Saturday, 30 December 2017

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता भाग 2 - शिरीष सप्रे

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता  भाग 2  -  शिरीष सप्रे


जोधपूर का महगोत नेणसी ने राजपूतों के बारे में जानकारी दी है (1606)। इस ग्रंथ को ख्यात कहते हैं। थोडी बहुत बखर, कुछ शकावली इस प्रकार का इस ग्रंथ का स्वरुप है। पद्मिनी के संबंध में वह इतना ही कहता है कि, 'रतनसिंह पद्मिनी प्रकरण में अलाउद्दीन से लडा और मारा गया"। नेणसी ने जनश्रुतिओं पर जोर दिया। उसे वंशावली भी ठीक से मालूम नहीं थी। एक बार वह रतनसिंह को समरसिंह का पुत्र कहता है तो, एक बार अजयसिंह का। अंत में तो एक बार उसने रतनसिंह को लक्ष्मणसिंह का भाई कहा है। लक्ष्मणसिंह की शाखा सिसोदिया। रतनसिंह की रावल। अजयसिंह लक्ष्मणसिंह का छोटा लडका, यह बातें उसे मालूम ही नहीं ऐसा दिखता है। इस कारण नेणसी के पद्मिनी संबंधी विधानों को महत्व नहीं दिया जा सकता।

फरिश्ता भारत का सर्वश्रेष्ठ मुस्लिम इतिहासकार। उसने 1610 के आसपास भारत की मुस्लिम सत्ता का इतिहास लिखा। चितौड की घेराबंदी के संबंध में वह कहता है ः  चितौड गढ़ का किला छः महीने की घेराबंदी के बाद खिलजी ने 1303 में जीत लिया और अपने बडे लडके खिज्रखान को उसका अधिकारी नियुक्त किया। फरिश्ता ने पद्मिनी की मांग चितौड गढ़ जीतने के बाद की बतलाई है। फरिश्ता कहता है 'इस दरमियान(1304) अलाउद्दीन की कैद से चितौड का राजा राम रतनसेन बडी विलक्षण रीति से भाग निकला। विस्तार भयावश आगे की कहानी में न जाते हुए हम केवल इतना बतलाते हैं कि, फरिश्ते के वर्णन में अनेक गलतियां समकालीन शिलालेखों के आधार पर बतलाई जा सकती हैं। अलाउद्दीन ने खिज्रखान को चितौड की सुबेदारी से हटा दिया। वह काल राजा रतनसेन कैद से निकल भागने के बाद का मतलब 1304-5 का था यह सूचित करता है।

परंतु, चितौड के तट से लगी एक कब्र पर सन्‌ 1310 का लेख है। उसमें अलाउद्दीन खिलजी का उल्लेख है। तब तक तो भी अलाउद्दीन ने चितौड रतनसेन के भांजे को नहीं दिया था। 1311-12 की घटनाओं का वर्णन करते हुए स्वयं फरिश्ता कहता है कि, देवगिरी पर चडाई करना चितौड से आसान था परंतु, मलिक काफूर खिज्रखान का द्वेष करता था इस कारण उसने यह मुहिम खिज्रखान को देने की अपेक्षा स्वयं जाना तय किया। इस पर से भी यह स्पष्ट होता है कि 1311-12 तक चितौड पर खिज्रखान बाप की तरफ से  शासन चलाता था। 

फरिश्ता को रतनसेन की पत्नी का नाम मालूम नहीं था। राजा रतनसिंह की औरतों में एक पद्मिनी थी, ऐसा वह कहता है। यहां पद्मिनी  नाम एक स्त्री का ना होकर एक जाति की स्त्री का है इस प्रकार से सूचित किया हुआ है। अच्छा एक बात ओर यहां रत्नसेन को छुडाने की तरकीब किसकी? तो रत्नसेन की लडकी की पद्मिनी की नहीं। एक बात और पद्मिनी के सौंदर्य की प्रसिद्धी अलाउद्दीन के कानों पर चितौड की घेराबंदी के समय गई क्या? नहीं। फरिश्ता के मतानुसार चितौड पर विजय के बाद रतनसेन कैद होकर दिल्ली आया और कुछ समय पश्चात अलाउद्दीन को पद्यिनी की हकीकत मालूम हुई।

अकबर के मंत्री अबुलफजल का आईने अकबरी ग्रंथ बडा प्रसिद्ध है। यह लगभग 1560 के आसपास लिखा गया था। इसमें लिखते समय अबुलफजल ने विशेष चिकित्सा नहीं की है। उसने पुराने गं्रथकारों द्वारा जो दर्ज कर रखा गया है वही लिखा है और स्पष्ट रुप से आख्यायिकाओं पर से अपनी हकीकत सजाई है। वह कहता है अलाउद्दीन ने तीन बार चितौड की घेराबंदी की थी। परंतु, अलाउद्दीन के साथ रहे खुसरो की सूचनानुसार घेरा एक ही बार डाला गया था और वह भी छः महीने में समाप्त हो गया था। अबुलफजल ने थोडे बहुत अंतर से 'पद्मावत" काव्य की ही कथा दी हुई है। 

