Sunday, 27 May 2018

अमृत फल है बेल फल - शिरीष सप्रे

अमृत फल है बेल फल
शिरीष सप्रे

साधारणतया जिन वनस्पतियों के बारे में हमारी धार्मिक विधियों में विशेष रुप से कहा गया है उनकी जानकारी सर्वसाधारण को होती ही है। तुलसी भगवान विष्णु को अर्पित किए बगैर पूजा पूर्ण नहीं होती। गणपति पूजन दूर्वा के बगैर अधूरा ही है इसी प्रकार शिवशंकर की पूजा बिल्व पत्रों के बगैर पूर्ण नहीं होती। इस कारण औषधी पदार्थ के रुप में इन उपयुक्त वनस्पतियों की जानकारी प्रत्येक को रहना अत्यावश्यक सा है। बेल के वृक्ष को शिवजी से जुडा होने के कारण पवित्र माना जाता है। बेल वृक्ष के आसपास महादेव का लिंग होता ही है ऐसी प्रथा है। ऋषि-मुनियों ने इस वृक्ष को जितना शरीर के लिए उपयोगी पाया है उतना ही इसे पवित्र एवं महत्वपूर्ण पेड कहा भी है। बेल के वृक्ष की छाया को भी शीतल और आरोग्यकारी माना गया है। प्रायः यह पेड वनों में पाया जाता है। भारतीय धार्मिक साहित्य में इसे दिव्य वनस्पति बताया गया है। आयुर्वेद के विशेषज्ञों ने इसके भरपूर औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण इसे अमृत फल कहा है और प्राचीनकाल से ही इसे औषधियों के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। आयुर्वेद में बिल्व का बहुत विशद विवेचन मिलता है।

शिव शुद्ध कल्याण है। शिवजी शीघ्र प्रसन्न होनेवाले होने के कारण इनकी पूजा सभी आस्तिक अपनी लौकिक-परालौकिक कामनाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। भगवान आशुतोष के पूजन-अभिषेक में बिल्वपत्र को पहला स्थान प्राप्त है। बेल का वृक्ष संपूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल है। बेल के वृक्ष के नीचे जाप से फल में अनंत वृद्धि होकर सिद्धि भी शीघ्र प्राप्त होती है। बेल फल की समिधा से लक्ष्मी का आगमन होता है। वे ही बेलपत्र पूूजार्थ उपयोगी होते हैं जिनके तीन पत्र संलग्न हों। बिल्व पत्र कभी बासी या अशुद्ध नहीं होते। इन्हें एक बार प्रयोग करने के पश्चात दूसरी बार धोकर उपयोग में लाया जा सकता है। इसके पत्तों का धुआं कमरे में करने पर कीडे-मकोडे, मच्छर, मकडी आदि नष्ट हो जाते हैं और वातावरण शुद्ध होता है।

बेल के फूलों को बहुत सुगंध होती है। बेल के पत्ते, फूल, छाल, फल और जडें तक औषधी द्रव्य के रुप में अत्यंत उपयुक्त हैं। मनुष्य  के जीवन को आनंद देनेवाला यह वृक्ष है इस कारण आयुर्वेदाचार्यों ने इस वृक्ष का संपूर्ण संशोधन कर इसके गुणगान गाए हैं। इससे हवा शुद्ध होती है और मनुष्य आरोग्य संपन्न रहता है। रोगनाशक होने के कारण संस्कृत में इसे बिल्व तथा श्रीफल आदि, हिंदी, मराठी और बंगला में बेल और गुजराती में बिली, कन्नड में बेललू तथा तमिल में विल्वपक्षम नामों से जाना जाता है। बेल एक ऐसा वृक्ष है जिसके फल कच्ची अवस्था में अधिक औषधीय गुण रखते हैं। पकने पर इसके औषधीय गुण कम हो जाते हैं। इसके पत्ते मधुमेह रोगियों के लिए रामबाण हैं। बेल की जड में त्रिदोष नाशक गुण होता है।

आयुर्वेद के मतानुसार बेल मधुर, लघुग्राही, वमन, शूल रोकनेवाला होकर मूत्रावरोध समाप्त करनेवाला है। बेल पत्तों के रस का मज्जातंतुओं पर विशेष परिणाम होता है। बेल की छाल अत्यंत प्रभावी औषधी है। चंदन के समान गुणों में श्रेष्ठ है। वात रोगों पर इन छिलकों का विशेष उपयोग होता है। ह्रदय विकार में अथवा छाती धडधडाने, अस्वस्थ महसूस करने, नींद नहीं आने इन विकारों पर वह योजनाबद्ध ढ़ंग से दी जाने पर अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में चरक, सुश्रुत आदि ने बेल के कच्चे फलों का ज्यादा गुणगान किया है। इनके मतानुसार कच्चा फल कफ, वायुनाशक, अग्निदीपक, पाचकग्राही, लघु स्निग्ध कहा गया है। जबकि पका फल मधुर और भारी अर्थात्‌ देर से पकनेवाला हो जाता है। पका फल पौष्टिक गुणों से युक्त हो जाता है। आधुनिक खोजों में बेल को उदरशोधक, खून के दस्त, आंव, अजीर्ण, विशेषरुप से मरोड (दर्द) युक्त पतले दस्त या खूनी पतले दस्तों में अत्यंत लाभकारी पाया है।

कच्चा और पका दोनों प्रकार के बेल ग्राही अर्थात्‌ ग्रहणी दोष को नष्ट करनेवाले कहे गए हैं। यह आंतों की शिथिलता दूर कर उनकी संकोच शक्ति को बढ़ाता है। जिससे मल निष्कासन की क्रिया में तीव्र सुधार होता है, आंव को बाहर कर यह आंतों को बलवान बनाता है। बेल का शर्बत पतला करके रात में या प्रातः पीना अत्यंत लाभप्रद है। पके हुए बेल का गूदा निकालकर पानी में भरपूर मसले फिर छान ले और इसमें इलायची के दाने, शक्कर डालकर शर्बत तयार करें। इसके कारण शरीर का दाह, अतिसार, पीला पेशाब होना समाप्त होता है और शरीर में स्फूर्ति निर्मित होती है। कहते हैं कि गर्मियों में बेल का शरबत नियमित रुप से पीने पर शरीर का कायाकल्प हो जाता है।

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