Sunday, 25 November 2018

कीट जगत का एक अजूबा - मकड़ी भाग १ शिरीष सप्रे


कीट जगत का  एक अजूबा - मकड़ी भाग १
शिरीष सप्रे

अपन जिस स्थान पर रहते हैं वहां केवल मनुष्यों का ही रहवास नहीं होता चूहे, झींगुर, चीटिंयां जैसे अन्य प्राणी भी रहते हैं | उन्हीं में से एक मकड़ी भी है | कीट जगत में मकड़ी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है | इसे जो स्थान योग्य लगता है वहीँ यह अपना जाला बना लेती है और भक्ष्य की राह देखने लगती है | 

मकड़ी ही एक ऐसा जीव है जो अन्य कीड़ों के शरीर का रस चूसकर जिन्दा रहती है | किसी भी कीट विज्ञानी ने आज तक किसी मकड़ी को भोजन चबाते या टुकडे निगलते नहीं देखा | पक्षियों से लेकर चूहों तक का शिकार करनेवाली मरुस्थलीय प्रदेशों, गर्म दलदली जंगलों व बर्फीले स्थानों पर मिलनेवाली टेरेंतुला मकड़ी भी अपने मुंह से शक्तिशाली पाचक रस निकालकर अपने शिकार के शरीर को गला डालती है | इसके पश्चात् इसे रस की तरह चूस डालती है | 

यदि हम घर साफ़ करने निकलें तो हमें अनेक जालें दिख पड़ेंगे | वैसे हमें कष्ट न देने वाली होने के कारण हम इसकी उपेक्षा करते हैं और इसी कारण हमें इसकी कोई विशेष जानकारी भी नहीं होती | परन्तु मकड़ी की दुनिया और जीवन बहुरंगी है इसलिए उसकी अपरिचित कहानी निश्चय ही रोचक एवं मनोरंजक लगेगी इसमें कोई शक नहीं |

शायद ही संसार में कोई ऐसा स्थान हो जहां मकड़ी ना पाई जाती हो | सागर से लेकर सागरमाथा, जंगलो, चरागाहों, दलदल, रेगिस्तानों, भूमिगत गुफाओं आदि सभी स्थानों पर मकड़ी पाई जाती है | मकड़ी की ४०,००० से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं | कुछ समुद्री मकड़ियां समुद्री पानी के किनारें स्थित चट्टानों से बनी कंदराओं में भी रहती हैं | जहाँ वे समुद्र में तैरने वाले नन्हें कीड़ों आदि को खाकर अपना जीवन निर्वाह करती हैं |

हाल ही में ईरान के तेहरान विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं नें मकड़ी की एक नई प्रजाति की खोज की है इसका नाम ‘लायकोसा अर्गोगी’ रखा गया है, जो कि जेके रोलिंग की किताब पर बनी विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म हैरी पाटर के बोलते मकडे के नाम पर रखा गया है |  पैर को छोड़कर इस मकड़ी का शरीर एक इंच लम्बा है | मकड़ी के शरीर के उपरी हिस्से में दो काले और तीन सफेद बालों की धारियां हैं | यह मकड़ी दक्षिणी - पूर्वी ईरान के केरमान प्रान्त के पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है |

चालीस करोड़ वर्ष पूर्व कीटकों ने इस पृथ्वी पर पदार्पण किया उसके कुछ समय बाद मकड़ी, बिच्छु इस वर्ग के प्राणी अवतीर्ण हुए | इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य से भी अनेक वर्षों पूर्व यह संसार में आई | कीटकों को छः पांव होने के कारण इस वर्ग को षटपाद कहते हैं | परन्तु बिच्छु को आठ पांव होने के कारण इसे अष्टपाद प्राणियों में गिनेंगे | मकड़ियों के चलने का ढंग काफी विचित्र होता है | चलते वक्त अगर बाई तरफ की पहली और तीसरी टांग उठाती है तो दाएं तरफ की दूसरी तथा चौथी | इसके बाद अगले कदम के लिए बाएँ तरफ की दूसरी व चौथी टांग के साथ दाएं तरफ की पहली और तीसरी उठाती है |