'पद्मावत" काव्य -

पद्मिनी की आख्यायिका के स्त्रोत की खोज करते-करते हमने टॉड (1820), नेणसी (1660) और फरिश्ता (1610) और अबुल फजल द्वारा दी हुई जानकारियों में कितना अंतर है इसको देखा। राजपूतों की सहमती से अलाउद्दीन ने पद्मिनी का चेहरा आईने में देेखा यह बात केवल टॉड कहता है और इस बात को ही भारतभर में प्रसिद्धि मिली। पद्मावत काव्य में इस प्रसंग का उल्लेख इस तरीके से नहीं आता। पद्मावत महाकाव्य अलाहबाद प्रांत के जायस गांव के सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा अवधी हिंदी भाषा में लिखा गया था। काव्य का आशय आध्यात्मिक होकर उसे कथानक में गूंथा गया है ऐसा सामान्यतः समझा जाता है।

 पद्मवात का सारांश इस प्रकार से है -

पद्मावती अत्यंत सुंदर होकर सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की पुत्री थी और उसके पास हीरामन नामका तोता था। तोता एक दिन पिंजरे से उड गया। उसे एक शिकारी ने पकड लिया और एक ब्राह्मण को बेच दिया। ब्राह्मण ने  उसे राजा रतनसेन को बेच दिया। राजा रतनसेन की पटरानी नागमती ने हीरामन से पूछा ः क्या मुझसे बढ़कर सुंदर कोई अन्य स्त्री इस संसार में है? इस पर तोते ने पद्मावती के अप्रतिम सौंदर्य की स्तुती की। राजा तोते को लेकर सिंहल द्वीप गया वहां तोते ने पद्मावती को  राजा के बारे में जानकारी दी। वे दोनो एक दूसरे पर अनुरक्त हो गए। उन दोनों का विवाह हो गया और राजा पद्मावती को लेकर चितौड वापिस आ गया।

राजा रतनसेन के दरबार में राघव चैतन्य नामका मंत्रतंत्र विद्या का जानकार था। उसने मंत्र विद्या के बल पर द्वितीया का चंद्र दिखलाकर आज द्वितीया है कहा। परंतु, दूसरे दिन द्वितीया का चंद्र उदित हुआ और मांत्रिक झूठा सिद्ध हुआ। उसे देश निकाला दे दिया गया। पद्मावती ने उसे समझाईश देने के लिए बुलाया। इस निमित्त उसे पद्मावती के दर्शन हुए और उसके मन पर पद्मावती के सौंदर्य का गहरा परिणाम हुआ। वह तत्काल अलाउद्दीन खिलजी के पास गया और उसके सामने पद्मिनी के सौंदर्य का वर्णन किया। अब अलाउद्दीन के मन में पद्मावती को हासिल करने की इच्छा जाग उठी और उसने रतनसेन के पास दूत भेज पद्मावती की मांग की जो रतनसेन द्वारा नकार दी गई। अलाउद्दीन बडी भारी सेना लेकर चितौड पर चढ़ दौडा। आठ साल की घेराबंदी के बाद भी वह चितौड ना जीत सका। इतने में वायव्य से दिल्ली पर आक्रमण की संभावना के कारण उसने रतनसेन को संदेश भेजा कि उसे पद्मावती नहीं केवल आपकी मित्रता चाहिए।

यह सुन रतनसेन ने अलाउद्दीन का स्वागत किया। आदरातिथ्य और भोज के पश्चात वे दोनो शतरंज खेलने बैठे। खेल किस प्रकार से चल रहा है यह देखने कुतुहलवश पद्मावती ने झरोखे से झांक कर देखा (राजपूतों द्वारा यह शर्त कबूल किए जाने का कोई उल्लेख नहीं) उसका प्रतिबिंब सामने के आईने में दिखा। वर्णनानुसार वही पद्मावती होनी चाहिए यह राघव चैतन्य ने उसे बतलाया। दूसरे दिन रतनसेन उसे छोडने प्रवेशद्वार तक आया। वहीं अलाउद्दीन ने दगा कर रतनसेन को कैद कर लिया और उसे ले दिल्ली आ गया। आगे की कथा कि किस प्रकार पद्मावती गोरा और बादल द्वारा की गई युक्ति से रतनसेन को छुडा लाई व लडाई में गोरा सहित अनेक राजपूत खेत रहे सुप्रसिद्ध है। फिर से अलाउद्दीन ने आक्रमण किया परंतु, कोई फायदा नहीं हुआ अलाउद्दीन के हाथ केवल पद्मिनी की राख ही लगी।

