Sunday, 25 November 2018

कीट जगत का एक अजूबा - मकड़ी भाग १ शिरीष सप्रे


कीट जगत का  एक अजूबा - मकड़ी भाग १
शिरीष सप्रे

अपन जिस स्थान पर रहते हैं वहां केवल मनुष्यों का ही रहवास नहीं होता चूहे, झींगुर, चीटिंयां जैसे अन्य प्राणी भी रहते हैं | उन्हीं में से एक मकड़ी भी है | कीट जगत में मकड़ी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है | इसे जो स्थान योग्य लगता है वहीँ यह अपना जाला बना लेती है और भक्ष्य की राह देखने लगती है | 

मकड़ी ही एक ऐसा जीव है जो अन्य कीड़ों के शरीर का रस चूसकर जिन्दा रहती है | किसी भी कीट विज्ञानी ने आज तक किसी मकड़ी को भोजन चबाते या टुकडे निगलते नहीं देखा | पक्षियों से लेकर चूहों तक का शिकार करनेवाली मरुस्थलीय प्रदेशों, गर्म दलदली जंगलों व बर्फीले स्थानों पर मिलनेवाली टेरेंतुला मकड़ी भी अपने मुंह से शक्तिशाली पाचक रस निकालकर अपने शिकार के शरीर को गला डालती है | इसके पश्चात् इसे रस की तरह चूस डालती है | 

यदि हम घर साफ़ करने निकलें तो हमें अनेक जालें दिख पड़ेंगे | वैसे हमें कष्ट न देने वाली होने के कारण हम इसकी उपेक्षा करते हैं और इसी कारण हमें इसकी कोई विशेष जानकारी भी नहीं होती | परन्तु मकड़ी की दुनिया और जीवन बहुरंगी है इसलिए उसकी अपरिचित कहानी निश्चय ही रोचक एवं मनोरंजक लगेगी इसमें कोई शक नहीं |

शायद ही संसार में कोई ऐसा स्थान हो जहां मकड़ी ना पाई जाती हो | सागर से लेकर सागरमाथा, जंगलो, चरागाहों, दलदल, रेगिस्तानों, भूमिगत गुफाओं आदि सभी स्थानों पर मकड़ी पाई जाती है | मकड़ी की ४०,००० से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं | कुछ समुद्री मकड़ियां समुद्री पानी के किनारें स्थित चट्टानों से बनी कंदराओं में भी रहती हैं | जहाँ वे समुद्र में तैरने वाले नन्हें कीड़ों आदि को खाकर अपना जीवन निर्वाह करती हैं |

हाल ही में ईरान के तेहरान विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं नें मकड़ी की एक नई प्रजाति की खोज की है इसका नाम ‘लायकोसा अर्गोगी’ रखा गया है, जो कि जेके रोलिंग की किताब पर बनी विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म हैरी पाटर के बोलते मकडे के नाम पर रखा गया है |  पैर को छोड़कर इस मकड़ी का शरीर एक इंच लम्बा है | मकड़ी के शरीर के उपरी हिस्से में दो काले और तीन सफेद बालों की धारियां हैं | यह मकड़ी दक्षिणी - पूर्वी ईरान के केरमान प्रान्त के पर्वतीय क्षेत्र में पाई जाती है |

चालीस करोड़ वर्ष पूर्व कीटकों ने इस पृथ्वी पर पदार्पण किया उसके कुछ समय बाद मकड़ी, बिच्छु इस वर्ग के प्राणी अवतीर्ण हुए | इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य से भी अनेक वर्षों पूर्व यह संसार में आई | कीटकों को छः पांव होने के कारण इस वर्ग को षटपाद कहते हैं | परन्तु बिच्छु को आठ पांव होने के कारण इसे अष्टपाद प्राणियों में गिनेंगे | मकड़ियों के चलने का ढंग काफी विचित्र होता है | चलते वक्त अगर बाई तरफ की पहली और तीसरी टांग उठाती है तो दाएं तरफ की दूसरी तथा चौथी | इसके बाद अगले कदम के लिए बाएँ तरफ की दूसरी व चौथी टांग के साथ दाएं तरफ की पहली और तीसरी उठाती है |