मकड़ियों का विकास कीटकों के साथ ही हुआ | कुछ कीटक ही रेशम जैसे धागे बना सकते हैं और वह भी केवल ये धागे स्वयं के आस-पास कोश बनाने के लिए | परन्तु सभी मकड़ियां धागे बनाती हैं | प्रत्येक मकड़ी के उदर पर रेशम ग्रंथियां होती हैं और तंतुओं की सहायता से वे धागे वातावरण में छोड़ती रहती  हैं | इसके अलावा इन धागों को बुनकर या व्यवस्थित रचना कर उनसे विविध आकार के छोटे-मोटे जालें ये बनाती हैं | मकड़ी की जाति के अनुसार अनेक प्रकार की रेशम बनती है | पानी के अन्दर बनाए गए जाले के अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के जाले मकड़ियां बुनती हैं |

मकड़ियों के शरीर की बढ़ोत्री केंचुली छोड़कर होती है | ऐसे समय में वे अपने जाल के आश्रय में चली जाती हैं | कुछ मकड़ियां फलित अंडे के आस-पास कोश बनाती हैं और कोश से बच्चा बाहर निकलता है तब पहला धागा निकालकर उसके आधार पर हवा में तैरनेवाले जीव का दुनिया में पदार्पण होता है | नर मकड़ी अपना जाल मादा मकड़ी को सन्देश देने के लिए उपयोग में लाती है | इसके लिए वह धागे को विशिष्ट पद्धति से हिलाती है | 

मकड़ी के विकास में और भी कुछ घटक हैं | उदा. उसकी भक्ष्य पकड़ने की पद्धति | अधिकांश मकड़ियां अपने भक्ष्य को विष चुभोती हैं | इसके अलावा दुसरे प्रकार भी मनोरंजक हैं | एक छोटे आकार की मकड़ी अपने भक्ष्य के आस-पास धागों का कड़ा आवरण बहुत तेजी से बनाकर भक्ष्य को एक ही स्थान पर जाम कर देती है | दीमक खानेवाली मकड़ी के सबसे अगले पांवों की जोड़ी पर विषग्रंथि होती हैं | कुछ मकड़ियां भक्ष्य को स्थिर करने के लिए भक्ष्य के शरीर पर गोंद जैसा चिप-चिपा द्रव्य फेंकती हैं | संकट आने पर शत्रु से दूर भागने के लिए कुछ जातियां अपने को गोल बना लेती हैं और तेजी से लुढकते हुए दूर चली जाती हैं |

कुछ मकड़ियां जहरीली होती हैं इसलिए लोग इनसे डरते हैं | केवल दो जातियों को छोड़कर सभी मकड़ियों में विष-ग्रंथियां होती हैं | ये ग्रंथियां नियंत्रित होती हैं तथा विशेष मौकों पर ही मकड़ी इनका प्रयोग करती है | जो मकड़ी जाले बनाती है वह अपने शिकार को पकड़ने के लिए इस विष ग्रंथी का प्रयोग नहीं करती | जो फूलों में छिपकर कीड़ों-मकोड़ों को उनके पंखों से पकड़ती हैं वे अपने शिकार को विष से मार देती हैं | मकड़ियां घिर जाने पर इस विष को अंतिम अस्त्र के रूप में आत्म रक्षा के लिए प्रयोग में लाती हैं |

मकड़ी के काटने से तेज दर्द होता है, आदमी बीमार भी पद सकता है | इस प्रकार की मकड़ियां आस्ट्रेलिया में पाई जाती हैं | बड़े आकार की घातक समझी जानेवाली कभी भी मनुष्य को नहीं मारती | हां, हाथ-पांव पर कहीं काटती है तो सूजन हो जाती है तथा कुछ दिनों तक दर्द रहता है | अधिकांश मकड़ियां बर्रों के मुकाबले कम हानिकारक होती हैं | कुछ मकड़ियां तो हाथ से पकडे जाने पर भी नहीं काटती |

ज्यादातर मकड़ियों का विष मनुष्य या बड़े जानवरों को हानि नहीं पहुंचाता परन्तु अमेरिका में पाई जाने वाली मकड़ी ‘ब्लैक विडो’ का विष मनुष्य को आसानी से मार सकता है | यह सबसे मजबूत रेशम बनाने के लिए भी मशहूर है | ‘क्रेव स्पाइडर’ नामकी मकड़ी में अपने शरीर का रंग बदलने की क्षमता होती है जिससे वह शिकार को आसानी से मार सकती है | जम्पिंग या कूदनेवाली मकड़ी की आँखें बहुत तेज होती हैं तथा तेजी से भाग रहे शिकार को कूदकर झट पकड़ लेती हैं | अमेरिका के रेड इंडियन व अमेजन जंगलों में रहनेवाले कई आदिवासी इन मकड़ियों को देवी मानते हैं व इनकी पूजा करते हैं | एक अंग्रेजी कविता की यह पंक्तियां मकड़ियों पर ही केन्द्रित है- अगर आपको सुखी एवं समपन्न जीवन जीना है तो मकड़ी को शांतिपूर्वक जीने दो, क्योंकि मक्खी, मच्छर, चींटी, आदि जीव मकड़ी के प्रिय भोज्य पदार्थ हैं | इसलिए घर में होने वाले इन जीवों से बचाने में मकड़ी हमारी सहायता करती है | थाईलैंड के आदिवासी मकड़ियों से स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ भी तैयार करते हैं | 

