Saturday, 27 January 2018

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान - शिरीष सप्रे

पत्रकारिता के इतिहास में गांधीजी का अप्रतिम योगदान  - 
 शिरीष सप्रे

गांधीजी ने पत्रकारिता को मिशन के रुप में अपनाया था। दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारतवर्ष तक उनके कार्यों में पत्रकारिता का विशेष सहयोग रहा। फिर वह दक्षिण अफ्रीका का 'इंडियन ओपीनियन" रहा हो या भारत के 'यंग इंडिया", 'नवजीवन", 'हरिजन" और 'हरिजन सेवक" जैसे पत्र जिनका संपादन उन्होंने किया। भले ही 'इंडियन ओपीनियन" के संपादक गांधीजी ही थे पर उनका नाम प्रिंट लाइन में नहीं छपता था। उन्होंने अपना लेखन और सम्पादन कर्म पत्रकारिता के ध्येय से नहीं वरन्‌ अपने विचारों को लिखने और दूसरों तक पहुंचान के उद्देश्य से ही किया। गांधीजी का पत्रकार रुप मुख्यतः 'इंडियन ओपीनियन" के माध्यम से ही सामने आता है जिसे इस उद्देश्य से निकाला था कि दक्षिण अफ्रीका के गोरे, ब्रिटेन के निवासी और भारत के लोग भी दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों और गुजराती व्यापारियों की कठिनाइयों के विषय में जान सकें। 

दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक जहां भी गांधीजी ने सार्वजनिक कार्य किया, उनकी कार्यप्रणाली में पत्रकारिता का विशेष सहाय्य रहा। महात्मा गांधी पत्रकारिता को भी मानवता की सेवा का माध्यम मानते थे। उनकी नजरों में पत्रकारिता लोकहित और लोकसेवा का व्रत  था। इस विषय में उनके कुछ आदर्श थे। गांधीजी वाणी की स्वतंत्रता के पूरे पक्षपाती थे, लेकिन आत्मसंयम पर उनका बहुत जोर था। इसलिए उन्होंने पत्रकारों को इस माध्यम के दुरुपयोग न करने, सनसनीखेज समाचारों से बचने और अपना उत्तरदायित्व ठीक तरीके से निभाने के लिए आगाह किया था। इस व्यवसाय को लाभ कमाने का साधन न बनाने की बार बार अपील की। उनकी मान्यता थी कि,पत्र-पत्रिकाएं देश के शासन से भी अधिक शक्तिशाली हैं, इसलिए उन्हें अपनी शक्ति का प्रयोग बहुत सावधानी से करना चाहिए। जो कुछ कहें, सोच-समझ कर कहें। ऐसा कुछ भी ना कहें, जो विवेकहीन माना जाए।

खोजी पत्रकारिता, इलेक्ट्रानिक मीडिया और अब तो डिजीटल मीडिया भी आ गया है के चमक-दमक भरे दिखावटी युग में जिसमें उद्‌घोषकों की आक्रमता भी शामिल है गांधीजी के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। एक दृष्टि अब उन पर भी - 'प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता सकता है। उसके शक्तिशाली होने में कोई संदेह नहीं है लेकिन उस शक्ति का दुरुपयोग करना एक अपराध है। मैं स्वयं एक पत्रकार हूं और अपने साथी पत्रकारों से अपील करता हूं कि, वे अपने उत्तरदायित्व को समझें और अपना काम करते समय केवल इस विचार को प्रश्रय दें कि, सच्चाई को सामने लाना है और उसीका पक्ष लेना है।" ('हरिजन" 23 अप्रैल 1947)

'आधुनिक पत्रकारिता में जिस तरह सतहीपन, पक्षपात यथार्थता और यहां तक कि बेईमानी भी घुस आई है। वह उन ईमानदार लोगों को भी बराबर गलत रास्ते पर ले जाते हैं जो केवल यह चाहते हैं कि न्याय की विजय हो।" (यंग इंडिया 28 मई, 1931) 

उन्होंने 18 अक्टूबर 1947 को 'हरिजन" में लिखा ः 'अखबारों का बडा जबरदस्त असर होता है। संपादकों का यह कर्तव्य है कि,  वे यह सुनिश्चित करें कि, उनके अखबार में कोई झूठी रिपोर्ट प्रकाशित न हो और न कोई ऐसी जिससे जनता के भडकने की आशंका हो। संपादकों और उनके सहायकों को खबरों और उनके देने के ढ़ंग के बारे में विशेष सावधान रहना चाहिए।"

विज्ञापन जो वर्तमान में समाचार जगत की सबसे बडी ताकत बनती जा रही है के संबंध में गांधीजी पत्रिकाओं की स्वतंत्रता को बहुत दूर तक ले गए थे। वे विज्ञापनदाताओं की आर्थिक शक्ति को समझते थे। इसलिए उनके दबाव से मुक्त रहने के लिए विज्ञापन न लेने की नीति ही बना ली थी। इसका कारण उनके विचार से कुछ विज्ञापन ऐसे भी होते हैं (वर्तमान में तो इस प्रकार के विज्ञापनों की बाढ़ सी आ गई है) जिनसे जनता का कुछ लाभ नहीं होता, उल्टे जनता धोखे में आ सकती है, मार्गभ्रष्टता, अनैतिकता, कामुकता, चरित्रहीनता की ओर अग्रसर हो सकती है। इसलिए भी वे ऐसे विज्ञापन छापना अनैतिक समझते थे। मुख्य रुप से विज्ञापन से आए पैसे के लोभ से बचने और विज्ञापनदाता के आर्थिक दबाव से स्वयं को मुक्त रखने के लिए पत्रों में विज्ञापन नहीं लेते थे। नैतिक दृष्टि से वे शुद्ध स्वावलंबन के पक्षधर थे।

