मकड़ी का जाला एक किस्म की रेशम से  बना होता है | यह मकड़ी रेशम दुनिया में पाए जानेवाले सबसे मजबूत प्राकृतिक पदार्थों में से एक है | मकड़ी का जाल दुनिया की सबसे मजबूत चीजों में से एक है | अमेरिकी सेना इन मकड़ियों के रेशों से बुलेटप्रूफ जैकेट बनाती है | यह रेशा मनुष्य की जानकारी में आया दुनिया का अब तक का सबसे मजबूत पदार्थ है, यह स्टील से भी अधिक मजबूत और टिकाऊ है |

 यदि मकड़ी रेशे को कार्बन रेशे के साथ मिश्रित कर दिया जाए तो एक बहुत मजबूत पदार्थ बनता है, जो बहुत मुलायम भी रहता है | इस रेशे के कई उपयोग हैं | जैसे एक उपयोग तो यह है कि हड्डीयों को आपस में से जोड़ने वाले तंतु टूट जाने पर इस रेशे को वहां लगाया जा सकता है | मकड़ी का रेशा हमारे तंतुओं से २० गुना ज्यादा मजबूत है |

दरअसल अलग-अलग मकड़ियों के जालों की ताकत अलग-अलग होती है | दक्षिण अमेरिका में पाई जानेवाली एक मकड़ी ‘ब्लैक विडो’ (लैक्ट्रोडैक्स मेक्टन्स) सबसे मजबूत रेशम बनाती है | ब्लैक विडो का बनाया रेशम इतना मजबूत होता है कि इसे इसकी मूल लम्बाई से २७ प्रतिशत और खींचा जा सकता है और यह टूटता नहीं | कल्पना कीजिए कि मकड़ी के इस रेशम की मोटाई कितनी होगी | शायद ०.१ मि. मी. से भी कम, इतने पतले स्टील के तार को भी आप खींच कर सवा गुना नहीं कर पाएंगे | बाकी मकड़ियों के रेशम की ताकत इससे आधी ही होती है |

 बात इतनी ही नहीं दरअसल ब्लैक विडो दो किस्म के रेशम बनाती है | दूसरे किस्म का रेशम तो और भी असाधारण होता है | यह खींचतातो उतना नहीं है, मगर इसे तोड़ने के लिए काफी ताकत लगानी पड़ती है | हाल के अनुसंधान से पता चला है कि इसे तोड़ने के लिए जितनी ताकत लगती है, वह बुलेट प्रूफ जैकेट में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ केवलार से भी अधिक है |

तात्पर्य यह है कि घरों में बेमतलब दिख पड़ने वाला और गन्दगी का प्रतीक मानकर साफ कर दिए जानेवाला मकडी का जाला शोधकर्ताओं के लिए रहस्य का केंद्र बिंदु बना हुआ है | नए-नए शोधों से अभी न जाने कितने रहस्यों का प्रकटीकरण होगा, किन्तु एक बात निश्चित है कि अब तक जो कुछ भी जानकारी सामने आई है वह अभियांत्रिकी के क्षेत्र में एक नई दिशा साबित हो सकती है |        
               


Friday, 7 December 2018

मकड़ी का रहस्यमय जाला - भाग २ शिरीष सप्रे

मकड़ी का रहस्यमय जाला - भाग २
शिरीष सप्रे

 धरती पर सभी जीव-जन्तुओ और कीट-पतंगों के समान मकड़ी भी प्रकृति की अदभुत देन है | जो घर के कोने में जाला बुनते हुए देखी जा सकती है | उसका यह जाला रहस्यों से भरे किसी पिटारे से कम नहीं | मकड़ी के जिन जालों को आप यदाकदा झाड़ू से साफ़ कर देते हैं, वे वास्तव में असाधारण रूप से मजबूत होते हैं |
  
 एक दिलचस्प बात यह है कि मकड़ी के जाले में बुलेटप्रूफ जैकेट की तरह मजबूती होती है इसलिए कुछ विशेष जाति की मकड़ी के जाले चूहे या चिड़िया को भी पकड़ लेते हैं |

मकडी अंडे रखने के लिए कागज की तरह पतली सफेद तह बनाती है | चीनी वैद्यों के अनुसार इस तह को निकालकर गुड के साथ गोली बनाकर देने से किसी भी प्रकार का ज्वर उतरने के साथ आंखों से निकलनेवाला पानी भी बंद हो जाता है | 
  
