Saturday, 2 June 2018

पर्यावरण दिवस 5 जून - बहुत खतरनाक है यह बढ़ता शोर - शिरीष सप्रे

पर्यावरण दिवस 5 जून
बहुत खतरनाक है यह बढ़ता शोर
शिरीष सप्रे 

चारों ओर बढ़ते शोर के चक्रव्यूह ने हमें बुरी तरह से घेर रखा है। शोर के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह एक चिडचिडाहट पैदा कर देनेवाली चीज है जो हमारे जीवन की गुणवत्ता तक को प्रभावित कर रही है। यह शोर हमारी एकाग्रता को भंग कर हमारे काम में व्यवधान उत्पन्न करता है इससे हमारी उत्पादकता में कमी आती है। यह न केवल हमारी श्रवण प्रणाली को प्रभावित करता है बल्कि हमारे मस्तिष्क पर भी बुरा प्रभाव छोडता है। सामान्यतया कर्णकटु, अप्रिय, अनावश्यक ध्वनि को हम शोर कह सकते हैं। वास्तव में हमारे कान को कोई ध्वनि अप्रिय लगती है तो वही शोर या शोर प्रदूषण है। यह शोर मात्र एक मुसीबत ही नहीं तो हमारे स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत हानिकारक है। अत्यधिक शोर से न केवल आदमी के दिमाग में तनाव पैदा होता है बल्कि इस तनाव से कई बीमारियां भी शरीर में अपनी जडें जमा लेती हैं। वह दिन दूर नहीं जब यही शोर दुनिया में बीमारियों के सबसे बडे कारणों में से एक होगा। 

ध्वनि प्रदूषण से उत्पन्न होनेवाले खतरों से हमारे यहां ज्यादातर लोग अभी अपरिचित हैं परंतु तथ्य यह है कि दूसरे अनेक प्रदूषणों की भांति ध्वनि प्रदूषण जानलेवा हो सकता है। दर्जनों की संख्या में तेज आवाज में बजनेवाले लाउडस्पीकर, म्यूजिक सिस्टम हमारी श्रवण क्षमता की नाजुक सीमा 150 डेसीबल को पार कर जाते हैं। यह कोलाहल पूर्ण धूम-धडाका हमारे युवाओं की कभी पूरी ना होनेवाली हवस की उत्तेजना को भले ही तृप्त करती हो परंतु बाकी लोगों के लिए घातक साबित हो रही है। शोर और कोलाहल के रुप में  प्रारंभ हुआ यह ध्वनि प्रदूषण का विष महानगरों से लेकर गांव खेडों तक फैल गया है। अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण का मानवीय रक्त संचलन पर भी बुरा प्रभाव पडता है। स्पीकरों की तेज गति से पैदा होनेवाला संगीत पहले शोर फिर अत्यधिक शोर विष के रुप में परिवर्तित हो जाता है। जिसके परिणाम घातक होते हैं।

देश में बढ़ते वायु, जल और पृथ्वी में व्याप्त प्रदूषण के खतरों पर तो अक्सर शोर मचाया जाता है परंतु, ध्वनि प्रदूषण के विरुद्ध प्रायः शोर सुनाई नहीं पडता। यदाकदा कोई संगठन भर इस बाबत चेताता भी है तो उसकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह बनकर रह जाती है। आज वायु, जल, पृथ्वी में व्याप्त प्रदूषण की तरह शोर भी पर्यावरण प्रदूषण में शामिल हो गया है। शायद लोगों को इसके गंभीर परिणामों का अहसास ही नहीं। उन्हें पता ही नहीं कि ध्वनि प्रदूषण का यह खतरा दबेपांव आकर हमें दबोच रहा है। अनेक शोध अध्ययनों और रिपोर्टो के मुताबिक कान के पर्दों पर भारी आघात करनेवाले शोरगुल का यही हाल रहा तो शीघ्र ही देश के अनगिनत लोग न केवल बहरों की कतार में नजर आएंगे बल्कि अनेक घातक रोगों से ग्रस्त नजर आएंगे।

शोर अर्थात्‌ ध्वनि प्रदूषण यानी वह ध्वनि जो अरुचिकर लगे की तीव्रता को जिस ईकाई से नापा जाता है उस पैमाने को डेसीबल यानी डी.बी कहते हैं। यह इकाई शून्य से शुरु होती है, जहां से ध्वनि सुनाई देना शुरु हो जाती है। यह ध्वनि की तीव्रता का वह स्तर है जहां से कोई आवाज सुनाई देने लगती है। इस हिसाब से मनुष्य के लिए 45 से 50 डेसीबल तीव्रता की ध्वनि निरापद मानी जाती है। 70 से 75 डेसिबल तक की आवाजें सुनने में विशेष असुविधा महसूस नहीं होती। लेकिन खेद की बात है कि आज मनुष्य को अक्सर इससे अधिक तीव्र अश्रव्य ध्वनियों को न चाहते हुए भी सुनने पर विवश होना पड रहा है और यही सबसे अधिक चिंता की बात है। वैज्ञानिक निष्कर्षों के अनुसार 85 डेसीबल से अधिक तीव्रता की ध्वनि में अधिक समय तक रहने पर मनुष्य बहरा हो सकता है और 120 डेसीबल से अधिक तेज ध्वनि गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशुओं को तक को प्रभावित कर सकती हैं। 

शोर से शारीरिक एवं मानसिक रोग होते हैं, यह जानकारी कोई नई नहीं है। अपने देश में बरसों से स्वास्थ्य विशेषज्ञ एवं वैद्य शोर से होनेवाली क्षति और रोगों से अवगत थे और शोर से बचने की सलाह देते थे। आज दुनिया भर में कई संस्थाएं ध्वनि प्रदूषण से होनेवाले रोगों का अध्ययन कर रही हैं। पिछले कुछ दशकों में हमारे देश में शोर-शराबा कई गुना बढ़ गया है। कान को तो शोर का सबसे अधिक अन्याय सहन करना पडता है। निरंतर शोर के बीच रहने से कान के भीतरी भाग की तंत्रिकाएं नष्ट हो जाती हैं और धीरे-धीरे मनुष्य पूरी तरह बहरा हो जाता है। भारत में जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक है कि ध्वनि प्रदूषण संबंधी चेतना बढ़ाने के लिए प्रचार माध्यमों के द्वारा अभियान चलाए जाएं। सत्य तो यह है कि हम भारतीय मूलतः शोर करनेवाले लोग हैं और इस मामले में असंवेदनशील भी हैं। आवश्यकता है कि शिक्षा के माध्यम से हममें शोर के प्रति संवेदनशीलता जगाने के प्रयास किए जाएं।

शोर या ध्वनि प्रदूषण से प्रभावित व्यक्ति अनिद्रा, कार्य में अरुचि, चिडचिडापन, क्रोध एवं मानसिक तनाव, घबराहट, जी मिचलाना, सिरदर्द, रक्तचाप में वृद्धि, पाचन क्षमता में क्षीणता और गुर्दों की खराबी आदि रोगों से ग्रस्त हो सकते हैं। बढ़ते हुए शोर को रोका जाना अत्यंत आवश्यक है। इस पर अंकुश लगाना हमारा नैतिक कर्तव्य है। ध्वनि प्रदूषण की समस्या का समाधान केवल कानून से ही संभव नहीं है अपितु इसमें स्वैच्छित सहयोग की अत्याधिक आवश्यकता है। इस दृष्टि से प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य हो जाता है कि वह कम से कम शोर उत्पन्न कर ध्वनि प्रदूषण को रोकने में सहयोग करे।  

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