दरअसल गांधीजी पत्रकारिता को जन कल्याण का काम मानते थे। विज्ञापनों को प्रकाशित करने के बारे में गांधीजी की राय बहुत सख्त थी। उन्होंने यंग इंडिया में 25 मार्च 1928 को लिखा था - 'मेरी धारणा है कि, अनैतिक विज्ञापनों के बल पर अखबार चलाना गलत है। मेरा विश्वास है कि यदि विज्ञापन लिया ही जाए तो अखबारों के मालिकों और स्वयं संपादकों को पहले उनकी कडी छानबीन करनी चाहिए और केवल तटस्थ विज्ञापन ही स्वीकार किए जाने चाहिए। आज बडे से बडे प्रतिष्ठित अखबार और पत्रिकाएं भी अनैतिक विज्ञापनों की बुराई का शिकार हैं। इसका सामना अखबारों के मालिकों और संपादकों के विवेक का परिष्कार करके ही किया जा सकता है।"

गांधीजी समझते थे कि पत्रकारिता एक महान सामाजिक उत्तरदायित्व और जनसेवा है। इसीलिए वे कहते थे कि, पत्रकार जो कहते हैं, खुल्लमखुल्ला कहें, यह उनका अधिकार तथा कर्तव्य है, किंतु उन्हें यह न भूलना चाहिए कि, उन्हें यह कार्य शिष्टता तथा संयम की मर्यादाओं के भीतर रहकर करना है। गांधीजी कहते थे 'मेरा जीवन ही संदेश है"। अब हम स्वयं ही विचार करके देखें कि कितना हम उनका अनुगमन कर रहे हैं।

Monday, 22 January 2018

विद्यादायिनी देवी सरस्वती के अन्य रुप - शिरीष सप्रे

वसंत पंचमी विशेष
विद्यादायिनी देवी सरस्वती के अन्य रुप
शिरीष सप्रे

ज्ञान और विद्या की अधीष्ठातृ देवी सरस्वती के प्रति करोडों भारतीयों के मन-मस्तिष्क में अपरिमित श्रद्धा और भक्तिभाव है। वसंत पंचमी पर्व को मनाने का एक कारण वसंत पंचमी को ही सरस्वती जयंती का होना भी है। इसी दिन देवी सरस्वती ब्रह्मा के मानस से अवतीर्ण हुई थी। वसंत पंचमी को जगह-जगह पर मॉं शारदा की पूजा अर्चना की जाती है। सरस्वती को 'विद्या की देवी", 'वीणा-पाणी" या 'बुद्धिदायिनी" के रुप में जाना जाता है एवं इन्हीं रुपों में उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। मां सरस्वती की कृपा से प्राप्त ज्ञान एवं कला के समावेश से मनुष्य जीवन में सुख एवं सौभाग्य प्राप्त होता है। माघ शुक्ल पंचमी को सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन किया था, तभी से देवी सरस्वती की पूजा वसंत पंचमी को करने की परंपरा चली आ रही है।

देवी भागवत पुराण में वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के पूजन का स्पष्ट उल्लेख है। इसी कारण वसंत पंचमी का एक नाम श्री पंचमी भी है। वसंत पंचमी के दिन ही सरसों के फूलों और नवांकुरों से अपनी आराध्य श्रीदेवी (लक्ष्मी या सरस्वती) की पूजा की जाती है। इसी दिन पीले कपडे भी पहनने की प्रथा है। वसंत पंचमी के दिन मदन (कामदेव) का उत्सव मनाने का विधान है। धर्मशास्त्र के प्रामाणिक ग्रंथ धर्मसिंधु के अनुसार इस दिन कामदेव और उनकी पत्नी रतिदेवी का पूजन तथा उत्सव करना चाहिए। कामदेव का मित्र वसंत ऋृतु को कहा जाता है। अतः संभव है कि कामदेव के मित्र के नाम पर वसंत पंचमी पडा हो।

देवी सरस्वती एक अन्य रुप है जन गण के हित और कल्याण हेतु सदैव तत्पर रहनेवाली माता सरस्वती का 'शत्रुविनाशिनी" रुप। जिसको जाननेवालों की संख्या जरा कम ही है। वस्तुतः सरस्वती का यह आदि स्वरुप भी है तथा वैदिक युग के एक शुभ लग्न में उनका यह रुप ऋषि-मुनियों के समक्ष मुखरित हो उठा था - 

यानी लोक कल्याण के लिए शत्रुओं के विरुद्ध संग्राम करती हूं मैं। मां वागेश्वरी की यह पवित्र वाणी ऋषि-मुनियों की हटतंत्री में गुंजायमान हो उठी। इसमें संशय नहीं कि इष्ट शक्ति अनिष्टकारी और देहध्वंसकारी शत्रु को पराजित करके प्राण की रक्षा हर क्षण करती है एवं इस प्रक्रिया के मूल में इष्ट शक्ति का खेल ही वास्तव में वाग्देवी की लीला है। एक भयंकर युद्ध चलता है मन के आसमान पर। इस युद्ध में सुप्रवत्ति (देवता) एवं कुप्रवृत्ति (असुर) के मध्य द्वंदयुद्ध चलता है और सुप्रवृत्ति -चैतन्यमयी मां वागेश्वरी कुप्रवृत्ति के नाश के लिए सक्रिय हो उठती है।

