Saturday, 30 December 2017

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता भाग 1 - शिरीष सप्रे

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता  भाग 1  -  शिरीष सप्रे

लगता है संजय लीला भंसाली अनैतिहासिक एवं विवादास्पद फिल्में बनाने में महारत हासिल कर एक विश्व रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं। इसीलिए लगातार बेसिरपैर की विवादास्पद फिल्में एक के बाद एक बनाए चले जा रहे हैं और मनोरंजन के नाम पर चाहे जो फिल्माए जा रहे हैं। इस कडी में बाजीराव मस्तानी के बाद अब उनकी नई फिल्म है पद्मावती जिसका चौतरफा विरोध हो रहा है और इस कारण इस फिल्म का प्रदर्शन खटाई में पड गया है। बाजीराव मस्तानी में भी उन्होंने अनेक अनैतिहासिक एवं बेसिरपैर की घटनाएं फिल्माई थी इसी कडी में आशुतोष गोवारिकर की फिल्म जोधा अकबर भी आती है। परंतु, इनका जैसा होना चाहिए वैसा व्यापक विरोध न होने के कारण  संजय लीला की हिम्मत जरा कुछ ज्यादह ही खुल गई और नतीजा सामने है कि फिल्म का देशव्यापी विरोध हो रहा है और फिल्म के प्रदर्शन की तारिख टलती चली जा रही है। मशहूर गीतकार और शायर जावेद अख्तर भी पद्मावती की कहानी को ऐतिहासिक नहीं अपितु नकली मानते हैं और एक टीव्ही डिबेट का हवाला देते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि, 'पद्मावती की रचना और अलाउद्दीन खिलजी के समय में काफी फर्क था। जायसी ने जिस वक्त इसे लिखा और खिलजी के शासनकाल में करीब 200-250 साल का फर्क था। इतने साल में जब तक कि जायसी ने पद्मावती नहीं लिखी, कहीं रानी पद्मावती का जिक्र ही नहीं है। जावेद अख्तर ने कहा, 'उस दौर (अलाउद्दीन के) में इतिहास बहुत लिखा गया। उस जमाने के सारे रिकॉर्ड भी मौजूद हैं, लेकिन कहीं पद्मावती का नाम नहीं है।....   तथ्य है कि जोधाबाई अकबर की पत्नी नहीं थी।(नया इंडिया 12 नवंबर 2017, भोपाल)

19वीं शताब्दी के प्रारंभ में जब कर्नल टॉड जो राजस्थान में पोलिटिकल एजेंट के रुप में कार्य कर रहा था के कानों पर पद्मिनी की कहानी आई और जैसी उसने सुनी पढ़ी वैसी उसने प्रस्तुत कर दी और यह कथा ऐतिहासिक दृष्टि से सत्य होनी चाहिए ऐसा मान लिया गया। परंतु जैसे-जैसे राजस्थान के इतिहास का अधिकाधिक संशोधन होने लगा वैसे-वैसे टॉड के ग्रंथ ऍनल्स ऑफ राजस्थान की कमियां नजरों में आने लगी। टॉड का ग्रंथ मतलब इतिहास और दंतकथाओं का मिश्रण है यह अभ्यासकों के ध्यान में आने लगा। टॉड ने जो कथा भाटों द्वारा उसे बतलाई गई वह उसने लिख ली। वह संक्षेप में इस प्रकार से है-

सन्‌ 1274 में लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर बैठा। वह आयु में कम होने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज चलाता था। भीमसिंह ने सिंहल द्वीप के राजा हमीरसिंह चौहान की कन्या पद्मिनी से विवाह किया। पद्मिनी के लावण्य पर मोहित हो अलाउद्दीन ने चितौड पर आक्रमण कर दिया परंतु, आक्रमण यशस्वी ना हो सका। इस कारण 'मुझे पद्मिनी का चेहरा दर्पण में देखने को मिलेगा तो भी पर्याप्त होगा, मैं चितौड छोडकर चला जाऊंगा" इस प्रकार का संदेश उसने भीमसिंह को भेजा। राजपूतों ने यह मान्य कर लिया। अलाउद्दीन अपने चुनिंदा सेवकों के साथ किले में गया उसने दर्पण में चेहरा देखा और वापिस लौट गया। उसे प्रवेशद्वार तक छोडने गए भीमसिंह को उसने कैद कर लिया। उसे छुडवाने के लिए पद्मिनी ने युक्ति की। 'मैं तुम्हारे अंतःपुर में आने के लिए तैयार हूं, परंतु उसके पूर्व मुझे भीमसिंह से अंतिम भेंट की अनुमति होनी चाहिए", ऐसा उसने अलाउद्दीन को संदेश भेजा। अलाउद्दीन ने अनुमति दे दी। पद्मिनी ने सात सौ पालकियां तैयार की और प्रत्येक पालकी में एक वीर राजपूत बैठा। इस दल का नेतृत्व पद्मिनी का काका गोरा और चचेरा भाई बादल के पास था। उन्होंने पराकाष्ठा की लडाई करके भीमसिंह को छुडा लिया। अलाउद्दीन ने पुनः चितौड पर हमला कर दिया। अपन टिक नहीं सकते यह देख पद्मिनी और अन्य राजपूत महिलाओं ने जौहर कर लिया तथा राजपूत वीर अलाउद्दीन की सेना पर टूट पडे व लडते-लडते हुतात्मा हो गए।

