Tuesday, 13 February 2018

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य - शिरीष सप्रे

अंतरिक्ष के देवता शिव से जुडे प्रतीकों का रहस्य
शिरीष सप्रे
शिवजी की उपासना पूरे भारत में अनादिकाल से चली आ रही है। भगवान शिव शंकर की हर बात निराली और रहस्यमय है। उनका सारा क्रियाकलाप विरोधाभासों से भरा हुआ है। शिव की नगरी काशी में तो शिव का प्रतीक शव को मानकर लोग सिर पर हाथ रखकर प्रणाम करते हैं। शिवजी की उपासना दो प्रकार से करते हैं। शिवलिंग और शिवमूर्ति के रुप में। अधिकांश मंदिरों में शिवलिंग के रुप में ही पूजा होती है।

शिवजी के हाथ में डमरु विश्व प्रतीक के रुप में है और ऐसा माना जाता है कि नाद की उत्पत्ति शिवजी द्वारा डमरु बजाने से हुई है। डमरु विश्व का अद्वैत भाव भी दर्शाता है। डमरु ज्ञान का उत्पत्ति स्थान है। महर्षि पाणिनी को  व्याकरण के बीज मंत्र डमरु के ध्वनि में ही मिले थे। कहते हैं स्वयं शिवजी ने उनके कान के पास डमरु बजाकर यह ज्ञान उन्हें दिया था। त्रिशूल का आयुध शस्त्र होकर उसके अनेक प्रतीकात्मक अर्थ हैं। वह चेतना की तीन स्थितियों जागृत, स्वप्न और निद्रावस्था को दर्शाता है। वह मानव के तीन तापों आधिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक को हरता है। एक शस्त्र के रुप में अभद्र, अमंगल और बुरी बातों को नष्ट करने की क्षमता का प्रतीक है। 

शिवजी का वाहन वृषभ यानी बैल है जो हमेशा शिवजी के साथ ही रहता है। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति में लिखा है 'वृषो हि भगवान धर्मः।" वेद धर्म को चार पैरोंवाला प्राणी कहते हैं। उसके चार पैर यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं और शिव इसी वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो उनके अधीन हैं। (इन्हें ही चार पुरुषार्थ भी कहा गया है, हिंदू धर्मानुसार पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से है अर्थात हमारा ध्येय शिव की प्राप्ति होना चाहिए।)

अथर्ववेद में वृषभ को पृथ्वी का धारक, पोषक, उत्पादक बतलाया गया है। वृषभ एक राशि का नाम भी है। वृषभ किसानों और कृषि के लिए भी उपयोगी है। वृष का अर्थ मेघ भी है। वृष से ही वर्षा, वृष्टि आदि शब्द बने हैं। शिव अंतरिक्ष के देवता हैं और उनका एक नाम व्योमकेश भी है। अतः आकाश उनकी जटा स्वरुप है एवं जटाएं वायुमंडल की प्रतीक हैं तथा वायु आकाश में व्याप्त रहती है। शिव जटाभार ब्रह्मांड के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रतीक है। शिवजी जटाधारी हैं और इस बारे में पुराणों में अनेक कथाएं है। गंगा शिव की जटा में प्रवाहित है। शिव रुद्र स्वरुप उग्र और संहार के देवता हैं और उनकी उग्रता उनके मस्तिष्क में निवास करती है इसलिए शांति की प्रतीक गंगा और अर्धचंद्र शिव के मस्तिष्क पर विराजमान होकर उनकी उग्र वृत्ति को शांत और शीतल रखते हैं।