मकड़ियों का विकास कीटकों के साथ ही हुआ | कुछ कीटक ही रेशम जैसे धागे बना सकते हैं और वह भी केवल ये धागे स्वयं के आस-पास कोश बनाने के लिए | परन्तु सभी मकड़ियां धागे बनाती हैं | प्रत्येक मकड़ी के उदर पर रेशम ग्रंथियां होती हैं और तंतुओं की सहायता से वे धागे वातावरण में छोड़ती रहती  हैं | इसके अलावा इन धागों को बुनकर या व्यवस्थित रचना कर उनसे विविध आकार के छोटे-मोटे जालें ये बनाती हैं | मकड़ी की जाति के अनुसार अनेक प्रकार की रेशम बनती है | पानी के अन्दर बनाए गए जाले के अतिरिक्त और भी अनेक प्रकार के जाले मकड़ियां बुनती हैं |

मकड़ियों के शरीर की बढ़ोत्री केंचुली छोड़कर होती है | ऐसे समय में वे अपने जाल के आश्रय में चली जाती हैं | कुछ मकड़ियां फलित अंडे के आस-पास कोश बनाती हैं और कोश से बच्चा बाहर निकलता है तब पहला धागा निकालकर उसके आधार पर हवा में तैरनेवाले जीव का दुनिया में पदार्पण होता है | नर मकड़ी अपना जाल मादा मकड़ी को सन्देश देने के लिए उपयोग में लाती है | इसके लिए वह धागे को विशिष्ट पद्धति से हिलाती है | 

मकड़ी के विकास में और भी कुछ घटक हैं | उदा. उसकी भक्ष्य पकड़ने की पद्धति | अधिकांश मकड़ियां अपने भक्ष्य को विष चुभोती हैं | इसके अलावा दुसरे प्रकार भी मनोरंजक हैं | एक छोटे आकार की मकड़ी अपने भक्ष्य के आस-पास धागों का कड़ा आवरण बहुत तेजी से बनाकर भक्ष्य को एक ही स्थान पर जाम कर देती है | दीमक खानेवाली मकड़ी के सबसे अगले पांवों की जोड़ी पर विषग्रंथि होती हैं | कुछ मकड़ियां भक्ष्य को स्थिर करने के लिए भक्ष्य के शरीर पर गोंद जैसा चिप-चिपा द्रव्य फेंकती हैं | संकट आने पर शत्रु से दूर भागने के लिए कुछ जातियां अपने को गोल बना लेती हैं और तेजी से लुढकते हुए दूर चली जाती हैं |

कुछ मकड़ियां जहरीली होती हैं इसलिए लोग इनसे डरते हैं | केवल दो जातियों को छोड़कर सभी मकड़ियों में विष-ग्रंथियां होती हैं | ये ग्रंथियां नियंत्रित होती हैं तथा विशेष मौकों पर ही मकड़ी इनका प्रयोग करती है | जो मकड़ी जाले बनाती है वह अपने शिकार को पकड़ने के लिए इस विष ग्रंथी का प्रयोग नहीं करती | जो फूलों में छिपकर कीड़ों-मकोड़ों को उनके पंखों से पकड़ती हैं वे अपने शिकार को विष से मार देती हैं | मकड़ियां घिर जाने पर इस विष को अंतिम अस्त्र के रूप में आत्म रक्षा के लिए प्रयोग में लाती हैं |

मकड़ी के काटने से तेज दर्द होता है, आदमी बीमार भी पद सकता है | इस प्रकार की मकड़ियां आस्ट्रेलिया में पाई जाती हैं | बड़े आकार की घातक समझी जानेवाली कभी भी मनुष्य को नहीं मारती | हां, हाथ-पांव पर कहीं काटती है तो सूजन हो जाती है तथा कुछ दिनों तक दर्द रहता है | अधिकांश मकड़ियां बर्रों के मुकाबले कम हानिकारक होती हैं | कुछ मकड़ियां तो हाथ से पकडे जाने पर भी नहीं काटती |