ऐसी अन्य आख्यायिकाएं भी हैं जैसे कुंभलगढ़ प्रशस्ती, इसामी का 'फुतूहस्सलातीन" जियाउद्दीन बरनी का 1357 में लिखा 'तारीखे फिरोजशाही" में ः 'चितौड घेरे के संबंध में कहता है, 'अलाउद्दीन अपनी सेना लेकर दिल्ली से निकला। उसने चितौड पर हमला किया। उसने चितौड को घेर लिया और थोडे ही समय में जीत लिया। इसके बाद वह दिल्ली लौट गया।" अमीर खुसरो जो चितौड पर चढ़ाई के समय अलाउद्दीन के साथ था के 'देवलरानी" काव्यग्रंथ में चितौड मुहिम का संक्षिप्त उल्लेख है इसमें पद्मावती का उल्लेख नहीं। यह सब विस्तारभयावश हम नहीं दे रहे हैं।

सारांश यह है कि, पद्मिनी या पद्मावती की कथा को विशुद्ध इतिहास में रत्तीभर भी आधार नहीं है। अलाउद्दीन ने चित्तौड को घेरा डाला और अंतिम हमले के समय चितौड का राणा रतनसिंह अलाउद्दीन के पास आश्रयार्थ आया। परंतु, राजपूतों ने लक्षमणसिंह सिसोदिया के नेतृत्वतले सामना कर अपने प्राणों की आहुति दी और राजपूत रमणियों ने जौहर कर सतीत्व स्वीकारा। रतनसिंह का क्या हुआ यह मालूम नहीं। परंतु, लक्ष्मणसिंह के पोते राणा हमीर ने आगे जाकर पच्चीस वर्षों पश्चात चितौड जीतकर सिसोदियांओ के वंश की शुरुआत की। इतिहास के आईने में प्रचंड ज्वालाओं में जलता चितौड ही दिखता है एवं दंतकथाओं के दर्पण की पद्मावती की कथा कल्पित है सत्य नहीं। (यह लेख संशोधक श्री सेतुमाधवराव पगडी की पुस्तक 'भारतीय मुसलमान शोध आणि (और) बोध" के लेख 'चितौड की पद्मिनी कल्पित या सत्य? पर आधारित है)

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता भाग 1 - शिरीष सप्रे

रानी पद्मावती की कथा कल्पना है या वास्तविकता  भाग 1  -  शिरीष सप्रे

लगता है संजय लीला भंसाली अनैतिहासिक एवं विवादास्पद फिल्में बनाने में महारत हासिल कर एक विश्व रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं। इसीलिए लगातार बेसिरपैर की विवादास्पद फिल्में एक के बाद एक बनाए चले जा रहे हैं और मनोरंजन के नाम पर चाहे जो फिल्माए जा रहे हैं। इस कडी में बाजीराव मस्तानी के बाद अब उनकी नई फिल्म है पद्मावती जिसका चौतरफा विरोध हो रहा है और इस कारण इस फिल्म का प्रदर्शन खटाई में पड गया है। बाजीराव मस्तानी में भी उन्होंने अनेक अनैतिहासिक एवं बेसिरपैर की घटनाएं फिल्माई थी इसी कडी में आशुतोष गोवारिकर की फिल्म जोधा अकबर भी आती है। परंतु, इनका जैसा होना चाहिए वैसा व्यापक विरोध न होने के कारण  संजय लीला की हिम्मत जरा कुछ ज्यादह ही खुल गई और नतीजा सामने है कि फिल्म का देशव्यापी विरोध हो रहा है और फिल्म के प्रदर्शन की तारिख टलती चली जा रही है। मशहूर गीतकार और शायर जावेद अख्तर भी पद्मावती की कहानी को ऐतिहासिक नहीं अपितु नकली मानते हैं और एक टीव्ही डिबेट का हवाला देते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि, 'पद्मावती की रचना और अलाउद्दीन खिलजी के समय में काफी फर्क था। जायसी ने जिस वक्त इसे लिखा और खिलजी के शासनकाल में करीब 200-250 साल का फर्क था। इतने साल में जब तक कि जायसी ने पद्मावती नहीं लिखी, कहीं रानी पद्मावती का जिक्र ही नहीं है। जावेद अख्तर ने कहा, 'उस दौर (अलाउद्दीन के) में इतिहास बहुत लिखा गया। उस जमाने के सारे रिकॉर्ड भी मौजूद हैं, लेकिन कहीं पद्मावती का नाम नहीं है।....   तथ्य है कि जोधाबाई अकबर की पत्नी नहीं थी।(नया इंडिया 12 नवंबर 2017, भोपाल)