समुद्र मंथन के समय प्राप्त हलाहल विष का पान कर सृष्टि को बचाने के कारण उत्पन्न जलन को गंगा और चंद्रमा से शांति मिलती है। शिव का चंद्रमा स्वच्छ एवं उज्जवल है उसमें मलिनता नहीं। वह अमृत वर्षा करता है। क्योंकि, स्वयं शिव का विवेक सदैव जागृत रहता है और मस्तिष्क में कभी अविवेकी विचार नहीं पनपते। चंद्रमा का एक नाम सोम है जो शांति का प्रतीक है इसी कारण से सोमवार को शिव पूजन, दर्शन और शिवोपासना का दिन माना गया है। शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ है। चंद्रमा ने अपने शाप के निवारणार्थ शिवोपासना शिवलिंग स्थापित कर की और शापमुक्त हुआ। इसलिए इस शिवलिंग को सोमनाथ कहते हैं। त्रिनेत्रधारी शिवजी का एक निवास त्र्यंबकेश्वर है। त्र्यंबक (तीन नेत्र) धारी ईश्वर यहां है इस कारण इस ज्योतिर्लिंग को त्र्यंबकेश्वर महादेव कहते हैं। इस तीसरे नेत्र से ही शिवजी ने कामदेव का दहन किया था।

तमोगुणी सर्प या नाग को उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है। नागेश्वर एक ज्योतिर्लिंग का नाम भी है। हलाहल विष के पान से जिसे उन्होंने अपने गले में धारण कर रखा है उन्हें नीलकंठ भी कहते हैं। भारत में नागपंचमी को नागपूजन की परंपरा है। विद्वानों के मतानुसार नागपूजन आर्येत्तर संस्कृति को दर्शाता है। परस्पर विरोधी मतों में सामंजस्य निर्मित करनेवाले शिवजी ने इस भयंकर क्रूर सर्प को अपने गले का हार बना रखा है। यह गले में लपेटा हुआ सर्प या नाग कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। 

शिवजी के गले में मुंड माला भी है जो यह भाव दर्शाती है कि उन्होंने मृत्यु को गले लगा रखा है और वे मृत्यु से भयभीत नहीं। शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनो को अपने अधीन कर रखा है इसके प्रतीक स्वरुप वे व्याघ्र चर्म और हस्ती चर्म को धारण करते हैं। इस प्रकार के देवता शिवजी की उपासना सगुण और निर्गुण दोनो रुपों में की जाती है।

Friday, 2 February 2018

दक्षिण भारत में विवाह की पद्धतियां - शिरीष सप्रे

दक्षिण भारत में विवाह की पद्धतियां
शिरीष सप्रे

तमिल भाषा में विवाह को कल्याणम्‌ कहते हैं। तमिलनाडु के अय्यर समाज में विवाह की रस्म तमिल और वैदिक रीति से पूरी की जाती है। कल्याणम्‌ की दृष्टि से सभी बाते निश्चित होने के पश्चात यानी जन्मपत्री मिलान, लडके द्वारा लडकी (लडके, लडकी दोनो के द्वारा ही) को पसंद करने के पश्चात और लेन-देन की बातें निश्चित होने के बाद पहली विधि 'निश्चयार्थम्‌" (निश्चयाताम्बूलम) अर्थात्‌ सगाई की रस्म पूरी की जाती है। यह विधि लडके के घर पर ही पूरी होती है। अय्यर लोग कांचीपुरम्‌ के शंकराचार्य को मानते हैं इस कारण पत्रिका की शुरुआत 'कांचीपुरम्‌ के शंकराचार्य के अनुग्रह से" इस आशय के मज्कूर से पूर्ण होती है। विवाह के दिन वर एक विशिष्ट धोती 'अंगवस्त्रम्‌" धारण करता है। वह काशी जाने का नाटक करता है। हाथ में छडी, छाता लेकर, नई कोरी चप्पल पहनकर काशी यात्रा ेके लिए निकलने का इशारा देता है। फिर लडकी के पिता उससे प्रार्थना करते हैं और कहते हैं कि, मैं मेरी कन्या तुझे देता हूं, तू सन्यास मत ले। अंततः लडका मान जाता है। यह प्रथा लगभग सभी दक्षिण भारतीय जातियों में आज भी प्रचलित है।