प्रकृति पट पर भी उषा के उज्जवल प्रकाश में तमिस्त्र-शत्रु का विनाश पर्व परिलक्षित होने लगा। उषा मध्य वाग्देवी शक्ति का आविर्भाव स्पष्ट हो उठा। उषा का प्रकाश प्रभावी सूर्य की आशा है। सूर्य के 'सास्वान" नाम के साथ जोडा गया है 'उषा" को क्योंकि, शुभ तेजस्विनी माता सरस्वती का आत्म प्रकाश वैदिक उषा के सहयोग से ही हुआ है। अतएव प्रकृति-राज्य व अंतर-राज्य में सरस्वती अद्वितीय शत्रुविनाशिनी के रुप में प्रतिष्ठित हुई। यद्यपि पूर्व में सरस्वती ज्योति-उपासना में सीमाबद्ध थी परंतु, तांत्रिक-पौराणिक-बौद्धयुग में उन्होंने मूर्तियों में रुप पाया। जैसे 'वीणावादिनी", 'ज्ञानदात्री", 'असुर संहारिणी" तथा 'प्रकाश की देवी" आदि। सरस्वती का वर्ण शुभ और गुण अशुभ-विनाश अन्य देवी-देवताओं के आकार में भी प्रकट हुआ।
उत्तर भारत के कई प्रदेशों के कई स्थानों पर महिषमर्दिनी दुर्गा की पूजा अश्विनी शुक्ल सप्तमी-अष्टमी-नवमी को तो कई स्थानों पर शुंभ-निशुंभ काली पूजा के समय दीवाली के त्यौहार पर होती है। रणदेवियां सरस्वती के साथ एक योगसूत्र में बंध गई। अतः उस इंगित का वहन करके एक मंत्र सरस्वती पूजा में भी चलने लगा- 'भद्र काल्यै...सरस्वत्यै...।" शत्रुनाशिनी देवी सरस्वती देश-विदेश की समर देवियों के साथ एकाकार हो गई थी और बौद्ध तांत्रिकयुग में वह निदर्शन बहुनामी देवियों के भाव-कर्म में मिलता है। चतुर्भुज सिंहवाहिनी सरस्वती के दो हाथों में परशु और गदा एवं अन्य दो हाथों से वह दानव की जीभ उखाड रही है।

श्रीपंचमी को महाशक्ति सरस्वती के चरणों में श्रद्धापूर्वक, भक्तिपूर्ण चित्त से जाकर ह्रदय का आकुल अनुनय व्यक्त करना होगा द्विषो जहि। यानी सकल शत्रुओं का नाश करो देवी। श्रीचरणों में अपनी-अपनी अंजली देकर ज्ञान का वरदान ग्रहण करना होगा, ताकि मन और देश की भूमि पर शांति और आनंद का साम्राज्य स्थापित हो सके। देवी के चरणों में जानेवाले निश्चित ही अतुल शक्ति के स्वामी होंगे और देवी की कृपा और आशीर्वाद से विश्व में उनकी सुकीर्ति फैलेगी तथा समग्र वसुंधरा सुगंधित हो उठेगी।

Tuesday, 16 January 2018

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य शिरीष सप्रे

अखण्ड राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करनेवाले 
महान राजनीतिक विचारक - चाणक्य
शिरीष सप्रे

चाणक्य चंद्रगुप्त का महामात्य प्रसिद्ध है। नन्द पतन और मौर्य-उत्थान के मुख्य नायक चाणक्य ही माने जाते हैं। श्रुति परम्परा के अनुसार चाणक्य दीर्घजीवी थे। उन्होंने सम्राट अशोक तक का मौर्य वंश शासन देखा था। आचार्य तत्ववेता, मंत्रद्रष्टा ऋषि परम्परा की असाधारण विभूति थे। वसिष्ठ, वाल्मिकी एवं व्यास की भांति युग के महान राष्ट्रचिंतक थे। उनके ज्ञानगौरव से अनभिज्ञ लोग उन्हें केवल कूटनीतिक समझ कर उनकी तुलना मध्यकालीन विचारक मैकियाविली से करते हैं जो नितांत भ्रामक है। मैकियाविली की कूटनीति भारतीय चरित्रादर्श से कतई भिन्न, अशोभनीय एवं अमांगलिक कुचक्रों का इंद्रजाल है। वास्तविक तौर पर देखा जाए तो इटली के मैकियाविली अपने प्रिंस को आदर्श शासक तथा महान साम्राज्य निर्माता नहीं बना पाए थे। इसके विपरीत कौटिल्य की कूटनीति राष्ट्र निर्माण, प्रजारंजन एवं देशोद्धार के उदात्त उद्देश्यों को मूर्त करनेवाली सर्वजनहिताय राजनीति है। 'अर्थशास्त्र" इसका ज्वलंत प्रमाण है। मैकियाविली को आधुनिक कौटिल्य भले ही कहा जा सकता है परंतु कौटिल्य की मैकियाविली से तुलना कौटिल्य का अपमान होगा। इसी तरह यदि कौटिल्य के पूर्वकालिक ग्रीक के महान दार्शनिक और राजनीतिक विचारक अरस्तु से तुलना की जाए तो वह भी अपने विचारों के अनुरुप व्यवहारिक प्रयोग में असफल रहने के कारण कौटिल्य से उन्नीस ही माना जाएगा। वस्तुतः दोनो ही अपने-अपने स्थान पर श्रेष्ठ हैं, लेकिन दोनो की परस्पर कोई तुलना नहीं। 

कौटिल्य के व्यक्तित्व की लोकह्रदय पर सदैव गहरी छाप रही है। संस्कृत गं्रथों के अतिरिक्त कई जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में चाणक्य के विरल उल्लेख मिलते हैं। चंद्रगुप्त मौर्य के सातसौ वर्षों बाद विशाखादत्त ने चाणक्य के महान राजनीतिक कृतत्व को चित्रांकित करते हुए 'मुद्राराक्षस" लिखा था, जो आज भी विश्व के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में गिना जाता है। इस नाटक में चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का सम्राट बनाने के बाद नंद वंश के प्रख्यात अमात्य राक्षस को चंद्रगुप्त के पक्ष में करने में कौटिल्य कैसे यशस्वी हुए, इसकी बडी रोचक कथा है। राक्षस को मौर्य साम्राज्य का स्वामीभक्त मंत्री बनाने के बाद कौटिल्य निश्ंिचत होकर वापस तक्षशिला चले जाते हैं। संन्यस्त, निष्काम जीवन के ऐसे कितने उदाहरण विश्व साहित्य में मिलेंगे।