ज्यादातर मकड़ियों का विष मनुष्य या बड़े जानवरों को हानि नहीं पहुंचाता परन्तु अमेरिका में पाई जाने वाली मकड़ी ‘ब्लैक विडो’ का विष मनुष्य को आसानी से मार सकता है | यह सबसे मजबूत रेशम बनाने के लिए भी मशहूर है | ‘क्रेव स्पाइडर’ नामकी मकड़ी में अपने शरीर का रंग बदलने की क्षमता होती है जिससे वह शिकार को आसानी से मार सकती है | जम्पिंग या कूदनेवाली मकड़ी की आँखें बहुत तेज होती हैं तथा तेजी से भाग रहे शिकार को कूदकर झट पकड़ लेती हैं | अमेरिका के रेड इंडियन व अमेजन जंगलों में रहनेवाले कई आदिवासी इन मकड़ियों को देवी मानते हैं व इनकी पूजा करते हैं | एक अंग्रेजी कविता की यह पंक्तियां मकड़ियों पर ही केन्द्रित है- अगर आपको सुखी एवं समपन्न जीवन जीना है तो मकड़ी को शांतिपूर्वक जीने दो, क्योंकि मक्खी, मच्छर, चींटी, आदि जीव मकड़ी के प्रिय भोज्य पदार्थ हैं | इसलिए घर में होने वाले इन जीवों से बचाने में मकड़ी हमारी सहायता करती है | थाईलैंड के आदिवासी मकड़ियों से स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ भी तैयार करते हैं | 

 साधारणतया मकड़ी की दृष्टि तीव्र नहीं होती | परन्तु इसके भी अपवाद हैं | छलांग मारनेवाली मकड़ी उड़नेवाले कीट को लक्ष्य बनाकर पकड़ लेती है |  मकड़ियां बहरी व सूंघने में असमर्थ होती हैं | परन्तु, पूरे शरीर पर पाए जानेवाले महीन कांटों जैसे रोम या बालों की संवेदनशीलता की सहायता से यह अपने शिकार शत्रुओं व मौसम के बढ़ते घटते ताप को झट पहचान जाती है |
कीट जगत में मकड़ी अपना एक विशिष्ट स्थान रखती है | इंगलैंड के प्रसिद्ध जंतु विज्ञानी डा. विलियम ब्रिस्तोव के अनुसार एक एकड़ खेत की जमीन में छोटी-बड़ी २० लाख मकड़ियां होती हैं और उसमें भी चारे वाली जमीन तो यह सख्यां न्यूनतम समझी जाती है |

 इस प्रतिभासंपन्न कीट को कीट जगत का इंजिनियर ही नहीं तो वास्तुविद, अप्रतिम कतनिया और श्रेष्ठ बुनकर भी कह सकते हैं | झूलनेवाला पुल बनाने वाला प्रथम जीवंत प्राणी होने का श्रेय मकड़ी को ही जाता है | मनुष्य को पूल बनाने की प्रेरणा एवं आत्मविश्वास भी निश्चय ही मकड़ी ही से मिला होगा | इस पर यह प्रेरणादायक किस्सा प्रस्तुत है – चौदवीं सदी में एक मकड़ी एक गुफा की अंदरूनी छत पर जाला बुनने में छह बार असफल रही, पर उसने हिम्मत नहीं हारी और अंत में सातवें प्रयास में उसे सफलता मिल ही गई | उस गुफा में स्काटलैंड का पराजित राजा राबर्ट ब्रूस यह सब देख रहा था | अपनी घोर निराशा के इस दौर में उसे इस मकड़ी के इन प्रयासों से बड़ी प्रेरणा मिली | उसने अपने शत्रुओं से एक बार फिर लोहा लिया और उन्हें परास्त कर दिया |

अपन कहते हैं कि चक्र का शोध मनुष्य ने लगाया परन्तु कई करोड़ वर्ष पूर्व मकड़ी की एक जाति ने यह शोध इसके भी पूर्व लगा लिया था | रेगिस्तान जैसे प्रदेशों में बालू के टीले बन जाते हैं इन टीलों पर विलक्षण उतार बन जाते हैं |  इन पर कारपराक्वेन आरिओ फ्लावा इस जाति की मकड़ी अपने शरीर को लपेटकर एकाध चक्के के समान फिसलती है और शत्रु से अपना बचाव करती  है व इस चक्र का अक्ष नहीं होता | एकाध मुक्त किए हुए चक्के के समान लुढकते चले जाती है | गुरुत्वाकर्षण की सहायता से प्रति सेकंड ३० से १५० से.मी. की गति से यह यात्रा करती है |

