Sunday, 27 May 2018

अमृत फल है बेल फल - शिरीष सप्रे

अमृत फल है बेल फल
शिरीष सप्रे

साधारणतया जिन वनस्पतियों के बारे में हमारी धार्मिक विधियों में विशेष रुप से कहा गया है उनकी जानकारी सर्वसाधारण को होती ही है। तुलसी भगवान विष्णु को अर्पित किए बगैर पूजा पूर्ण नहीं होती। गणपति पूजन दूर्वा के बगैर अधूरा ही है इसी प्रकार शिवशंकर की पूजा बिल्व पत्रों के बगैर पूर्ण नहीं होती। इस कारण औषधी पदार्थ के रुप में इन उपयुक्त वनस्पतियों की जानकारी प्रत्येक को रहना अत्यावश्यक सा है। बेल के वृक्ष को शिवजी से जुडा होने के कारण पवित्र माना जाता है। बेल वृक्ष के आसपास महादेव का लिंग होता ही है ऐसी प्रथा है। ऋषि-मुनियों ने इस वृक्ष को जितना शरीर के लिए उपयोगी पाया है उतना ही इसे पवित्र एवं महत्वपूर्ण पेड कहा भी है। बेल के वृक्ष की छाया को भी शीतल और आरोग्यकारी माना गया है। प्रायः यह पेड वनों में पाया जाता है। भारतीय धार्मिक साहित्य में इसे दिव्य वनस्पति बताया गया है। आयुर्वेद के विशेषज्ञों ने इसके भरपूर औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण इसे अमृत फल कहा है और प्राचीनकाल से ही इसे औषधियों के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। आयुर्वेद में बिल्व का बहुत विशद विवेचन मिलता है।

शिव शुद्ध कल्याण है। शिवजी शीघ्र प्रसन्न होनेवाले होने के कारण इनकी पूजा सभी आस्तिक अपनी लौकिक-परालौकिक कामनाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। भगवान आशुतोष के पूजन-अभिषेक में बिल्वपत्र को पहला स्थान प्राप्त है। बेल का वृक्ष संपूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल है। बेल के वृक्ष के नीचे जाप से फल में अनंत वृद्धि होकर सिद्धि भी शीघ्र प्राप्त होती है। बेल फल की समिधा से लक्ष्मी का आगमन होता है। वे ही बेलपत्र पूूजार्थ उपयोगी होते हैं जिनके तीन पत्र संलग्न हों। बिल्व पत्र कभी बासी या अशुद्ध नहीं होते। इन्हें एक बार प्रयोग करने के पश्चात दूसरी बार धोकर उपयोग में लाया जा सकता है। इसके पत्तों का धुआं कमरे में करने पर कीडे-मकोडे, मच्छर, मकडी आदि नष्ट हो जाते हैं और वातावरण शुद्ध होता है।

बेल के फूलों को बहुत सुगंध होती है। बेल के पत्ते, फूल, छाल, फल और जडें तक औषधी द्रव्य के रुप में अत्यंत उपयुक्त हैं। मनुष्य  के जीवन को आनंद देनेवाला यह वृक्ष है इस कारण आयुर्वेदाचार्यों ने इस वृक्ष का संपूर्ण संशोधन कर इसके गुणगान गाए हैं। इससे हवा शुद्ध होती है और मनुष्य आरोग्य संपन्न रहता है। रोगनाशक होने के कारण संस्कृत में इसे बिल्व तथा श्रीफल आदि, हिंदी, मराठी और बंगला में बेल और गुजराती में बिली, कन्नड में बेललू तथा तमिल में विल्वपक्षम नामों से जाना जाता है। बेल एक ऐसा वृक्ष है जिसके फल कच्ची अवस्था में अधिक औषधीय गुण रखते हैं। पकने पर इसके औषधीय गुण कम हो जाते हैं। इसके पत्ते मधुमेह रोगियों के लिए रामबाण हैं। बेल की जड में त्रिदोष नाशक गुण होता है।

