Friday, 12 January 2018

गाथा दीपक की ः भाग - 2 - शिरीष सप्रे

गाथा दीपक की ः भाग - 2
शिरीष सप्रे

क्या आपने कभी सोचा है कि, दीपक का जन्म कैसे हुआ? दीपक के आकार और रुप में क्या कोई परिवर्तन आया ही नहीं? जब मानव ने पत्थर से आग जलाना सीखा तभी वह रात्रि में प्रकाश की आशा करने लगा होगा। इस अग्नि का मानव के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। अग्नि की खोज के पूर्व ऊष्मा एवं प्रकाश का एकमात्र स्त्रोत व साधन सूर्य को ही समझा जाता था और उस पर कोई नियंत्रण न होने की वजह से आदिम मानव को शीत ऋतु और अंधकार में अनेकानेक कठिनाइयों का सामना करना पडता था। आग की खोज आज से कोई एक लाख वर्ष पूर्व हुई। जब मानव ने पत्थर से आग जलाना सीखा होगा। तभी से वह रात्रि में प्रकाश की आशा करने लगा होगा। कुछ समय पश्चात मानव को अनुभूति हुई कि कुछ वस्तुएं अन्य की अपेक्षा बेहतर जलती हैं।

संभवतः आदिम मानव ने भोजन के वास्ते मांस भूनते समय चर्बी को पिघलकर आग में गिरते समय आग को धधक कर जलते देखा होगा। धीरे-धीरे ऐसे पदार्थों का चयन होने लगा जो जलने पर बेहतर रोशनी देते थे। कुछ विशेष तरह की खपच्चियों को दीवारों में खोंस दिया जाता था जो आहिस्ता-आहिस्ता जलकर मद्धम रोशनी देती थी। फिर मशाले अस्तित्व में आईं। पत्थर के कटोरीनुमा दीयों में चर्बी डालकर किसी पेड की पतली छाल अथवा वनस्पति आदि को बटकर बाती बनाकर जलाना पडता था। वास्तव में यही आरंभिक ऑइल लैम्प थे। आग के लिए दो पत्थर रगडने पडते थे।

कहा जाता है कि इसी पर से आदिमानव ने दीपक के स्वरुप की कल्पना कर मिट्टी के दीपक बनाने का विचार किया। यही क्रम चलता रहा और एक दिन ऐसा भी आया कि इसके लिए उसने हाथों से दीपक का निर्माण कर लिया और जब लोग दीपक को जलाने के लिए तेल और घी का प्रयोग करने लगे। मोमबत्ती की रचना का इतिहास भी कुछ इसी प्रकार का है। जानवरों की चर्बी पिघलाकर उन्हें बांस के खोखले सांचे में भरकर पहले-पहले मोमबत्ती तैयार की गई। वनस्पति के सूखे रेशों को आपस में गूंथकर सांचे के बीचोबीच लटका दिया जाता था ताकि जमने पर सम्पूर्ण मोमबत्ती प्राप्त हो। इस प्रकार ईसा से काफी समय पूर्व मोमबत्ती की रचना हो चूकी थी।

दीपक से जुडी हुई कई लोककथाएं विदेशों में भी प्रचलन में है। एक सीरियाई लोककथा के अनुसार- प्राचीनकाल में एक ऐसा वृक्ष था, जिसके फलों का आकार दीयों जैसा था। ये फल शाम घिरने पर अपनेआप जगमगाने लगते थे। एक दिन एक जबरदस्त आंधी आने से वह पेड उखड गया तो जंगल में घोर तिमिर यानी अंधकार रहने लगा। इससे आदिमानव को बडी दिक्कतों का सामना करना पडता था। फिर आदिमानव ने इसी प्रकार के एक फल की खोज की और उसे सूखाकर उसमें मृत जानवरों का गोश्त भरा। एक पेड की छोटी सी टहनी काटकर गोश्त में मजबूती से घुसैडकर जला दिया। यह अनोखा दीपक दो सप्ताह तक लगातार जलता रहा।

यूनानी लोककथा के अनुसार यूनान में प्राचीनकाल में सूरज सालभर में लगातार एक माह तक नहीं उगता था। जिसके कारण लोगों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडता था। इस अंधेरे में एक दिन एक बुढ़िया हांडी में घी तपा रही थी, तभी आसमान से एक चूहे की कटी पूंछ आ गिरी। पूंछ कुछ ऐसे गिरी कि उसका नुकिला भाग तो हंडिया के बाहर था और शेष भाग हंडिया के अंदर। इस बात से बेखबर बुढ़िया चूल्हे में लगातार लकडियां डाले जा रही थी। इस कारण चूल्हा बाहर लौ फेंकने लगा और किसी तरह चूहे की पूंछ का नुकिला सिरा दीपक की तरह जलने लगा। जब बुढ़िया ने अचानक प्रकाश देखा तो दंग रह गई। बुद्धि से काम लेते हुए बुढ़िया ने मिट्टी से कुछ दीपक बनाए और उसमें घी, चूहे की पूछें डालकर जला दिया। अपने द्वारा किए गए आविष्कार पर बुढ़िया बहुत खुश हुई। बुढ़िया की देखादेखी बाकी लोग भी इस प्रकार के दीपक जलाने लगे। इस प्रकार यूनान में दीपक का उद्‌भव हुआ।

