Saturday, 25 November 2017

इत्र इतिहास के आइने में अर्पिता सप्रे

इत्र इतिहास के आइने में   
अर्पिता सप्रे

विश्व को इत्र निर्मिती भारत ने ही सीखाई है। भारत में इत्र का इतिहास उतना ही पुराना है जितने कि वेद। सत्रहवीं शताब्दकी के अंत तक यूरोप में इत्र का निर्माण तक शुरु नहीं हुआ था। इसके बाद ही यूरोप में इत्र बनाने के प्रयास हुए। रानी नूरजहां ने ही पहली बार गुलाब के इत्र का निर्माण करवाया। जिसका नाम 'इत्र-ए-जहांगीर" रखा और इसके लिए फ्रांस से निपुण कारीगरों को बुलवाया। ये कारीगर आकर कन्नौज में बस गए और कन्नौज इत्र की राजधानी में तब्दील हो गया। संभवतः इस इत्र की निर्मिती सन्‌ 1612 ई. में अपने विवाह के अवसर पर की थी। भारत, फ्रांस और इटली में आरंभ हुआ यह इत्र का व्यवसाय बाद में पूरे विश्व में फैल गया।

फूलों का सिरमौर, सौंदर्य और प्रेम का प्रतीक गुलाब से संगीत, शिल्प, कथाएं, कविताएं, साहित्य सभाएं सभी महक रही हैं। गुलाब का इन सभी में मनोहारी एवं सुंदर चित्रण, वर्णन है। कोई सा भी धार्मिक उत्सव हो या समारोह सभी में गुलाब की उपस्थिति अनिवार्य सी ही है। ऐसे इस गुलाब का अस्तित्व अति प्राचीन है। वैज्ञानिकों द्वारा किए शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि आज से ढ़ाई करोड वर्ष पूर्व से इस विश्व में गुलाब विद्यमान है। सुमेरियन राजा सारगोन प्रथम सबसे पहले गुलाब टर्की से अपने देश मंें लाया। पारसियों के धार्मिक ग्रंथ अवेस्ता में धार्मिक प्रतीक के रुप में गुलाब का जिक्र मिलता है। हजारों वर्ष पुराने चीनी साम्राज्य में भी गुलाब को ऊंचा स्थान प्राप्त था।

चीन में गुलाब से इत्र तैयार किया जाता था।लेकिन इसका उपयोग कुछ ही लोगों तक सीमित था। रोम निवासी ई. पू. से ही गुलाब के बारे में जानते थे और गुलाब के प्रशंसक थे। रोमनिवासी केवल घरों की शोभा बढ़ाने के लिए ही नहीं बल्कि अपने बिस्तरों और स्नानघरों में भी गुलाब की पंखुडियों का प्रयोग करते थे। महिलाएं अपनी सौंदर्य वृद्धि के लिए नहाने के पानी में गुलाब की पंखुडियों और कलियों का उपयोग करती थी। रोम में पर्व या उत्सव के लिए काफी गुलाब लगते थे इसके लिए गुलाब के बगीचे इटली में ही नहीं अपितु गर्म जलवायु वाले प्रदेश इजिप्ट में भी फैले हुए थे। जहां से गुलाब के फूल नावों द्वारा लाए जाते थे। रोमन सम्राट नीरो को गुलाब के फूल इतने प्रिय थे कि उसके महल में गुलाब की पंखुडियां बिखरी पडी रहती थी। रानी के बिस्तर और रजाइयों में पंखुडियां भरी रहती थी।

तेरहवीं शताब्दी में फूलों की मांग इतनी बढ़ गई कि फूल उत्पादकों को रविवार की भी छुट्टी नहीं मिलती थी। इस समय गुलाब को स्वर्गदूत समझा जाता था। जो बालकों के लिए ईश्वर का आशीर्वाद लेकर आता था। इसलिए यह निर्णय लिया गया कि चर्च का निमार्ण उस स्थान पर किया जाए जहां गुलाब हो। बारहवीं शताब्दी में क्रुसेडर्स (धार्मिक योद्धा) द्वारा गुलाब को सेंट्रल और उत्तरी यूरोप में लाया गया। सोलहवीं शताब्दी तक गुलाबों के उद्यान लगाना एक फैशन हो गया। वानस्पतिक शौक के लिए गुलाब की विभिन्न किस्में बगीचों में लगाई जाने लगी। इस काल में गुलाब शोभा की वस्तु ना होकर उत्सुकता का विषय हो गई। लोग गुलाब की सूखी टहनियों (पत्तियों) से भरी थैली अपने शरीर पर लटकाते थे। ऐसा वे बुरी आत्माओं से बचने के लिए करते थे।

