Sunday, 18 November 2018

तुलसी विवाह और वनस्पति जगत का गौरव - शिरीष सप्रे


तुलसी विवाह और वनस्पति जगत का गौरव
शिरीष सप्रे

तुलसी विवाह से जुडी एक पौराणिक कथा से तुलसी विवाह की प्रथा कैसे निर्मित हुई यह ज्ञात होता है | बृज मंडल में वृंदा नामकी एक कृष्ण भक्त गोपी थी | एक निर्जन स्थान पर उसने भगवान् कृष्ण की तपश्चर्या प्रारम्भ की, गणेशजी को उसकी तपश्चर्या पर बड़ा आश्चर्य हुआ | वृंदा की माँ शिव भक्त थी और उसका गणेशजी पर पुत्रवत स्नेह था | वृंदा रोज कडकड़ाती धूप-ठंड़-हवा में कृष्ण की आराधना कर रही है यह देखकर गणपति ने उसके आसपास कुछ लकडीयां डाल दी | वर्षा हुई और उससे एक तण  की निर्मिती हुई इसके कारण वृंदा पर छाया का आच्छादन हो गया | उसे इसका बड़ा अचम्भा हुआ और उसने उस पेड़ से पूछा- तू इस तरह मुझ से प्यार क्यों दर्शा रहा है? तू कौन है? पेड़ ने उत्तर दिया ‘ ओमकार सृष्टि का आदिकंद है इसलिए उसने ब्रहमदेव से सृष्टि निर्मित करवा लेने के बाद स्वयं की चाह के लिए पेड़ निर्मित करवा लिया वही हूँ मैं | मुझे इक्षु दंड कहते हैं |’ 

वृंदा की चल रही कठोर तप साधना को देख भगवान् प्रसन्न हुए | तब वृंदा ने वर मांगा की अगले जन्म में आप मेरे स्वामी बनो | इस पर भगवान् ने कहा कि अगले जन्म में यह होगा, यह कहकर वे अंतर्धान हो गए|

आगे वृंदा ने कृष्ण- कृष्ण का जाप करते हुए इस जन्म की यात्रा समाप्त की और उसका पुनः जन्म हुआ |  नए जन्म में भी उसका नाम वृंदा ही था | वह अत्यंत सुन्दर थी | एक बार वन में कृष्ण की आराधना करते हुए जालंधर नामके राक्षस ने उसे देखा और उससे विवाह की याचना की | वृंदा ने उसे नकार दिया | तब वह उसे भगा ले गया और उससे राक्षस विवाह किया | अपने नसीब में यही लिखा था ऐसा मानकर वृंदा चुपचाप अपना वैवाहिक जीवन बिताने लगी | मगर जालंधर वृत्ती से दुष्ट था | वह साधू-संतों को कष्ट देने लगा |

इसके लिए उसने अपने परिवार में भूत-पिशाच, इनका समावेश कर लिया | उनके रहवास के लिए स्वतंत्र स्थान हो इसलिए जालंधर अपने शरीर पर के पसीने की बूंदे जमीन पर छिडकी | उसमें से आम्लिका नामका पेड़ तैयार हुआ | भूत वहां रहने लगे | परन्तु इस करण सज्जन लोगों ने उधर फटकना भी छोड़ दिया | इस कारण आम्लिका दुःखी रहने लगी और उसने अपनी मनोव्यथा वृंदा को बतलाई | वृंदा ने उससे कहा चिंता न कर  जहां नारायण का आगमन होता हैं वहाँ से भूत-पिशाच तत्काल पलायन कर जाते हैं | तू नारायण का चिंतन कर, तेरी चिंता समाप्त हो जाएगी | आम्लिका वृंदा की सलाह मानकर नारायण का चिंतन करने लगी |

एक बार नारद मूनी नारायण- नारायण का जाप करते हुए वहां से गुजरे | विश्राम के लिए वे आम्लिका के पेड़ तले रुके | उनकी वीणा से निकलने वाले नारायण- नारायण के स्वर वैकुण्ड में विष्णूजी के कानों में पड़े और अपने इस निस्सीम भक्त के लिए वे तत्काल दौड़ पड़े और आम्लिका के पेड़ तले आ पहुंचे | तात्कालिक निवास के लिए ही क्यों न हो परन्तु नारायण वहां आए हैं यह देखकर भूत-पिशाचों ने वहां से पलायन कर लिया | इस आम्लिका को आगे जाकर जो फल आए वे थे हरी इमली के | वृंदा को वह बहुत पसंद आई |

इस दरम्यान जालन्धर के कष्टों से बेजार होकर ऋषि-मुनियों ने भगवान् की आराधना प्रारम्भ कर दी | भगवान् ने उसे समझाने के बहुत प्रयत्न किए परन्तु वह बस में नहीं आया | अंततः भगवान् को उससे युद्ध आरम्भ करना पड़ा | घनघोर युद्ध शुरू हो गया | भगवान् को अंत में सुदर्शन चक्र छोड़ना पड़ा, बाणों की वर्षा करनी पड़ी, गदा प्रहार किए परन्तु उस पर किसी भी शस्त्र का असर न हुआ बल्कि वह और अधिक उन्मत्त हो जाएगा इसकी कल्पना नारदजी को आ जाने के कारण और जालन्धर की पत्नी वृंदा पतिव्रता होने के कारण उसकी पुण्याई के कारण जालंधर की मृत्यु नहीं हो रही | यह रहस्य नारदजी ने भगवान् को बतला दिया |