आधुनिक युग में तो आचार्य चाणक्य को इतिहास के नूतन मूल्यांकन के पश्चात देश-विदेश के इतिहासकारों द्वारा जहां उन्हें राजनीति शास्त्र का युग प्रवर्त्तक मनीषी प्रमाणित किया गया है, वहीं साहित्यकारों ने उन्हें राष्ट्रनिर्माता के रुप में चित्रित कर व्यापक लोकमानस का चरितनायक बना दिया है। बृहत्काय 'कौटलीय अर्थशास्त्र" के अतिरिक्त आचार्य कौटिल्य ने ज्ञानकणों के कोष के रुप में एक सूत्रग्रंथ की भी रचना की है, जो चाणक्य-सूत्र के नाम से प्रसिद्ध है। एक छोटे से वाक्य में सार्थक व्यवहारिक जीवन में उपयोगी, ये नीति-उपदेश संस्कृत के सूत्र-साहित्य की अनमोल निधि हैं। 

कौटिल्य का अर्थशास्त्र राष्ट्र की सर्वांगीण राज्य व्यवस्था का सांगोपांग आचरण शास्त्र है। देश की विदेश नीति से लेकर चुंगी प्रणाली के साथ-साथ, ब्रह्म की सत्ता से लेकर पुजारियों और भिक्षुओं के भरण-पोषण के नियमों का भी उसमें विस्तार से विधान है। कौटिल्य से पहले शुक्र, विदुर आदि अनेक राजनीतिशास्त्र के प्रणेता हुए हैं, किंतु कौटिल्य के अर्थशास्त्र की तुलना में उनकी कृतियां बौनी ही प्रतीत होती हैं। क्योंकि, एक तो कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में उनकी सारी आचार-संहिताओं का परिशोधित रुप में उल्लेख किया है और दूसरे, कौटिल्य ने उसमें अतिरिक्त जो कुछ लिखा है, वह स्वानुभव की तुला पर तौल कर लिखा है। 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का वैदिशिक भाषाओं में अनुवाद होने से पहले पाश्चात्य विद्वानों की यह भ्रामक धारणा थी कि, भारतीय शास्त्रकारों के चिंतन का ध्येय अध्यात्म तक ही सीमित रहा है, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र की समस्याओं से उन्हें को सरोकार नहीं रहा है। किंतु, 'कौटिलीय अर्थशास्त्र" के अवलोकन मनन के बाद उनकी यह भ्रांति निर्मूल सिद्ध हो गई। कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने कौटिल्य को ही संसार का शीर्षस्थ राजनीतिज्ञ प्रचारित कर दिया, उनके स्वदेश भारत को भी यह गौरव प्रदान कर दिया है कि, अन्य विद्याओं की तरह राजतंत्र और समाज व्यवस्था की आचार संहिताएं भी यूनानियों के द्वारा भारत से पश्चिम को गई हैं। 

     

Friday, 12 January 2018

गाथा दीपक की ः भाग - 2 - शिरीष सप्रे

गाथा दीपक की ः भाग - 2
शिरीष सप्रे

क्या आपने कभी सोचा है कि, दीपक का जन्म कैसे हुआ? दीपक के आकार और रुप में क्या कोई परिवर्तन आया ही नहीं? जब मानव ने पत्थर से आग जलाना सीखा तभी वह रात्रि में प्रकाश की आशा करने लगा होगा। इस अग्नि का मानव के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। अग्नि की खोज के पूर्व ऊष्मा एवं प्रकाश का एकमात्र स्त्रोत व साधन सूर्य को ही समझा जाता था और उस पर कोई नियंत्रण न होने की वजह से आदिम मानव को शीत ऋतु और अंधकार में अनेकानेक कठिनाइयों का सामना करना पडता था। आग की खोज आज से कोई एक लाख वर्ष पूर्व हुई। जब मानव ने पत्थर से आग जलाना सीखा होगा। तभी से वह रात्रि में प्रकाश की आशा करने लगा होगा। कुछ समय पश्चात मानव को अनुभूति हुई कि कुछ वस्तुएं अन्य की अपेक्षा बेहतर जलती हैं।

संभवतः आदिम मानव ने भोजन के वास्ते मांस भूनते समय चर्बी को पिघलकर आग में गिरते समय आग को धधक कर जलते देखा होगा। धीरे-धीरे ऐसे पदार्थों का चयन होने लगा जो जलने पर बेहतर रोशनी देते थे। कुछ विशेष तरह की खपच्चियों को दीवारों में खोंस दिया जाता था जो आहिस्ता-आहिस्ता जलकर मद्धम रोशनी देती थी। फिर मशाले अस्तित्व में आईं। पत्थर के कटोरीनुमा दीयों में चर्बी डालकर किसी पेड की पतली छाल अथवा वनस्पति आदि को बटकर बाती बनाकर जलाना पडता था। वास्तव में यही आरंभिक ऑइल लैम्प थे। आग के लिए दो पत्थर रगडने पडते थे।