 साधारणतया मकड़ी की दृष्टि तीव्र नहीं होती | परन्तु इसके भी अपवाद हैं | छलांग मारनेवाली मकड़ी उड़नेवाले कीट को लक्ष्य बनाकर पकड़ लेती है |  मकड़ियां बहरी व सूंघने में असमर्थ होती हैं | परन्तु, पूरे शरीर पर पाए जानेवाले महीन कांटों जैसे रोम या बालों की संवेदनशीलता की सहायता से यह अपने शिकार शत्रुओं व मौसम के बढ़ते घटते ताप को झट पहचान जाती है |
कीट जगत में मकड़ी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है | इंगलैंड के प्रसिद्ध जंतु विज्ञानी डा. विलियम ब्रिस्तोव के अनुसार एक एकड़ खेत की जमीन में छोटी-बड़ी २० लाख मकड़ियां होती हैं और उसमें भी चारे वाली जमीन तो यह सख्यां न्यूनतम समझी जाती है |

 इस प्रतिभासंपन्न कीट को कीट जगत का इंजिनियर ही नहीं तो वास्तुविद, अप्रतिम कतनिया और श्रेष्ठ बुनकर भी कह सकते हैं | झूलनेवाला पुल बनाने वाला प्रथम जीवंत प्राणी होने का श्रेय मकड़ी को ही जाता है | मनुष्य को पूल बनाने की प्रेरणा एवं आत्मविश्वास भी निश्चय ही मकड़ी ही से मिला होगा | इस पर यह प्रेरणादायक किस्सा प्रस्तुत है – चौदवीं सदी में एक मकड़ी एक गुफा की अंदरूनी छत पर जाला बुनने में छह बार असफल रही, पर उसने हिम्मत नहीं हारी और अंत में सातवें प्रयास में उसे सफलता मिल ही गई | उस गुफा में स्काटलैंड का पराजित राजा राबर्ट ब्रूस यह सब देख रहा था | अपनी घोर निराशा के इस दौर में उसे इस मकड़ी के इन प्रयासों से बड़ी प्रेरणा मिली | उसने अपने शत्रुओं से एक बार फिर लोहा लिया और उन्हें परास्त कर दिया |

अपन कहते हैं कि चक्र का शोध मनुष्य ने लगाया परन्तु कई करोड़ वर्ष पूर्व मकड़ी की एक जाति ने यह शोध इसके भी पूर्व लगा लिया था | रेगिस्तान जैसे प्रदेशों में बालू के टीले बन जाते हैं इन टीलों पर विलक्षण उतार बन जाते हैं |  इन पर कारपराक्वेन आरिओ फ्लावा इस जाति की मकड़ी अपने शरीर को लपेटकर एकाध चक्के के समान फिसलती है और शत्रु से अपना बचाव करती  है व इस चक्र का अक्ष नहीं होता | एकाध मुक्त किए हुए चक्के के समान लुढकते चले जाती है | गुरुत्वाकर्षण की सहायता से प्रति सेकंड ३० से १५० से.मी. की गति से यह यात्रा करती है |

 यह मकड़ी सुनहरे पीले रंग की होती है | दिन में धूप से कष्ट न हो इसलिए रेत के बिल में रहती है और रात को अपने भोजन को पकड़ती है | चक्राकार गति से एक नुकसान यह होता है कि इस गति के लिए बड़ी मात्र में उर्जा लगती है | और थकने के कारण आराम के समय शत्रु उस पर हमला कर सकता है | इस मकड़ी का शत्रु है ततैया उड़ने के कारण वह भक्ष्य का पिछा कर उसे पकड़ सकता है | यदि उतार अच्छा हो तो यह मकड़ी दौड़कर अपना बचाव कर सकती है |

जनन काल में दो नरों में लड़ाई होती है | एक विशिष्ट जाति की मकड़ीयों में नर को तलवार जैसे उपांग होते हैं जिनका उपयोग दुसरे नर को हटाने के लिए होता है |......  ....

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