 यह मकड़ी सुनहरे पीले रंग की होती है | दिन में धूप से कष्ट न हो इसलिए रेत के बिल में रहती है और रात को अपने भोजन को पकड़ती है | चक्राकार गति से एक नुकसान यह होता है कि इस गति के लिए बड़ी मात्र में उर्जा लगती है | और थकने के कारण आराम के समय शत्रु उस पर हमला कर सकता है | इस मकड़ी का शत्रु है ततैया उड़ने के कारण वह भक्ष्य का पिछा कर उसे पकड़ सकता है | यदि उतार अच्छा हो तो यह मकड़ी दौड़कर अपना बचाव कर सकती है |

जनन काल में दो नरों में लड़ाई होती है | एक विशिष्ट जाति की मकड़ीयों में नर को तलवार जैसे उपांग होते हैं जिनका उपयोग दुसरे नर को हटाने के लिए होता है |......  ....

Sunday, 18 November 2018

तुलसी विवाह और वनस्पति जगत का गौरव - शिरीष सप्रे


तुलसी विवाह और वनस्पति जगत का गौरव
शिरीष सप्रे

तुलसी विवाह से जुडी एक पौराणिक कथा से तुलसी विवाह की प्रथा कैसे निर्मित हुई यह ज्ञात होता है | बृज मंडल में वृंदा नामकी एक कृष्ण भक्त गोपी थी | एक निर्जन स्थान पर उसने भगवान् कृष्ण की तपश्चर्या प्रारम्भ की, गणेशजी को उसकी तपश्चर्या पर बड़ा आश्चर्य हुआ | वृंदा की माँ शिव भक्त थी और उसका गणेशजी पर पुत्रवत स्नेह था | वृंदा रोज कडकड़ाती धूप-ठंड़-हवा में कृष्ण की आराधना कर रही है यह देखकर गणपति ने उसके आसपास कुछ लकडीयां डाल दी | वर्षा हुई और उससे एक तण  की निर्मिती हुई इसके कारण वृंदा पर छाया का आच्छादन हो गया | उसे इसका बड़ा अचम्भा हुआ और उसने उस पेड़ से पूछा- तू इस तरह मुझ से प्यार क्यों दर्शा रहा है? तू कौन है? पेड़ ने उत्तर दिया ‘ ओमकार सृष्टि का आदिकंद है इसलिए उसने ब्रहमदेव से सृष्टि निर्मित करवा लेने के बाद स्वयं की चाह के लिए पेड़ निर्मित करवा लिया वही हूँ मैं | मुझे इक्षु दंड कहते हैं |’ 

वृंदा की चल रही कठोर तप साधना को देख भगवान् प्रसन्न हुए | तब वृंदा ने वर मांगा की अगले जन्म में आप मेरे स्वामी बनो | इस पर भगवान् ने कहा कि अगले जन्म में यह होगा, यह कहकर वे अंतर्धान हो गए|

आगे वृंदा ने कृष्ण- कृष्ण का जाप करते हुए इस जन्म की यात्रा समाप्त की और उसका पुनः जन्म हुआ |  नए जन्म में भी उसका नाम वृंदा ही था | वह अत्यंत सुन्दर थी | एक बार वन में कृष्ण की आराधना करते हुए जालंधर नामके राक्षस ने उसे देखा और उससे विवाह की याचना की | वृंदा ने उसे नकार दिया | तब वह उसे भगा ले गया और उससे राक्षस विवाह किया | अपने नसीब में यही लिखा था ऐसा मानकर वृंदा चुपचाप अपना वैवाहिक जीवन बिताने लगी | मगर जालंधर वृत्ती से दुष्ट था | वह साधू-संतों को कष्ट देने लगा |

इसके लिए उसने अपने परिवार में भूत-पिशाच, इनका समावेश कर लिया | उनके रहवास के लिए स्वतंत्र स्थान हो इसलिए जालंधर अपने शरीर पर के पसीने की बूंदे जमीन पर छिडकी | उसमें से आम्लिका नामका पेड़ तैयार हुआ | भूत वहां रहने लगे | परन्तु इस करण सज्जन लोगों ने उधर फटकना भी छोड़ दिया | इस कारण आम्लिका दुःखी रहने लगी और उसने अपनी मनोव्यथा वृंदा को बतलाई | वृंदा ने उससे कहा चिंता न कर  जहां नारायण का आगमन होता हैं वहाँ से भूत-पिशाच तत्काल पलायन कर जाते हैं | तू नारायण का चिंतन कर, तेरी चिंता समाप्त हो जाएगी | आम्लिका वृंदा की सलाह मानकर नारायण का चिंतन करने लगी |

