Friday, 9 March 2018

क्या कठपुतली कला नष्ट हो जाएगी? - शिरीष सप्रे

क्या कठपुतली कला नष्ट हो जाएगी?
शिरीष सप्रे

प्राचीन भारतीय संस्कृति के वैभवशाली इतिहास और परंपराओं के संबंध में बोलते समय हर भारतीय अपने प्राचीन देवालयों, जो विशिष्ट शैलियों में बने हैं, संगीत, नृत्य, चित्रकला, आदि के बारे में बिल्कूल सहज भाव से बोलता चला जाता है। किंबहुना, इन कलाओं से ही भारतीय संस्कृति का एक चित्र संपूर्ण विश्व के सामने आ जाता है। परंतु, इन कलाओं के साथ ही अथवा उनसे भी अधिक प्राचीन एक भारतीय कला जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर भी है। हमारे द्वारा बहुत दुर्लक्षित हुई है और इस कारण यह कला कहीं हमारे देश से ही अस्तंगत तो नहीं ना हो जाएगी की परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। यह कला है 'कठपुतली कला"। वर्तमान में हमें यह कला टी. व्ही. के कुछ कार्यक्रमों में शीर्षक दिखलाते समय सामने आनेवाली गुडियाओं के रुप में नजर आती है।

यदि इस कला का इतिहास देखें तो यह लोक कला जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर होने के साथ प्रचार-प्रसार का माध्यम भी है, भारत की ही विश्व को देन है परंतु, अब लुप्त होने की कगार पर है। ई.पू. चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी के नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है। कठपुतली शब्द संस्कृत के 'पुत्तलिका" या 'पुत्तिका" और लैटिन के 'प्युपा" से मिलकर बना है जिसका अर्थ है छोटी गुडिया। पुत्तलिका शब्द निःसंदेह अत्यंत प्राचीन है क्योंकि वेदों में भी इसका प्रयोग हुआ है। अथर्ववेद में शत्रु का पुतला बनाकर मंत्र द्वारा जलाने का उल्लेख है। सिंहासन बत्तीसी की पुतलियों की कहानी भी बहुत प्रसिद्ध है। 

भारत से तुर्कस्थान होते हुए युरोप में यह कला गई और वहां से अन्यत्र फैली। बौद्ध धर्म के साथ श्रीलंका, इंडोनेशिया, चीन, जापान इन स्थानों पर कला का प्रचार-प्रसार और विस्तार हुआ। कहा जाता है कि, राजाश्रय से जिस प्रकार अन्य कलाओं का विकास हमारे यहां हुआ उसी प्रकार से डोरियोंवाली पुतलियों की कला का विकास भी हुआ। नाट्यकला का उद्‌गम इन्हीं के रंगमंच से हुआ ऐसा भी कहते हैं। इन कठपुतली-नाट्य के लिए संहिता लगती है, नृत्य-गान, संवाद प्रेषण, नैपथ्य, वेशभूषा, रंगभूषा, दिग्दर्शन इन सब नाट्यांगों का ज्ञान कठपुतली कलाकारों को होना आवश्यक है। अन्य सभी कलाकारों के समान राजा की स्तुती, उसके मनोरंजन के साथ ही ईशस्तुती और रामायण-महाभारत इन महाकाव्यों के प्रसंग इस कला के माध्यम से प्रस्तुत किए जाते हैं।

मूलतः कठपुतली का खेल दिखानेवाली विशिष्ट जमातें होती थी और उनके पास इन कलाओं को संजोए रखने की विरासत होती थी जो पीढ़ि दर पीढ़ि आगे बढ़ती रहती थी। उनके पास इस कला का उत्तराधिकार पीढ़ि दर पी़ढि सुरक्षित रहता था जो आगे की पीढ़ि को हस्तांतरित होता रहता था। उन्हें कठपुतलियां बनाना, उनके कपडे, पट-नैपथ्य-मंच व्यवस्था-रंगभूषा-केशभूषा-प्रस्तुती आदि कला कोशल और हुनर का काम तो होता ही था सिवाय इसके साथ संगीत, गायन, वादन, नृत्य, संवाद अदायगी, नाद-लय-स्वर, संभाषण कला, संवादों का उच्चारण, देहबोली, स्वर नियंत्रण आदि का ज्ञान भी आवश्यक होता था। इन नाटकों के कथानक भी परंपरागत पुराण कथाओं पर आधारित रहते थे। इस कारण एक जमात के लोग या परिवार के सदस्य मिलकर इन उपर्युक्त कला प्रकारों को उपयोग में लाकर प्रयोग करते रहते थे। भिन्न-भिन्न प्रदेशों की भाषा और उन प्रदेशों की कथाओं के अनुसार उनकी संहिता बनी रहती थी। वैसे ही कई स्थानों पर देवताओं और दानवों की कठपुतलियों के लिए कौनसे रंग और वस्त्र उपयोग में लाना तय रहता था। चमडा उपयोग में लाना हो तो कौनसे प्राणी का यह भी तय रहता था और उसीके अनुसार कठपुतलियां बनाई जाती थी।