कहा जाता है कि इसी पर से आदिमानव ने दीपक के स्वरुप की कल्पना कर मिट्टी के दीपक बनाने का विचार किया। यही क्रम चलता रहा और एक दिन ऐसा भी आया कि इसके लिए उसने हाथों से दीपक का निर्माण कर लिया और जब लोग दीपक को जलाने के लिए तेल और घी का प्रयोग करने लगे। मोमबत्ती की रचना का इतिहास भी कुछ इसी प्रकार का है। जानवरों की चर्बी पिघलाकर उन्हें बांस के खोखले सांचे में भरकर पहले-पहले मोमबत्ती तैयार की गई। वनस्पति के सूखे रेशों को आपस में गूंथकर सांचे के बीचोबीच लटका दिया जाता था ताकि जमने पर सम्पूर्ण मोमबत्ती प्राप्त हो। इस प्रकार ईसा से काफी समय पूर्व मोमबत्ती की रचना हो चूकी थी।

दीपक से जुडी हुई कई लोककथाएं विदेशों में भी प्रचलन में है। एक सीरियाई लोककथा के अनुसार- प्राचीनकाल में एक ऐसा वृक्ष था, जिसके फलों का आकार दीयों जैसा था। ये फल शाम घिरने पर अपनेआप जगमगाने लगते थे। एक दिन एक जबरदस्त आंधी आने से वह पेड उखड गया तो जंगल में घोर तिमिर यानी अंधकार रहने लगा। इससे आदिमानव को बडी दिक्कतों का सामना करना पडता था। फिर आदिमानव ने इसी प्रकार के एक फल की खोज की और उसे सूखाकर उसमें मृत जानवरों का गोश्त भरा। एक पेड की छोटी सी टहनी काटकर गोश्त में मजबूती से घुसैडकर जला दिया। यह अनोखा दीपक दो सप्ताह तक लगातार जलता रहा।

यूनानी लोककथा के अनुसार यूनान में प्राचीनकाल में सूरज सालभर में लगातार एक माह तक नहीं उगता था। जिसके कारण लोगों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडता था। इस अंधेरे में एक दिन एक बुढ़िया हांडी में घी तपा रही थी, तभी आसमान से एक चूहे की कटी पूंछ आ गिरी। पूंछ कुछ ऐसे गिरी कि उसका नुकिला भाग तो हंडिया के बाहर था और शेष भाग हंडिया के अंदर। इस बात से बेखबर बुढ़िया चूल्हे में लगातार लकडियां डाले जा रही थी। इस कारण चूल्हा बाहर लौ फेंकने लगा और किसी तरह चूहे की पूंछ का नुकिला सिरा दीपक की तरह जलने लगा। जब बुढ़िया ने अचानक प्रकाश देखा तो दंग रह गई। बुद्धि से काम लेते हुए बुढ़िया ने मिट्टी से कुछ दीपक बनाए और उसमें घी, चूहे की पूछें डालकर जला दिया। अपने द्वारा किए गए आविष्कार पर बुढ़िया बहुत खुश हुई। बुढ़िया की देखादेखी बाकी लोग भी इस प्रकार के दीपक जलाने लगे। इस प्रकार यूनान में दीपक का उद्‌भव हुआ।

जापान की लोककथानुसार प्राचीनकाल में वहां एक अत्यंत सुंदर युवती रहती थी जिसे अंधेरे में बहुत डर लगता था। एक दोपहर वह जंगल से लकडियां लेकर आ रही थी कि रास्ते में ही एक आंधी आ गई। वह डर गई और जोर-जोर से रोने लगी उसके रोने की आवाज सुनकर वनदेवी उसके समक्ष दीपक लेकर आई। युवती ने दीपक उठाया और अपनी झोपडी तक आ पहुंची। इस दीपक को देखकर उसने मिट्टी से कई दीपक बनाए उसमें गिली लकडियों का रस भरकर युवती पेड की छाल से बनी बाती रख देती थी व उन्हे प्रज्जवलित कर देती थी। इस प्रकार जापान में दीपकों का जन्म हुआ। धीरे-धीरे प्रगति के साथ-साथ मानव कलात्मक सीपियों को भी उनमें चर्बी भरकर उपयोग में लाने लगा।

मोहनजोदडो और हडप्पा की खुदाई में प्राप्त दीपों के अतिरिक्त तक्षशीला, उज्जैन, पाटिलपुत्र, मथुरा और कौशाम्बी आदि स्थानों पर भी प्राचीन दीपों की प्राप्ति हुई है। देवालयों के दीप और भी मनोहारी लगते हैं। इनसे प्राप्त दीपक एक मुखी, तीन मुखी, पांच मुखी और सप्त मुखी तक हैं। खुदाई से प्राप्त दीप में लक्ष्मी मूर्ति के आगे एक व्यक्ति हाथ जोडकर बैठा हुआ है जिससे लक्ष्मी पूजा का प्रमाण मिलता है। इस काल के ऐसे दीप भी मिले हैं जो नगर के मुख्य मार्गों पर रखे जाते थे, यह प्राप्त मूर्तियों को देखने से ज्ञात होता है। कुछ अन्य दीप ऐसे भी मिले हैं जो हाथी, घोडे, सिंह, मयूर और गौरैया आदि से संबंधित हैं। कहीं गज की सूंड या मस्तक पर दीपक है तो कहीं बाघों के मस्तक या पीठ पर। कहीं जंजीर से लटके  दीपक भी मिले हैं।

प्राचीन काल से ही राजाओं ने अपने राज्य में दीपों को बहुत महत्व दिया है। उन्होंने द्वार दीप, वृन्दावन दीप, नंदा दीप, प्रांगण दीप,  उद्यान दीप आदि दीपों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार स्तंभ और गुंबदों पर भी कलात्मक दीप रखने की प्रथा का प्रचलन हुआ। दीपों की संस्कृति निराली ही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक दीपों का प्रयोग होता है मांगलिक कार्यों में दीप प्रज्जवलित करने की स्वस्थ परंपरा अब तक चली आ रही है। हमारे यहां ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के सभी धर्मों में कहीं ना कहीं दीपों का वर्णन मिलता है। क्योंकि, दीप विजय का, शक्ति का, अंधकार दूर करने का व जनकल्याण का प्रतीक है। अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के हाथ में एक मशाल है। यह भी दीपक की महत्ता को देखकर बनाई गई है। ओलम्पिक खेलों में दीपों को प्रज्जवलित करने की परम्परा अब तक चली आ रही है।