आयुर्वेद के मतानुसार बेल मधुर, लघुग्राही, वमन, शूल रोकनेवाला होकर मूत्रावरोध समाप्त करनेवाला है। बेल पत्तों के रस का मज्जातंतुओं पर विशेष परिणाम होता है। बेल की छाल अत्यंत प्रभावी औषधी है। चंदन के समान गुणों में श्रेष्ठ है। वात रोगों पर इन छिलकों का विशेष उपयोग होता है। ह्रदय विकार में अथवा छाती धडधडाने, अस्वस्थ महसूस करने, नींद नहीं आने इन विकारों पर वह योजनाबद्ध ढ़ंग से दी जाने पर अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में चरक, सुश्रुत आदि ने बेल के कच्चे फलों का ज्यादा गुणगान किया है। इनके मतानुसार कच्चा फल कफ, वायुनाशक, अग्निदीपक, पाचकग्राही, लघु स्निग्ध कहा गया है। जबकि पका फल मधुर और भारी अर्थात्‌ देर से पकनेवाला हो जाता है। पका फल पौष्टिक गुणों से युक्त हो जाता है। आधुनिक खोजों में बेल को उदरशोधक, खून के दस्त, आंव, अजीर्ण, विशेषरुप से मरोड (दर्द) युक्त पतले दस्त या खूनी पतले दस्तों में अत्यंत लाभकारी पाया है।

कच्चा और पका दोनों प्रकार के बेल ग्राही अर्थात्‌ ग्रहणी दोष को नष्ट करनेवाले कहे गए हैं। यह आंतों की शिथिलता दूर कर उनकी संकोच शक्ति को बढ़ाता है। जिससे मल निष्कासन की क्रिया में तीव्र सुधार होता है, आंव को बाहर कर यह आंतों को बलवान बनाता है। बेल का शर्बत पतला करके रात में या प्रातः पीना अत्यंत लाभप्रद है। पके हुए बेल का गूदा निकालकर पानी में भरपूर मसले फिर छान ले और इसमें इलायची के दाने, शक्कर डालकर शर्बत तयार करें। इसके कारण शरीर का दाह, अतिसार, पीला पेशाब होना समाप्त होता है और शरीर में स्फूर्ति निर्मित होती है। कहते हैं कि गर्मियों में बेल का शरबत नियमित रुप से पीने पर शरीर का कायाकल्प हो जाता है।

Friday, 25 May 2018

अनन्यसाधारण है कल्पवृक्ष आम - शिरीष सप्रे

अनन्यसाधारण है कल्पवृक्ष आम
शिरीष सप्रे

सभी फलों के राजा का सर्वत्र महत्व है और इसे पवित्र अमृत फल माना जाता है। आम देवताओं के बगीचे का फल है। लोकपरंपरा में जनभावनाओं में आम देवताओं का वृक्ष होने के कारण और इसकी पवित्रता के कारण किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत आम के पत्तों के तोरण से ही होती है। कोई सी भी पूजा हो द्वार पर आम के पत्तों का तोरण लगने के पश्चात ही त्यौहार या शुभ कार्य की शुरुआत होती है। फिर वह भगवान सत्यनारायण की पूजा ही क्यों ना हो? आम के पत्तों की माला दरवाजे पर टांगी नहीं कि मानो सारा मांगल्य द्वार पर अवतरित हो जाता है। शुभ कार्यों में जल से भरे कलश का महात्म्य और उसमें आम के पत्ते होना ही चाहिए। कलश पूजन भारतीय संस्कृति का अग्रगण्य प्रतीक है। पुराणों के अनुसार नारदमुनि शिवजी के विवाह के अवसर पर इस वृक्ष को स्वर्ग की वाटिका से लाए थे। बौद्ध और जैन मत में भी आम को शुभ वृक्ष मानते हैं। जातक कथाओं में भी आम का वर्णन मिलता है। 

दीर्घकाल तक प्रसन्नता से भरा हराकच्च रंग रखनेवाले आम के पत्ते सहज ही सुखद ठंडक दे जाते हैं। विवाह प्रसंग पर मंडप के द्वार पर आम के पत्तों के तोरण का कोई विकल्प नहीं। अमृत फल के रुप में प्रसिद्ध आम फिर वह कच्चा हो या पका हुआ का सर्वत्र कौतुक होता है। प्रत्येक को ही चाहिए ऐसा यह फल देवताओं का फल यानी आम ही है। शायद ही कोई हो जिसे यह फल पसंद ना हो। गर्मी के दिनों में इसका रस और कैरी का पना अतिथियों की आवाभगत कैसे करें की चिंता तत्काल दूर कर देता है। 

