Sunday, 22 July 2018

राष्ट्रीय वृक्ष - वट वृक्ष

वन महोत्सव सप्ताह - जुलाई का प्रथम सप्ताह
राष्ट्रीय वृक्ष - वट वृक्ष 

वट वृक्ष वेदकाल से पूजनीय माने गए हैं। यह वृक्ष हमारी दृष्टि में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भी है। भव्यता के मामले में इसकी बराबरी कोई अन्य वृक्ष नहीं कर सकता। विभिन्न जाति-प्रजाति के पंछी, तितलियां, बंदर, चिमदागड इसके फल चाव से खाते हैं। इसके नरम पत्ते हाथी का आहार हैं। अनेकानेक जाति-प्रजाति के जीव-जंतुओं की आश्रय स्थली वटवृक्ष एक औषधी वृक्ष भी है। अंग्रेजी में इसे 'बनयान ट्री" कहते हैं और यह नाम कैसे पडा यह जानना भी रोचक होगा। युरोपीयन लोगों ने यह नाम पर्शियन गल्फ के इसी प्रकार के एक वृक्ष को दिया था। क्योंकि, इसी वृक्षतले 'बनिया" यानी हिंदू व्यापारी व्यापार या पूजा-अर्चा करने के लिए एकत्रित होते थे। धीरे-धीरे आगे चलकर सभी स्थानों पर के बरगद को यही नाम प्राप्त हो गया। वटवृक्ष का संस्कृत नाम न्यग्रोथ अर्थात्‌ नीचे-नीचे की ओर बढ़नेवाला क्योंकि, वृक्ष की शाखाएं पुनः भूमि की ओर बढ़नेवाली होकर इनमें जडें फूटी हुई होती हैं और भूमि में प्रवेश कर पुनः वृक्ष के तने का रुप धारण कर लेती हैं इस प्रकार से वृक्ष का विस्तार होता चला जाता है। अथर्ववेद में इसका उल्लेख आता है और इसके बाद के साहित्य में भी इसका उल्लेख आते चला गया है। भारत में आज भी अनेक स्थानों पर कुछ-कुछ वटवृक्ष बहुत विस्तृत भूभाग में फैले हुए हैं।

सौभाग्यवती स्त्रियां सौभाग्य वृद्धि के लिए श्रद्धावश वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत रखती हैं। रुढीनुसार यह पूजा सावित्री की नहीं तो वटवृक्ष की करती हैं। ब्रह्माजी, सावित्री, सत्यवान, यमधर्म, नारद की भी पूजा की जाती है। यह व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को करने की प्रथा है। महाभारत के वन पर्व में पतिव्रतामाहामात्य पर्व में ही इस व्रत की कथा दी हुई है। भारत में बहुत प्राचीन काल से वृक्षों की पूजा की जाती है इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं। वृक्षों के अनेकानेक उपयोग ध्यान में आने पर उनके विषय में कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, आदि देवताओं का वटवृक्ष पर निवास माना गया है) या राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, आदि दैवी या अद्‌भुत, अलौकिक, अमानवीय शक्तियों का वास वृक्षों में है यह समझकर वृक्ष पूजा अस्तित्व में आई। 

वटवृक्ष सृजन का प्रतीक है इसलिए संतान के इच्छुक लोग इसकी पूजा करते हैं। यह बहुत लंबे समय तक जीवित रहता है इसलिए इसे अक्षय वट भी कहा जाता है। इसे मघा नक्षत्र का प्रतीक माना जाता है। वटवृक्ष का और यक्ष कोटी के देवताओं का निकट का संबंध माना जाता है यह कुछ व्रतों पर से समझा जा सकता है। अनेक धार्मिक और लौकिक समारोहों में वृक्षों के विषय में पूज्यभाव व्यक्त किया जाता है। वृक्षपूजन, वृक्षसंरक्षण और वृक्षारोपण करने की एक अच्छी रुढी बहुत प्राचीनकाल से अस्तित्व में है। वृक्षारोपण करनेवाला मनुष्य कभी नर्क में नहीं जाता यह अर्थ बतलानेवाला एक संस्कृत श्लोक है। 

वट पूर्णिमा का व्रत वृक्ष संवर्धन से जुडा हुआ व्रत है और वही अपना आद्य कालोचित कर्तव्य होना भी चाहिए परंतु, भयवश उपजी अंधश्रद्धावश महिलाएं बरगद के पेड की डालियां तोड-तोडकर या ट्रकों में छोटी-मोटी तोडकर लाई हुई बरगद की डालियां बेची जाती हैं जिन्हें घर में लाकर उन्हें नमस्कार, पूजन कर निरात पाती हैं। इस प्रकार से इस पूजा के पीछे की मूल भावना का ही हरण हो गया  है। अब तो प्लास्टीक की डालियों की भी पूजा की जा रही हैं। इसी प्रकार से बढ़ते शहरीकरण के कारण दीर्घ आयुवाले बरगद को तो क्या ना जाने कितने पुराने बडी आयुवाले कई बहु उपयोगी वृक्षों को काटा जा रहा है।

जबकि हमारे पूर्वजों को तो वनप्रिय थे और वे उनका महत्व भी समझते थे और इसी कारण 'पंचवटी" की संकल्पना उत्पन्न हुई थी। रामायण में पंचवटी का वर्णन एक स्थान के रुप में है परंतु, भारत में अन्य स्थानों पर भी पंचवटी एक अरण्य के रुप में था और सभी भाषाओं में  यह शब्द आता है। पंचवटी मतलब संखया में पांच वट वृक्ष या पांच विशिष्ट या पांच महत्वपूर्ण प्रकार के वृक्षोंवाला अरण्य या वन। पंचवटी में पांच प्रकार के वृक्ष यह अर्थ लें तो भौगोलिक स्थानानुसार महत्व प्राप्त प्रत्येक स्थान पर के पांच वृक्ष भिन्न-भिन्न होंगे। इन पांच में वट और अश्वत्थ यानी पीपल समाविष्ट होंगे बाकी में अशोक, बेल, आम आंवला, आदि होंगे। परंतु, वर्तमान में हम वृक्षों का महत्व, उनकी उपयोगिता समझने के स्थान पर आधुनिकता की चकाचौंध में इनके विनाश पर तुले हुए हैं। 

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