Sunday, 22 April 2018

दक्षिणाकाश का तेजस्वी नक्षत्र भगवान अगस्त्य - भाग 1 शिरीष सप्रे

दक्षिणाकाश का तेजस्वी नक्षत्र भगवान अगस्त्य - भाग 1
शिरीष सप्रे

दीर्घदर्शी और समयज्ञ ऋषी अगस्त्य का उल्लेख सबसे पहले ऋगवेद के प्रथम मंडल में देखने को मिलता है। वे ऋचाओं और मंत्रों के द्रष्टा और स्रष्टा हैं। धर्मपत्नी लोपामुद्रा (विदर्भ नरेश मलयध्वज की पुत्री। इससे विवाह कर मुनिवर ने संभवतः प्रथम ही अंतरदेशीय विवाह की प्रथा का शुभारंभ किया। विदर्भ में अमरावती नगरी के निकट सालबर्डी नामक गांव में अगत्स्य ऋषि का आश्रम था और उनके दक्षिण की महान यात्रा की आरंभ स्थली यही है, इस प्रकार की जनश्रुति है।) के साथ भी उनका उल्लेख संयुक्त रुप से पढ़ने को मिलता है। सामवेद के पंचम और द्वादश अध्याय में भी उनका उल्लेख यहां-वहां हुआ है। परंतु, एकाकी ही लोपामुद्रा के साथ संयुक्त रुप से नहीं। इसके पश्चात आदिकाव्य वाल्मिकी रामायण के अरण्यकांड के द्वादश और त्र्योदश सर्ग तथा उत्तरकांड के 34वें और 35वें सर्ग में अगस्त्य तथा भगवान राम की भेंट वार्ता और दिव्यास्त्र प्रदान करने की गाथा पढ़ने को मिलती है। 

दक्षिण दिशा के निवास के दौरान राम का मन सारे ऋषिवृंद में यदि कहीं विशेष रुप से आकृष्ट हुआ था तो वह भारतीय संस्कृति का शुभ संदेश लेकर दक्षिण की ओर चल पडनेवाले महामुनि अगस्त्य की ओर ही। भगवान अगस्त्य से श्रीराम को दंडकारण्य का पूर्वइतिहास किस प्रकार से इक्ष्वाकु कुल से संबंधित था का पता चला। वैसे वंश परंपरा से यह उन्हें ज्ञात ही होगा। विंध्य और शैवल पर्वत के मध्य भाग में स्थित इस अरण्य प्रदेश में उन्ही के पूर्वज इक्ष्वाकु के पुत्र दंड ने अपने राज्य का निर्माण कर अनेक वर्षों तक राज्य किया था।

उस काल में आर्यावर्ती प्रदेश से दक्षिण देश की ओर जाना अत्यंत कठिन कार्य था। घोर अरण्यों से तथा वन्य पशुओं से यह मार्ग भरा हुआ था। यहां की जंगली जातियों का भी बहुत भय था। रामायण के लंका कांड में इन क्रूर राक्षसों की विकट लीलाओं का वर्णन मिलता है। इल्वल तथा वातापी नामके राक्षस संभवतः इसी प्रदेश के निवासियों के नेता थे। उत्तर-दक्षिण के समन्वय की साधना करनेवाले इस महान यात्री मुनि ने अपने निवास से दक्षिण देश की भूमि को पवित्र किया। अगस्त्य ने यहां के निवासियों के मन पर विजय प्राप्त की। इस समस्त भूप्रदेश को आवागमन के योग्य बनाने का प्रचंड कार्य करने में वे सफल हुए। इस बात का प्रशंसापूर्ण उल्लेख वाल्मिकी रामायण के अरण्यकांड में है। वास्तव में दुर्गम दक्षिण में सर्वप्रथम आनेवाले अगस्त्य ही भारतीय संस्कृति के अग्रदूत हैं। दक्षिण में यज्ञसंस्था का प्रारंभ करने का श्रेय इन्हीं को देना चाहिए। दक्षिण देश के राजाओं तथा सामंतों ने यज्ञ विधि को अपनाया।