एक बार नारद मूनी नारायण- नारायण का जाप करते हुए वहां से गुजरे | विश्राम के लिए वे आम्लिका के पेड़ तले रुके | उनकी वीणा से निकलने वाले नारायण- नारायण के स्वर वैकुण्ड में विष्णूजी के कानों में पड़े और अपने इस निस्सीम भक्त के लिए वे तत्काल दौड़ पड़े और आम्लिका के पेड़ तले आ पहुंचे | तात्कालिक निवास के लिए ही क्यों न हो परन्तु नारायण वहां आए हैं यह देखकर भूत-पिशाचों ने वहां से पलायन कर लिया | इस आम्लिका को आगे जाकर जो फल आए वे थे हरी इमली के | वृंदा को वह बहुत पसंद आई |

इस दरम्यान जालन्धर के कष्टों से बेजार होकर ऋषि-मुनियों ने भगवान् की आराधना प्रारम्भ कर दी | भगवान् ने उसे समझाने के बहुत प्रयत्न किए परन्तु वह बस में नहीं आया | अंततः भगवान् को उससे युद्ध आरम्भ करना पड़ा | घनघोर युद्ध शुरू हो गया | भगवान् को अंत में सुदर्शन चक्र छोड़ना पड़ा, बाणों की वर्षा करनी पड़ी, गदा प्रहार किए परन्तु उस पर किसी भी शस्त्र का असर न हुआ बल्कि वह और अधिक उन्मत्त हो जाएगा इसकी कल्पना नारदजी को आ जाने के कारण और जालन्धर की पत्नी वृंदा पतिव्रता होने के कारण उसकी पुण्याई के कारण जालंधर की मृत्यु नहीं हो रही | यह रहस्य नारदजी ने भगवान् को बतला दिया |

 भगवान् युद्ध छोड़कर चले गए और जालंधर का भेष धरकर वृंदा को धोखा दिया | यह रहस्य सामने आने पर वृंदा को बहुत दुःख हुआ | तब भगवान् ने पिछले जन्म में उसीके द्वारा मांगे गए वर का स्मरण करा और किसी भी कारण से जालन्धर उसकी दुष्ट प्रवृती के कारण जीवित रहने योग्य नहीं कहा | युद्ध भूमि पर लौट भगवान् ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ा और वृंदा की पुण्याई समाप्त हो जाने के कारण जालंधर का तत्काल वध हो गया | वृंदा उसकी चिता में कूद गई | तब भगवान् विष्णु वहीँ चिता के पास बैठ गए ! पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने उन्हें यह हकीकत बतलाने वाले देवताओं को तीन बीज दिए | चिता शांत होने पर उसमें से तुलसी, धात्री याने आंवला और मालती ये तीन पेड़ उगे | फिर विष्णु ने कृष्ण रूप धारण किया | वहां एकत्रित देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों ने कृष्ण-तुलसी का विवाह रचाया |

इस विवाह के समय तुलसी की बहन आम्लिका सहेली के रूप में कुछ दिनों के लिए उसके ससुराल गई | इस विवाह समारोह के लिए हिमालय के बद्रीनाथ से कुछ ऋषि-मुनि आए थे | वे वहां से सुन्दर बेर लेकर आए थे वह उन्होंने कृष्ण और तुलसी को दिए | उनमें से कुछ बेर उन दोनों ने शोक से खाए | कृष्ण और वृंदा का बचपन का मित्र पेंद्या आया था जो एक हाथ और एक पांव से विकलांग था | वह आर्थिक रूप से निर्धन था | कृष्ण और तुलसी को उसने विवाह की भेंट के रूप में कपित्थ वृक्ष का फल दिया |