वैसे तो अक्षय तृतीया से बाजार में आम आना शुरु हो जाते हैं। भले ही महंगे क्यों ना हों परंतु घरों में आम आना शुरु हो ही जाते हैं। जेठ के महिने में वटसावित्री पूर्णिमा पर सुहागिनें अपने पति के जीवन के लिए मन ही मन वटवृक्ष की पूजा अवश्य करती हैं। इस पूजा में मान भले ही वटवृक्ष का हो परंतु आम के पत्तों के बिना काम नहीं चलता। 'गंगा दशहरा" के लिए देवताओं, गंगा और पंडितों को कम से कम 10 आम तो भी दान करने का महत्व है और वह किया भी जाता है। आम कभी निष्पर्ण नहीं होता। यह दीर्घायु वृक्ष है। वैवाहिक जीवन भी इसी तरह से फले फूले इस भावना से विवाह प्रसंग पर आम का महत्व है। आम संततीदायी है। पुत्रप्राप्ति के लिए वृक्ष की पूजा की जाती हैै। महान विभूति या सत्पुरुष पुत्र हो इसके लिए स्त्री के आंचल में आम प्रसाद के रुप में देते हैं। प्रजोत्पादक माने जाने के कारण विवाह  की विधियों के समय आम को पूजा में स्थान मिला है।

आम ऐसा फल है जो परंपरागत शत्रु भारत और पाकिस्तान दोनो का ही राष्ट्रीय फल है। बांग्लादेश का राष्ट्रीय वृक्ष तो फिलीपाइन्स का राष्ट्रचिंह है। वैसे तो इसका उद्‌गम अज्ञात है फिर भी यह फल है तो एशिया का ही, ऐसा माना जाता है। भारत ही नहीं तो दक्षिण एशिया की संस्कृति में भी आम को विशेष स्थान प्राप्त है। भारत में आम की अनेक प्रजातियां लगभग 200 हैं, हापुस, तोतापुरी, बादाम, लंगडा, दशहरी, केशर, पायरी, गोला, नीलम, आदि। आयुर्वेद में आम का बहुत महत्व है। आम्रमंजिरी कामदेव के पांच बाणों में से एक है। महाकवि कालीदास के साहित्य में अमराई और कोकिला के कुंजन के वर्णन हैं। आम को आनेवाली पहली आम्रमंजिरी पहिली शिवरात्रि को शिवजी को अर्पित करने की प्रथा है।

फलों का राजा अपने खट्टे-मीठे और रसदार गुणधर्म के कारण बच्चों से लेकर बुढ़ों तक में लोकप्रिय है। यह अपने कई औषधीय गुणों के कारण भी जाना जाता है। कच्चा हो या पका आम अनेक औषधीय गुणों से भरपूर है। कच्चा आम केरी आम्लधर्मी स्तंभक होकर इसका छिलका कषायात्मक और उत्तेजक होता है। पका हुआ आम मधुर, स्निग्ध, सुखदायक, बलदायक पचने में थोडा भारी, वायुहारक, शरीर की कांति और जठाराग्नि को बढ़ानेवाला होता है। यह कैल्शियम, लोहा, फॉस्फोरस, विटामीन के, फायबर, प्रोटीन आदि से युक्त होता है। आम का सेवन वजन बढ़ाने में सहायक होता है। इसके सेवन से बुद्धि एवं दृष्टि तीव्र होती है। एनिमिया या रक्ताल्पता से बचाव होता है। क्योंकि, इसमें तांबा की मात्रा भी भरपूर होती है। तांबा शरीर में लाल रक्तपेशियां बढ़ाने में सहायता प्रदान करता है। ब्लडप्रेशर और डायबिटीज नियंत्रित करने में आम के पत्ते उपयोगी होते हैं। बालों के लिए आम की गुठली के तेल को उपयोग में लाते हैं। आम की गुठली में विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में होते हैं। अंत में आम के संबंध में यह जो कहावत है कि आम तो आम गुठलियों के दाम निश्चय ही बडी सटीक बैठती है। 

Tuesday, 15 May 2018

गजब खरबूजे की माया - शिरीष सप्रे

गजब खरबूजे की माया
शिरीष सप्रे

खरबूजे के संबंध में यह कहावत भले ही पुरानी हो परंतु आज भी सटीक बैठती है खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। दूसरी प्रसिद्ध कहावत है छुरी खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरी पर कटेगा तो खरबूजा ही। यह कहावत इसकी मृदुता को लेकर है। यों तो ग्रीष्म ऋतु में अनेक फल बाजार में उपलब्ध रहते हैं, किंतु सभी फलों में खरबूजा अपना एक अलग ही स्थान रखता है। इसे गर्मियों का राजा भी कहा जा सकता है। यह गोलाकार या अंडाकार होता है। यह पौष्टिक स्वादिष्ट तो होता ही है साथ ही कई छोटी-मोटी बीमारियों को मिटाने के गुण भी इसमें होते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि खरबूजा ग्रीष्म ऋतु का अमृत फल है। इसको खाने से आप एक नई ताजगी  महसूस कर उठेंगे। बस इसे भूखे पेट मत खाइएगा अन्यथा लेने के देने पड जाएंगे।