19वीं शताब्दी के प्रारंभ में जब कर्नल टॉड जो राजस्थान में पोलिटिकल एजेंट के रुप में कार्य कर रहा था के कानों पर पद्मिनी की कहानी आई और जैसी उसने सुनी पढ़ी वैसी उसने प्रस्तुत कर दी और यह कथा ऐतिहासिक दृष्टि से सत्य होनी चाहिए ऐसा मान लिया गया। परंतु जैसे-जैसे राजस्थान के इतिहास का अधिकाधिक संशोधन होने लगा वैसे-वैसे टॉड के ग्रंथ ऍनल्स ऑफ राजस्थान की कमियां नजरों में आने लगी। टॉड का ग्रंथ मतलब इतिहास और दंतकथाओं का मिश्रण है यह अभ्यासकों के ध्यान में आने लगा। टॉड ने जो कथा भाटों द्वारा उसे बतलाई गई वह उसने लिख ली। वह संक्षेप में इस प्रकार से है-

सन्‌ 1274 में लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर बैठा। वह आयु में कम होने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज चलाता था। भीमसिंह ने सिंहल द्वीप के राजा हमीरसिंह चौहान की कन्या पद्मिनी से विवाह किया। पद्मिनी के लावण्य पर मोहित हो अलाउद्दीन ने चितौड पर आक्रमण कर दिया परंतु, आक्रमण यशस्वी ना हो सका। इस कारण 'मुझे पद्मिनी का चेहरा दर्पण में देखने को मिलेगा तो भी पर्याप्त होगा, मैं चितौड छोडकर चला जाऊंगा" इस प्रकार का संदेश उसने भीमसिंह को भेजा। राजपूतों ने यह मान्य कर लिया। अलाउद्दीन अपने चुनिंदा सेवकों के साथ किले में गया उसने दर्पण में चेहरा देखा और वापिस लौट गया। उसे प्रवेशद्वार तक छोडने गए भीमसिंह को उसने कैद कर लिया। उसे छुडवाने के लिए पद्मिनी ने युक्ति की। 'मैं तुम्हारे अंतःपुर में आने के लिए तैयार हूं, परंतु उसके पूर्व मुझे भीमसिंह से अंतिम भेंट की अनुमति होनी चाहिए", ऐसा उसने अलाउद्दीन को संदेश भेजा। अलाउद्दीन ने अनुमति दे दी। पद्मिनी ने सात सौ पालकियां तैयार की और प्रत्येक पालकी में एक वीर राजपूत बैठा। इस दल का नेतृत्व पद्मिनी का काका गोरा और चचेरा भाई बादल के पास था। उन्होंने पराकाष्ठा की लडाई करके भीमसिंह को छुडा लिया। अलाउद्दीन ने पुनः चितौड पर हमला कर दिया। अपन टिक नहीं सकते यह देख पद्मिनी और अन्य राजपूत महिलाओं ने जौहर कर लिया तथा राजपूत वीर अलाउद्दीन की सेना पर टूट पडे व लडते-लडते हुतात्मा हो गए।

सन्‌ 1460 का महाराणा कुंभा के काल का एक शिलालेख उपलब्ध हुआ है। इसके अलावा समकालीन 'एकलिंगमहात्म्य" के 'राजवर्णन" अध्याय में भी लक्ष्मणसिंह की जानकारी आई हुई है। लक्ष्मणसिंह चितौड की राजगद्दी पर विराजमान हुआ परंतु, आयु में कम  होेने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज देखता था, ऐसा टॉड का कहना है। वास्तविकता देखें तो लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर कभी भी नहीं था। मेवाड के गेहलोत वंश मेंं रणसिंह कर्ण राजा था। उसका पुत्र क्षेमसिंह चितौड पर राज्य करने लगा। उसके वंशज चितौड के रावल कहे जाने लगे। क्षेमसिंह का भाई राहप के पास सिसोदे गांव की सरदारी थी। इस कारण गेहलोतों की इस शाखा को सिसोदिया कहा जाने लगा। चितौड की ज्येष्ठ रावल शाखा के रतनसिंह (1302-3) के काल में ही अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड के किले पर आक्रमण किया था। इधर इस काल में गेहलोतों की कनिष्ठ शाखा सिसोदे में राज्य कर रही थी। रतनसिंह का समकालीन था लक्ष्मणसिंह। सिसोदियाओं के इन राजाओं को राणा कहते थे। लक्ष्मणसिंह चितौड की ज्येष्ठ शाखा के रावलों के रतनसिंह की सहायता के लिए दौडकर गया और अलाउद्दीन के साथ लडते हुए अपने सातों पुत्रों सहित मारा गया।