विवाह संस्कार के समय पूरा श्रंगार कर दुल्हन को मंडप में लाया जाता है जहां वर-वधू एक दूसरे को माला पहनाते हैं। इस रस्म के पश्चात वर-वधू को झूले पर बैठाया जाता है इस विधि को 'ऊंजलपाट्ट" कहते हैं। 'ऊंजल" मतलब झूला। फिर नजर उतारी जाती है तत्पश्चात विवाह गीत गाए जाते हैं। इस विधि के पश्चात मुख्य मंडप में हिंदू विवाह पद्धति की सारी विधियां पूर्ण की जाती हैं। इसमें कन्या दान, मांगल्यधारणम्‌, लाजाहोम और सप्तपदी (सात फेरे) का समावेश होता है। लडका लडकी के गले में 'ताली" अर्थात्‌ मंगलसूत्र बांधता है। यह मंगलसूत्र हल्दी के धागे में बंधा होता है। इस धागे में चौकोर आकार की दो पेटियां गुंथी रहती हैं। एक पेटी लडकेवालों की होती है तो, दूसरी लडकीवालों की। इस पर तुलसी वृंदावन या शिवलिंग उकेरा हुआ होता है। 'ताली" की पहली गांठ वर बांधता है तो दूसरी गांठ वर की बहन बांधती है। लाजा होम और सप्त पदी के पश्चात 'आशीर्वादम्‌" विधि होती है। सारे उपस्थिजन आशीर्वादस्वरुप अक्षता उनके सिरों पर डालते हैं। अय्यर जाति की तरह ही अयंगारों में भी विवाह की विधि पूरी की जाती है। अंतर केवल इतना ही है कि अय्यर विवाह के समय ऋगवेद की ऋचाओं का उच्चारण करते हैं तो अयंगारों में यजुर्वेद की। पहले ताली (मंगलसूत्र) पहनाने की प्रथा अयंगारों में नहीं थी लेकिन आजकल यह प्रथा सामान्यसी हो गई है।

कोयम्बटूर, मदुरै और सेलम जिलों में कोंगुवेल्लाला जाति के लोग मुख्यतः रहते हैं। इस जाति में समाज के अगुवों के आशीर्वाद से विवाह संपन्न किए जाते हैं। वे जोडे जो सफलतापूर्वक स्वेच्छा से एकसाथ जीवन गुजारते रहते हैं उन्हें चुनकर विवाह द्वारा पक्का जीवन साथी बना दिया जाता है। आजकल इस जाति में भी वैदिक रीति से ही विवाह संपन्न किए जाते हैं। साधारणतः इस जाति में दहेज लेना या देना आवश्यक नहीं है। कन्या के माता-पिता अपनी कन्या को स्वेच्छया जो कुछ भी उपहार स्वरुप देते हैं, वह कन्या का ही रहता है, पति का इन पर कोई अधिकार नहीं रहता। लेकिन अन्य समाज की देखादेखी इनमें भी दहेज की प्रवृत्ति विकसित हो रही है।

तमिल ईसाइयों में वधू हल्के पीले रंग की रेशमी साडी विवाह के समय पहनती है। आमतौर पर तमिल ईसाई पहले जिस जाति या समाज के रह चूके होते हैं, विवाह के समय उस समाज के नियमों का ही पालन करते हैं। अधिक शिक्षित वर्ग के लिए दहेज की मांग अधिक होती है। विवाह के साथ क्रॉस के आकार की ताली (मंगलसूत्र) सोने की चेन के साथ वधू को पहनाई जाती है।

केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण जाति में चार दिनों तक विवाह समारोह मनाया जाता है। दुल्हन के घर में ही एक भोज का आयोजन किया जाता है। वर अपने साथ वधू के लिए कपडे, होम के लिए घास (दर्पा) और पल्लव लाता है। वर के पहुंचने पर वधू का पिता उसका स्वागत करता है और अपनी पुत्री को स्वीकारने का आग्रह करता है। पिता अपनी कुलदेवी और देवताओं को पूजा के उपरांत मंगलसूत्र (ताली) अपनी बेटी को बांधता है और एक श्वेत साडी में बाहर लाता है। एक संस्कार 'उदका पुरवाक्कम" में वधू द्वारा वर की हथेली पर जल डाला जाता है। आमतौर पर इस रस्म को भी कन्या का पिता ही पुरी करता है। जल डालते समय सहधर्मचरिता मंत्र पढ़े जाते हैं। पाणिग्रहण के समय वर वधू का हाथ थाम कर मंत्र पढ़ता है जिसका आशय उपस्थिजनों की अनुमति से जिसमें देवताओं का भी समावेश होता है कि मैं तुम्हें अपने जीवन साथी के रुप में स्वीकारता हूं। वधू केवल वैवाहिक संस्कारो के लिए सुबह शाम कक्ष से बाहर आती है। चौथे दिन वधू की विदाई होती है।

