Saturday, 11 November 2017

बाह्याचार विरोधी संत कबीर - शिरीष सप्रे

बाह्याचार विरोधी संत कबीर
शिरीष सप्रे

भारत के धार्मिक एवं दार्शनिक इतिहास के पन्नों में महामनस्वी कपिल, कणाद, बुद्ध महावीर आदि कुछ नाम अंकित हैं, जिन्होंने परम्परा की परवाह अधिक ना कर सत्य के अनुसंधान एवं मानवता पर अपने ध्यान केंद्रित किए थे। इस क्रम में संत कबीर का नाम अनूठा है। अंधविश्वास, गलत रुढ़ियों, मानवता विरोधी विचारधाराओं तथा अज्ञान पर जितनी निर्भयता से करारी चोट कबीरदासजी ने की उतनी किसी ने नहीं की।

कबीर के युग में भी ढ़ोंग, बाह्याचार, कृत्रिमता और साम्प्रदायिकता बढ़ चूकी थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इन सबका खंडन किया। साम्प्रायिक पाखंडी विचारों और बाह्यचार की अधिकता ने उनमें वितृष्णा भर दी। सारी दुनिया जानती है कि कबीर के विचारों से कई लोग घबराते हैं, कारण है उनके अपने विचारों की दुर्बलता। यह सत्य है कि चोर को चांदनी अच्छी नहीं लगती। परंतु, सत्य का अपलाप भी तो संभव नहीं। कबीर के विचारों एवं सिद्धांतों को गूढ़, अगम्य, आदि कहकर जनता को उनसे दूर करने के प्रयत्न भी किए गए। परंतु, उनके विचारों की धारा को रोका ना जा सका बल्कि लोगों के मन में कुतुहल उत्पन्न हो गया और वे उनकी ओर मुडे। अंधकार कभी सूर्योदय को रोक सका है क्या? कबीर की तो सारी बातें तर्काधारित थी। सत्य की तो सदा विजय ही होती है।

कबीर हिंदू-मुस्लिम दोनों में के ही बाह्याचारों के घोर विरोधी थे। संत कबीर का सारा आग्रह धर्म, मजहब के बाहरी प्रतीकों की अपेक्षा आत्मशुद्धि और आचरण शुद्धि पर है। चरित्रबल ही आत्मबल है। देह मन के आधार पर व्यक्ति किसी भी धर्म या मजहब के अनेकानेक भेदों में पडकर गलतियां करता है। धर्म-मत की विभिन्नताओं का आधार भी बाह्याचार है। आत्मिक आचार, मर्म तो सबका एक ही है। चाहे मनुष्य हो या उनके मजहब, धर्म या मत। विधि-निषेध ही एक दूसरे को अलगाते हैं। कल्पित वर्ण एवं जाति के आधार पर मनुष्य-मनुष्य के बीच में ऊंच-नीच तथा छूत की भावना और मोक्ष एवं सत्य पर किसी कल्पित ईश्वरीय मत का एकाधिकार ये दो धारणाएं मानव समाज के लिए विष हैं। इन दोनों धारणाओं पर संत कबीर का करारा प्रहार है। मनुष्य-मनुष्य में जातिगत कोई भेद नहीं, यदि भेद है तो वह है आचार-विचार एवं रहन-सहन का। कोई भी व्यक्ति इनको सुधार कर महान हो सकता है। मोक्ष एवं सत्य पर किसी भी मत का एकाधिकार नहीं। मोक्षपथ के बिचौलिए सांप्रदायिक दलाल हटा देना चाहिए।
 
मोटे रुप में जिसप्रकार पहने हुए बाहरी वस्त्रों की भिन्नता में कपडों की डिजाईन, रंगो, आकार-प्रकार की भिन्नता कई प्रकार की हैं पर उन पहने हुए कपडों की भिन्नता के नीचे चमडी की भिन्नताएं, अपेक्षतया कम होती हैं और चमडी के नीचे की देह के अंदर मानसिक वृत्तियों में चमडी की भिन्नताओं से कम भिन्नता होंगी। रोना, हंसना, प्यार, घृणा के मूल भावों में सब एक समान हैं। बस उन्हें प्रकट करने के हाव-भाव, स्थान-स्थिति की भिन्नता से पृथक हो सकते हैं और अंततः आत्मिक स्तर पर सब एक अभिन्न धरातल पर आ खडे होते हैं। इसी आंतरिक धरातल पर चारित्रिक-शुद्धि पर बल देने से जातीय-मजहबी विभिन्नताएं समाप्त हो जाती हैं। क्योंकि, दोनों हिंदुओं और मुसलमानों ने अपना-अपना साहब और उसकी कल्पना भिन्न-भिन्न बना रखी है-

'न जाने तेरा साहब कैसा है। मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या तेरा साहिब बहिरा है? चिउंटी के पग नेवर बाजे, सो भी साहब सुनता है। पंडित होय के आसन मारै, लंबी माला जपता है। अंतर तेर कपट-कतरनी, सो भी साहब लखता है।" इन धार्मिक पद्धतियों का विरोधाभास और विडंबनाएं दिखाकर कबीर दोनों की सामाजिक-आर्थिक विभेदात्मक विडबंनाएं दिखाते हैं - 

'सतवंदी को गजी मिलै नहिं, वैश्या पहिरै खासा है। जेहि घर साधु भीख न पावे, भडुआ खान बतासा है।" इस एक ही पद में धर्माचारों के साथ सामाजिक व्यवहारों  को जोडने की मंशा से कबीर के अभिप्रेत पर सहज ही पहुंचा जा सकता है। ऐसे समाज और व्यक्तियों के सोच व्यवहार, बर्ताव के भ्रष्ट आचरणों पर कबीर को सख्त आपत्तियां हैं। व्यक्तियों की भांति समूचे समाज के चरित्र व्यवहार को कबीर नकारते हैं एवं मानवीय सद्‌ व नेक बर्तावों की जरुरत को महत्व देते हैं।

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे उनका जो भी ज्ञान था वह अनुभवजन्य था उसके दर्शन निम्न दोहों में होते हैं-

"तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखों की देखी।' उनका यह दोहा तो बहुत ही प्रसिद्ध एवं हितकारी है- निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाये। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।। अन्य बहुउपयोगी दोहे हैं -  जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय। जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।। लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट। पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट।। गुरु महिमा गान के समय हमेशा जिस दोहे का उद्धहरण दिया जाता है वह कबीर का ही है- गुरु गोविंद दोउ खडे काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।। कटु भाषा बोलनेवालों को यह दोहा सुनाया जाता है- ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।। समय की पाबंदी के लिए यह दोहा है- काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।। अंत में यह दोहा- सांई इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये। मैं भी भूखा ना रहूं, साधू ना भूखा जाये।। 

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