अब टॉड की गलती देखें। चितौड के रावल रतनसिंह हैं, लक्ष्मणसिंह नहीं। लक्ष्मणसिंह चितौड की गद्दी पर बैठा। परंतु, वह छोटा होने के कारण उसका काका भीमसिंह राजकाज चलाता था ऐसा टॉड कहता है और पद्मिनी भीमसिंह की पत्नी, ऐसा भी वह कहता है। वास्तविकता देखें भीमसिंह लक्ष्मणसिंह का दादा। अलाउद्दीन खिलजी के घेरे के समय लक्ष्मणसिंह को सात पुत्र थे। यह एकलिंग महात्म्य में भी कहा गया है।

पद्मिनी की आख्यायिका

टॉड, जोधपूर के सत्रहवीं शताब्दी के इतिहासकार नेणसी, मुसलमान इतिहासकार फरिश्ता (1610) और अकबर का चरित्रकार अबुलफजल इन सबने पद्मिनी की जनश्रुति सीधे-सीधे मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत (सन्‌1440) इस कपोलकल्पित हिंदी काव्य पर से ली है। और इसमें सबने अपनी-अपनी इच्छानुसार बदलाव भी किया है। उदाहरणार्थः अलाउद्दीन द्वारा दर्पण में पद्मिनी का चेहरा देखने का प्रसंग लें। राजपूतों ने इस बात को मान्यता दी, ऐसा टॉड कहता है। परंतु, मूल काव्य 'पद्मावत" में मजकूर इस प्रकार से है-

चितौड किले में रतनसिंह ने अलाउद्दीन का स्वागत किया, उसकी सेवा में दास-दासियां उपस्थित थे। परंतु, पद्मिनी उसे नजर नहीं आई। भोजनोपरांत रतनसिंह और अलाउद्दीन शतरंज खेलने बैठे। अलाउद्दीन ने अपने पास दर्पण रखा था। ऊपर झरोखे से पद्मिनी खेल देखने के लिए झांकेगी और उसका प्रतिबिंब दिखेगा ऐसी उसकी अपेक्षा थी। संयोगवश हुआ भी ऐसा ही। दासियों के कहने पर से कुतूहलवश पद्मिनी ने झरोखे का परदा हटाकर नीचे देखा। वह प्रतिबिंब अलाउद्दीन को दिखा। परंतु, वही पद्मिनी है इसकी विश्वनीयता अलाउद्दीन को नहीं थी। अंत में राघव चैतन्य नामक अपने सलाहकार से उसका वर्णन किया। वर्णनानुसार वही पद्मिनी होना चाहिए ऐसा राघवचैतन्य ने उसे बतलाया।

अर्थात्‌ राजपूतों ने पद्मिनी (या पद्मावती) का चेहरा दर्पण में देखने की अनुमति दी यह काव्य पर से भी सिद्ध नहीं होता। इतिहास बाबद बात करना ही व्यर्थ है।........

Friday, 22 December 2017

क्रिसमस - विश्व के विभिन्न देशों में - शिरीष सप्रे

क्रिसमस - विश्व के विभिन्न देशों में
शिरीष सप्रे

क्रिसमस एक ऐसा पर्व है जो सारी दुनिया में बडी धूमधाम से मनाया जाता है। क्रिसमस या बडा दिन का प्राचीन नाम 'यूल-टाइड" है और इस धार्मिक पर्व को मनाने की रीतियां हर स्थान पर भिन्न-भिन्न है। इस पर्व का महत्व इसलिए है क्योंकि, ईसा का जन्म दिन इसी दिन मनाया जाता है। प्राचीन काल में बडा दिन मनाने के लिए जो शीतकालीन उत्सव अपनाए गए थे उनमें बहुत से तो ईसाई धर्म के आरम्भिक कालीन रोमवासियों के जीवन से संबद्ध थे। रोमवासी 'सैटरनेलिया" नामका एक बडा पर्व 17 से 25 दिसंबर तक मनाया करते थे। इस उत्सव के दौरान दास मुक्त कर दिए जाते थे। ये दास फिर एक नकली राजा चुनकर हंसी-ठट्ठा करते थे। इस उत्सव के पश्चात एक गुडियों का उत्सव 'सिगिलेरिया" मनाया जाता था। उसके अंतर्गत एक मेला आयोजित किया जाता था। जिसमें बच्चों को भेंट में खिलौने दिए जाते थे। इन ऐतिहासिक उत्सवों के पश्चात जो विकास हुआ उसके अंतर्गत 25 दिसंबर का उत्सव मनाया जाने लगा। इसका आरम्भ शायद सम्राट आरिलियन ने अपने पारसी उपास्य सूर्य देवता मिथिरास के सम्मान किया था। इस उत्सव को अविजयी सूर्य का जन्मदिन कहा गया और इसी दिन से दिन बडे होना माना गया।

