Friday, 15 June 2018

प्राचीनकालीन चोर और चौर्य कला - शिरीष सप्रे

प्राचीनकालीन चोर और चौर्य कला 
शिरीष सप्रे

प्राचीनकाल में चोरी करना भी एक कला, ऊंचे दर्जे की कला मानी जाती थी और चोर का स्थान आज की तरह हेय नहीं था। उस समय देश धन-धान्य से भरपूर था और लोग खा-पीकर सुखी थे इसलिए उस काल में आजकल जितनी चोरियां भी नहीं होती थी। जिस प्रकार से कामशास्त्र को धर्म का एक अविच्छिन्न भाग माना गया है उसी तरह से चौर्यकला भी धर्म का ही भाग मानी गई है। परंतु, कामशास्त्र की भांति इस विषय पर कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है। किंतु, वांग्मय में प्राप्त विवरणों से पता चलता है कि, चोरों को उनके गुरुजन आदेश दिया करते थे कि वह धर्मपूर्वक चोरी करें, इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि अभावग्रस्त व्यक्तियों को चोरी करने का अधिकार होता था और उन पर यह बंधन होता था कि, वह दरिद्रजन के यहां चोरी ना करें वरन्‌ अपना कार्य धनाढ्य वर्ग के बीच ही संपन्न करें। चोरी को उन दिनों बाकायदा एक कला के रुप में ही विकसित किया गया था। इतना ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति को इस कला का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक माना जाता था। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि राजकुमारों को अन्य कलाओं की शिक्षा देने के साथ ही चौर्यकला भी भलीभांति सीखाई जाना चाहिए जिससे राजनय में आवश्यकता पडने पर वह समयानुसार उसका उपयोग कर सके।

महाकवि शूद्रक का मृच्छकटिकम्‌ इस दृष्टि से पठनीय है। मृच्छकटिकम्‌ इस चर्चित संस्कृत नाटक में चोर की स्थिति देखने के पूर्व यह जान लें कि, मृच्छकटिकम्‌ भारतीय नाट्‌य परंपरा का पहला वास्तववादी नाटक और शूद्रक पहला विद्रोही कहा जाना चाहिए। शूद्रक ने ही संस्कृत नाटक को पौराणिक कथा और राजा रानी की दुनिया से बाहर निकाला और गणिका, चोर, जुआरी, क्रांतिकारियों के उपेक्षित विश्व को सामने लाया। भ्रष्ट ब्राह्मण, अनाचारी बौद्ध भिक्षुओं का पर्दाफाश किया। इस नाटक की अनेक विशेषताओं में से एक विशिष्टता यह है कि, इसमें चौर्यकला के बारे में बहुत सी जानकारी अपने को मिलती है।

मृच्छकटिकम्‌ इस नाटक में चोर की स्थिति देखिए इस पात्र का नाम शर्विलक है जो कभी दान न लेनेवाले व्युत्पन्न ब्राह्मण (चतुर्वेदी) का पुत्र है फिर भी एक चोर है। चोरी में और वह भी किसी घर में सेंध लगाने में वह माहिर है। वसंतसेना की दासी मदनिका से वह प्रेम करता है। लेकिन उससे विवाह करने के पूर्व उसे दासत्व से मुक्त कराना आवश्यक है और इसके लिए धन चाहिए। इसके लिए वह चारुदत्त के घर को चुनता है। चारुदत्त का घर विशाल भवन होने के बावजूद एक जमाने का धनाढ्य व्यापारी अब धनहीन ब्राह्मण है। जब शर्विलक को यह पता चलता है तो वह चोरी किए बिना वापिस लौटना चाहता है।

