Tuesday, 16 January 2018

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य शिरीष सप्रे

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले 
महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य
शिरीष सप्रे

चाणक्य चंद्रगुप्त का महामात्य प्रसिद्ध है। नन्द पतन और मौर्य-उत्थान के मुख्य नायक चाणक्य ही माने जाते हैं। श्रुति परम्परा के अनुसार चाणक्य दीर्घजीवी थे। उन्होंने सम्राट अशोक तक का मौर्य वंश शासन देखा था। आचार्य तत्ववेता, मंत्रद्रष्टा ऋषि परम्परा की असाधारण विभूति थे। वसिष्ठ, वाल्मिकी एवं व्यास की भांति युग के महान राष्ट्रचिंतक थे। उनके ज्ञानगौरव से अनभिज्ञ लोग उन्हें केवल कूटनीतिक समझ कर उनकी तुलना मध्यकालीन विचारक मैकियाविली से करते हैं जो नितांत भ्रामक है। मैकियाविली की कूटनीति भारतीय चरित्रादर्श से कतई भिन्न, अशोभनीय एवं अमांगलिक कुचक्रों का इंद्रजाल है। वास्तविक तौर पर देखा जाए तो इटली के मैकियाविली अपने प्रिंस को आदर्श शासक तथा महान साम्राज्य निर्माता नहीं बना पाए थे। इसके विपरीत कौटिल्य की कूटनीति राष्ट्र निर्माण, प्रजारंजन एवं देशोद्धार के उदात्त उद्देश्यों को मूर्त करनेवाली सर्वजनहिताय राजनीति है। 'अर्थशास्त्र" इसका ज्वलंत प्रमाण है। मैकियाविली को आधुनिक कौटिल्य भले ही कहा जा सकता है परंतु कौटिल्य की मैकियाविली से तुलना कौटिल्य का अपमान होगा। इसी तरह यदि कौटिल्य के पूर्वकालिक ग्रीक के महान दार्शनिक और राजनीतिक विचारक अरस्तु से तुलना की जाए तो वह भी अपने विचारों के अनुरुप व्यवहारिक प्रयोग में असफल रहने के कारण कौटिल्य से उन्नीस ही माना जाएगा। वस्तुतः दोनो ही अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं, लेकिन दोनो की परस्पर कोई तुलना नहीं। 

कौटिल्य के व्यक्तित्व की लोकह्रदय पर सदैव गहरी छाप रही है। संस्कृत गं्रथों के अतिरिक्त कई जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में चाणक्य के विरल उल्लेख मिलते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य के सातसौ वर्षों बाद विशाखादत्त ने चाणक्य के महान राजनीतिक कृतत्व को चित्रांकित करते हुए 'मुद्राराक्षस" लिखा था, जो आज भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में गिना जाता है। इस नाटक में चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का सम्राट बनाने के बाद नंद वंश के प्रख्यात अमात्य राक्षस को चंद्रगुप्त के पक्ष में करने में कौटिल्य कैसे यशस्वी हुए, इसकी बडी रोचक कथा है। राक्षस को मौर्य साम्राज्य का स्वामीभक्त मंत्री बनाने के बाद कौटिल्य निश्ंिचत होकर वापस तक्षशिला चले जाते हैं। संन्यस्त, निष्काम जीवन के ऐसे कितने उदाहरण विश्व साहित्य में मिलेंगे।

आधुनिक युग में तो आचार्य चाणक्य को इतिहास के नूतन मूल्यांकन के पश्चात देश-विदेश के इतिहासकारों द्वारा जहां उन्हें राजनीति शास्त्र का युग प्रवर्त्तक मनीषी प्रमाणित किया गया है, वहीं साहित्यकारों ने उन्हें राष्ट्रनिर्माता के रुप में चित्रित कर व्यापक लोकमानस का चरितनायक बना दिया है। बृहत्काय 'कौटलीय अर्थशास्त्र" के अतिरिक्त आचार्य कौटिल्य ने ज्ञानकणों के कोष के रुप में एक सूत्रग्रंथ की भी रचना की है, जो चाणक्य-सूत्र के नाम से प्रसिद्ध है। एक छोटे से वाक्य में सार्थक व्यवहारिक जीवन में उपयोगी, ये नीति-उपदेश संस्कृत के सूत्र-साहित्य की अनमोल निधि हैं। 

कौटिल्य का अर्थशास्त्र राष्ट्र की सर्वांगीण राज्य व्यवस्था का सांगोपांग आचरण शास्त्र है। देश की विदेश नीति से लेकर चुंगी प्रणाली के साथ-साथ, ब्रह्म की सत्ता से लेकर पुजारियों और भिक्षुओं के भरण-पोषण के नियमों का भी उसमें विस्तार से विधान है। कौटिल्य से पहले शुक्र, विदुर आदि अनेक राजनीतिशास्त्र के प्रणेता हुए हैं, किंतु कौटिल्य के अर्थशास्त्र की तुलना में उनकी कृतियां बौनी ही प्रतीत होती हैं। क्योंकि, एक तो कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में उनकी सारी आचार-संहिताओं का परिशोधित रुप में उल्लेख किया है और दूसरे, कौटिल्य ने उसमें अतिरिक्त जो कुछ लिखा है, वह स्वानुभव की तुला पर तौल कर लिखा है। 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का वैदिशिक भाषाओं में अनुवाद होने से पहले पाश्चात्य विद्वानों की यह भ्रामक धारणा थी कि, भारतीय शास्त्रकारों के चिंतन का ध्येय अध्यात्म तक ही सीमित रहा है, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र की समस्याओं से उन्हें को सरोकार नहीं रहा है। किंतु, 'कौटिलीय अर्थशास्त्र" के अवलोकन मनन के बाद उनकी यह भ्रांति निर्मूल सिद्ध हो गई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने कौटिल्य को ही संसार का शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ प्रचारित कर दिया, उनके स्वदेश भारत को भी यह गौरव प्रदान कर दिया है कि, अन्य विद्याओं की तरह राजतंत्र और समाज व्यवस्था की आचार संहिताएं भी यूनानियों के द्वारा भारत से पश्चिम को गई हैं। 

     

No comments:

Post a Comment