भारत के राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र, तमिलनाडू, ओरिसा, बंगाल, हिमाचल प्रदेश, बिहार आदि प्रदेशों में यह परंपरा दिख पडती है। राजस्थान की कठपुतलियों की जानकारी तो यहां के लगभग सभी लोगों को है की कठपुतलियां लकडी की होती हैं। इनके संबंध में कथा है कि, सादी लकडी की कठपुतलियां बनाकर निर्वाह करनेवाला एक व्यक्ति था। हमेशा की तरह शंकर-पार्वती रात्री भ्रमण पर निकले थे तभी पार्वती की दृष्टि इन कठपुतलियों पर पडी और हमेशा की तरह उन्होंने हठ पकडा कि, 'हे कैलाशनाथ इन कठपुतलियों में प्रवेश कर अपन नृत्य करें"। और दुकान के अंदर की दो कठपुतलियां अचानक नाचने लगीं। दुकानदार जाग गया एवं भयभीत होकर ईश्वर की प्रार्थना करने लगा। नृत्य समाप्ति के पश्चात शंकर-पार्वती उसे दर्शन दे आशीर्वाद देते हुए बोले, 'वत्स, इन कठपुतलियों को  डोरियां बांध उनकी हलचलों के माध्यम से जिस प्रकार हमने नृत्य किया उसी तरह से तू लोगों को दिखला। तेरी कला अजराअमर हो जाएगी" और तभी से इस कला का जन्म हुआ।

राजस्थान में तो इस कला को दिखलानेवालों का एक समाज ही है और एक गांव का तो नाम ही 'कठपुतली" है। इन कठपुतलियों की विशिष्टता यह है कि, इनकी डोरियां कलाकारों के हाथों की उंगलियों से जुडी रहती हैं और कलाकार की उंगलियों की हरकतों पर ही उनके नृत्यों की विविधता अवलंबित रहती है। इन पुतलियों की एक और विशिष्टता यह है कि, इन्हें पांव नहीं होते। इनके कपडे इस प्रकार से बने होते है कि इस कारण उनके पांव हैं ऐसा लगे। केवल उंट या घुडसवार कठपुतलियों के ही पांव होते हैं।
यूरोप में इस प्रकार की डोरियोंवाली कठपुतलियों को 'मॅरिओनट्‌स" कहा जाता है। उनके हाथ-पांव और अन्य जोड मानवी जोडों के समान ही रखकर हरएक जोड की हलचल के लिए एक डोर अलग से होती है और इन सभी डोरों का दूसरा सिरा कलाकार के हाथ एक या अधिक लकडी पट्टियों से जुडा होता है विशिष्ट डोर खिंची की तयशुदा हलचल दिखती है। केवल कौनसी डोर किस हलचल के लिए है यह ज्ञात होना चाहिए। राजस्थानी कठपुतलियों की तुलना में इनको नचाना आसान होता है। 

कठपुतलियों का एक बिल्कूल ही भिन्न प्रकार छाया कठपुतलियां महाराष्ट्र की सावंतवाडी के निकट पिंगळी(ली) नामक स्थान पर देखने को मिलता है। जो चित्रकथी नाम से अधिक जाना जाता है। वैसे ही यहां उपयोग में लाई जानेवाली छोटी कठपुतलियां भी आंध्र, कर्नाटक की छाया कठपुलियों से समानता दर्शाती हैं। इन कठपुतलियों के कपडों की बनावट, डिजाईन आदि पर मुगल शैली का प्रभाव दिख पडता है। परंतु, इनके राजाओं और देवताओं के मुकुट भर पैठण शैली के चित्रों में नजर आते हैं उस प्रकार के हैं।

कर्नाटक में कठपुतलियों को 'सिक्की" कहते हैं। कर्नाटक के ये खेल जोशपूर्ण और जीवनस्पर्शी होते हैं। इनके भी विषय अधिकतर रामायण-महाभारत के ही होते हैं। आंध्र की कठपुतलियों को 'तोलू कम्मलय" कहते हैं। आंध्र की कठपुतलियां अन्य राज्यों की तुलना में बहुत बडी होती हैं। इनके भी कपडों और जवाहारातों पर मुगल शैली का प्रभाव दिख पडता है। केरल में कठपुतलियों को 'पवई कथू" कहते हैं। केरल और तमिलनाडू इन दोनो ही स्थानों पर मुगल शैली का ही प्रभाव दिख पडता है। ओरिसा और बिहार में इन्हें 'रावण छाया" कहते हैं। पश्चिम बंगाल की कुछ कठपुतलियां भी प्रसिद्ध हैं।

चित्र, शिल्प, नृत्य, संगीत आदि कलाओं में जिस प्रकार से अपने-अपने प्रदेशानुरुप विविधता होती है वैसीही परंपरागत कठपुतलियों  की कला में भी दिख पडती है। अपने ही उत्तराधिकारी को कला सीखाने की गुरु-शिष्य परंपरा इन कलाकारों ने बनाए रखी और इसी कारण से इन कलाकारों की संख्या हमेशा कम ही रही। मेलों, उत्सवों में डेरों में घूमनेवाले घूमंतू जमातों तक ही यह कला मर्यादित रहने के कारण अन्य कलाओं के समान इस कला को सम्मानीय स्थान नहीं मिल पाया। परिणामतः जैसा चाहिए वैसा इस कला का विकास हो नहीं पाया और इस कला का विकास रुक गया। जब अन्यत्र इस कला का मुक्त उपयोग हो रहा है वहीं इस कला के उत्तराधिकारी इस कला से विमुख हो अन्य व्यवसायों की ओर अग्रसर हो रहे हैं, इस कला को सीखने के प्रति उत्सुक भी नहीं।