विवाह के अवसर पर उन्हें अनेक अमूल्य चीजें भेंट स्वरूप मिली थी | कृष्ण ने तुलसी को कहा ये सारी मूल्यवान वस्तुएं निर्धनों को दक्षिणा के रूप में बांट दो और देते समय तुलसी का एक पत्ता उस पर रख दो | पेंद्या द्वारा तुलसी पत्र रखने का कारण पूछने पर कृष्ण ने कहा ‘ दिए हुए दान की पुन्ह मन में अभिलाषा निर्मित न हो, इतना ही नहीं तो उसका उच्चार भी कभी न हो, इसलिए यह तुलसी पत्र उस पर रखा गया है | आगे से इन दो बातों का तुलसी पत्र प्रतीक रहेगा |’

तुलसी को रिक्त हाथ घर नहीं ले जाना इसलिए कृष्ण ने सुन्दर केशरिया रंग के गेंदे के फूल उठा लिए | त्याग के प्रतीक के रूप में भगवा रंग धारण किए हुए गेंदे के फूलों को कृष्ण ने अपनाया यह सब लोगों के ध्यान में आ गया | पेंद्या ने दिया हुआ कपित्थ वृक्ष का फल भी कृष्ण ने उठा लिया | आंवला, इमली और बेर लेने का इशारा उन्होंने तुलसी से किया | कृष्ण ने अपने एक हाथ में गन्ना लिया और दुसरे हाथ में तुलसी का हाथ लेकर स्वर्ग की ओर चल पड़े | देवी-देवता उनकी राह देखते स्वर्ग में रुके हुए थे | कृष्ण तुलसी को लेकर आ रहे हैं यह देखकर उन्होंने उन पर फूलों की वर्षा की शहनाई-चौघडा के स्वरों का निनाद गूंजने लगा और सर्वत्र आनंद ही आनंद फैल गया |

तुलसी विवाह की यह प्रदीर्घ पौराणिक कथा वनस्पति जगत के गौरव से सजी हुई है | वनस्पति जगत के सम्बन्ध में मानव जगत में आदर सदैव बना रहे इसके लिए इसके लिए उनका मेल अपने कुलधर्म और कुलाचार से बैठाया गया है | तुलसी विवाह में तुलसी, गन्ना, आंवला, इमली, बेर, कपित्थ और गेंदा इन वनस्पतियों को प्रधानता दी गई है वह उन-उन वनस्पतियों के विशिष्ट गुणधर्मों के कारण ही |

 तुलसी वनस्पतिशास्त्रानुसार लबिएटी कुल की होकर उसके पत्ते कफहारक, चर्मरोगों पर उपयुक्त होकर उसकी मंजिरी मुत्रविकारों पर गुणकारी है | उसका तेल जंतुनाशक है | भारत में यह वनस्पति सर्वत्र उपलब्ध है | गन्ना ग्रमिनि कुल का होकर उससे शकर-गुड तैयार होती है | उसका रस सारक है | आंवला श्वांस नलिका के दाह, दमा में, अतिसार, रक्तस्त्राव पर उपयुक्त है | गेंदे का रस आँखे आने, जखम, रक्तशुद्धि और बवासीर में गेंदे के फूलों का रस गुणकारी है |

आयुर्वेद जो मनुष्य के दीर्घायु होने के संबंध में सोचता है उसकी बहुतसी औषधियां वनस्पति आधारित ही हैं | इस कारण छोटा सा दिखने वाला पौधा हो अथवा बड़ा वृक्ष, सभी का संवर्धन करो, पालन-पोषण करो और मानवी जीवन को समृद्ध करने की दृष्टी से संशोधन करो यह तुलसी विवाह के लिए आवश्यक गन्ना, आंवला, इमली, बेर, कपित्थ और गेंदा इन वनश्रियों का भावार्थ है |       
         

                 

Saturday, 3 November 2018

दीपोत्सव विदेशों में शिरीष सप्रे


दीपोत्सव विदेशों में
शिरीष सप्रे

यह प्रकाश पर्व न केवल हिन्दुस्तान में बल्कि अन्य कई देशों में भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है | हां यह बात जरुर है कि पर्व मनाने का तरीका निश्चय ही हमसे कुछ भिन्न है | लेकिन वहां के यह त्यौहार भी हमारी  दीवाली की भांति ही हैं | श्रीलंका जैसा छोटा सा द्वीप दीवाली को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाता है इस त्यौहार की रात्रि को प्रत्येक घर छोटे-छोटे दीपों से सजाया जाता है और लोग पटाखे छोड़ते हैं | श्रीलंका में इस अवसर पर खांड से बनी मिठाइयां विभिन्न पशु-पक्षियों और मानव आकृतियों में बनाई जाती हैं | यहां यह दिन राष्ट्रीय अवकाश का होता है |