जापान की लोककथानुसार प्राचीनकाल में वहां एक अत्यंत सुंदर युवती रहती थी जिसे अंधेरे में बहुत डर लगता था। एक दोपहर वह जंगल से लकडियां लेकर आ रही थी कि रास्ते में ही एक आंधी आ गई। वह डर गई और जोर-जोर से रोने लगी उसके रोने की आवाज सुनकर वनदेवी उसके समक्ष दीपक लेकर आई। युवती ने दीपक उठाया और अपनी झोपडी तक आ पहुंची। इस दीपक को देखकर उसने मिट्टी से कई दीपक बनाए उसमें गिली लकडियों का रस भरकर युवती पेड की छाल से बनी बाती रख देती थी व उन्हे प्रज्जवलित कर देती थी। इस प्रकार जापान में दीपकों का जन्म हुआ। धीरे-धीरे प्रगति के साथ-साथ मानव कलात्मक सीपियों को भी उनमें चर्बी भरकर उपयोग में लाने लगा।

मोहनजोदडो और हडप्पा की खुदाई में प्राप्त दीपों के अतिरिक्त तक्षशीला, उज्जैन, पाटिलपुत्र, मथुरा और कौशाम्बी आदि स्थानों पर भी प्राचीन दीपों की प्राप्ति हुई है। देवालयों के दीप और भी मनोहारी लगते हैं। इनसे प्राप्त दीपक एक मुखी, तीन मुखी, पांच मुखी और सप्त मुखी तक हैं। खुदाई से प्राप्त दीप में लक्ष्मी मूर्ति के आगे एक व्यक्ति हाथ जोडकर बैठा हुआ है जिससे लक्ष्मी पूजा का प्रमाण मिलता है। इस काल के ऐसे दीप भी मिले हैं जो नगर के मुख्य मार्गों पर रखे जाते थे, यह प्राप्त मूर्तियों को देखने से ज्ञात होता है। कुछ अन्य दीप ऐसे भी मिले हैं जो हाथी, घोडे, सिंह, मयूर और गौरैया आदि से संबंधित हैं। कहीं गज की सूंड या मस्तक पर दीपक है तो कहीं बाघों के मस्तक या पीठ पर। कहीं जंजीर से लटके  दीपक भी मिले हैं।

प्राचीन काल से ही राजाओं ने अपने राज्य में दीपों को बहुत महत्व दिया है। उन्होंने द्वार दीप, वृन्दावन दीप, नंदा दीप, प्रांगण दीप,  उद्यान दीप आदि दीपों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार स्तंभ और गुंबदों पर भी कलात्मक दीप रखने की प्रथा का प्रचलन हुआ। दीपों की संस्कृति निराली ही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक दीपों का प्रयोग होता है मांगलिक कार्यों में दीप प्रज्जवलित करने की स्वस्थ परंपरा अब तक चली आ रही है। हमारे यहां ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के सभी धर्मों में कहीं ना कहीं दीपों का वर्णन मिलता है। क्योंकि, दीप विजय का, शक्ति का, अंधकार दूर करने का व जनकल्याण का प्रतीक है। अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के हाथ में एक मशाल है। यह भी दीपक की महत्ता को देखकर बनाई गई है। ओलम्पिक खेलों में दीपों को प्रज्जवलित करने की परम्परा अब तक चली आ रही है।


चीन में तेंग पिन्ह त्यौहार पर सौ फुट ऊंचा चक्र बनाकर उसमें हजारों दीप जलाए जाते हैं। जापान में तोरों नागासी त्यौहार पर पानी में दीप जलाकर छोडने की प्रथा है। इसी प्रकार शहीद सैनिकों की स्मृति में विभिन्न देशों में ज्योति जलाई जाती है। भारत में किसी भवन के शिलान्यास पर दीप जलाने की प्रथा है। इटली में मकबरों में दीपों को जलाना शुभकार्य समझा जाता है। बृहस्पती वार को लोग मजारों पर दीप जलाते हैं। यहूदी भी अपनी अपनी पूजा के कार्यक्रमों में दीप जलाते हैं। सारनाथ में बौद्ध मंदिर में बराबर दीप जलता है। जलते-जलते अचानक दीपक का बुझ जाना अशुभ माना जाता है। दीपक को फूंक मारकर या हाथ से बुझाना वर्जित है। दीप का गिरना अंधकारमय भविष्य का द्योतक है। इस प्रकार आदिम युग से लेकर इस परमाणु युग तक आदिवासी-वनवासी समाज से लेकर सभ्य समाज तक सभी दीप संस्कृति से जुडे हुए हैं। 

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