Tuesday, 15 May 2018

गजब खरबूजे की माया - शिरीष सप्रे

गजब खरबूजे की माया
शिरीष सप्रे

खरबूजे के संबंध में यह कहावत भले ही पुरानी हो परंतु आज भी सटीक बैठती है खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। दूसरी प्रसिद्ध कहावत है छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर कटेगा तो खरबूजा ही। यह कहावत इसकी मृदुता को लेकर है। यों तो ग्रीष्म ऋतु में अनेक फल बाजार में उपलब्ध रहते हैं, किंतु सभी फलों में खरबूजा अपना एक अलग ही स्थान रखता है। इसे गर्मियों का राजा भी कहा जा सकता है। यह गोलाकार या अंडाकार होता है। यह पौष्टिक स्वादिष्ट तो होता ही है साथ ही कई छोटी-मोटी बीमारियों को मिटाने के गुण भी इसमें होते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि खरबूजा ग्रीष्म ऋतु का अमृत फल है। इसको खाने से आप एक नई ताजगी  महसूस कर उठेंगे। बस इसे भूखे पेट मत खाइएगा अन्यथा लेने के देने पड जाएंगे।

इतिहास गवाह है कि खरबूजे ने दुनिया का इतिहास बदलने, आपसी फूट के बीज पनपाने, फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मई 1498 में वास्कोडिगामा ने जब कालीकट में अपने जहाज का लंगर डाला था तो भारतीय मीठे-मीठे महकते स्वादिष्ट खरबूजों की  सुगंध ने ही उनकी जीभ से लार टपका दी थी। वस्तुतः खरबूजे की महक पर फिदा होकर स्पेनवासियों और पुर्तगालियों को समुद्र के रास्ते भारत के लिए नया मार्ग तलाशना पडा था। मोहनजोदडों (3000 ई.पू.) की खुदाई में जो खास चीज मिली थी, वह चांदी में लिपटा एक कपडा था जिसमें खरबूजों के पूर्वज बीजों के अवशेष थे। निश्चय ही किसी भी पुरातत्वज्ञ को उन बीजों की कीमत सोने से कम नहीं लगी होगी।

वेस्टइंडीज में गन्ने की खेती करनेवाले अंगे्रजों की जीभ पर खरबूजे का स्वाद चढ़ गया होगा सो धीरे-धीरे खरबूजे की तारीफ ब्रिटेन के घर-घर में होने लगी तो रायल सोसायटी के अध्यक्ष सर जोसेफ बैक्स ने कैप्टेन ब्लिंग के नेतृत्व में वहां एक जहाज भेजने का निश्चय किया। 15 अक्टूबर, 1798 को 'बाउंटी" रवाना हुआ। लगभग 1 वर्ष बाद वे टिहरी पहुंचे और वहां खरबूजों की बहार में खो गए। कोई पांच महिने बाद उनके दिमाग से खरबूजे का भूत उतरा तो उन्होंने साथियों से लौटने का आग्रह किया। परंतु, साथियों में विद्रोह भडक उठा क्योंकि उन लोगों ने तो खरबूजे के लोभ में वहीं बस जाने का निश्चय कर लिया था। खरबूजे के दीवाने सैनिकों ने ब्लिंग साहब को एक नाव में बिठाकर समुद्र की लहरों में भाग्य भरोसे छोड दिया। ब्लिंग साहब बडी मुश्किल से यंत्रणाएं सहते हुए बडी ही दयनीय दशा में स्वदेश लौटे। लेकिन ब्लिंग साहब से फिर भी खरबूजे का मोह ना छूटा इसलिए उन्होंने फिर से एक बार टिहरी यात्रा का खतरा उठाया और बहुत सारे फल लेकर स्वदेश लौटे। जैसाकि अंगे्रजों का इतिहास रहा है उन्होंने भारतीय किसानों के खून-पसीने की मेहनत से पैदा किया खरबूजा यूरोप भेजकर यूरोपवासियों की जेबें खाली की और इधर किसानों का जमकर शोषण किया। 

खरबूजे की कई जातियां हैं। भारत में पाई जानेवाली जातियों में प्रमुख है - सफेदा और चिता, जो लखनऊ में मिलता है। पंजाब का चुनियारी और कलाची भी प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में मिलनेवाली जातियां हैं- बताशा, शरबत, शिरंजीत (जिसे जामखिरुल भी कहते हैं)।  आयुर्वेद के अनुसार यह मूत्रकारक, बलवर्द्धक, कोष्ठ शुद्ध करनेवाला, पचने में भारी, शीतल, स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक तथा वात-पित्त नाशक है। मौसम भर खरबूजे के सेवन से शरीर में तरावट रहती है और चित्त प्रसन्न रहता है। लगातार खाते रहने से खुश्की और कमजोरी मिटती है। दांत पर जमा मैल, मुंह की दुर्गंध, पीलिया, मूत्राशय की पथरी तथा सभी चर्मरोग नष्ट होते हैं। जिसको अम्लीयता की शिकायत हो वह आराम से इसे ले सकता है। पेचिश के लिए यह रामबाण दवा है। इसके बीज भी कुछ कम गुणों से भरपूर नहीं होते। बीजों से केवल ताजगी और ठंडाई ही नहीं पहुंचती है, बल्कि इससे दिमाग भी तेज होता है। इसके बीजों से खाने का तेल भी बनता है, जो काफी पोषक होता है। 

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