 भगवान् युद्ध छोड़कर चले गए और जालंधर का भेष धरकर वृंदा को धोखा दिया | यह रहस्य सामने आने पर वृंदा को बहुत दुःख हुआ | तब भगवान् ने पिछले जन्म में उसीके द्वारा मांगे गए वर का स्मरण करा और किसी भी कारण से जालन्धर उसकी दुष्ट प्रवृती के कारण जीवित रहने योग्य नहीं कहा | युद्ध भूमि पर लौट भगवान् ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ा और वृंदा की पुण्याई समाप्त हो जाने के कारण जालंधर का तत्काल वध हो गया | वृंदा उसकी चिता में कूद गई | तब भगवान् विष्णु वहीँ चिता के पास बैठ गए ! पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने उन्हें यह हकीकत बतलाने वाले देवताओं को तीन बीज दिए | चिता शांत होने पर उसमें से तुलसी, धात्री याने आंवला और मालती ये तीन पेड़ उगे | फिर विष्णु ने कृष्ण रूप धारण किया | वहां एकत्रित देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने कृष्ण-तुलसी का विवाह रचाया |

इस विवाह के समय तुलसी की बहन आम्लिका सहेली के रूप में कुछ दिनों के लिए उसके ससुराल गई | इस विवाह समारोह के लिए हिमालय के बद्रीनाथ से कुछ ऋषि-मुनि आए थे | वे वहां से सुन्दर बेर लेकर आए थे वह उन्होंने कृष्ण और तुलसी को दिए | उनमें से कुछ बेर उन दोनों ने शोक से खाए | कृष्ण और वृंदा का बचपन का मित्र पेंद्या आया था जो एक हाथ और एक पांव से विकलांग था | वह आर्थिक रूप से निर्धन था | कृष्ण और तुलसी को उसने विवाह की भेंट के रूप में कपित्थ वृक्ष का फल दिया |

विवाह के अवसर पर उन्हें अनेक अमूल्य चीजें भेंट स्वरूप मिली थी | कृष्ण ने तुलसी को कहा ये सारी मूल्यवान वस्तुएं निर्धनों को दक्षिणा के रूप में बांट दो और देते समय तुलसी का एक पत्ता उस पर रख दो | पेंद्या द्वारा तुलसी पत्र रखने का कारण पूछने पर कृष्ण ने कहा ‘ दिए हुए दान की पुन्ह मन में अभिलाषा निर्मित न हो, इतना ही नहीं तो उसका उच्चार भी कभी न हो, इसलिए यह तुलसी पत्र उस पर रखा गया है | आगे से इन दो बातों का तुलसी पत्र प्रतीक रहेगा |’

तुलसी को रिक्त हाथ घर नहीं ले जाना इसलिए कृष्ण ने सुन्दर केशरिया रंग के गेंदे के फूल उठा लिए | त्याग के प्रतीक के रूप में भगवा रंग धारण किए हुए गेंदे के फूलों को कृष्ण ने अपनाया यह सब लोगों के ध्यान में आ गया | पेंद्या ने दिया हुआ कपित्थ वृक्ष का फल भी कृष्ण ने उठा लिया | आंवला, इमली और बेर लेने का इशारा उन्होंने तुलसी से किया | कृष्ण ने अपने एक हाथ में गन्ना लिया और दुसरे हाथ में तुलसी का हाथ लेकर स्वर्ग की ओर चल पड़े | देवी-देवता उनकी राह देखते स्वर्ग में रुके हुए थे | कृष्ण तुलसी को लेकर आ रहे हैं यह देखकर उन्होंने उन पर फूलों की वर्षा की शहनाई-चौघडा के स्वरों का निनाद गूंजने लगा और सर्वत्र आनंद ही आनंद फैल गया |

तुलसी विवाह की यह प्रदीर्घ पौराणिक कथा वनस्पति जगत के गौरव से सजी हुई है | वनस्पति जगत के सम्बन्ध में मानव जगत में आदर सदैव बना रहे इसके लिए इसके लिए उनका मेल अपने कुलधर्म और कुलाचार से बैठाया गया है | तुलसी विवाह में तुलसी, गन्ना, आंवला, इमली, बेर, कपित्थ और गेंदा इन वनस्पतियों को प्रधानता दी गई है वह उन-उन वनस्पतियों के विशिष्ट गुणधर्मों के कारण ही |

 तुलसी वनस्पतिशास्त्रानुसार लबिएटी कुल की होकर उसके पत्ते कफहारक, चर्मरोगों पर उपयुक्त होकर उसकी मंजिरी मुत्रविकारों पर गुणकारी है | उसका तेल जंतुनाशक है | भारत में यह वनस्पति सर्वत्र उपलब्ध है | गन्ना ग्रमिनि कुल का होकर उससे शकर-गुड तैयार होती है | उसका रस सारक है | आंवला श्वांस नलिका के दाह, दमा में, अतिसार, रक्तस्त्राव पर उपयुक्त है | गेंदे का रस आँखे आने, जखम, रक्तशुद्धि और बवासीर में गेंदे के फूलों का रस गुणकारी है |

आयुर्वेद जो मनुष्य के दीर्घायु होने के संबंध में सोचता है उसकी बहुतसी औषधियां वनस्पति आधारित ही हैं | इस कारण छोटा सा दिखने वाला पौधा हो अथवा बड़ा वृक्ष, सभी का संवर्धन करो, पालन-पोषण करो और मानवी जीवन को समृद्ध करने की दृष्टी से संशोधन करो यह तुलसी विवाह के लिए आवश्यक गन्ना, आंवला, इमली, बेर, कपित्थ और गेंदा इन वनश्रियों का भावार्थ है |       
         

                 

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