रोम व ग्रीसवासी अपने त्यौहारों में सदा हरी रहनेवाली झाडी हाली का प्रयोग करते थे इसका उद्देश्य इस विश्वास के साथ किया जाता था कि, यह दुष्टात्माओं से बचाएगी। मिस्टलेटो नामक पौधा समकालीन पंडितों द्वारा पवित्र माना जाता था। दंतकथाओं के अनुसार एक पवित्र वृक्ष से काटकर कांटों का हार बनाया जाता था। इस संदर्भ में बेरियां ईसा के रक्त से लाल हो जाती थी। प्राचीन ईसाई हाली को 'गुणी शाखा" या 'ईसा का कांटा" कहते थे। इस प्राचीन रीति की पहले चर्च ने निंदा की, फलतः इटली में इसका कम प्रचलन है। फ्रांस में यह कभी लोकप्रिय नहीं हुआ तथा छठी शताब्दी में स्पेन की चर्च काउन्सिल ने इस पर पाबंदी लगा दी। इंग्लैंड एवं जर्मनी ने इन प्रतिबंधों की परवाह नहीं की। अब तक इन देशों में यह प्राचीन रीति बडी सफलतापूर्वक धूमधाम से मनाई जाती है।

स्केन्डियन देशों में बडा दिन बडे विशाल समारोह से मनाया जाता है और कहीं इतने विशाल स्तर पर यह नहीं मनाया जाता। स्वीडन में यह 13 दिसंबर को ल्युशिया दिवस से शुरु होता है। इस दिन प्रकाश की रानी का भोज मनाया जाता है। स्टाकहोम में ल्युशिया तथा उनके अनुचरों के सम्मान में रात में जलती मशालों का जुलूस निकाला जाता है। समारोह का अंत टाउनहाल में एक भोज के बाद होता है। ल्युशिया दिवस का समारोह स्वीडन से अन्य देशों में भी गया। अमेरिका जहां स्केन्डेेवियायी देशों के बहुत से लोग रहते हैं, में यह उत्सव मनाया जाता है।

जैसे-जैसे बडा दिन निकट आता जाता है राजधानी की सडकें 'परिलोक" बन जाती हैं। बडे दिन के प्रतीकों से युक्त प्रकाशित मालाएं जहां-तहां इमारतों से लटकी नजर आती हैं। बडे दिन की रात्रि को डेनमार्क एवं नार्वे के चर्च विशेष प्रार्थना के लिए लोगों से भर जाते हैं। प्रार्थना के बाद चर्च की घंटियां मधुर ध्वनि से बडे दिन के आगमन की शुभ सूचना देती हैं। समस्त स्केन्डियन देशों की बडे दिन की रात्रि को सान्ताक्लास का आगमन होता है। इसी दिन शाम को भेंट-पार्सल खोले जाते हैं। स्वीडन में दिन निकलने से पूर्व बडे दिन की प्रार्थनाएं शुरु होती हैं। चर्च में सैंकडों मोमबत्तियां जलाकर प्रकाश किया जाता है। 

जर्मनी में बडा दिन सारे त्यौहारों एवं उत्सवों में शानदार माना जाता है। बडे दिन से पूर्व यानी 24 दिसंबर की शाम की बच्चे-बुढ़े सभी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। एक छोटी सी घंटी की मधुर ध्वनि के साथ शाम को पिता घर के एकत्रित सदस्यों के सामने क्रिसमस कमरे का द्वार खोलते हैं। कमरे के बीच में एक क्रिसमस का पेड जिसमें सुंदर शीशे की गेंदें होती हैं, नकली चमकीले तारों से युक्त होता है। पेड में नारंगियां, सेब, सुनहरे मेवे, खिलौने तथा मिठाइयां लगी होती हैं। मोमबत्ती प्रकाश से चमकते पेड के इर्दगिर्द परिवार एकत्रित होता है। बच्चे यह तय ही नहीं कर पाते कि पेड को निहारें कि भेंट के पार्सल खोलें। पिता सेंट ल्युक की गास्पेल से प्रार्थना पढ़ते हैं और फिर पूरा परिवार 'साइलेंट नाइट, होली नाइट" का प्राचीन और प्रिय समवेत गान गाते हैं। इस गान के द्वारा वे पृथ्वी पर शांति एवं मनुष्यों में सद्‌भाव की कामना करते हैं।