इतिहास गवाह है कि खरबूजे ने दुनिया का इतिहास बदलने, आपसी फूट के बीज पनपाने, फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मई 1498 में वास्कोडिगामा ने जब कालीकट में अपने जहाज का लंगर डाला था तो भारतीय मीठे-मीठे महकते स्वादिष्ट खरबूजों की  सुगंध ने ही उनकी जीभ से लार टपका दी थी। वस्तुतः खरबूजे की महक पर फिदा होकर स्पेनवासियों और पुर्तगालियों को समुद्र के रास्ते भारत के लिए नया मार्ग तलाशना पडा था। मोहनजोदडों (3000 ई.पू.) की खुदाई में जो खास चीज मिली थी, वह चांदी में लिपटा एक कपडा था जिसमें खरबूजों के पूर्वज बीजों के अवशेष थे। निश्चय ही किसी भी पुरातत्वज्ञ को उन बीजों की कीमत सोने से कम नहीं लगी होगी।

वेस्टइंडीज में गन्ने की खेती करनेवाले अंगे्रजों की जीभ पर खरबूजे का स्वाद चढ़ गया होगा सो धीरे-धीरे खरबूजे की तारीफ ब्रिटेन के घर-घर में होने लगी तो रायल सोसायटी के अध्यक्ष सर जोसेफ बैक्स ने कैप्टेन ब्लिंग के नेतृत्व में वहां एक जहाज भेजने का निश्चय किया। 15 अक्टूबर, 1798 को 'बाउंटी" रवाना हुआ। लगभग 1 वर्ष बाद वे टिहरी पहुंचे और वहां खरबूजों की बहार में खो गए। कोई पांच महिने बाद उनके दिमाग से खरबूजे का भूत उतरा तो उन्होंने साथियों से लौटने का आग्रह किया। परंतु, साथियों में विद्रोह भडक उठा क्योंकि उन लोगों ने तो खरबूजे के लोभ में वहीं बस जाने का निश्चय कर लिया था। खरबूजे के दीवाने सैनिकों ने ब्लिंग साहब को एक नाव में बिठाकर समुद्र की लहरों में भाग्य भरोसे छोड दिया। ब्लिंग साहब बडी मुश्किल से यंत्रणाएं सहते हुए बडी ही दयनीय दशा में स्वदेश लौटे। लेकिन ब्लिंग साहब से फिर भी खरबूजे का मोह ना छूटा इसलिए उन्होंने फिर से एक बार टिहरी यात्रा का खतरा उठाया और बहुत सारे फल लेकर स्वदेश लौटे। जैसाकि अंगे्रजों का इतिहास रहा है उन्होंने भारतीय किसानों के खून-पसीने की मेहनत से पैदा किया खरबूजा यूरोप भेजकर यूरोपवासियों की जेबें खाली की और इधर किसानों का जमकर शोषण किया। 

खरबूजे की कई जातियां हैं। भारत में पाई जानेवाली जातियों में प्रमुख है - सफेदा और चिता, जो लखनऊ में मिलता है। पंजाब का चुनियारी और कलाची भी प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में मिलनेवाली जातियां हैं- बताशा, शरबत, शिरंजीत (जिसे जामखिरुल भी कहते हैं)।  आयुर्वेद के अनुसार यह मूत्रकारक, बलवर्द्धक, कोष्ठ शुद्ध करनेवाला, पचने में भारी, शीतल, स्वादिष्ट, वीर्यवर्द्धक तथा वात-पित्त नाशक है। मौसम भर खरबूजे के सेवन से शरीर में तरावट रहती है और चित्त प्रसन्न रहता है। लगातार खाते रहने से खुश्की और कमजोरी मिटती है। दांत पर जमा मैल, मुंह की दुर्गंध, पीलिया, मूत्राशय की पथरी तथा सभी चर्मरोग नष्ट होते हैं। जिसको अम्लीयता की शिकायत हो वह आराम से इसे ले सकता है। पेचिश के लिए यह रामबाण दवा है। इसके बीज भी कुछ कम गुणों से भरपूर नहीं होते। बीजों से केवल ताजगी और ठंडाई ही नहीं पहुंचती है, बल्कि इससे दिमाग भी तेज होता है। इसके बीजों से खाने का तेल भी बनता है, जो काफी पोषक होता है। 