चीन में तेंग पिन्ह त्यौहार पर सौ फुट ऊंचा चक्र बनाकर उसमें हजारों दीप जलाए जाते हैं। जापान में तोरों नागासी त्यौहार पर पानी में दीप जलाकर छोडने की प्रथा है। इसी प्रकार शहीद सैनिकों की स्मृति में विभिन्न देशों में ज्योति जलाई जाती है। भारत में किसी भवन के शिलान्यास पर दीप जलाने की प्रथा है। इटली में मकबरों में दीपों को जलाना शुभकार्य समझा जाता है। बृहस्पती वार को लोग मजारों पर दीप जलाते हैं। यहूदी भी अपनी अपनी पूजा के कार्यक्रमों में दीप जलाते हैं। सारनाथ में बौद्ध मंदिर में बराबर दीप जलता है। जलते-जलते अचानक दीपक का बुझ जाना अशुभ माना जाता है। दीपक को फूंक मारकर या हाथ से बुझाना वर्जित है। दीप का गिरना अंधकारमय भविष्य का द्योतक है। इस प्रकार आदिम युग से लेकर इस परमाणु युग तक आदिवासी-वनवासी समाज से लेकर सभ्य समाज तक सभी दीप संस्कृति से जुडे हुए हैं। 

Friday, 5 January 2018

महत्ता दीपक की भाग 1

महत्ता दीपक की भाग 1
शिरीष सप्रे

दीपक की गाथा बडी ही रोचक और बडा इतिहास समेटे हुए है। दीपक अग्नि का प्रतीक भी है। जिसका आवाहन तीन रुपों में मिलता है। पहला, पृथ्वी का यज्ञ संबंधी, दूसरा अंतरिक्ष का विद्युत रुप, तीसरा आकाश का सूर्य रुप अग्नि। दीप या दीपक संस्कृत के दीपन्‌ से उद्‌भुत है। हमारे यहां दीप प्रज्जवलन से सभी शुभ कार्यों का आरंभ होता है। शुभविवाह के समय अग्नि को ही साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं। अग्नि मनुष्यों और देवताओं का मध्यस्थ है। यज्ञ-पूजा-आराधना उसका माध्यम है। दीपक प्रकाश के लिए ही प्रयुक्त नहीं होता बल्कि इसका कलात्मक एवं भावनात्म पक्ष भी है। दीपक ने भारतीय संस्कृति के सभी पहलुओं को छूआ है यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। 'सूर्यांश संभव दीपः अर्थात्‌ दीपक अग्नि का लघु रुप तथा सूर्य का एकमात्र विकल्प है।

वैदिक साहित्य में दीपक की महत्ता का उल्लेख मिलता है। स्कंध पुराण के अनुसार - अग्नि ज्योति रवि ज्योति चंद्र ज्योतिस्तथैव च उत्तम सर्व ज्योतिषां दीपो यम्‌। अर्थात्‌ अग्निज्योति, सूर्य की ज्योति और चंद्रमा की ज्योति में दीपक की ज्योति सर्वोत्तम है। वाल्मिकी रामायण में रावण के अंतःपुर में सुंगधित तेलयुक्त स्वर्ण दीपों का वर्णन है। वाल्मिकी ने रामायण के सुंदर कांड में लंका का वर्णन करते हुए रत्नदीप का उल्लेख किया है। रामायण के पांचवे सर्ग में लंका के मंद ज्योति में जलनेवाले दीपकों की तुलना हारे हुए जुआरी से की गई है। तुलसीकृत रामचरित्‌ मानस के बालकांड में भी दीपक का उल्लेख मिलता है। महाभारत में दुर्योधन ने स्वयं के प्रयाण के पूर्व दीपशिखा लेने का आदेश दिया था। महाभारत में दीपकों की रोशनी में हुए छलकपट व रोमांचकारी युद्ध का वर्णन है। हाथी एवं घोडों पर  रखे हुए दीपकों का भी उल्लेख है।

अनादिकाल से दीपक तिल-तिल जलकर निरंतर प्रकाश देता है। चौरासी सिद्धों में सिद्ध माने जाने वाले सरहपा, गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ आदि ने अपनी प्रतिभा और पांडित्य के सहारे दीपक की महिमा और गरिमा को वर्णित किया है। महात्मा बुद्ध ने 'अप्प दीपो भव" अर्थात्‌ अपने दीपक आप बनो की बात कही है। क्योंकि, अपने प्रकाश से प्रकाशित एक दीप, असंख्य दीप प्रज्वलित कर सकता है। इसकी लौ में निशाचरी कीट, पतंगों को भस्म करने की शक्ति होती है। दीपक के महत्व बतलाते हुए रहीम ने कहा है, 'जो गति रहीम दीप की, कुल कपूत की सोय। बारै उजियारे लगै, बढ़े अंधियारो होय।"

कालिदास रचित संस्कृत काव्य रघुवंश में दीपक का उल्लेख कई बार आया है। मेघदूत में यक्षों द्वारा अलकानगरी के शयनकक्षों में दीपक के उपयोग का उल्लेख मिलता है जिन्हें रत्नदीप कहा गया है। हिंदी साहित्य की पहेलियों में दीपकों का वर्णन मिलता है। अमीर खुसरो की यह पहेली देखिए, एक नार ने अचरज किया, सांप मार पिंजरे में दिया। ज्यों ज्यों सांप ताल को खाए, सूखे ताल सांप मर जाए अर्थात्‌ दीया-बाती। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध आदि कवियों ने दीपक में अनेक वृत्तियों को अनेकानेक ढ़ंग से प्रज्जवलित कराया है। कहीं एक मुखी, कहीं पंचमुखी तथा कहीं सप्तमुखी दीपकों का वर्णन कर दीपोत्सव के प्रति स्वयं के भाव व्यक्त किए हैं। स्तंभों पर दीप टांगकर भटके हुए जहाजों को, व्यक्तियों को दिशाज्ञान कराया जाता है।