हमारे जीवन से सम्बंधित प्राणी जगत से जुडी कई बातें मुहावरों-कहावतों और लोकोक्तियों के रूप में मान्यताएं प्रचलित हैं तथा मकड़ी भी इससे बच नहीं सकी है – विश्व के कुछ देशों में मकड़ी स्वस्थता एवं सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती है | अगर आपके पर्स से मकड़ी निकलती है तो निकट भविष्य में धन प्राप्त होगा, अगर पहने जानेवाले कपड़ों से मकड़ी निकलती है तो आप निकट भविष्य नए कपडे खरीदेंगे, इस प्रकार की मान्यताएं यूरोप में प्रचलित हैं | एक लोकोक्ति के अनुसार ब्राजील की महारानी बानू ने ब्रिटेन की महारानी को स्वस्थता एवं दीर्घायु के लिए मकड़ी के जाले से बनी विशेष ड्रेस भेजी थी |

योरप की एक नर मकड़ी अपने रेशम जैसे जाल में मक्खी को पकड़ कर अपनी पसंद की मादा को उपहार में देती है | लेकिन यह भेंट उसके जीवन की अंतिम भेंट होती है | क्योंकि, सहवास के बाद मादा नर को खा जाती है | ब्लैक विडो मकड़ी का उल्लेख पहले भी आ चूका है इसमें मादा सहवास के बाद नर को खा जाती है |

नेफिला प्रजाति की ‘वन सुंदरी’ (जंगल ब्यूटी) नाम से पुकारे जानेवाली मकड़ी सबसे मजबूत धागा निकालती है | इसका जाला करीब पांच फीट से अधिक व्यास का होता है | कांगो के जंगलों में मिलनेवाली कुछ प्रजातियां हवा में उड़ाते हुए भी जाला बन सकती हैं | मकड़ी एक बार में दो से लेकर तीन हजार तक अंडे देती है व अंडों को धागे से अच्छी तरह लपेट कर एक गुच्छे का रूप दे देती है | कुछ मकड़ियां अपने अंडे रेशम के कोकून में देती है | रेक्ट और आरजीरोनेटा प्रजाति की मकड़ियां पानी में रहती हैं | ये मकड़ियां पत्ते पर तैरती रहती हैं और जैसे ही कोई कीड़ा नजर आता है उसका शिकार कर लेती हैं | हिप्सा प्रजाति की मकड़ी घास के बीच जाला बनाकर रहती है |

मकडी के बच्चे शुरू से ही अपने माता-पिता जैसे दिखते हैं और तीन से लेकर बारह निर्मोचनो के बाद वयस्क बन जाते हैं | टरेनटुला नामक मकडी को पूर्ण वयस्क होने में ९-१० वर्ष लग जाते हैं | इस मकडी की आयु २५-३० वर्ष तक होती है | साधारणतया मकड़ी की आयु एक वर्ष से अधिक नहीं होती | टांगे टूट जाने पर इनकी दूसरी टांगें निकल आती हैं | इनकी एक से चार जोड़ी तक आंखें होती हैं |

विश्व में तीस हजार से भी अधिक प्रकार की मकड़ियां पाई जाती हैं | अंग्रेजी में इनमें से कई एक के नाम बड़े मनोरंजक रखे गए हैं – यथा ग्रीन स्पाइडर (हरी मकड़ी), ब्लैक विडो (काली विधवा), होम स्पाइडर (घरेलु मकड़ी), गार्डन स्पाइडर (कानन मकड़ी), वाटर स्पाइडर (जल मकड़ी), वुल्फ स्पाइडर ( भेडिया मकड़ी) और क्रैब स्पाइडर (केकड़ा मकड़ी) |

क्रैब स्पाइडर (केकड़ा मकड़ी) यह गिरगिट की तरह रंग बदलती है | सामान्यतया यह पीले रंग की होती है लेकिन परिस्थितियों के अनुसार अपना रंग बदल लेने की अद्भुत क्षमता इनमे होती है | यह आम तौर पर फूलों में छुपकर अपने शिकार की प्रतीक्षा करती हैं | यह मकड़ी जिस रंग के फूल पर बैठती है , उसका शरीर भी उस रंग का हो जाता है |