थाइलैंड और मलेशिया में भी दीपावली मनाई जाती है | थाइलैंड में यह क्राथोग के नाम से मनाया जाता है | इस दिन यहां के निवासी केले के पत्तों को छोटे-छोटे खंड बनाकर जल में प्रवाहित करते हैं | केले के पत्तो के इन खण्डों को ‘क्राथोग’ नाम से पुकारा जाता है, प्रत्येक खंड एक जलती हुई बत्ती एक मुद्रा और ‘धूप’ होती है| इसके अतिरिक्त वे लोग अपने घरों को रोशनी से भी सजाते हैं | मलेशिया में ज्योति पर्व राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है | वहां के लोग इस पर्व को बिलकुल भारत जैसे तौर-तरीकों से बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं | इस दिन राष्ट्रीय अवकाश होता है | यहां के निवासी इस दिन आतिशबाजी का आनंद उठाते हैं |

सुमात्रा एवं जावा  द्वीपों में यह प्रकाश पर्व भारत के समान अक्टूबर या नवम्बर में मनाया जाता है | मलाया में भी दीपावली का पर्व मनाया जाता है | वहां ‘फानो पर्वत’ पर एक भग्न मंदिर विद्यमान है | जिसमें भगवान विष्णु और लक्ष्मी की प्रतिमाएं हैं | १९७६ में गुयाना ने दीपावली पर चार डाक टिकिट की एक श्रंखला जारी की थी जिसमें दीपक व लक्ष्मी के चित्र अंकित थे | वहां पर भी दीपोत्सव पर लक्ष्मी की पूजा प्राचीन काल से विद्यमान थी वहां पर लक्ष्मी पूजा का विधान है |

म्यांमार (बर्मा) में वहां के लोग इस पर्व को ( वैगिजू) नाम से नवम्बर महीने में मनाते हैं | म्यांमारवासियों में यह मान्यता है कि भगवान बुद्ध ने ज्ञान का प्रकाश पाने के बाद इसी भूमि पर अवतरण किया था | हर एक मकान को इस दिन रोशनी से सजाया जाता है और हर द्वार पर तोरण वन्दनवार लगाए जाते हैं | म्यांमार  के लोग इस दिन नए वस्त्र पहनना शुभ मानते हैं | 
 
जापानी लोग दिवाली जैसा ही पूर्व (तौरोनगाशी) नाम से मानते हैं | यहां के लोगों का अटूट विश्वास है कि इस शुभ दिन उनके पूर्वज उन्हें आशीर्वाद देने उनके घर आते हैं | अतएव पूर्वजों के आगमन की खुशी में सारे घर के लोग प्रकाश करते हैं | वहां इस पर्व का त्रिदिवसीय आयोजन किया जाता है |

चीनी लोग प्रकाश पर्व को ‘नई महुआ’ नाम से जानते हैं | चीन में इस दिन की तैयारी के लिए बहुत पहले से मकान साफ़ कर लिए जाते हैं | इस दिन विभिन्न रंगों के कागजों से मकानों को सजाया जाता है | चीनी व्यापारी भारत की तरह ही इसी दिन नए बही खाता शुरू करते हैं | ‘नई महुआ’ नामक इस पर्व के दिन चीन में राष्ट्रीय अवकाश रहता है |
  
इस तरह हम देखते हैं कि दीपावली पर्व हर देश में ख़ुशी से मनाया जाता है और उन देशों में भी दीप जलाने की परम्परा वर्षों से चली आ रही है|
    
     

Friday, 2 November 2018

पुखराज – रत्नों का रत्न है - शिरीष सप्रे


पुखराज – रत्नों का रत्न है
शिरीष सप्रे

‘पुखराज’, ‘पुष्पराग’, ‘सैफायर’ का महत्व भारतीय ज्योतिष में बहुत अधिक है ,क्योंकि यह बृहस्पति या गुरु का प्रतिनिधित्व करता है | एक साल में एक राशि की परिक्रमा पूरी करनेवाला यह पीले रंग का ग्रह ब्रह्माण्ड में सबसे बड़े ग्रह शनि के बाद दूसरा बड़ा ग्रह माना गया है | फूल में जितने रंग होते हैं वह सब इस में भी होते हैं | रत्नों की ओर खिचाव या आकर्षण मनुष्य को बहुत पहले से है | उसमें पुखराज का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि, इसकी उपलब्धि अल्प मात्रा में है | अंग्रेजी में इसे टोपाज कहते हैं |