नायर जाति के विवाह में ज्योतिषियों का बडा महत्व होता है। ज्योतिष द्वारा मान्यता मिलने पर पास-पडौस और संबंधियों को निमंत्रण (काराक्कर) भेजा जाता है। घर के सामने पंडाल सजाया जाता है। बीच में सुसज्जित तांबे का दीपदान रखकर जलाया जाता है। एक कलश पानी और चावल से भरकर रखा जाता है (तीरपाडा)।बारात के स्वागतार्थ कन्या पक्ष नादस्वरम्‌ बजाता है। बारात के आगमन पर पिता वर को हार पहनाते हैं और चंदन का लेप लगाते हैं। वधू पक्ष की स्त्रियां वर के समक्ष वधू के गुणों का वर्णन 'कुरवा" के रुप में करती हैं। वधू को मंडप तक चाची, मौसी या मामी पहुंचाती है। वर वधू का चेहरा पूर्व की ओर रहता है। मंगलसूत्र पहनाने की विधि के समय वाद्ययंत्रों की गति में तीव्रता आ जाती है। तत्पश्चात वर वधू मंडप की तीन बार परिक्रमा करते हैं।

आंध्र की रेड्डी जाति संपन्न और प्रभावशाली मानी जाती है। इनमें भी काशी जाने का नाटक वर द्वारा वधू के घर पर किया जाता है। विवाह के एक दिन पूर्व गणेशजी और वर की पूजा की जाती है तथा विभिन्न तरह के उपहार वर को दिए जाते हैं। उपहार में तांबे का एक कटोरा और कपडों का जोडा अवश्य रहता है। दूसरे दिन वर को स्नान कराकर माता-पिता के साथ पूजा करने के लिए ले जाया जाता है। विवाह के समय वर वधू को फूलों का हार और मांगल्यधारणम्‌ (मंगलसूत्र) पहनाता है। मांगल्यधारणम्‌ के उपरांत वधू के माता-पिता और संबंधी चांदी के कलश का गंगाजल वर की हथेली पर डालते हैं। हवन विवाह का एक मुख्य अंग होकर ताम्बूलम्‌ में कुमकुम, नारियल और फूल आदि रखकर अग्नि को समर्पित किए जाते हैं। वर वधू हवन कुंड की प्रज्जवलित अग्नि की तीन बार परिक्रमा करते हैं।

आंध्र की ब्राह्मण जातियों में विवाह के शुभारम्भ में गौरी पूजन या लक्ष्मी पूजन किया जाता है। वहां के एक रिवाज थट्टा के अनुसार लडकी का मामा वधू को एक टोकनी में बैठाकर विवाह मंडप जिसे कल्याण मंडप भी कहते हैं में लाता है। शुभ मुहूर्त से पहले लडकी के माथे पर खजूर और उसके बीज से बना एक लेप 'गुडजिरका" लगाया जाता है। इसके पीछे भाव यह रहता है कि कन्या अब किसीकी पत्नी बन गई है इसके पश्चात मांगल्यधारणम्‌ संस्कार होता है। इस दौरान दोनो के बीच एक पर्दा रहता है। वर वधू 33 करोड देवी-देवताओ की पूजा 33 बर्तनों के घेरे को 33 बार प्रदक्षिणा करके करते हैं। यह प्रथा आंध्र ब्राह्मणों में विशिष्ट मानी जाती है। रात को अरुंधती तारा विश्वास और पवित्रता के रुप में वर वधू को दिखाया जाता है।

