Friday, 22 December 2017

क्रिसमस - विश्व के विभिन्न देशों में - शिरीष सप्रे

क्रिसमस - विश्व के विभिन्न देशों में
शिरीष सप्रे

क्रिसमस एक ऐसा पर्व है जो सारी दुनिया में बडी धूमधाम से मनाया जाता है। क्रिसमस या बडा दिन का प्राचीन नाम 'यूल-टाइड" है और इस धार्मिक पर्व को मनाने की रीतियां हर स्थान पर भिन्न-भिन्न है। इस पर्व का महत्व इसलिए है क्योंकि, ईसा का जन्म दिन इसी दिन मनाया जाता है। प्राचीन काल में बडा दिन मनाने के लिए जो शीतकालीन उत्सव अपनाए गए थे उनमें बहुत से तो ईसाई धर्म के आरम्भिक कालीन रोमवासियों के जीवन से संबद्ध थे। रोमवासी 'सैटरनेलिया" नामका एक बडा पर्व 17 से 25 दिसंबर तक मनाया करते थे। इस उत्सव के दौरान दास मुक्त कर दिए जाते थे। ये दास फिर एक नकली राजा चुनकर हंसी-ठट्ठा करते थे। इस उत्सव के पश्चात एक गुडियों का उत्सव 'सिगिलेरिया" मनाया जाता था। उसके अंतर्गत एक मेला आयोजित किया जाता था। जिसमें बच्चों को भेंट में खिलौने दिए जाते थे। इन ऐतिहासिक उत्सवों के पश्चात जो विकास हुआ उसके अंतर्गत 25 दिसंबर का उत्सव मनाया जाने लगा। इसका आरम्भ शायद सम्राट आरिलियन ने अपने पारसी उपास्य सूर्य देवता मिथिरास के सम्मान किया था। इस उत्सव को अविजयी सूर्य का जन्मदिन कहा गया और इसी दिन से दिन बडे होना माना गया।

रोम व ग्रीसवासी अपने त्यौहारों में सदा हरी रहनेवाली झाडी हाली का प्रयोग करते थे इसका उद्देश्य इस विश्वास के साथ किया जाता था कि, यह दुष्टात्माओं से बचाएगी। मिस्टलेटो नामक पौधा समकालीन पंडितों द्वारा पवित्र माना जाता था। दंतकथाओं के अनुसार एक पवित्र वृक्ष से काटकर कांटों का हार बनाया जाता था। इस संदर्भ में बेरियां ईसा के रक्त से लाल हो जाती थी। प्राचीन ईसाई हाली को 'गुणी शाखा" या 'ईसा का कांटा" कहते थे। इस प्राचीन रीति की पहले चर्च ने निंदा की, फलतः इटली में इसका कम प्रचलन है। फ्रांस में यह कभी लोकप्रिय नहीं हुआ तथा छठी शताब्दी में स्पेन की चर्च काउन्सिल ने इस पर पाबंदी लगा दी। इंग्लैंड एवं जर्मनी ने इन प्रतिबंधों की परवाह नहीं की। अब तक इन देशों में यह प्राचीन रीति बडी सफलतापूर्वक धूमधाम से मनाई जाती है।

स्केन्डियन देशों में बडा दिन बडे विशाल समारोह से मनाया जाता है और कहीं इतने विशाल स्तर पर यह नहीं मनाया जाता। स्वीडन में यह 13 दिसंबर को ल्युशिया दिवस से शुरु होता है। इस दिन प्रकाश की रानी का भोज मनाया जाता है। स्टाकहोम में ल्युशिया तथा उनके अनुचरों के सम्मान में रात में जलती मशालों का जुलूस निकाला जाता है। समारोह का अंत टाउनहाल में एक भोज के बाद होता है। ल्युशिया दिवस का समारोह स्वीडन से अन्य देशों में भी गया। अमेरिका जहां स्केन्डेेवियायी देशों के बहुत से लोग रहते हैं, में यह उत्सव मनाया जाता है।

