Friday, 2 November 2018

पुखराज – रत्नों का रत्न है - शिरीष सप्रे


पुखराज – रत्नों का रत्न है
शिरीष सप्रे

‘पुखराज’, ‘पुष्पराग’, ‘सैफायर’ का महत्व भारतीय ज्योतिष में बहुत अधिक है ,क्योंकि यह बृहस्पति या गुरु का प्रतिनिधित्व करता है | एक साल में एक राशि की परिक्रमा पूरी करनेवाला यह पीले रंग का ग्रह ब्रह्माण्ड में सबसे बड़े ग्रह शनि के बाद दूसरा बड़ा ग्रह माना गया है | फूल में जितने रंग होते हैं वह सब इस में भी होते हैं | रत्नों की ओर खिचाव या आकर्षण मनुष्य को बहुत पहले से है | उसमें पुखराज का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि, इसकी उपलब्धि अल्प मात्रा में है | अंग्रेजी में इसे टोपाज कहते हैं |

सामान्य धारणा के विपरीत शुद्ध पुखराज रंगहीन रत्न है| अज्ञात अशुद्धियों के कारण ही इसके रवे रंगीन होते हैं | इन रंगों में कम गहरे पर अधिक चमकीले पीले, भूरे, सलेटी, हल्के नीले, हरे, बैंगनी, रंग प्रमुख हैं | इनमें से पीले रंग के पारदर्शक, चमकीले एवं उच्चकोटि के स्फटीकों की गणना रत्नों में की जाती है | कभी-कभी गुलाबी रंग का पुखराज भी मिल जाता है | लेकिन अमलतास के फूलों के रंग वाला पुखराज वाला पुखराज श्रेष्ठ होता है | पीलिया, प्लेग, गले के रोग, सिरदर्द आदि रोगों में पुखराज धारण करना बेहतर होता है | जिस कन्या के विवाह में व्यवधान अथवा विलम्ब हो उसे पीला पुखराज धारण करना चाहिए | चमत्कारिक अनुभव कुछ ही दिन में आपके सामने आएगा | 
    
उत्तम कोटि का पुखराज भारी, स्वछ, चिकना, कोमल और कन्ठपम्पा के पुष्प के समान होता है | ऐसे पुखराज में चीट, सुन्न, दुधक, दुरंग, टहेरू, जाला, छींटा, गड्ढ़ा, और रेशा नहीं होना चाहिए | पीले स्फटिक और पुखराज में भेद करना कठिन हो जाता है | दोनों समान आकार, स्वच्छ और चमक वाले भी मिल जाते हैं ,यद्यपि पुखराज का रंग अधिक सुकुमार होता है | बोमोफार्म या मैथिलीन आयोडैड में डालने पर पुखराज डूब जाएगा पर स्फटिक तैरने लगेगा |

जडे हुए रत्न की जांच फिरेक्टोमीटर से की जाती है, जिससे इसका वर्तनांक  ज्ञात हो जाता है | स्फटिक के अतिरिक्त पीले रंग के नीलम, शोभामणी, बैरुज, गोमेद, हई हैमवैदुर्य मणी,पुखराज जैसे होते हैं | अत: पुखराज मान लेने से पूर्व रत्न की पूरी जांच की जाना चाहिए |

फेरन कृत ‘रत्न परीक्षा’ में लिखा है कि, पुखराज कनक वर्ण अत्यंत पीला, स्निग्ध होता है | इसको जो धारण करता है  उससे बृहस्पति अत्यन्त प्रसन्न होते हैं |  रत्नों के अतिरिक्त पुखराज का उपयोग औषधियों के निर्माण में भी किया जाता है | गुलाब जल या केवडा जल में २५ दिन तक छोटे हुए काजल समान बारीक पुखराजपुख को धूप में सुखाकर उसका उपयोग आयुर्वेदिक विज्ञान के अनुसार पीलिया, आमवात, कफ, खांसी, श्वांस, नकसीर, आदि रोगों के उपचार में किया जाता है | हीरे सी चमक-दमक और टिकाउपन होने के कारण पुखराज का पर्याप्त प्रचलन है |

उत्तम कोटि के पुखराज की दुर्लभता के कारण आजकल इमिटेशन पुखराज भी बनाए जाते हैं | ऐसे पुखराज में रुक्षता होती है और चमक कांच जैसी होती है | इसमें दुधक नहीं होता | कृत्रिम पुखराज अंग में नरम होता है | इसमें आभा भी अधिक नहीं होती |
पुखराज श्रीलंका, ब्राजील, रूस, साइबेरिया, उत्तर नाइजेरिया, अमेरिका, मेक्सिकों आदि देशों में मिलता है | नीले रंग के पुखराज स्काटलैंड में मिलते हैं | श्रीलंका में मिलने वाले पुखराज पीले, हलके हरे, तथा रंगहीन होते हैं |   
    
                      

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