Saturday, 30 December 2017

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता भाग 2 - शिरीष सप्रे

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता  भाग 2  -  शिरीष सप्रे


जोधपूर का महगोत नेणसी ने राजपूतों के बारे में जानकारी दी है (1606)। इस ग्रंथ को ख्यात कहते हैं। थोडी बहुत बखर, कुछ शकावली इस प्रकार का इस ग्रंथ का स्वरुप है। पद्मिनी के संबंध में वह इतना ही कहता है कि, 'रतनसिंह पद्मिनी प्रकरण में अलाउद्दीन से लडा और मारा गया"। नेणसी ने जनश्रुतिओं पर जोर दिया। उसे वंशावली भी ठीक से मालूम नहीं थी। एक बार वह रतनसिंह को समरसिंह का पुत्र कहता है तो, एक बार अजयसिंह का। अंत में तो एक बार उसने रतनसिंह को लक्ष्मणसिंह का भाई कहा है। लक्ष्मणसिंह की शाखा सिसोदिया। रतनसिंह की रावल। अजयसिंह लक्ष्मणसिंह का छोटा लडका, यह बातें उसे मालूम ही नहीं ऐसा दिखता है। इस कारण नेणसी के पद्मिनी संबंधी विधानों को महत्व नहीं दिया जा सकता।

फरिश्ता भारत का सर्वश्रेष्ठ मुस्लिम इतिहासकार। उसने 1610 के आसपास भारत की मुस्लिम सत्ता का इतिहास लिखा। चितौड की घेराबंदी के संबंध में वह कहता है ः  चितौड गढ़ का किला छः महीने की घेराबंदी के बाद खिलजी ने 1303 में जीत लिया और अपने बडे लडके खिज्रखान को उसका अधिकारी नियुक्त किया। फरिश्ता ने पद्मिनी की मांग चितौड गढ़ जीतने के बाद की बतलाई है। फरिश्ता कहता है 'इस दरमियान(1304) अलाउद्दीन की कैद से चितौड का राजा राम रतनसेन बडी विलक्षण रीति से भाग निकला। विस्तार भयावश आगे की कहानी में न जाते हुए हम केवल इतना बतलाते हैं कि, फरिश्ते के वर्णन में अनेक गलतियां समकालीन शिलालेखों के आधार पर बतलाई जा सकती हैं। अलाउद्दीन ने खिज्रखान को चितौड की सुबेदारी से हटा दिया। वह काल राजा रतनसेन कैद से निकल भागने के बाद का मतलब 1304-5 का था यह सूचित करता है।

परंतु, चितौड के तट से लगी एक कब्र पर सन्‌ 1310 का लेख है। उसमें अलाउद्दीन खिलजी का उल्लेख है। तब तक तो भी अलाउद्दीन ने चितौड रतनसेन के भांजे को नहीं दिया था। 1311-12 की घटनाओं का वर्णन करते हुए स्वयं फरिश्ता कहता है कि, देवगिरी पर चडाई करना चितौड से आसान था परंतु, मलिक काफूर खिज्रखान का द्वेष करता था इस कारण उसने यह मुहिम खिज्रखान को देने की अपेक्षा स्वयं जाना तय किया। इस पर से भी यह स्पष्ट होता है कि 1311-12 तक चितौड पर खिज्रखान बाप की तरफ से  शासन चलाता था। 

फरिश्ता को रतनसेन की पत्नी का नाम मालूम नहीं था। राजा रतनसिंह की औरतों में एक पद्मिनी थी, ऐसा वह कहता है। यहां पद्मिनी  नाम एक स्त्री का ना होकर एक जाति की स्त्री का है इस प्रकार से सूचित किया हुआ है। अच्छा एक बात ओर यहां रत्नसेन को छुडाने की तरकीब किसकी? तो रत्नसेन की लडकी की पद्मिनी की नहीं। एक बात और पद्मिनी के सौंदर्य की प्रसिद्धी अलाउद्दीन के कानों पर चितौड की घेराबंदी के समय गई क्या? नहीं। फरिश्ता के मतानुसार चितौड पर विजय के बाद रतनसेन कैद होकर दिल्ली आया और कुछ समय पश्चात अलाउद्दीन को पद्यिनी की हकीकत मालूम हुई।