जैसे-जैसे बडा दिन निकट आता जाता है राजधानी की सडकें 'परिलोक" बन जाती हैं। बडे दिन के प्रतीकों से युक्त प्रकाशित मालाएं जहां-तहां इमारतों से लटकी नजर आती हैं। बडे दिन की रात्रि को डेनमार्क एवं नार्वे के चर्च विशेष प्रार्थना के लिए लोगों से भर जाते हैं। प्रार्थना के बाद चर्च की घंटियां मधुर ध्वनि से बडे दिन के आगमन की शुभ सूचना देती हैं। समस्त स्केन्डियन देशों की बडे दिन की रात्रि को सान्ताक्लास का आगमन होता है। इसी दिन शाम को भेंट-पार्सल खोले जाते हैं। स्वीडन में दिन निकलने से पूर्व बडे दिन की प्रार्थनाएं शुरु होती हैं। चर्च में सैंकडों मोमबत्तियां जलाकर प्रकाश किया जाता है। 

जर्मनी में बडा दिन सारे त्यौहारों एवं उत्सवों में शानदार माना जाता है। बडे दिन से पूर्व यानी 24 दिसंबर की शाम की बच्चे-बुढ़े सभी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। एक छोटी सी घंटी की मधुर ध्वनि के साथ शाम को पिता घर के एकत्रित सदस्यों के सामने क्रिसमस कमरे का द्वार खोलते हैं। कमरे के बीच में एक क्रिसमस का पेड जिसमें सुंदर शीशे की गेंदें होती हैं, नकली चमकीले तारों से युक्त होता है। पेड में नारंगियां, सेब, सुनहरे मेवे, खिलौने तथा मिठाइयां लगी होती हैं। मोमबत्ती प्रकाश से चमकते पेड के इर्दगिर्द परिवार एकत्रित होता है। बच्चे यह तय ही नहीं कर पाते कि पेड को निहारें कि भेंट के पार्सल खोलें। पिता सेंट ल्युक की गास्पेल से प्रार्थना पढ़ते हैं और फिर पूरा परिवार 'साइलेंट नाइट, होली नाइट" का प्राचीन और प्रिय समवेत गान गाते हैं। इस गान के द्वारा वे पृथ्वी पर शांति एवं मनुष्यों में सद्‌भाव की कामना करते हैं।

अमेरिका में 25 दिसंबर से कुछ पूर्व और कुछ दिन बाद तक खुशी और मस्ती का वातावरण रहता है। अमरिकी इसे 'क्रिसमस" स्प्रिट"कहते हैं। दुकानें आकर्षक भेंटों से भरी रहती हैं। भेंटों के बोझ से दबे ग्राहक इस दुकान से उस दुकान तक दौडते रहते हैं। क्रिसमस का सान्ताक्लास गली के कौने में अपनी घंटियां बजाता हुआ असहायों की सहायतार्थ निमंत्रण देता रहता है। छोट-छोटे बच्चे सान्ताक्लास के कानों में अपनी इच्छाएं जाहिर करते हैं। हर जगह पर लाल चेहरेवाला, मुस्कराता, बर्फ की तरह सफेद गुलमच्छोंवाला तथा लाल कपडे पहना बूढ़ा दयालुता का ऐसा प्रतीक माना जाता है जो वर्ष में एक बार बच्चों के लिए प्रसन्नता का तथा बडों के लिए ह्रदय को सांत्वना प्रदान करनेवाली यादों का अवसर लाता है। 

बहुत लंबे समय से अमेरिकी बडे दिन को ऐसे मनाते आए हैं जो उनकी विविध संस्कृतियों-रीतियों का यथेष्ट परिचय देता है। प्राचीन स्पेनियों के कीमती प्रदर्शन एवं जर्मनों के कलात्मक प्रदर्शन का विचित्र अभूतपूर्व सामंजस्य इस अवसर पर अमेरिका में मिलता है। दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों में, जहां बहुत से अमेरिकी, स्पेनी, मैक्सिकी और अमेरिकी इंडियनों की संतानें हैं, रीतियां बदल जाती हैं। प्राचीन इंडियन और आधुनिक क्रिश्चियन रीतियां परस्पर मिल जाती हैं तथा कबीली उत्सव संबंधी नृत्यों के बाद आधी रात में कैथोलिक चर्च में प्रार्थना होती है। गलियां फूलों की खुशबु से महकने लगती हैं। बल्बों तथा बहुरंगी मोमबत्तियों के प्रकाश बहुत से घरों के सामने इंद्रधनुषी छटा बिखेरने लगते हैं। 

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