सामान्य धारणा के विपरीत शुद्ध पुखराज रंगहीन रत्न है| अज्ञात अशुद्धियों के कारण ही इसके रवे रंगीन होते हैं | इन रंगों में कम गहरे पर अधिक चमकीले पीले, भूरे, सलेटी, हल्के नीले, हरे, बैंगनी, रंग प्रमुख हैं | इनमें से पीले रंग के पारदर्शक, चमकीले एवं उच्चकोटि के स्फटीकों की गणना रत्नों में की जाती है | कभी-कभी गुलाबी रंग का पुखराज भी मिल जाता है | लेकिन अमलतास के फूलों के रंग वाला पुखराज वाला पुखराज श्रेष्ठ होता है | पीलिया, प्लेग, गले के रोग, सिरदर्द आदि रोगों में पुखराज धारण करना बेहतर होता है | जिस कन्या के विवाह में व्यवधान अथवा विलम्ब हो उसे पीला पुखराज धारण करना चाहिए | चमत्कारिक अनुभव कुछ ही दिन में आपके सामने आएगा | 
    
उत्तम कोटि का पुखराज भारी, स्वछ, चिकना, कोमल और कन्ठपम्पा के पुष्प के समान होता है | ऐसे पुखराज में चीट, सुन्न, दुधक, दुरंग, टहेरू, जाला, छींटा, गड्ढ़ा, और रेशा नहीं होना चाहिए | पीले स्फटिक और पुखराज में भेद करना कठिन हो जाता है | दोनों समान आकार, स्वच्छ और चमक वाले भी मिल जाते हैं ,यद्यपि पुखराज का रंग अधिक सुकुमार होता है | बोमोफार्म या मैथिलीन आयोडैड में डालने पर पुखराज डूब जाएगा पर स्फटिक तैरने लगेगा |

जडे हुए रत्न की जांच फिरेक्टोमीटर से की जाती है, जिससे इसका वर्तनांक  ज्ञात हो जाता है | स्फटिक के अतिरिक्त पीले रंग के नीलम, शोभामणी, बैरुज, गोमेद, हई हैमवैदुर्य मणी,पुखराज जैसे होते हैं | अत: पुखराज मान लेने से पूर्व रत्न की पूरी जांच की जाना चाहिए |

फेरन कृत ‘रत्न परीक्षा’ में लिखा है कि, पुखराज कनक वर्ण अत्यंत पीला, स्निग्ध होता है | इसको जो धारण करता है  उससे बृहस्पति अत्यन्त प्रसन्न होते हैं |  रत्नों के अतिरिक्त पुखराज का उपयोग औषधियों के निर्माण में भी किया जाता है | गुलाब जल या केवडा जल में २५ दिन तक छोटे हुए काजल समान बारीक पुखराजपुख को धूप में सुखाकर उसका उपयोग आयुर्वेदिक विज्ञान के अनुसार पीलिया, आमवात, कफ, खांसी, श्वांस, नकसीर, आदि रोगों के उपचार में किया जाता है | हीरे सी चमक-दमक और टिकाउपन होने के कारण पुखराज का पर्याप्त प्रचलन है |

उत्तम कोटि के पुखराज की दुर्लभता के कारण आजकल इमिटेशन पुखराज भी बनाए जाते हैं | ऐसे पुखराज में रुक्षता होती है और चमक कांच जैसी होती है | इसमें दुधक नहीं होता | कृत्रिम पुखराज अंग में नरम होता है | इसमें आभा भी अधिक नहीं होती |
पुखराज श्रीलंका, ब्राजील, रूस, साइबेरिया, उत्तर नाइजेरिया, अमेरिका, मेक्सिकों आदि देशों में मिलता है | नीले रंग के पुखराज स्काटलैंड में मिलते हैं | श्रीलंका में मिलने वाले पुखराज पीले, हलके हरे, तथा रंगहीन होते हैं |