Friday, 11 May 2018

ग्रीष्मकाल में वरदान हैं तरबूज - शिरीष सप्रे

ग्रीष्मकाल में वरदान हैं तरबूज 
शिरीष सप्रे

हमारा शरीर तंदरुस्त और शक्तिशाली बना रहे इसकी व्यवस्था प्रकृति ने स्वयं ही कर रखी है बस आवश्यकता है तो हमें इस संबंध में व्यवस्थित जानकारी रखने की। अब ग्रीष्मकाल में होनेवाली गर्मी के प्रकोप को ही लीजिए इससे बचाने के लिए प्रकृति ने हमें तरबूज और खरबूज जैसे फल दिए हैं। यह प्रकृति की अनुपम कृपा ही है कि बहुउपयोगी, बहुगुणी स्वादिष्ट ये फल हमें खाने को मिलते हैं। तरबूज  को ही लीजिए जहां यह गरीबों के लिए सस्ता फल है वहीं अमीरों के लिए विभिन्न प्रकार से खाया जानेवाला एक स्वादिष्ट फल है। वर्गीकरण की दृष्टि से यह कद्दूवर्गीय फल है। कच्चे तरबूज की लोग सब्जी, रायता आदि बनाते हैं। इसके बीज की गिरियों को विभिन्न प्रकार के मेवा मिष्ठानों में डालते हैं। बीजों से तेल भी निकलता है।
तरबूज ग्रीष्मकालीन फसल है। जितनी तेज गर्मी होगी उतनी ही इसकी पौध एवं फसल में वृद्धि होगी। तरबूज की खेती के लिए सबसे उपयुक्त नदी के किनारे की रेतीली जमीन होती है। प्रकृति की अनमोल देन तरबूज ग्रीष्मकालीन विशेष फल है। तरबूज का सर्वाधिक उत्पादन चीन में किया जाता है। जापान में चौकोन तरबूजों का उत्पादन किया जाता है। तरबूज या वाटर मेलन अफ्रीका से आकर सारी दुनिया में खाया जाने लगा। इसके सफेद हिस्से की सब्जी बनाकर खाई जाती है। ठंडक प्रदान करनेवाला यह फल अत्यंत शीत होकर बढ़िया टानिक है। आयुर्वेद के कई ग्रंथों में इसके गुणों की चर्चा है। आयुर्वेद के अनुसार यह ग्राही, आंख की रोशनी बढ़ानेवाला, शीतलता प्रदान करनेवाला, भारी तथा वात-कफनाशक और प्यास को शांत करनेवाला कहा गया है। गर्मी के दिनों में अधिक पसीना निकलने के कारण प्राकृतिक लवणों की कमी हो जाती है और प्यास अधिक लगती है। तरबूज खाने से प्यास शांत होती है और उपर्युक्त लवणों की पूर्ति होती है।

आधुनिक खोजों मेें इसे चर्म रोगों, पेचिश, कब्ज, आंतों की जलन, जी मिचलाना, उल्टी, पीलिया, लीवर-तिल्ली, उच्च रक्तचाप, पेशाब में जलन या पेशाब रुकने, आदि रोगों में उपयोगी पाया गया है। यह फेफडे के रोगों पर भी लाभप्रद पाया गया है। गर्मी के मौसम में तरबूज का शर्बत अत्यंत लाभप्रद है।

Thursday, 10 May 2018

प्राचीनत्व अंगूर (द्राक्ष) की बेल का - शिरीष सप्रे

प्राचीनत्व अंगूर (द्राक्ष) की बेल का 
शिरीष सप्रे

समुद्र मंथन की कथा से तो लगभग सभी लोग वाफिक होंगे ही जिसमें चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी। परंतु इसी समुद्र मंथन के दौरान एक सुंदर स्त्री जिसका देवताओं ने नामकरण द्राक्षा किया ऊपर आई और उसने तत्काल बेल का रुप धर लिया। देवताओं ने इस बेल का नामकरण द्राक्षा किया। इस पर से द्राक्षा का प्राचीनत्व सिद्ध होता है। यह द्राक्षा बेल अत्यंत गुणकारी एवं औषधीय गुणों से युक्त होती है। यदि इसके औषधीय गुणों पर गौर किया जाए तो ध्यान में आएगा कि यह अद्‌भुत फल है जिसका औषधीय उपयोग हजारों साल से होता चला आ रहा है।