सन्‌ 1460 का महाराणा कुंभा के काल का एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है। इसके अलावा समकालीन 'एकलिंगमहात्म्य" के 'राजवर्णन" अध्याय में भी लक्ष्मणसिंह की जानकारी आई हुई है। लक्ष्मणसिंह चितौड की राजगद्दी पर विराजमान हुआ परंतु, आयु में कम  होेने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज देखता था, ऐसा टॉड का कहना है। वास्तविकता देखें तो लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर कभी भी नहीं था। मेवाड के गेहलोत वंश मेंं रणसिंह कर्ण राजा था। उसका पुत्र क्षेमसिंह चितौड पर राज्य करने लगा। उसके वंशज चितौड के रावल कहे जाने लगे। क्षेमसिंह का भाई राहप के पास सिसोदे गांव की सरदारी थी। इस कारण गेहलोतों की इस शाखा को सिसोदिया कहा जाने लगा। चितौड की ज्येष्ठ रावल शाखा के रतनसिंह (1302-3) के काल में ही अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड के किले पर आक्रमण किया था। इधर इस काल में गेहलोतों की कनिष्ठ शाखा सिसोदे में राज्य कर रही थी। रतनसिंह का समकालीन था लक्ष्मणसिंह। सिसोदियाओं के इन राजाओं को राणा कहते थे। लक्ष्मणसिंह चितौड की ज्येष्ठ शाखा के रावलों के रतनसिंह की सहायता के लिए दौडकर गया और अलाउद्दीन के साथ लडते हुए अपने सातों पुत्रों सहित मारा गया।

अब टॉड की गलती देखें। चितौड के रावल रतनसिंह हैं, लक्ष्मणसिंह नहीं। लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर बैठा। परंतु, वह छोटा होने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज चलाता था ऐसा टॉड कहता है और पद्मिनी भीमसिंह की पत्नी, ऐसा भी वह कहता है। वास्तविकता देखें भीमसिंह लक्ष्मणसिंह का दादा। अलाउद्दीन खिलजी के घेरे के समय लक्ष्मणसिंह को सात पुत्र थे। यह एकलिंग महात्म्य में भी कहा गया है।

पद्मिनी की आख्यायिका

टॉड, जोधपूर के सत्रहवीं शताब्दी के इतिहासकार नेणसी, मुसलमान इतिहासकार फरिश्ता (1610) और अकबर का चरित्रकार अबुलफजल इन सबने पद्मिनी की जनश्रुति सीधे-सीधे मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत (सन्‌1440) इस कपोलकल्पित हिंदी काव्य पर से ली है। और इसमें सबने अपनी-अपनी इच्छानुसार बदलाव भी किया है। उदाहरणार्थः अलाउद्दीन द्वारा दर्पण में पद्मिनी का चेहरा देखने का प्रसंग लें। राजपूतों ने इस बात को मान्यता दी, ऐसा टॉड कहता है। परंतु, मूल काव्य 'पद्मावत" में मजकूर इस प्रकार से है-

चितौड किले में रतनसिंह ने अलाउद्दीन का स्वागत किया, उसकी सेवा में दास-दासियां उपस्थित थे। परंतु, पद्मिनी उसे नजर नहीं आई। भोजनोपरांत रतनसिंह और अलाउद्दीन शतरंज खेलने बैठे। अलाउद्दीन ने अपने पास दर्पण रखा था। ऊपर झरोखे से पद्मिनी खेल देखने के लिए झांकेगी और उसका प्रतिबिंब दिखेगा ऐसी उसकी अपेक्षा थी। संयोगवश हुआ भी ऐसा ही। दासियों के कहने पर से कुतूहलवश पद्मिनी ने झरोखे का परदा हटाकर नीचे देखा। वह प्रतिबिंब अलाउद्दीन को दिखा। परंतु, वही पद्मिनी है इसकी विश्वनीयता अलाउद्दीन को नहीं थी। अंत में राघव चैतन्य नामक अपने सलाहकार से उसका वर्णन किया। वर्णनानुसार वही पद्मिनी होना चाहिए ऐसा राघवचैतन्य ने उसे बतलाया।

अर्थात्‌ राजपूतों ने पद्मिनी (या पद्मावती) का चेहरा दर्पण में देखने की अनुमति दी यह काव्य पर से भी सिद्ध नहीं होता। इतिहास बाबद बात करना ही व्यर्थ है।........

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