अमेरिका में 25 दिसंबर से कुछ पूर्व और कुछ दिन बाद तक खुशी और मस्ती का वातावरण रहता है। अमरिकी इसे 'क्रिसमस" स्प्रिट"कहते हैं। दुकानें आकर्षक भेंटों से भरी रहती हैं। भेंटों के बोझ से दबे ग्राहक इस दुकान से उस दुकान तक दौडते रहते हैं। क्रिसमस का सान्ताक्लास गली के कौने में अपनी घंटियां बजाता हुआ असहायों की सहायतार्थ निमंत्रण देता रहता है। छोट-छोटे बच्चे सान्ताक्लास के कानों में अपनी इच्छाएं जाहिर करते हैं। हर जगह पर लाल चेहरेवाला, मुस्कराता, बर्फ की तरह सफेद गुलमच्छोंवाला तथा लाल कपडे पहना बूढ़ा दयालुता का ऐसा प्रतीक माना जाता है जो वर्ष में एक बार बच्चों के लिए प्रसन्नता का तथा बडों के लिए ह्रदय को सांत्वना प्रदान करनेवाली यादों का अवसर लाता है। 

बहुत लंबे समय से अमेरिकी बडे दिन को ऐसे मनाते आए हैं जो उनकी विविध संस्कृतियों-रीतियों का यथेष्ट परिचय देता है। प्राचीन स्पेनियों के कीमती प्रदर्शन एवं जर्मनों के कलात्मक प्रदर्शन का विचित्र अभूतपूर्व सामंजस्य इस अवसर पर अमेरिका में मिलता है। दक्षिण पूर्वी क्षेत्रों में, जहां बहुत से अमेरिकी, स्पेनी, मैक्सिकी और अमेरिकी इंडियनों की संतानें हैं, रीतियां बदल जाती हैं। प्राचीन इंडियन और आधुनिक क्रिश्चियन रीतियां परस्पर मिल जाती हैं तथा कबीली उत्सव संबंधी नृत्यों के बाद आधी रात में कैथोलिक चर्च में प्रार्थना होती है। गलियां फूलों की खुशबु से महकने लगती हैं। बल्बों तथा बहुरंगी मोमबत्तियों के प्रकाश बहुत से घरों के सामने इंद्रधनुषी छटा बिखेरने लगते हैं। 

Friday, 1 December 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 4 भाग 2 - 'ऊँ" शिरीष सप्रे

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 4   भाग 2 - 'ऊँ"
शिरीष सप्रे

यदि भारतवासियों को अपने अध्यात्म का एक ही प्रतीक विश्व के सामने प्रस्तुत करना हो तो वह है 'स्वस्तिक" और उसके नाभिस्थल में 'ऊँ" को दर्शाना चाहिए। यह 'ऊँ" केवल शब्द नहीं है। शब्द के रुप में उसे लिखा भी नहीं जाता 'ऊँ" चित्र है। निशब्द की यात्रा में शब्द छूट जाता है और चित्र उभर आता है। वैदिक वाड़्‌मय सदृश्य धर्मशास्त्र, पुराण और आगम साहित्य में भी ओंाकार की महिमा सर्वत्र पाई जाती है। इसी प्रकार बौद्ध और जैन संप्रदाय में भी सर्वत्र ओम के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्त की गई है। 'ऊँ" ही ब्रह्म है। 'ऊँ" ही प्रत्यक्ष जगत है। 'ऊँ" ही इसकी अनुकृति है। पद्मासन में बैठकर इसका जाप करने से मन को एकाग्रता और शांति प्राप्त होती है। वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों का कथन है कि, ओम के पाठ में दांत, नाक, जीभ सबका प्रयोग होता है जिसके कारण हार्मोनल स्त्राव कम होता है तथा ग्रंथि स्त्राव को कम करके यह शब्द कई रोगों से रक्षा और कुंडलिनी को जागृत करता है।

जैसाकि पूर्व में ही कहा गया है कि, 'ऊँ" के तीन खंड हैं 'अ", 'उ", 'म"। संस्कृत से निषपन्न सभी भाषाओं का प्रथम स्वर 'अ" है। 'अ" आश्चर्य का द्योतक है। जब कोई व्यक्ति बोलते-बोलते अटक जाता है तो वह 'अ", 'अ" ही का उच्चारण करता है। आनंद के समय भी 'अ" की ही ध्वनि निकालता है। 'अ" से पूर्व कोई भी वर्ण होठो से नहीं निकल सकता। यदि किसी वर्ण से 'अ" का लोप कर दिया जाए तो वह वर्ण से सीधा व्यंजन बन जाता है। इसलिए ओम का प्रथम स्वर 'अ" को मानना भाषा के संपूर्ण रचना तंत्र को 'ओम" से संबद्द करना है। सृष्टी के आरंभ में जब ईश्वर ने ऋषियों के ह्रदयों में वेद प्रकाशित किए तो हर एक शब्द से संबंधित उनके निश्चित अर्थ ऋखियों ने ध्यानावस्था में प्राप्त किए। 'ऊँ" बोलने से शरीर के विभिन्न भागों में कंपन होते हैं जैसेकि 'अ" शरीर के निचले हिस्से (पेट), 'उ" से मध्य भाग (छाती) और 'म" से शरीर के ऊपरी हिस्से (मस्तिष्क) में कंपन होता है।