अकबर के मंत्री अबुलफजल का आईने अकबरी ग्रंथ बडा प्रसिद्ध है। यह लगभग 1560 के आसपास लिखा गया था। इसमें लिखते समय अबुलफजल ने विशेष चिकित्सा नहीं की है। उसने पुराने गं्रथकारों द्वारा जो दर्ज कर रखा गया है वही लिखा है और स्पष्ट रुप से आख्यायिकाओं पर से अपनी हकीकत सजाई है। वह कहता है अलाउद्दीन ने तीन बार चितौड की घेराबंदी की थी। परंतु, अलाउद्दीन के साथ रहे खुसरो की सूचनानुसार घेरा एक ही बार डाला गया था और वह भी छः महीने में समाप्त हो गया था। अबुलफजल ने थोडे बहुत अंतर से 'पद्मावत" काव्य की ही कथा दी हुई है। 

'पद्मावत" काव्य -

पद्मिनी की आख्यायिका के स्त्रोत की खोज करते-करते हमने टॉड (1820), नेणसी (1660) और फरिश्ता (1610) और अबुल फजल द्वारा दी हुई जानकारियों में कितना अंतर है इसको देखा। राजपूतों की सहमती से अलाउद्दीन ने पद्मिनी का चेहरा आईने में देेखा यह बात केवल टॉड कहता है और इस बात को ही भारतभर में प्रसिद्धि मिली। पद्मावत काव्य में इस प्रसंग का उल्लेख इस तरीके से नहीं आता। पद्मावत महाकाव्य अलाहबाद प्रांत के जायस गांव के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा अवधी हिंदी भाषा में लिखा गया था। काव्य का आशय आध्यात्मिक होकर उसे कथानक में गूंथा गया है ऐसा सामान्यतः समझा जाता है।

 पद्मवात का सारांश इस प्रकार से है -

पद्मावती अत्यंत सुंदर होकर सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की पुत्री थी और उसके पास हीरामन नामका तोता था। तोता एक दिन पिंजरे से उड गया। उसे एक शिकारी ने पकड लिया और एक ब्राह्मण को बेच दिया। ब्राह्मण ने  उसे राजा रतनसेन को बेच दिया। राजा रतनसेन की पटरानी नागमती ने हीरामन से पूछा ः क्या मुझसे बढ़कर सुंदर कोई अन्य स्त्री इस संसार में है? इस पर तोते ने पद्मावती के अप्रतिम सौंदर्य की स्तुती की। राजा तोते को लेकर सिंहल द्वीप गया वहां तोते ने पद्मावती को  राजा के बारे में जानकारी दी। वे दोनो एक दूसरे पर अनुरक्त हो गए। उन दोनों का विवाह हो गया और राजा पद्मावती को लेकर चितौड वापिस आ गया।

राजा रतनसेन के दरबार में राघव चैतन्य नामका मंत्रतंत्र विद्या का जानकार था। उसने मंत्र विद्या के बल पर द्वितीया का चंद्र दिखलाकर आज द्वितीया है कहा। परंतु, दूसरे दिन द्वितीया का चंद्र उदित हुआ और मांत्रिक झूठा सिद्ध हुआ। उसे देश निकाला दे दिया गया। पद्मावती ने उसे समझाईश देने के लिए बुलाया। इस निमित्त उसे पद्मावती के दर्शन हुए और उसके मन पर पद्मावती के सौंदर्य का गहरा परिणाम हुआ। वह तत्काल अलाउद्दीन खिलजी के पास गया और उसके सामने पद्मिनी के सौंदर्य का वर्णन किया। अब अलाउद्दीन के मन में पद्मावती को हासिल करने की इच्छा जाग उठी और उसने रतनसेन के पास दूत भेज पद्मावती की मांग की जो रतनसेन द्वारा नकार दी गई। अलाउद्दीन बडी भारी सेना लेकर चितौड पर चढ़ दौडा। आठ साल की घेराबंदी के बाद भी वह चितौड ना जीत सका। इतने में वायव्य से दिल्ली पर आक्रमण की संभावना के कारण उसने रतनसेन को संदेश भेजा कि उसे पद्मावती नहीं केवल आपकी मित्रता चाहिए।