शर्विलक ने चौर्यकला की शिक्षा के पाठ योगाचार्य नामक गुरु से सीखे हैं। अन्य चोरों के समान ही शिवपुत्र स्कंद यानी कार्तिकेय शर्विलक की उपास्य देवता है। चौर्यकला के उपासक स्वयं को स्कंद के वंशज, शिष्य समझते हैं। चोरी करने के पूर्व वे अपनी गुरु परंपरा का स्मरण करते हैं। भगवान कनकशक्ति नामक किसी व्यक्ति ने इस संबंध में कोई ग्रंथ लिखा है यह भी प्रतीत होता है। शर्विलक के अनुसार भगवान कनकशक्ति ने सेंध लगाने के चार नियम बताए हैं। शर्विलक एक अंधेरी रात में चारुदत्त के घर चोरी करने के लिए सिद्ध होने पर पहले कार्तिकेय, कनकशक्ति, भास्करनंदी, योगाचार्य इन अपने गुरुओं को वंदन करता है। योगाचार्य के अपन आद्य शिष्य हैं इसका उसे सार्थ गर्व है। जब मनुष्य सोये हुए हों तब चोरी करना यह कोई पराक्रमी कार्य नहीं परंतु, चोरों की यह परंपरा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। अश्वत्थामा ने तो सोये हुए पांडवपुत्रों को ही मार डाला था इसका उदाहरण शर्विलक देता है। चोरी का समर्थन करते हुए वह यह भी कहता है कि चोर किस प्रकार से स्वयं का कार्य स्वयं की इच्छानुसार कर सकता है। किसी का गुलाम बनकर रहने की नौबत उस पर नहीं आती।

शर्विलक भले ही चोर हो परंतु, चोरी के इस अधम पेशे में भी कम से कम नीतिमत्ता का पालन तो भी करना चाहिए इसका भान उसे है। इसीलिए उसने किसके यहां चोरी करना, किसके यहां नहीं, क्या चुराना, क्या नहीं इसके कुछ संकेत उसने तय कर रखे हैं। मिला मौका कि कर चोरी इस प्रकार की उसकी वृत्ति नहीं। चोरी की हिम्मत जुटाए बगैर धन नहीं मिलता यह मदनिका को समझाते हुए वह कहता है उसने कभी भयभीत, सोये हुए व्यक्ति पर आक्रमण नहीं किया ना ही किसी के साथ बेवजह मारपीट की और ना ही करेगा। चोरी के लिए निकलने पर उसने किन घरों को छोडा उससे पता चलता है कि शर्विलक चोर होने पर भी सज्जन है।

शर्विलक अत्यंत चतुर, मंजा हुआ चोर है उसने चोरी की विधिवत शिक्षा अपने गुरु से हासिल की है। चौर्यकला के लिए आवश्यक सारे गुण उसमें हैं। वह चतुर है, समयानुकूल सूझ और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता उसमें है। साहस तो उसके रोम-रोम में मानो भिना हुआ है। उसका शरीर दृढ़ तथा लचीला है। स्वयं के इन गुणों का वर्णन उसने स्वयं बडे सुंदर शब्दों में किया है। वह स्वयं के बारे में कहता है- 'मैं बिल्ली जैसे दबे पांव भाग सकता हूं, समय आने पर हिरन जैसा चपल होकर वायुगति से दौड सकता हूं। किसी भी चीज को हाथो-हाथो उठाकर गायब करने की कला मैं बाज से सीखा हूं। कुत्ते के समान मनुष्य सोया हुआ है कि जाग रहा है इसका अंदाजा मुझे तत्काल लग जाता है। सांप के समान संकरी जगह से मैं निकल सकता हूं। रुप, भेष बदलने में मैं माहिर हूं, मानो साक्षात माया ही। भाषा परिवर्तन में मूर्तिमंत वाणी। रात में दिया, संकट में दोमुंहा सांप, जमीन पर घोडा और पानी में मै नौका बन जाता हूं।