जब पाणिनी ने शिव का डमरु नाद सुना तो उसके नाद मेें उन्हें चौदह सूत्र सुनाई दिए। सारे सूत्रों का शिरोमणि 'अ" बना और इस  'अ" के हटते ही शब्द की पूर्णता को लंगडी खानी पडती है। 'अ" की पहले की हद को स्वीकारने के कारण ही श्रमण परंपरा ने अपने धर्मचक्र प्रवर्तकों को अर्हत या अरिहंत कहना उचित माना। वे तीर्थंकर की विरुदावली गाते समय प्रारंभ 'णमो अरिहंताणां" से करते हैं।  'ऊँ" का 'अ" श्रमण परंपरा के अनुसार अरिहंत का वाचक है। इसलिए 'ऊँ" अर्हत मनीषा का मूल प्रतीक है। संपूर्ण ओम' में 'ऊ" ही ऐसा स्वर है जिसके उच्चारण से शरीर के सारे अवयव प्रभावित और स्पंदित होते हैं।

यदि कोई व्यक्ति मानसिक तनाव से घिर जाए तो उससे मुक्ति पाने के लिए 'ऊँ" का जोर-जोर से उच्चार करे। 'ऊँ" का उच्चारण इस प्रकार करें मानो वह सिंहनाद कर रहा हो। यह प्रयोग आश्चर्यचकित कर देनेवाला है। शरीर पसीना पसीना होने लगेगा। जब 'ऊँ" 'ऊँ" करते थककर चूर हो जाएं तो शांत हो जाइए। पहले कुछ क्षणों तक तो बोलें पश्चात शांत हो पडे रहें। 'ऊँ" का यह वेदना मुक्ति के लिए किया जानेवाला मंत्रयोग है, ध्यान का एक मार्ग है। यह प्रक्रिया एक नवीनता देगी। आप शरीर और मन को स्वस्थ पाएंगे। विज्ञान ने भी 'ऊँ" के उच्चारण और उसके लाभ को प्रमाणित किया है। यह धीमी, सामान्य और पूरी सांस को छोडने में सहायता करता है। यह हमारे श्वसन तंत्र को विश्राम देता है और नियंत्रित करता है। मन-मस्तिष्क को शांत करने में भी लाभप्रद है। 'ऊँ" के मंत्र से शरीर और मन को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। ह्रदय की धडकन और रक्त संचार व्यवस्थित होता है। इसका उच्चारण करनेवाला और इसे सुननेवाला दोनो ही लाभांवित होते हैं। प्राणायम में भी 'ऊँ" का बहुत महत्व है। आजकल डॉक्टर भी अपने रोगियों को प्राणायाम करने की सलाह देते हैं।


'ऊँ" का अंतिम वर्ण 'म" है। 'म" व्यंजन का अंतिम सोपान है, जो 'अ" से आरंभ हुआ 'ऊ" की ऊंचाइयों को छुआ और 'म" तक पहुंचा। उसमें मंजिल पा ली। 'अ" से 'म" की यात्रा 'ओम" की यात्रा है और 'ऊँ" से कभी पृथक नहीं हो सकता। परमात्मा 'ऊँ' में ही समाया हुआ है। ब्रह्म बीज है यह। 'ऊँ" से ही हैं धर्म प्रवर्तकों की रश्मियां। 'ऊँ" सबसे विराट है। 'ऊँ" से विराट हुआ नहीं जा सकता। इसलिए जो 'ऊँ" हो गया वह 'अरिहंत" हो गया, 'ओम" होना ही 'हरिओम" होना है। 'ऊँ" से ही यात्रा शुरु होती है और 'ऊँ" पर ही समाप्त होती है। जो 'ऊँ" अक्षर रुपी ब्रह्म का उच्चारण करते हुए शरीर को त्यागता है वह परमगति को प्राप्त करता है। 'ऊँ" ब्रह्मांड का नाद है और मनुष्य के अंतर में स्थित ईश्वर का प्रतीक है। ''ऊँ"कार (ऐहिक वैसे ही पारमार्थिक) उभय वैभव प्राप्त करवा देनेवाला एक अपूर्व मंत्र है। संसार और परमार्थ दोनो को जोडनेवाला यह पुल है।"