Friday, 3 November 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 3 - श्री शिरीष सप्रे

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 3 - श्री  - शिरीष सप्रे

भारतोद्‌भव धर्मों (सनातनी, जैन, बौद्ध, सिख) एवं संस्कृति में 'श्री" का प्रयोग सर्वव्यापक है। संज्ञा के रुप में 'श्री" का अर्थ हुआ प्रकाश, चमक, कांति, वैभव या शान, सुंदरता, गौरव, या परमेश्वर का गुणगान, आदरणीय और श्रीमान, समृद्धता, समृद्धि आदि। विशेषण के रुप में भी 'श्री" का प्रयोग किया जाता है ः योग्य, शुभ, दीप्तीमान, उज्जवल, अतिउत्तम। किसी व्यक्ति के नाम के सम्मुख पहले श्री लिखा जाता है। अर्थात्‌ यह व्यक्ति श्री से युक्त हो। श्रीहत ना हो। श्री शुभकामना का एक संक्षिप्त रुप है। किसी भी कार्य को आरंभ करने के पूर्व श्री लिखना यश और शुभ लक्षणों का सूचक माना जाता है। विभिन्न मतों में श्री का एक ही अर्थ ग्रहण किया जाता है और वह है शोभा, सुंदरता और समृद्धि से युक्त होना। सौंदर्य रुप में भी श्री का प्रतिकार्थ ग्रहणीय है। धर्म, अर्थ एवं काम का त्रिवर्ग है 'श्री"।

श्री देवी लक्ष्मी का एक नाम है साथ ही वह देवी सरस्वती के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। श्री का अर्थ समृद्धि के देवता गणेशजी से भी लिया जाता है। अनेक देवी-देवताओं का आदरपूर्वक उल्लेख करते समय श्री उपयोग में लाया जाता है जैसेकि, श्रीदुर्गा, श्रीराम,श्रीकृष्ण। विभिन्न भारतीय भाषाओं में श्री लिखने के विविध प्रकार हैं। परंतु,  संस्कृत, हिंदी, मराठी, भोजपूरी, नेपाली में श्री समान रुप से उपयोग में लाया जाता है। श्री का प्रयोग हमारी संस्कृति में इतना व्यापक है कि एक शास्त्रीय राग जो कि पुरुष राग है का नाम ही रागश्री है। अन्य राग हैं धनश्री, बागेश्री, मालाश्री, जयंतश्री, आदि। कुछ नगरों के नामों में भी श्री प्रयोग में लाया जाता है। जैसेकि, श्रीनगर, श्री गंगानगर, श्रीपेरम्बदूर, श्रीकाकुलम, श्री जयवर्धनपूर श्रीलंका की प्रशासनिक राजधानी, इंडोनेशिया के सुमात्रा का एक राज्य की राजधानी श्रीविजय आदि।

पंजाबी में प्रयुक्त किया जानेवाला अभिवादन सूचक शब्द है सत श्री अकाल जो भारतीय सेना के रणनादों में से एक है और भारतीय चलचित्रों में भी सर्वाधिक चित्रित किया गया है। सत श्री अकाल का अर्थ है - सत यानी सत्य, श्री एक सम्मानसूचक शब्द और अकाल का अर्थ है समय से रहित यानी ईश्वर अर्थात्‌ ईश्वर ही सत्य है। धार्मिक ग्रंथों के साथ भी श्री शब्द उपयोग में लाया जाता है जैसेकि, श्री गुरुग्रंथ साहिब, श्री रामचरित्‌मानस आदि। ओम श्री गणपतये नमः से पूर्वकाल में शिक्षा प्रारंभ की जाती थी। दोष या बाधा निवारण के लिए श्री यंत्र उपयोग में लाया जाता है।