इस द्राक्षा बेल का मूलस्थान कॅस्पियन और काला समुद्र के मध्य स्थित कॉकेशस पर्वत के आसपास है, ऐसा माना जाता है। आज भी वहां द्राक्ष की जंगली बेलें दिख पडती हैं। संभवतः आर्य इन द्राक्षों के बीज वहां से भारत लाए। कॅस्पियन समुद्र के उस पार अंगूर का प्रसार सर्वप्रथम एशिया मायनर, फिर यूनान और सिसली में हुआ। फोनिसियन व्यापारियों द्वारा 600 वर्ष ई. पू. इटली, स्पेन और फ्रांस में अंगूर की बेलें ले जाई गई। अंगूर के पत्ते व बीजों वाले अवशेष (फॉसिल्स) उत्तर अमेरिका और यूरोप में मिले हैं।

शायद बहुत प्राचीन काल से ही मनुष्य को अंगूर की बागबानी का ज्ञान हो। अंगूर की खेती और अंगूर से शराब बनाने का ज्ञान छः हजार वर्ष पूर्व से इजिप्त के लोगों को था। इजिप्त की पुरानी कब्रों में अंगूर के बीज मिले हैं और दीवारों पर अंगूर की खेती के चित्र भी मिले हैं। बायबल में भी नूह द्वारा अंगूर की खेती करने का उल्लेख मिलता है। पुराने हिब्रू, रोमन और यूनानी साहित्य में भी अंगूर और उसकी शराब के उल्लेख मिलते हैं। रोमन ज्ञानकोशकार प्लीनी ने अंगूर की 51 जातियों और पचास तरह की शराब की जानकारी दी है।

शराब का उद्‌गम कैसे हुआ इस संबंध में एक ईरानी कथा इस प्रकार से है - पुराने जमाने में जमशेद नामका एक राजा ईरान पर राज करता था। इस राजा को दुनिया की सर्वोत्तम वस्तुओं के साथ - साथ हर रोज अंगूर खाना भी बहुत प्रिय था। उसके गुलाम कॅस्पियन के जंगलों में से अंगूर एकत्रित कर राजमहल के तहखाने में रखा करते थे। राजमहल में काम करनेवाली अल्मा नामकी एक दासी थी जिसकी महत्वाकांक्षा राजा की रखैल बनने की थी। सतत प्रयत्नों के बाद भी उसे सफलता हासिल नहीं हो पाई वह राजा को आकर्षित नहीं कर पाई। 

वह प्रतिदिन तहखाने में राजा के लिए रखे हुए अंगूरों का सेवन अवश्य करती थी। एक दिन उसे एक घडे में कुचले हुए अंगूर नजर आए। उसने उस मटके में हाथ डाला और हाथ पर लगे लाल रस को चखकर देखा। उसे वह स्वाद कुछ पसंद नहीं आया, उसने उसे थूक दिया, उसे लगा शायद यह रस जहरीला हो गया है। कहीं राजा इसका सेवन ना कर ले इसलिए उसने इस मटके को अलग निकालकर रख दिया। एक दिन जब राजा प्रसन्न था तब उसने उसे बताया कि वह रोज तहखाने में रखे अंगूर खाती है। यह सुन राजा क्रोधित हो गया और उसने उसे दंडित कर दिया। जीवन से हताश हो उसने आत्महत्या करने की ठान तहखाने में रखे उन कुचले हुए अंगूरों के रस का सेवन करने का निश्चय किया और भरपूर मात्रा में उस रस का सेवन कर लिया। 

परंतु, परिणाम उल्टा हो गया उसका निराश मन उत्तेजित हो गया और वह मदहोश हो नाचने लगी। गुलामों ने यह देख राजा को सूचित किया। गुलामों ने राजा को सूचित किया। राजा ने तलघर में आकर माजरा समझने की कोशिश में इस रस को चखकर देखा। नशे में उसे  आल्मा सुंदर दिखने लगी और उसने आल्मा को अपनी रानी के रुप में अपना लिया।  

द्राक्षा बेलवर्गीय जाति की होकर जाम, जेली और ज्यूस बनाने के काम आती है यह कई औषधीय गुणों से युक्त होकर इसकी कई जातियां है। जिसमें थामसन सीडलेस सबसे अधिक उत्कृष्ट, प्रसिद्ध होकर सर्वाधिक उपयोग में लाई जाती है। तुर्कस्थान में इसे 'सुलतानीना" कहते हैं। इस जाति की खेती सबसे अधिक ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका मेंं होती है। किसमिस और शराब बनाने के लिए इस जाति के अंगूरों का सर्वाधिक प्रयोग होता है। महाराष्ट्र के नासिक जिले में इसकी खेती सर्वाधिक होती है। यहां के अंगूरों की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बहुत है।