कर्नाटक की वोक्कालिंगा जाति के लोगों में विवाह के अवसर पर उस कुएं के पानी का उपयोग किया जाता है जिसे पुजारी द्वारा पवित्र कर दिया गया हो। आभूषणों और पुष्पों से श्रंगारित वधू को हरे रंग की साडी-ब्लाउज पहनाया जाता है। वधू सुमंगला कहलाने के लिए हरे रंग की चूडियां पहनती है। वधू के सिर पर कृषि उपज की चीजों से भरा पात्र रखकर विवाह मंडप तक लाया जाता है। मंडप में वधू का पिता अपनी पुत्री वर को सौंपने की रस्म के समय वर वधू का हाथ एक नारियल के साथ पकडे रहता है और वधू का पिता उस पर पवित्र जल और दूध डालता है। यह विवाह समारोह तीन या पांच दिन तक चलता है। सूर्य दर्शन विवाह की एक रस्म है। अर्स जाति के लोगों में पत्रिका मिलान के पश्चात सगाई की रस्म (निश्चितारतम्‌) वधू के घर पर ही पूरी होती है। वर परिवार के लोग फल, पान, सुपारी आदि अपने साथ लेकर जाते हैं। सगाई के बाद लग्न पत्रिका बनाई जाती है तत्पश्चात्‌ पान सुपारी आदि बांटी जाती है। विवाह की रस्म वैदिक पद्धति से की जाती है। वर द्वारा काशी जाने की रस्म के पश्चात गणेश तथा नवग्रहों की पूजा की जाती है। विवाह की रस्म के समय वर वधू दोनो एक पत्थर पर पैर रखते हैं इस रस्म को अस्त्ररोहण कहा जाता है। अग्नि की पूजा में अक्षत छिडके जाते हैं और सप्तपदी की रस्म निभाई जाती है। रात में अरुंधती दर्शन किया जाता है। बारात की अगुवाई लंकाधीर जो हाथ में तलवार पकडे रहता है करता है। उसके पैर धरती पर ना पडें इसलिए कपडे बिछा दिए जाते हैं। वर भी तलवार या कटार पूरे विवाह समारोह में अपने साथ रखता है।
दुर्ग जाति के लोगों की विवाह रस्म निराली होती है। बाराती पारंपरिक पोशाक में आते हैं। विवाह के पहले दिन वधू के संबंधी विभिन्न व्यंजन बनाते हैं। शाम को सहभोज होता है। इनमें भी काशी जाने का नाटक होता है। विवाह के दिन वधू को तीन विवाहित स्त्रियां और उनके पति कन्या को दूध स्नान कराते हैं तत्पश्चात कन्या लाल रंग की सोने-चांदी की जरीवाली बनारसी रेशमी साडी पहनती है। इस साडी से पहले धोबी द्वारा लाई गई सफेद साडी पवित्रता के प्रतीक रुप में पहनती है। दो लडकिया दीपदान सिर पर रखकर वधू के आगे चलते हुए मंडप तक पहुंचती हैं। वधू तीन बार मंडप में जाती है और तीन पांववाले स्टूल पर बैठती है। विवाह की रस्म के पश्चात सभी लोग जमीन पर बैठकर भोजन करते हैं। शाम को जब बारात वधू के घर पहुंचती है तो वर के घर में प्रवेश के पूर्व शक्ति प्रदर्शन स्वरुप वर पक्ष का कोई व्यक्ति 6 पेडों के पौधों को तलवार से काटने की विधि करता है। लडकी को शक्ति से जीतने की खुशी में एक युद्ध नृत्य का आयोजन भी होता है। वधू को वर के घर की सदस्यता प्राप्त करने के लिए स्वयं पानी लाकर गंगा पूजन करना पडता है। रात को वर वधू को नया नाम देता है।
इस लेख को पढ़ने के उपरांत पाठकों के ध्यान में यह आ ही गया होगा कि, दक्षिण भारत के इन चारों प्रदेशों पर एक दूसरे का प्रभाव है जो इन चारों राज्यों की एकमेवता को प्रमाणित करता है। इन उपर्युक्त जातियों में विवाह की प्रथा लगभग एक सी ही है। दक्षिण भारत की कुछ जातियों की विवाह प्रथा का सम्यक स्वरुप उद्‌घाटित करना ही इस लेख का मूल उद्देश्य है। विस्तारभयावश कुछ बातों, प्रथाओं का उल्लेख नहीं हो पाया है आशा है पाठक इस मजबूरी को समझेंगे।