अनैतिक धन, भोजन न स्वीकारना, लोकहित के मूल्य पर अपना व्यक्गित हित साधना से बढ़कर पाप नहीं। लोकरंजन, लोकमंगल के कार्य से रोकना या व्यवधान उत्पन्न करना उचित नहीं इन आर्य मूल्यों के विपरीत सुदुर दक्षिण में निविड अंधकार, अज्ञान का अंधकार, घनीभूत होकर आक्रांत कृण्वंतो विश्वम्‌ आर्यम्‌ का उद्‌घोष करनेवाली आर्य संस्कृति आचारहीन, विचारशून्य, कुरीतियों का पालन, घृणिंत परंपरा का प्रचलन, आध्यात्मिक ज्ञान का नितांत अभाव, भूत-प्रेत की आराधना, संस्कार संपन्नताविहीन, भडकीले वस्त्राभूषण, मदिरापान, वासनापूर्ति में लिप्त, शिष्टता-सभ्यता से दूर (किसीका भी वरण), त्याग-तपस्या-बलिदान से घृणा, पुनर्जन्म, परलोक में आस्था नहीं, सबल द्वारा निर्बल का शोषण, पशु-पक्षी तक सुरक्षित नहीं, गो भक्षण, नरभक्षी, ऋषियों का भक्षण, पिशाचता, पाश्विक वृत्तियों वाली रक्ष संस्कृति से पीडित थी। दक्षिणापथ एवं दंडकारण्य को मुक्त कराने, आर्यों को अत्याचार, भय और दुःख से मुक्त ना करा लूंगा उत्तरापथ नहीं लौटूंगा का प्रण लेकर दक्षिणापथ की ओर प्रयाण कर अगत्स्य ने दक्षिणापथ में सुरक्षित रहने की अविश्वनियता को समाप्त किया।

प्रत्येक पुराण में यत्किंचित ही क्यों ना हो अगस्त्य से संबंधित वृत या घटना का उल्लेख मिलता है। इतिहास एवं काव्य में भी अगस्त्य का आख्यान यहां-वहां मिलता है। राष्ट्रीय-अस्मिता तथा सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा की रक्षा के लिए जो आगे चलकर श्रीराम ने व्यापक स्तर पर किए उनका शुभारम्भ अगस्त्य ने ही किया था। यही नहीं अगस्त्य पहले आर्य ऋषि थे जिन्होंने आत्मकल्याण की तुलना में लोककल्याण की महत्ता प्रतिपादित की। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की दिशा में कुछ पग उठाए। शम्बर, इल्बल तथा कालकेयों का वध कर राष्ट्र को निरापद बनाने का स्तुत्य प्रयास किया। इस महान यात्री के संकल्प में पहली बाधा विंध्याद्रि ने उपस्थित की। आर्यावर्त की सीमा पर खडा रहकर मेरु पर्वत की उत्तुंगता के साथ प्रतिस्पर्धा करनेवाला विंध्याद्रि आर्यावर्त के यात्री का मार्ग रोकना चाहता था। परंतु, अपनी दिव्य तपस्या के बल पर अगस्त्य ने विंध्याद्रि पर विजय प्राप्त की, विंध्याद्रि को नम्र बनाया। 

उस काल में जन सामान्य यह मानने लगा था कि, विंध्य अनवरत ऊंचा उठ रहा है परंतु, सत्य क्या है? भूगर्भ में घट रही अकल्पनीय घटनाओं, परिवर्तनों के कारण ऐसा तो कभीकभार ही होता है फिर वास्तविकता क्या है? विंध्य हिमालय की भांति दुर्लघ्य तो नहीं परंतु, विंध्य के पगतल में विस्तृत क्षेत्र में रहने पर संस्कृति संकरता, संस्कार विलुप्तता तथा जीवन सुरक्षा की अनिश्चितता के भय से दुर्लघ्य प्रचारित हो गया था। अतः मेधावी व्यक्ति, तपस्वी दंडकारण्य तो क्या उससे दूर रहनेवाले ऋषियों ने भी स्वयं को सीमित कर लिया। परंतु, अगस्त्य ने दक्षिण में प्रवेश कर वैदिक संस्कृति को व्यापक आयाम देने का सबल प्रयास किया।