प्रकृति के इस अनमोल मेवे के सेवन से शरीर में नवचैतन्य निर्मित होकर स्फूर्ति मिलती है। हरे और काले इस प्रकार दो तरह के अंगूर होते हैं। काले अंगूर अधिक औषधीय होते हैं। अंगूर मृदु विरेचक, दाहनाशक, तृप्तिदायक और श्रमहारक होते हैं। अशक्तता पचन शक्ति मंद होने पर इसका सेवन लाभकारी होता है। इसके फ्री न्यूट्रिएंट्‌स शरीर और ह्रदय के लिए बहुत लाभकारी होते हैं। साथ ही इसमें  लाभदायक तत्व के रुप में एंटीऑक्सीटडेंट्‌स होते हैं।  

Tuesday, 1 May 2018

उत्तर-दक्षिण के समन्वय की साधना करनेवाला महान यात्री मुनि अगत्स्य - भाग 2 शिरीष सप्रे

उत्तर-दक्षिण के समन्वय की साधना करनेवाला महान यात्री
 मुनि अगत्स्य - भाग 2   शिरीष सप्रे
तमिल बंधुओं के मन में अगत्स्य ऋषि के प्रति अतीव आदर की भावना पाई जाती है। तमिलनाड में अगत्स्य को शिवजी का सत्‌ शिष्य, मनीषि, महात्मा, वेदशास्त्र का प्रणेता एवं अलौकिक शक्ति संपन्न महर्षि मानते हैं। महामुनि अगत्स्य के अनेक मंदिर इस प्रदेश में आज भी विद्यमान हैं जो इस श्रद्धा और भक्तिभाव के प्रतीक हैं। चिदंबरम्‌ के मंदिर के पूर्व गोपुर पर अंकित अगत्स्य की मूर्ति प्रमाणित मानी जाती है। दक्षिण के अगत्स्य मंदिरों में पोर्दियमलै का मंदिर अत्यधिक प्रसिद्ध है। कहा जाता है, पंचवटी से प्रस्थान करने के बाद मुनि का प्रमुख आश्रम इसी स्थल पर निर्मित हुआ था और यही वह पुण्य स्थल है, जहां से मुनिराज ने समस्त दक्षिण भूमि में आर्य संस्कृति के श्रेष्ठ विचारों का प्रचार किया। दक्षिण में अगत्स्य से संबंधित क्षेत्रों की संख्या बहुत बडी है। कर्नाटक में बीजापुर के निकट वातापी (बदामी), कूर्ग प्रदेश में ब्रह्मगिरी, आंध्रप्रदेश द्राक्ष-रामम्‌, तंजौर जिले में अगत्स्यमपल्ली और तिरुनवेल्ली के समीप अगत्स्यवरम्‌ आदि तीर्थस्थल अगत्स्य के महान सांस्कृतिक कार्य की स्मृति सदैव जाग्रत करते आए हैं।

ऋषि अगत्स्य के तमिलनाड के प्राचीन राजवंशों के साथ संबंध थे और उनका उन पर बहुत प्रभाव भी था। पाण्ड्‌य राजाओं का कुलगुरु अगत्स्य ही को माना जाता है। दक्षिण प्रदेश में आने के उपरांत मुनि ने ही यहां के वनप्रदेश को मनुष्यों के रहवास योग्य बनाया। उनके द्वारा सघन वनों की कटाई अभूतपूर्व थी। वेलीर, अरुवालर, आदि द्रविड जनजातियों ने ऋषि अगत्स्य के इस अद्‌भुत साहसी सेवाकार्य में उनका साथ दिया था। तमिल भाषा के साथ भी मुनिवर का संबंध अतीव महत्वपूर्ण था। आर्य एवं द्रविड संस्कृति को एकात्मता के सुंदर सूत्र में जोडनेवाले इसी मनीषी महापुरुष ने तमिल के व्याकरण की रचना की, इस प्रकार का दृढ़ विश्वास तमिलों में आज भी विद्यमान है। तमिल भाषा के विकास के लिए अगत्स्य ने 'संघम्‌" की स्थापना की। उन्हीं के प्रेरक अस्तित्व के कारण तमिल और देववाणी संस्कृत का सहयोग संपन्न हुआ। तमिल के प्राचीन साहित्य का इतिहास अगत्स्य की कथाओं से भरापूरा है।... तमिल भाषा, व्याकरण एवं साहित्य की अभिवृद्धि करने में इस महर्षि का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रदेश के निवासियों में महर्षि अगत्स्य के प्रति बहुत श्रद्धा भावना है।