   जिस समय चंद्रदेव अस्ताचल की ओर जाते हैं उस समय शर्विलक चारुदत्त के मकान में प्रवेश करता है। पहले वह उद्यान की चारदीवारी में सेंध लगाकर भीतर घुसता है। जो अपेक्षाकृत सरल है, फिर वह अंतःपुर की ओर उन्मुख होता है, वह भित्ति का ऐसा स्थल तलाश करता है जो निरंतर जलवर्षा को सहते-सहते शिथिल पड गया हो और जिस पर प्रहार करने से कोई आवाज ना निकले, साथ ही वह स्थान ऐसा भी होना चाहिए जहां वह छुप भी सके  तथा जहां स्त्रियों का आवागमन भी ना हो। अंततः वह ऐसे स्थान को पा ही लेता है जहां की मिट्टी निरंतर सूर्य को जल देते रहने के फलस्वरुप शिथिल पड गई हो, जहां चूहों ने धूल का ढ़ेर लगा रखा हो। शर्विलक इस सबको सफलता के लक्षण मानता है। अब वह भगवान कनकशक्ति द्वारा बताए गए सेंध के चार नियमों को दुहराता है, यह नियम हैं -

जिस भित्ति की ईंटें पक्की हों, उन्हें खींचना, जिसकी ईंटें कच्ची हों उन्हें काटना, जिसकी मिट्टी संपुटित हो उसे खींचना तथा जो भित्ति काठ की हो उसे चीरना। चारुदत्त के घर की भित्ति की ईंटें चूंकी पक्की हैं इसलिए वह उन्हें खींचता है। शर्विलक ऐसी कलात्मक सेंध लगाना चाहता है जिसे देखकर नगरवासी वाहवाह कर उठें। चौर्यशास्त्र के संकेतानुसार खिलता कमल, सूर्यबिंब, अर्धचंद्र, कुआ, स्वस्तिक और पूर्णकुंभ इन छः आकारों में से किसी एक आकृति में छेद बनाएं।

चारुदत्त का मकान पक्की ईंटों का है इसलिए शर्विलाक उसमें कुंभ के आकार की सेंध बनाता है परंतु, शीघ्रता के कारण वह नापने की रस्सी लाना भूल जाता है इसलिए वह गले के यज्ञोपवीत से काम चलाता है। चोरी के लिए यज्ञोपवीत का उपयोग करने की एक कृति से भ्रष्ट ब्राह्मण्य, कर्मकांड, दांभिकता पर शूद्रक ने जो प्रहार किया है उसका भारतीय साहित्य में जवाब नहीं। चोरी के अलावा उसमें अटकाई हुई चाभी से दरवाजा खोलने, बिच्छू अथवा सांप के काटे हुए स्थान पर बांधने के लिए यज्ञोपवीत का उपयोग किस प्रकार से होता है यह भी शूद्रक ने बतलाया है। संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार, महाकवि भास ने अपनी रचना चारुदत्त में 'दिन में ब्रह्मसूत्र के लिए और रात्रि में कर्मसूत्र के लिए" इस प्रकार के मार्मिक शब्दों में यज्ञोपवीत का चौर्यकला में महत्व बतलाया है।

सेंध काटते समय जब एक ईंट रह जाती है तब उसे एक सर्प काट लेता है। उसके पास इसकी भी औषधी है क्योंकि, ऐसे कामों में सांप का काटना बहुत मामूली बात है। अपना उपचार करके वह सेंध पूरी करता है। दीवार में प्रमाणबद्ध छेद हो जाने पर शर्विलक पहले अपने साथ लाए हुए लकडी के पुतले को अंदर सरकाकर देखता है कि, वह कहीं अटक तो नहीं रहा, इसका विश्वास हो जाने पर वह स्वयं अंदर प्रवेश करता है। घर में प्रवेश करने के पश्चात सबसे पहले वह मुख्य द्वार की कुंडियों को खोलता है जिससे अगर भागने की आवश्यकता हुई तो किसी तरह की कठिनाई का सामना ना करना पडे। कमरे में लगे दीये के प्रकाश में मृदंग, पखवाज, ढ़ोलकी, वीणा, सारंगी, ग्रंथ इस प्रकार से एक एक वस्तुएं स्पष्ट होती जाती हैं अपन ने एक कंगाल के घर में प्रवेश किया है यह उसके ध्यान में आ जाता है।

