Thursday, 9 November 2017

मिजाज बिगाड रहा है शोर - शिरीष सप्रे

मिजाज बिगाड रहा है शोर
शिरीष सप्रे

सभी स्थानों पर यह कैसा शोर-गुल और कोलाहल? कहीं टी. व्ही. का शोर तो, कहीं लाउड स्पीकर की तेज आवाज, मोटर गाडियों, कल-कारखानों की तेज आवाजें। घरों में गृहिणियों द्वारा चलाए जानेवाली मिक्सियों की ध्वनि। दो मिनिट शांति से बैठ भी ना सकें और मोबाईल या टेलीफोन की घंटी। अचानक ही साइलेंसर विहिन दोपहियों की तेज आवाजें भी गाहेबेगाहे सुनने में आ ही जाती हैं। हवाई जहाज की आवाज, ट्रेन की आवाजें। लगता है जैसे सभी जबरदस्त ध्वनि प्रदूषण फैलाने में जोर शोर से लगे हुए हैं बिना किसी ऐसे एहसास कि इसके क्या दुष्परिणाम होंगे। शोर कम करना शायद हम लोग सीखे ही नहीं हैं। लाडस्पीकर पर जोर-जोर से भजन सुने, गाए बगैर हमें मजा ही नहीं आता। इसी कडी में जोर शोर से लडना भी शामिल है।

लेकिन,शायद आप जानते ही न हों कि यह शोर कितना हानिकारक है? लगता है हमें शोरगुल की आदत सी ही पड गई है और जाने-अनजाने हम सब इसकी गिरफ्त में जकडे हुए हैं। हम इस शोर को अपने जीवन का स्वाभाविक अंग मान बैठे हैं। यहां तक कि हमें इस विचार से राहत मिलती है कि शोर मतबल हमारे आसपास कोई है। इसलिए कि, पडौसी का रोता बच्चा, पास की किसी बिल्डिंग में चलती ड्रिलिंग मशीन का शोर, फेरीवाले की आवाज, यातायात की ध्वनियां ये सब हमारी चेतना को मारती हैं। हम में से अधिकतर यह जानते ही नहीं हैं कि, शोर हमारे मस्तिष्क में वहीं दर्ज होता है जहां भय, आक्रमण और सुरक्षा के केंद्र हैं और अंततः हमारी चेतना को कमजोर बनाते हैं। पर्यावरणवादियों के अनुसार आनेवाले समय में ध्वनि प्रदूषण विकासशील देशों में बीमारियों का सबसे बडा कारण होगा।
विश्व में सर्वाधिक शोरगुल में लिप्त हम भारतीय लगता है कि, इस भयानक स्थिति के संबंध में जरा भी चिंतित नहीं हैं। औद्योगिक शोर भी एक बहुत बडा खतरा है। लेकिन अफसोस है कि कारखानों में उत्पन्न शोर को नियंत्रित करने की कोई कोशिश नहीं की जाती है जिसके कारण औद्योगिक पेशे से जुडे श्रमिकों में बहरेपन के प्रकरण मुंबई और चेन्नई में किए गए अध्ययनों के दौरान देखने में आए हैं। संगीत के शौकिनो के लिए भी ध्वनि प्रदूषण के कारण कठिनाइयां खडी हो सकती हैं। यदि वे लगातार चार घंटे तक रॉक संगीत सभा को सुनें। लेकिन इन ध्वनि प्रदूषणकर्ताओं पर किसी तरह की निषेधात्मक कार्यवाही होते नजर नहीं आती। अंतर राष्ट्रीय मापकों के अनुसार ध्वनि प्रदूषण से बच्चों को बचाने के लिए छोटे बच्चों के स्कूल ऐसे स्थान पर होने चाहिएं जहां ध्वनि का स्तर केवल 20-25 डेसिबल हो मगर दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं है और बचपन से ही उनकी श्रवण क्षमता पर असर पडने लगता है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार हर समुदाय का अपना एक शोर का वातावरण होता है। सामाजिक रुप से भी देखा गया है कि समृद्ध और शिक्षित वर्ग के लोग अपेक्षाकृत कम शोर करते हैं। वास्तव में किसी प्रकार के निवारक उपाय न होने के कारण भारत के शहर पश्चिमी देशों की अपेक्षा कहीं अधिक ध्वनि प्रदूषित हैं। मुंबई के कुछ क्षेत्रों ने तो सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं। वहां के कई लोग गंभीर रुप से प्रभावित हो रहे हैं। वास्तव में हम भारतीय मूलतः शोर मचानेवाले लोगों में ही हैं और इस मामले में असंवेदनशील हैं। योरोप में तो मल्टी स्टोरिड बिल्डिंगों में देर रात नहाने पर एक तरह के अघोषित कर्फ्यू का पालन किया जाता है ताकि नल से गिरते पानी की आवाज से पड़ौसी परेशान न हों। जबकि हमारे यहां तो मंदिरों-मस्जिदों में चलनेवाले लाउडस्पीकर युद्ध के कारण साम्प्रदायिक दंगे तक भडकने की बातें सामने आई हैं।

अब हम यह जान लें कि शोर क्या है? जो ध्वनियां सुनने में अप्रिय लगती हैं वे शोर या कोलाहल हैं। चिकित्सा विज्ञानियों ने भी अप्रिय ध्वनि को शोर कहा है। शोर या ध्वनि प्रदूषण को इस प्रकार भी परिभाषित किया जा सकता है कि, जो श्रोताओं को अरुचिकर लगे। एक पुरानी कहावत के अनुसार किसी प्रकार की ध्वनि या तो संगीत है या फिर शोर। यूं भी कह सकते हैं कि, जो ध्वनि कर्णप्रिय है, सहज है, वह संगीत है और जो कर्कश है, कष्टदाई है, वह शोर है। शोर के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह एक खिजानेवाली चीज है जो जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। अपने सबसे बुरे रुप में यह एकाग्रता को भंग करके, उत्पादकता में कमी लाती है। यह अवसाद, तनाव और बहरेपन का कारण भी है। लेकिन खेद है कि ध्वनि प्रदूषण पर हमारी चेतना जागृत नहीं है। ध्वनि प्रदूषण का एक प्रमुख कारण कारों का हॉर्न बजाना भी है जिसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव अस्पतालों पर पडता है।


अब चूंकि, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी पर्यावरण अधिनियम में सुधार कर लिया है जिसके अंतर्गत अब हवा की गुणवत्ता और ध्वनि प्रदूषण के मानकों के उल्लंघन के लिए लोगों पर मुकदमा चलाया जा सकता है। अगर ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे पर जनआंदोलन शुरु हो जाएं तो मौन क्षेत्रों (साइलेंस जोन्स) को कडाई से लागू करके नियमों का उल्लंघन करनेवालों पर दंड किए जा सकेंगे। वर्तमान में हर स्थान पर ध्वनि का तीव्रता तेज गति से बढ़ती जा रही है। अगर इसी रफ्तार से बढ़नेवाले ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो आनेवाले वर्षों में बहरों की संख्या में अत्याधिक वृद्धि दिखेगी। अब सबकुछ सरकार पर छोडने के स्थान पर शोर कम करने के लिए हमें भी सहयोग देना चाहिए।

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