केथरीन क्रेग इस महिला संशोधिका ने मकड़ी के जालों का विशेषतौर पर अध्ययन किया है | सभी मकड़ियां धागे निर्मित करती हैं परन्तु , इन धागों में प्रथिनों के विविध प्रकार होते हैं | धागों की रचना विभिन्न प्रकार की और भिन्न कामों के लिए होती है | उदा. टरेंटूला जाति की मकड़ी रेशम का जो धागा तैयार करती है वह दो भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रथिनो से बना हुआ होता है | यह धागे घरों को अन्दर से अस्तर के रूप में लग जाते हैं | अंडों के आस-पास कोश तैयार करते हैं |

मकड़ी की एक जाति तो विशाल आकार के गोलाकार जाले निर्मित करती है | इन धागों की विशेषता यह है कि ये प्रकाश का परावर्तन विविध प्रकार से करते हैं | इस कारण ये जाल कुछ विशिष्ट परिस्थितियों के लिए और विशिष्ट कीटकों के लिए होना संभव है |
दक्षिण ब्राज़ील में नेफिला क्ले व्हिपेस जाति की मकड़ी विविध प्रकार के स्थानों पर बड़े गोलाकार जाल निर्मित करता है | यह संसार में सबसे बड़ा जाला बुननेवाली मकड़ी है | इस मकड़ी द्वारा बुना गया जाला, आदमी के कद के बराबर होता है | यह एक बड़े पहिये की शक्ल में होता है | नेफिला दिन-रात निरंतर जाले की निर्मिती ख़त्म होने तक भिड़ी रहती है | इसका जाल  वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना होता है और अत्यंत मजबूत भी होता है |       
यह मकड़ी धागों पर पीले रंग का द्रव्य डालती है | इस कारण यह जाले पीले रंग के नजर आते हैं और इस कारण कुछ लोग इन्हें सुनहरे जाले बुननेवाली मकड़ी कहते हैं | ये मकड़ियां पीले रंग के जाले क्यों निर्मित करती हैं इसका शोध करने के लिए एक विशिष्ट प्रकार की मधु मक्खी पर प्रयोग किया गया | तब यह पाया गया कि पीले जालों में सबसे अधिक मक्खियां फसी हुई मिली | दूसरी बात यह की जालों के धागों का पीला रंग विभिन्न स्थानों पर कम ज्यादा होता है और मधु मक्खियों को जाल का पता लगने नहीं देता |
  
 मधु मक्खियां फूलों के रंगों को पहचान लेती है | विशेष रूप से उनकी आंखें अति नीले रंग की किरणों के लिए संवेदनक्षम होने के कारण ये मक्खियां पंखुड़ियों की विविध पत्तियों की रचना को पहचान लेती हैं | मकड़ियों को मधुमक्खियों का यह गुण संभवतः मालूम है | कारण अर्जिओप नाम की मकड़ी स्वच्छ प्रकाश में अपना पारदर्शक जाल बनाती है | उस जाल का एक भाग टेढ़े मेढ़े धागों से बांधकर अलग किया हुआ होता है | सच कहें तो वह भाग एक फन्दा होता है |  क्योंकि,  उसकी रचना के कारण धागे सूर्य प्रकाश की अति नील किरणें परावर्तित करता है | यह फन्दा साधारणतया जाल के मध्य भाग में अधिक चिन्ह के समान तैयार किया हुआ होता है | स्वाभाविक ही है कि मधु मक्खियां धोखा जाती हैं और जाल में फस जाती हैं |

कुछ होशियार मक्खियां जाल को टाल सकती हैं | उन्हें पकड़ने के लिए यह मकड़ी प्रति दिन नए – नए फंदे तैयार करती है और इन्हें पकड़ती है | सिवाय इन जालों की अतिनील किरणें परावर्तित करने की क्षमता भी बदली जा सकती है जो मधुमक्खियां घास के फूलों का शोध अतिनील किरणों की सहायता से लेती हैं, वे मक्खियां इन मकड़ियों के जालों में विशेष रूप से फसती हैं | मानलो वे मक्खियां अतिनील किरणों को परावर्तित करनेवाली वस्तुओं को टालने लगी तो, उन्हें भोजन ही नहीं मिलेगा | प्रकृति में एकदूसरे को मात देने की कोशिशें चलती ही रहती हैं | मकड़ियों का जाल भी उन्हीं का एक भाग है | ......