महाभारत के वन पर्व में एक कथा है ः कालकेय नामक दैत्य जाति समुद सागरीय क्षेत्र में निवास करती थी। मनुष्य जगत को सदैव पीडा पहुंचाने में इन दैत्यों को बडा आनंद आया करता था। समस्त विश्व इन दैत्यों के कारण भयभीत हो गया था। इस विचित्र संकट से  विश्व को बचाने के लिए तपस्वी अगत्स्य वहां पहुंचे। अपनी दिव्य तपशक्ति के बलबूते उन्होंने एक ही घूंट में सारे समुद्र के पानी का पान कर लिया और कालकेय दैत्यों को नष्ट कर दिया। यह रुपक अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं है। यह कथा कुछ गंभीर अर्थ रखती है। जिस प्रकार चुल्लूभर पानी को हम झट से पी सकते हैं वैसे ही अगत्स्य ने समुद्र पर विजय प्राप्त की एवं अत्यंत वीरता के साथ दैत्यों का संहार कर दिया समुद्र का भय दूर हुआ।

समुद्र बंधन तोडकर उपनिवेश संस्थापन तथा भारतीय सभ्यता का प्रसार करने हेतु अगत्स्य ऋषि ने सुदूर देशों में भ्रमण किया। कम्बोडिया में इस बात के भरपूर साक्ष्य मिले हैं। यहां आकर मुनि अगत्स्य ने विशाल शिव मंदिरों का निर्माण किया था। यहां के किसी राजवंश की स्थापना का श्रेय भी इसी ऋषि को प्राप्त है। कम्बोडिया के अंकोरवाट में एक अति प्राचीन शिलालेख मिला है जिस पर अगत्स्य के यहां निवास करते हुए परमधाम जाने का उल्लेख किया हुआ है। इस टूटे-फूटे शिलालेख की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं - ब्राह्मण अगत्स्य आर्य देश के निवासी थे। वे शैवमतानुयायी थे। उनमें अलौकिक शक्ति थी। उसीके प्रभाव से वे इस देश तक पहुंच सके थे। यहां आकर उन्होंने भद्रेश्वर नामके शिवलिंग की पूजा-अर्चना बहुत समय तक की थी। यहीं से वे परमधाम को सिधारे थे।

सागर की सीमाओं को पार करनेवाला, महान भारतीय संस्कृति का यह पुजारी, भारतीय विचारों का प्रथम प्रतिनिधि है। वायुपुराण में इसकी बहिर्द्वीप (बोर्निओ), यवद्वीप (जावा), सुमात्रा, कुशद्वीप, वराह द्वीप एवं शांख्य द्वीप तक की सुदूर यात्राओं का उल्लेख मिलता है। ये द्वीप आज के इंडोनेशिया, मलाया और उनके निकटवर्ती प्रदेश हैं। इन प्रदेशों में आज भी अगत्स्य की स्मृति किसी ना किसी रुप में विद्यमान है। पूर्व बोर्नियो में कीबेग नामक गांव में प्राचीन गुफाएं और अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां शिव, गणेश, नंदी आदि भारतीय देवताओं के साथ अगत्स्य ऋषि की मूर्ति भी मिली है। जावा में भी अनेक स्थलों पर इस प्रकार की मूर्तियां मिलती हैं। श्रीलंका के साथ भी अगत्स्य का संबंध सर्वश्रुत है। उन्हें लंकावासी बताया गया है। यहां के निवासी उन्हें दक्षिण का स्वामी समझते हैं।

आर्यावर्त की संस्कृति का शुभ संदेश लेकर जो पहला मिशनरी दक्षिणापथ में आया वह था अगत्स्य, जिसने अपने सफल जीवन में उत्तर और दक्षिण की आर्य और द्रविड देश की संस्कृति का सुंदर समन्वय करने का सेवाव्रत सार्थ किया उसकी जीवनगाथा निश्चय ही प्रेरणादायी है। अगत्स्य नक्षत्र का उदय भाद्रपद महिने में होता है और इसके उदय के पश्चात वर्षाकाल में गंदला हुआ नदियों का पानी पुनः एक बार निर्मल हो जाता है। इसी प्रकार वर्तमान में हमारी संस्कृति पर जो आक्रमण हो रहे हैं वह चुनौतियां काल का प्रवाह है। हमारी एकात्मता चिरंजीवी है और महर्षि अगत्स्य की स्मृति हमें यही प्रेरणा देती है कि, हमारी एकात्मता चिरंजीवी है।