साहित्य और वेदों में ही दीपक का उल्लेख किया गया हो ऐसा नहीं है, बल्कि संगीत शास्त्र में भी दीपक का वर्णन मिलता है। शास्त्रीय संगीत में दीपक राग बहुत ही प्रसिद्ध है। शास्त्रीय संगीत दीपक राग से संबंधित कई किवदंतियों से भरा पडा है। ऐसा कहा जाता है कि, यदि इस राग को सही एवं कलात्मक ढ़ंग से गाया जाए तो यह श्रोताओं के ह्रदय में ज्योति प्रज्जवलित कर देता है। राग दीपक से संबंधित एक किवदंति बहुत प्रसिद्ध है कि जब संगीत सम्राट तानसेन ने दीपक राग को गाया था तो अकबर के सभाकक्ष के दीपक जल उठे थे।

संगीत शास्त्र ही नहीं भारतीय चित्रकला भी दीपक से अछूती नहीं रही है। 17वीं एवं 18वीं शताब्दी की मुगलकालीन, राजस्थानी, कांगडा एवं मराठा शैली के चित्रों में स्तंभ दीपक, लटकनेवाले दीपकों तथा सभा कक्षों में प्रयुक्त होनेवाले बहुत ही सुंदर कई प्रकार के दीपक देखने को मिलते हैं। शिल्प कला में भी दीपक प्रिय विषय रहा है। प्राचीन अमरावती एवं ईसा की दूसरी शताब्दी के बोरबुदर की मूर्तिकला में कई दीपक तराशे हुए देखने को मिलते हैं।

साहित्य की ही भांति संस्कृति का अभिन्न अंग है 'दीपक" भी। जन्म से लेकर मृत्यु तक की अंतिम यात्रा के पश्चात भी मानव का साथ दीपक ही तो निभाता है। आत्मा 'अन्‌" धातु से निष्पन्न होने से उसका अर्थ है प्राण या श्वास/ उर्जा। आज अग्नि/दीप उसका द्योतक है। प्राण निकलने पर, तभी तो कहते हैं दीप बुझ गया। इसी रुप में मृत्यु पश्चात दीप शाश्वत सत्य प्रज्वलन की परंपरा है। जन्म लेने पर भी कुलदीपक की संज्ञा प्रयुक्त की जाती है। जहां मृत व्यक्ति का शरीर लिटाया गया था वहां दसवें दिन तक उस स्थान पर दीपक जलाकर रख दिया जाता है।

जब किसी लोकमंगलकारी कार्य हेतु कोई व्यक्ति घर से प्रस्थान करता है तो विजय की कामना हेतु आरती उतारकर तिलक लगाया जाता है। हुतात्माओं की पावन स्मृति में आज भी हुतात्मा स्थल पर दीपक जलाकर आस्थांजलि समर्पित करने की परंपरा है। प्रवाहित जल में दीपदान करके मानव अपनी साधना और आराधना को व्यक्त करता है। हमारी संस्कृति में दीपक को फूंक मारकर बुझाना अपशगुन माना जाता है। किसी भी मंगल कार्य में कलश में जल भरकर पंचपल्लवों के ऊपर दीपक रखा जाता है। दीपक कैसा भी हो, उसका अस्तित्व हर काल तथा युग में सुखद एवं मंगलकारी होता आया है। 

दीपक की महिमा अपरंपारी है। उसकी लगन और विश्वसनीयता ने तो उसे देवों का सिरमौर बना दिया है। स्वयं सूर्य उसका ऋणी है। उपनिषद में इस आर्य सत्य को एक लघु कथा द्वारा व्यक्त किया गया है, जिसका सारांश कुछ इस प्रकार है -


एक बार सूर्य को अहं उपजा कि सृष्टि के आरंभ से वह अविरत, अविकल कार्यरत है, विश्व को आलोकित किए हुए है। इसलिए कुछ  समय के लिए अवकाश पर चले जाना चाहिए। वे अपनी जिम्मेदारी अन्य देवताओं को सौंपने की दृष्टि से सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए और उन्हें उत्तरदायित्व सौंपकर अवकाश पर चले जाने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन उन्होंने अपनी व्यस्तता बतलाकर इंकार कर दिया। सूर्यदेवता अन्य देवताओं के पास भी गए। परंतु, सभी देवताओं ने कुछ ना कुछ बहाना बनाकर टाल दिया। यह सब एक लघु दीपक देख रहा था अंत में सूर्यदेव को निराश देखकर बोला, हे देव- आप चाहें तो आपका उत्तरदायित्व मैं निभाहने का प्रयत्न कर सकता हूं। इस प्रकार सूर्यदेव अवकाश पा गए। तभी से माटी दीप अविकल-अविरत इस विश्व को अपनी ज्योति से आलोकित किए हुए है। यह लघुता की महिमा है।   