हमारी संस्कृति के सामाजिक शिष्टाचारों में श्री शब्द का प्रयोग श्री, श्रीमान और श्रीमति शब्दों में भी हुआ है जिनका बडा महत्व है।  आमतौर पर श्री और श्रीमान शब्द पुरुषों के साथ लगाए जाते हैं और श्रीमति महिलाओं के लिए। परंपरानुसार श्री और श्रीमान तो पुरुष विवाहित हो या अविवाहित दोनो के लिए ही प्रयुक्त होता है परंतु, श्रीमति केवल विवाहित महिलाओं के लिए ही प्रयुक्त होता है और अविवाहिता के लिए सुश्री शब्द लगाना प्रचलन में है। श्रीमान या श्रीमत संज्ञा भगवान विष्णु को लगाई जाती है। श्री स्त्रीवाची शब्द है और लेख के प्रारंभ में ही हमने श्री के जो अर्थ बतलाए हुए हैं वे सब श्री में ही समाहित हैं अतः सारा संसार ही श्री का आश्रय लेता है। श्री के साथ रहने के कारण ही भगवान विष्णु को श्रीमान कहा गया है। इसीलिए श्रीमत्‌ हुए। भावार्थ यह है कि, कण कण में ईश्वर व्याप्त है। श्री तो स्वयंभू हैं। श्री का जन्म संस्कृत की 'श्रि" धातु से हुआ है जिसमें धारण करना, शरण लेना जैसे भाव हैं। स्त्री ही वह शक्ति है जो सबकुछ धारण करती है, जो सृष्टि के मूल में है इसलिए उसे श्री कहा गया है। 'श्री" शब्द  वैभव, कीर्ति, यश का द्योतक है। यह शब्द शोभा, सौंदर्य, गौरव, कांति व चमक को दर्शाता है। शुभपत्रों का आरंभ 'श्री" शब्द से ही होता है। 

वेदों में श्री का उल्लेख पर्याप्त मिलता है। अथर्ववेद में श्री का उल्लेख पृथ्वी माता के रुप में है। ऋगवेद में श्री शब्द को लक्ष्मीजी का रुप दिया गया है। यजुर्वेद में श्री व लक्ष्मीजी दोनो को विष्णु देवता की पत्नी का दर्जा दिया गया है। समस्त उत्सव, मांगलिक पर्वों में श्री का उच्चारण किया जाता है। तंत्र-मंत्र माननेवाले इसे आंतरिक समृद्धि, सौंदर्य तथा उन्नति के रुप में मान्यता देते हैं।

ऋगवेद में श्री का उल्लेख 'श्री सूक्त" के रुप में मिलता है। जिसे 'श्री" और 'लक्ष्मी" से संबोधित किया गया है। इस सूक्त का पाठ धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसमें लक्ष्मी के सत्तर नाम हैं। इसमें वे हिरण्यवर्णा तो हैं ही लेकिन आदि ऋषि ने भूदेवी, ज्वलंती, हरिणी, मनोज्ञा और लक्ष्मी कहकर उनकी स्तुति की गई है। अर्थात्‌ वे धरती की देवी हैं, दीपमयी हैं, दुख हरनेवाली, हरेक के दुख-सुख को जाननेवाली और स्वजनों के उद्धार का उपाय सोचनेवाली हैं। लक्ष्मी का यही सच्चा स्वरुप है।  हिंदूधर्म में षोडशोपचार पूजा करते समय पुरुष सूक्त के समान ही श्री सूक्त भी कहा जाता है। ऋगवेद में श्री का अर्थ सौंदर्य है। ऋगवेद काल में भी श्री का तात्पर्य महत्व, प्रतिष्ठा और समृद्धि से था। शतपथ ब्राह्मण में श्री का मूर्त रुप भी सामने आया है। इसकी एक कथा में प्रजापति की 'श्री" उसके तापस द्वारा प्रकट की गई है, जो स्वर्ग की देवी की भांति दैदीप्यमान हो गई। यहां सौंदर्य की अमूर्त भावना दिव्य मूर्ति के रुप में परिणत हो गई। 'श्री" का प्रतीकार्थ हम ग्रहण करें और 'श्री" अनुरुप बनें, तभी श्री का प्रयोग सार्थक होगा।


श्री प्राप्ति की पौराणिक कथा यों हैं कि महर्षि दुर्वासा के शाप से श्रीहीन हो चूके इंद्रादि देवताओं से विष्णु ने सागर मंथन का परामर्श किया महकच्छप की आधारीत शिला, मंदराचल पर्वत की मथनी, वासुकी नाग की रस्सी। मथनी के एक ओर देवता, दूसरी ओर दानव। सागर मंथन हुआ। अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के साथ श्री भी बाहर आई। श्रीयुक्त होकर देवराज इंद्र फिर स्वर्ग के सिंहासन पर बैठे।

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