यह सुन रतनसेन ने अलाउद्दीन का स्वागत किया। आदरातिथ्य और भोज के पश्चात वे दोनो शतरंज खेलने बैठे। खेल किस प्रकार से चल रहा है यह देखने कुतुहलवश पद्मावती ने झरोखे से झांक कर देखा (राजपूतों द्वारा यह शर्त कबूल किए जाने का कोई उल्लेख नहीं) उसका प्रतिबिंब सामने के आईने में दिखा। वर्णनानुसार वही पद्मावती होनी चाहिए यह राघव चैतन्य ने उसे बतलाया। दूसरे दिन रतनसेन उसे छोडने प्रवेशद्वार तक आया। वहीं अलाउद्दीन ने दगा कर रतनसेन को कैद कर लिया और उसे ले दिल्ली आ गया। आगे की कथा कि किस प्रकार पद्मावती गोरा और बादल द्वारा की गई युक्ति से रतनसेन को छुडा लाई व लडाई में गोरा सहित अनेक राजपूत खेत रहे सुप्रसिद्ध है। फिर से अलाउद्दीन ने आक्रमण किया परंतु, कोई फायदा नहीं हुआ अलाउद्दीन के हाथ केवल पद्मिनी की राख ही लगी।

ऐसी अन्य आख्यायिकाएं भी हैं जैसे कुंभलगढ़ प्रशस्ती, इसामी का 'फुतूहस्सलातीन" जियाउद्दीन बरनी का 1357 में लिखा 'तारीखे फिरोजशाही" में ः 'चितौड घेरे के संबंध में कहता है, 'अलाउद्दीन अपनी सेना लेकर दिल्ली से निकला। उसने चितौड पर हमला किया। उसने चितौड को घेर लिया और थोडे ही समय में जीत लिया। इसके बाद वह दिल्ली लौट गया।" अमीर खुसरो जो चितौड पर चढ़ाई के समय अलाउद्दीन के साथ था के 'देवलरानी" काव्यग्रंथ में चितौड मुहिम का संक्षिप्त उल्लेख है इसमें पद्मावती का उल्लेख नहीं। यह सब विस्तारभयावश हम नहीं दे रहे हैं।

सारांश यह है कि, पद्मिनी या पद्मावती की कथा को विशुद्ध इतिहास में रत्तीभर भी आधार नहीं है। अलाउद्दीन ने चित्तौड को घेरा डाला और अंतिम हमले के समय चितौड का राणा रतनसिंह अलाउद्दीन के पास आश्रयार्थ आया। परंतु, राजपूतों ने लक्षमणसिंह सिसोदिया के नेतृत्वतले सामना कर अपने प्राणों की आहुति दी और राजपूत रमणियों ने जौहर कर सतीत्व स्वीकारा। रतनसिंह का क्या हुआ यह मालूम नहीं। परंतु, लक्ष्मणसिंह के पोते राणा हमीर ने आगे जाकर पच्चीस वर्षों पश्चात चितौड जीतकर सिसोदियांओ के वंश की शुरुआत की। इतिहास के आईने में प्रचंड ज्वालाओं में जलता चितौड ही दिखता है एवं दंतकथाओं के दर्पण की पद्मावती की कथा कल्पित है सत्य नहीं। (यह लेख संशोधक श्री सेतुमाधवराव पगडी की पुस्तक 'भारतीय मुसलमान शोध आणि (और) बोध" के लेख 'चितौड की पद्मिनी कल्पित या सत्य? पर आधारित है)

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