Wednesday, 3 January 2018

शुभ-अशुभ के बीच झूलती छींक - रश्मि

शुभ-अशुभ के बीच झूलती छींक  - रश्मि

छींक आना जीवन से जुडी एक साधारण सी घटना है। परंतु, शुभ-अशुभ, शकुन-अपशकुन माननेवालों ने इस साधारणसी अनायास ही घटित हो जानेवाली घटना को इतना महत्व दे दिया है कि, यह भी एक लेख का विषय बन गई है। जबकि इस धरा पर शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे कभी छींक ना आई हो। छींक को लेकर विश्व में कई धारणाएं प्रचलित हैं जबकि सच यह है कि, छींक हमारे  शरीर की एक आवश्यक क्रिया है और कई डॉक्टर एवं वैज्ञानिक तो इसे स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद बताते हैं और इसके आने से मस्तिष्क तरोताजा हो जाता है और मन हल्का। पर यह भी सत्य है कि मौके-बेमौके आ जाने पर दोष इस बेचारी छींक पर मढ़ दिया जाता है। अब भला इसमें इस बेचारी छींक क्या दोष! इस छींक से जुडी कई अजीबोगरीब मान्यताएं पूरी दुनिया में फैली हुई हैं। एक नजर जरा उन पर भी डाल लें - सबसे पहले अमेरिका जैसे अतिविकसित देश की धारणाओं पर नजर डालें तो वहां भी छींक के प्रति कई अंधविश्वास प्रचलित हैं। यहां जब लडकियों को छींक आती है तो माना जाता है कि, उनका मित्र उन्हें याद कर रहा है। शिशु के जन्म के समय छींक आती है तो यह समझा जाता है कि वह बडा होकर नेता बनेगा। 

घर से बाहर निकलते समय या किसी शुभ कार्य को आरंभ करते समय यदि किसी को छींक आ जाए तो कुछ देर रुक कर आगे बढ़ते हैं क्योंकि, ऐसे समय छींक आने को अशुभ समझते हैं। अधिकांश लोग सम संख्या में आनेवाली छींक को बुरा नहीं मानते, जबकि विषम संख्या में आनेवाली छींक को अशुभ। ईसाई मत के आरंभ में लोगों की मान्यता थी कि इससे भूत-प्रेत की बाधा उत्पन्न होती है। इस बाधा को दूर करने के लिए वे क्रॉस का चिन्ह बनाते थे। रोम में छींक आने से दुरात्माएं शरीर से बाहर निकल जाती हैं ऐसी मान्यता थी। प्राचीन समय में छींक यमदूत का बुलावा समझी जाती थी। छींक आने पर लोग कहते थे, 'ईश्वर तुम्हारा भला करे"।

छींक सदियों से शुभ-अशुभ के बीच झूलती चली आ रही है। प्राचीनकाल में छींक को लेकर राजाओं और पंडितों में कई विवाद हुए और अंत में जीत पंडितों की हुई। उनकी कही बातों को राजाओं को मानना पडा। छींक को लेकर इतिहास में एक अद्‌भुत घटना भी घटी है। मदुरा के राजा तिरु को ठंड लग गई और लगातार छींकें आने लगी। जब तक जुकाम ठीक नहीं हुआ तो उसने प्रण किया कि, जितने दिन उसे छींक आती रहेगी, उतने मंदिर वह अपने राज्य में बनवाएगा। उसको तीन महिनों तक छींके आती रही। आखिर 96 दिन में जाकर वह ठीक हुआ और एक शुभ मुहुर्त पर उसने एक साथ 96 मंदिर बनवाना प्रारंभ किया। जिनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं और वे छींकवाले मंदिरों के नाम से जाने जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय छींक संबंधी शोध करनेवाले एक विद्वान का कहना है कि, जिस दुल्हन का विवाह जनवरी माह में हो रहा हो और वह दुल्हन अपने विवाह के समय दो बार छींक दे तो उसे जुडवां बच्चे होंगे। यदि कोई व्यक्ति दूसरे पक्ष के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है और यदि स्वीकारात्मक उत्तर मिलने से पूर्व छींक आ जाए तो, संबंध एक वर्ष के भीतर टूट जाएगा। कुछ लोगों की मान्यता है कि, सगाई की अंगूठी लेते समय लडका छींक दे तो वह संबंध अस्थिर होगा। भारत में भी विवाह आदि शुभ कार्यों में शायद ढ़ोल, शहनाई, बैंड-बाजे आदि इसीलिए बजाए जाते हैं ताकि उस समय उपस्थित भारी भीड में यदि किसी को छींक आ भी जाए तो वह अतिथियों तक नहीं पहुंच पाए अन्यथा वे दुल्हा-दुल्हन के भविष्य के प्रति चिंतित हो उठेंगे।
ब्राजील और पुर्तगाल के लोग छींकनेवाले को कहते हैं, 'आप दीर्घजीवी हों।" इंग्लैंड का एक पुराना विश्वास है कि, रात में मकान के अंदर छींक आना उस मकान के लिए शुभ है। जर्मनी में जूता पहनते समय छींक आने को अपशकुन माना जाता है और व्यक्ति पहना हुआ जूता उतारकर कुछ देर बाद पुनः पहनता है, तब घर से रवाना होता है। लेकिन रुस में मोजे पहनते समय छींक आ जाए तो शुभ माना जाता है। ऑस्ट्रेलिया के लोग तो छींक आने के बाद ईश्वर को शुक्रिया अदा करते हैं।

छींक के संबंध में कुछ अन्य मान्यताएं इस प्रकार हैं, अगर यात्रा के दौरान अनायास ही दाईं तरफ अपनी छींक हो गई तो, उस दिन आवश्यकता से अधिक खर्च होगा। अगर छींक के समय चेहरा ऊपर हो जाए तो यात्रा में जय प्राप्त होती है। अगर छींक के समय चेहरा नीचे हो जाए तो अशुभ है। यात्रा पर जाते समय बार-बार छींक आए तो सभी काम चौपट होने की सूचना है, यात्रा रोक देनी चाहिए। कहीं भी एक साथ दो छींक आ जाए सभी काम ठीक बन जाने की सूचना है।  (संकलन)