इसका अर्थ यह नहीं कि इसके पूर्व दक्षिण भारत में आर्य थे ही नहीं। क्योंकि, ऐसा मानने का अर्थ होगा कि दक्षिण भारत में केवल अनार्य जातियां थी और वहां वैदिक कर्मकांड नहीं होते थे और गुरुकुल भी नहीं थे न ही ऋषि आश्रम। पुराणों में उपलब्ध अंतर्साक्ष्य तथा तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश पर विचार करने पर इसकी पुष्टि नहीं होती। कहा जाता है कि वृत्तासुर के अत्याचारों से पीडित आर्यों व देवों की रक्षार्थ इंद्र ने इसी क्षेत्र में निवसित आर्यऋषि दधीचि की अस्थियां लेकर वज्र बनाया था तथा इसी वज्र से युद्ध कर वृत्रासुर का वध किया था और उसके सजातिय कालकेयों द्वारा पीडित आर्य व आर्य ऋषियों की रक्षा अगस्त्य ने की थी। यदि एक क्षण के लिए हम इन सबको अपनी दृष्टि से ओझल कर दें तो भी यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि वहां आर्य थे ही नहीं। यदि नहीं थे तो अत्याचार किन पर होता था? असुर जातियां किनके यज्ञों का ध्वंस करती थी? 'निशिचर निकर सकल मुनि खाए," तुलसी ने यह किनको दृष्टि में रखकर लिखा था? निष्कर्षतः समस्त प्रश्नों का उत्तर यही है कि, अगस्त्य के पहुंचने के पूर्व आर्य ही नहीं, आर्य ऋषि भी वहां रहते थे।

तो फिर अगस्त्य के संबंध में ऐसा क्यों कहा जाता है। ऐसा लगता है कि तत्कालीन दक्षिण भारत में जो वन्य जातियां रहती थी वे थी तो आर्य जाति से संबंधित परंतु, असंस्कारित थी और इसका कारण था दक्षिण भारत में जो गुरुकुल या आश्रम थे वे असुर जाति के प्राबल्य तथा वन्य जातियों के औदास्य भाव के कारण इन लोगों को वैदिक विचारधारा में दीक्षित करने का व्यापक स्तर पर सफल प्रयास कर नहीं पा रहे थे। करते भी कैसे? वे तो स्वंय ही अस्तित्व रक्षा के संघर्ष में उलझे हुए थे और उसमें भी सफलता प्राप्त हो लेने की स्थिति में नहीं थे। उनकी इस दुर्दशा पर उत्तर भारतीय दुखी एवं चिंतित तो थे ही, अपने आपको असहाय भी अनुभव करते थे। अतः उत्तर भारतीय आर्यों को दुर्दशा से बचाने के लिए यह प्रचारित कर दिया कि, विंध्य हिमालय की उच्चता से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। अतः दक्षिण भारत में जाना असंभव है।

किंतु अगस्त्य ने लोगों द्वारा प्रसारित इस भ्रांत धारणा का खंडन करते हुए दक्षिण भारत में जाने का साहसिक पग उठाया तथा वहां जाकर तत्द्देशीय आर्यों को सुरक्षित ही नहीं तो सुसंस्कारित करने का भी उल्लेखनीय कार्य किया। अतः लोगों ने उस समय तक मित्रावरुणी, महामुनि, और्वश्य तथा कुंभज आदि नामों से अभिहित साहिसिक ऋषि को 'अगं पर्वतं स्तम्भयति इति अगस्त्यः" के सिद्धांतानुसार अगत्स्य नाम से पुकारना प्रारंभ कर दिया और आगे आनेवाली पीढ़ियों ने उन्हें चिरस्मृत बनाए रखने के अभिप्राय से एक तारे को ही अगत्स्य संज्ञा से संबोधित करना प्रारंभ कर दिया। जो आज भी प्रचलित है और वर्तमान पीढ़ि को उस ऋषि के महत्व का स्मरण दिलाता है। .....