Saturday, 27 January 2018

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान - शिरीष सप्रे

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान  - 
 शिरीष सप्रे

गांधीजी ने पत्रकारिता को मिशन के रुप में अपनाया था। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारतवर्ष तक उनके कार्यों में पत्रकारिता का विशेष सहयोग रहा। फिर वह दक्षिण अफ्रीका का 'इंडियन ओपीनियन" रहा हो या भारत के 'यंग इंडिया", 'नवजीवन", 'हरिजन" और 'हरिजन सेवक" जैसे पत्र जिनका संपादन उन्होंने किया। भले ही 'इंडियन ओपीनियन" के संपादक गांधीजी ही थे पर उनका नाम प्रिंट लाइन में नहीं छपता था। उन्होंने अपना लेखन और सम्पादन कर्म पत्रकारिता के ध्येय से नहीं वरन्‌ अपने विचारों को लिखने और दूसरों तक पहुंचान के उद्देश्य से ही किया। गांधीजी का पत्रकार रुप मुख्यतः 'इंडियन ओपीनियन" के माध्यम से ही सामने आता है जिसे इस उद्देश्य से निकाला था कि दक्षिण अफ्रीका के गोरे, ब्रिटेन के निवासी और भारत के लोग भी दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों और गुजराती व्यापारियों की कठिनाइयों के विषय में जान सकें। 

दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक जहां भी गांधीजी ने सार्वजनिक कार्य किया, उनकी कार्यप्रणाली में पत्रकारिता का विशेष सहाय्य रहा। महात्मा गांधी पत्रकारिता को भी मानवता की सेवा का माध्यम मानते थे। उनकी नजरों में पत्रकारिता लोकहित और लोकसेवा का व्रत  था। इस विषय में उनके कुछ आदर्श थे। गांधीजी वाणी की स्वतंत्रता के पूरे पक्षपाती थे, लेकिन आत्मसंयम पर उनका बहुत जोर था। इसलिए उन्होंने पत्रकारों को इस माध्यम के दुरुपयोग न करने, सनसनीखेज समाचारों से बचने और अपना उत्तरदायित्व ठीक तरीके से निभाने के लिए आगाह किया था। इस व्यवसाय को लाभ कमाने का साधन न बनाने की बार बार अपील की। उनकी मान्यता थी कि,पत्र-पत्रिकाएं देश के शासन से भी अधिक शक्तिशाली हैं, इसलिए उन्हें अपनी शक्ति का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए। जो कुछ कहें, सोच-समझ कर कहें। ऐसा कुछ भी ना कहें, जो विवेकहीन माना जाए।

खोजी पत्रकारिता, इलेक्ट्रानिक मीडिया और अब तो डिजीटल मीडिया भी आ गया है के चमक-दमक भरे दिखावटी युग में जिसमें उद्‌घोषकों की आक्रमता भी शामिल है गांधीजी के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। एक दृष्टि अब उन पर भी - 'प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता सकता है। उसके शक्तिशाली होने में कोई संदेह नहीं है लेकिन उस शक्ति का दुरुपयोग करना एक अपराध है। मैं स्वयं एक पत्रकार हूं और अपने साथी पत्रकारों से अपील करता हूं कि, वे अपने उत्तरदायित्व को समझें और अपना काम करते समय केवल इस विचार को प्रश्रय दें कि, सच्चाई को सामने लाना है और उसीका पक्ष लेना है।" ('हरिजन" 23 अप्रैल 1947)

'आधुनिक पत्रकारिता में जिस तरह सतहीपन, पक्षपात यथार्थता और यहां तक कि बेईमानी भी घुस आई है। वह उन ईमानदार लोगों को भी बराबर गलत रास्ते पर ले जाते हैं जो केवल यह चाहते हैं कि न्याय की विजय हो।" (यंग इंडिया 28 मई, 1931) 

उन्होंने 18 अक्टूबर 1947 को 'हरिजन" में लिखा ः 'अखबारों का बडा जबरदस्त असर होता है। संपादकों का यह कर्तव्य है कि,  वे यह सुनिश्चित करें कि, उनके अखबार में कोई झूठी रिपोर्ट प्रकाशित न हो और न कोई ऐसी जिससे जनता के भडकने की आशंका हो। संपादकों और उनके सहायकों को खबरों और उनके देने के ढ़ंग के बारे में विशेष सावधान रहना चाहिए।"

विज्ञापन जो वर्तमान में समाचार जगत की सबसे बडी ताकत बनती जा रही है के संबंध में गांधीजी पत्रिकाओं की स्वतंत्रता को बहुत दूर तक ले गए थे। वे विज्ञापनदाताओं की आर्थिक शक्ति को समझते थे। इसलिए उनके दबाव से मुक्त रहने के लिए विज्ञापन न लेने की नीति ही बना ली थी। इसका कारण उनके विचार से कुछ विज्ञापन ऐसे भी होते हैं (वर्तमान में तो इस प्रकार के विज्ञापनों की बाढ़ सी आ गई है) जिनसे जनता का कुछ लाभ नहीं होता, उल्टे जनता धोखे में आ सकती है, मार्गभ्रष्टता, अनैतिकता, कामुकता, चरित्रहीनता की ओर अग्रसर हो सकती है। इसलिए भी वे ऐसे विज्ञापन छापना अनैतिक समझते थे। मुख्य रुप से विज्ञापन से आए पैसे के लोभ से बचने और विज्ञापनदाता के आर्थिक दबाव से स्वयं को मुक्त रखने के लिए पत्रों में विज्ञापन नहीं लेते थे। नैतिक दृष्टि से वे शुद्ध स्वावलंबन के पक्षधर थे।

दरअसल गांधीजी पत्रकारिता को जन कल्याण का काम मानते थे। विज्ञापनों को प्रकाशित करने के बारे में गांधीजी की राय बहुत सख्त थी। उन्होंने यंग इंडिया में 25 मार्च 1928 को लिखा था - 'मेरी धारणा है कि, अनैतिक विज्ञापनों के बल पर अखबार चलाना गलत है। मेरा विश्वास है कि यदि विज्ञापन लिया ही जाए तो अखबारों के मालिकों और स्वयं संपादकों को पहले उनकी कडी छानबीन करनी चाहिए और केवल तटस्थ विज्ञापन ही स्वीकार किए जाने चाहिए। आज बडे से बडे प्रतिष्ठित अखबार और पत्रिकाएं भी अनैतिक विज्ञापनों की बुराई का शिकार हैं। इसका सामना अखबारों के मालिकों और संपादकों के विवेक का परिष्कार करके ही किया जा सकता है।"

गांधीजी समझते थे कि पत्रकारिता एक महान सामाजिक उत्तरदायित्व और जनसेवा है। इसीलिए वे कहते थे कि, पत्रकार जो कहते हैं, खुल्लमखुल्ला कहें, यह उनका अधिकार तथा कर्तव्य है, किंतु उन्हें यह न भूलना चाहिए कि, उन्हें यह कार्य शिष्टता तथा संयम की मर्यादाओं के भीतर रहकर करना है। गांधीजी कहते थे 'मेरा जीवन ही संदेश है"। अब हम स्वयं ही विचार करके देखें कि कितना हम उनका अनुगमन कर रहे हैं।

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