इसी कमरे में चारुदत्त और उसका विदूषक मित्र सोये हुए होते हैं। उन पर नजर पडते ही शर्विलक उनके पास जाकर वे सचमुच सोये हुए हैं ना यह देखता है। संयोग ऐसा कि विदूषक उसी समय दीवार में छेद कर चोर घर में घुस आया है का स्वप्न देख रहा होता है और नींद में ही वह अपने पास की वसंतसेना के दागिनों की गठरी 'चारुदत्त तू इसे संभाल" कहकर आगे आए हुए शर्विलक के हाथों मेंे सौंप देता है। दरिद्री चारुदत्त के घर में केवल भाग्य से शर्विलक के हाथों में बडा सुयोग आ जाता है। उसे बगल में दबा शर्विलक अपने पास के दीपक को बुझानेवाले कीडे को दीये पर छोडकर उसे बुझा देता है और स्वयं के ब्राह्मण कुल को कलंक लगाया और अब इस गरीब ब्राह्मण के जीवन में भी अंधेरा फैला दिया इस विचार से खिन्न होकर बाहर निकलता है।

शर्विलक भास्करनंदी का नाम लेकर ऐसी कोई साधना भी करता है जिससे कोई उसे देख ना सके और यदि कोई उसे मारने का प्रयत्न करे तो उसे किसी तरह का चोट ना लगने पाए। यह साधना कैसी होगी इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। शर्विलक मानता है कि चोरी रुपी धूर्तता स्वतंत्र होने के कारण उत्तम है इसमें किसी का दास बनकर हाथ नहीं जोडने पडते।

प्राचीन भारत में चौर्यशास्त्र महत्वपूर्ण विद्या समझी जाती थी। उसे तस्कर मार्ग, स्तेय शास्त्र इस प्रकार के भी नाम थे। मूलदेव स्तेयशास्त्र का जनक माना गया है। मूलभद्र, मूलश्री, कलांकुर, कर्णिसुत, गोणिकपुत्र ये मूलदेव के अन्य नाम हैं। क्षेमेंद्र ने कलाविलास में उसका अत्यंत मायावी, अनेक कलाओं में पारंगत, धूर्तशिरोमणि इस प्रकार से वर्णन किया हुआ है। भोजदेव के श्रंगारमंजरी में भी मूलदेव उज्जयनी का रहवासी होकर वह अत्यंत लंपट, धूर्त होने का कहा गया है। प्राचीन भारत में शर्विलक जैसे गुणी चोर थे वैसे ही चोरों की गुणग्राहकता का कौतुक करनेवाले राजा भी थे। इस प्रकार चोर को भी भारतीय समाज में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।

इस संबंध में यह कथा पढ़ें - एक बार राजा भोज के शयनमंदिर में एक चोर ने प्रवेश किया, अचानक नींद खुलने के पश्चात राजा के मन में अपने ऐश्वर्य के संबंध में विचार उठने लगेेे और वह स्वयं से बोला 'मुझे क्या कमी है? सुंदर रानियां हैं, दास-दासियां हैं, खजाना भरा हुआ है, जान की बाजी लगा देनेवाले मित्र हैं, एकनिष्ठ मंत्री हैं, भरपूर सेना है।" राजा का यह स्वगत सुन कोने में छिपा बैठा चोर बोल पडा, ' राजन, यह सब आंखें खुली हैं तभी तक, आंखें मुंदने पर इनमें से कुछ भी नहीं।" यह मार्मिक वचन सुन राजा ने चोर के अपराध को क्षमा तो किया साथ ही उसे भरपूर पुरस्कार भी दिया। 

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