चीन में गुलाब की खेती एक आदर्श और सफल व्यवसाय था। यूरोपवासी गुलाब उत्पादन से 1789 तक अनभिज्ञ ही थे। यूनानी कवि गुलाब के गुणगान गाते थे। प्राचीन यूनान में हर जगह पर गुलाब की खेती होती थी। यूनानी उपनिवेशकों ने सीसली और अफ्रीका का गुलाब से परिचय कराया। गुलाब से जुडी हुई अनेक कथाएं हैं। सन्‌ 1580 में एशिया माइनर के पीले गुलाब की किस्म यूरोप पहुंची। इन दिनों यूरोप में लाल और सफेद गुलाब बहुतप्रिय थे। सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हॉलैंड यूरोप का प्रमुख गुलाब उत्पादक केंद्र था। गुलाब के इतिहास में वर्ष 1804 एक प्रमुख वर्ष है। इस वर्ष सम्राट नेपोलियन प्रथम की रानी जासफीन ने माइल माइसन में गुलाब का सुंदर बगीचा लगाया। इस उद्यान में अपने समय के सभी गुलाब उपलब्ध थे।

भारत में गुलाब बागवानी बहुत बाद में शुरु हुई। वैसे हिमालय में जंगली गुलाब अपनेआप उगते थे। संस्कृत में गुलाब को स्थल कमल, अति मंजुल, तरुणपुष्प आदि नामों से संबोधित किया गया है। मुगलकाल में भारत में गुलाब का प्रचलन काफी बढ़ गया। मुगल सम्राटों को गुलाब बहुत प्रिय थे। उन्होंने गुलाबों के बडे-बडे उद्यान लगाए। नूरजहां को गुलाब से विशेष प्रेम था। वह गुलाब से भरे सरोवर में स्नान किया करती थी। मध्यकालीन कवियों ने अपने कवित्व की माला में गुलाब को पिरोया। भारत के गुलाब के इत्र का अपना एक अलग ही महत्व है। ऐतिहासिक काल में राजा-महाराजा ही केवल इत्र का प्रतिदिन उपयोग कर सकते थे। गुलाब के इत्र और गुलाब पानी का उपयोग करना मुगल सम्राटों की ही बपौती थी। तब फूलों का अर्क या तेल निकालकर, चंदन के तेल में मिलाकर ही इत्र बनाए जाते थे। 

नए जमाने में इत्र इस तरीके से नहीं बनाया जाता अब न तो इसमें फूलों का तेल होता है, न चंदन का तेल। इन्हें सुगंधि मिश्रण या इंडस्ट्रियल परफ्यूम कहना उचित होगा। इनकी माफिक कीमतों के कारण तीज-त्यौहारों में आम आदमी भी इनका उपयोग कर सकते हैं। पुराने जमाने से कन्नौज इत्र के लिए प्रसिद्ध है। ये इत्र महंगे होने के कारण इन असली इत्रों की कीमत चुकाना केवल अमीर लोगों के बस की ही बात है। इस कारण हमारे यहां नियमित रुप से इत्र लगाने की प्रथा नहीं है। वर्तमान में विदेशी परफ्यूम्स, स्प्रे, सेंट कॉलोन आदि चलन में हैं। एक समय में सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी रही कन्नौज के इत्र का स्थान विश्व भर में प्रमुख था। दिल्ली, लखनऊ और पटियाला के इत्र भी प्रसिद्ध रहे हैं। भारत में आज भी उत्तरप्रदेश का स्थान इत्र उत्पादन में प्रमुख है। देव अर्चना से आरंभ हुआ इत्र का प्रयोग पहले औषधी के रुप में और बाद में नारियों के श्रंगार का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया। गुलाब के अलावा गेंदा, मेहंदी और मिट्टी का इत्र विशेष रुप से प्रसिद्ध है। मिट्टी के इत्र का इतिहास चार हजार साल पुराना है। कहा जाता है कि मिट्टी के इत्र की खुशबू से विचलित दिमाग शांत हो जाता है।

परंतु, करोडों के इस व्यवसाय की सुगंधित शीशियों में कैद सुगंध का आनंद कुछ लोग उठा नहीं सकते उनके उन पर इसका विपरीत प्रभाव पडता है। इत्रों के प्रति होनेवाली प्रतिक्रिया को पहले एलर्जी नाम दिया गया था लेकिन अब चिकित्सा विज्ञानी इसे रसायन संवेदशीलता कहते हैं। वैसे इस पर भी कोई सहमति हो नहीं पाई है कि इन रासायनिक इत्रों से दर्द किस प्रकार का होता है। कुछ रोगियों ने हर्जाने के मुकदमें जीते भी हैं। कुछ चिकित्सक इस विषय में विशेषज्ञता हासिल कर रहे हैं। सार्वजनिक स्थानों पर इत्र के उपयोग पर प्रतिबंध की मांग का इत्र उद्योग विरोध करता है। देखें आगे जाकर क्या होता है।

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