Sunday, 29 October 2017

अद्वितीय है नमक

अद्वितीय है नमक
शिरीष सप्रे

नमक हमारे प्रतिदिन के आहार का एक अविभाज्य अंग है। नमक के बगैर तो हमारे भोजन की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल सी ही है, भोजन स्वादहीन सा ही जो हो जाता है। यह हमारे जीवन पद्धति का अविभाज्य भाग सा ही है। विभिन्न गुणधर्मोंवाले नमक के कई प्रकार और अलग-अलग स्वाद हैं। नमक को लेकर कई हिंदी फिल्मों का नामकरण भीहुआ है जैसे नमक हलाल, नमक हराम तो, मुंशी प्रेमचंद जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार ने इस नमक को लेकर 'नमक का दरोगा" जैसी अमर कथा की रचना की है। गांधीजी का नमक सत्याग्रह भी प्रसिद्ध है। जिसके कारण गांधीजी दुनिया की नजरों में आए और इस आंदोलन को यूरोप-अमेरिका की प्रेस ने भी भरपूर कवरेज दी थी। मशहूर टाइम पत्रिका ने इसे दुनिया के दस सबसे बडे आंदोलनों में शामिल किया है। टाइम का कहना है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को इस आंदोलन से मजबूती मिली।

आज हमें आश्चर्य होगा किंतु इस साधारण से लगनेवाले नमक को लेकर 12 फीट (3.7मी.) ऊंची और लगभग 2300 कि.मी. लंबी एक बागड भारत में ब्रिटिशों ने खडी की थी, नमक की तस्करी को रोकने के लिए। जो उनकी इनलैंड कस्टम लाइन का एक भाग थी। 1803 में ब्रिटिशों द्वारा भारत से नमक की तस्करी को रोकने और उसके यातायात पर कर लगाने के लिए तत्कालीन पंजाब (मुलतान, वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा) से लेकर ओरिसा के सोनापूर गांव तक यह इनलैंड कस्टम लाइन खडी की गई थी। कुल 4000 कि.मी. लंबी यह कस्टम लाइन यानी भारतीयों के अधिकारों और मुक्त व्यापार नीति पर लगाया गया प्रचंड ऐसा मूर्त रुप था। उस जमाने में इस बागड की तुलना चीन की दीवार से की गई थी। नमक की चोरी करनेवाले तस्करों को रोकने के लिए ब्रिटिशों ने यह लाइन विकसित की थी। 1872 तक इनलैंड कस्टम विभाग में कस्टम अधिकारी, जमादार और गश्त लगाने वाले सामान्य रक्षक जैसे लगभग 14000 के आसपास लोग इस कस्टम लाइन की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए थे। 1879 में नमक के अंतरदेशीय आयात-निर्यात पर कर लगाया गया। जो सन्‌ 1946 तक चालू था। इसी नमक के कानून को तोडने के लिए गांधीजी ने उनकी विश्वप्रसिद्ध दांडी यात्रा निकाली थी। 

प्रतिदिन की रसोई के लिए उपयोग में आनेवाले इस नमक का भी एक बडा इतिहास है जो बडा ही रोचक भी है। नमक का शोध मानव संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी टप्पा माना जाता है। आश्चर्य होगा परंतु, इसको लेकर युद्ध तक हुए हैं, नमक की खोज के लिए अनेक अभियान भी हुए हैं। महाकवि होमर ने तो इसे 'डिव्हाईन सबस्टन्स" के रुप में गौरवान्वित किया हुआ है। बीसवी शताब्दी के प्रारंभ तक और आधुनिक भूगर्भशास्त्र द्वारा सिद्ध किए जाने तक तो पृथ्वी पर सर्वत्र नमक है यह ज्ञात ही नहीं था। भूगर्भशास्त्र और रसायन शास्त्र दोनो में ही नमक का महत्व अग्रक्रम पर रहा है। सॅलरी यानी वेतन शब्द साल्ट यानी नमक पर से ही रुढ़ हुआ है। इस नमक ने खाद्य संस्कृति तो निर्मित की ही साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में अपना सहयोग दिया है। धार्मिक कार्यों में भी नमक का महत्व है। तांत्रिक विधियों में भी नमक को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। धीरे-धीरे जिसका नमक खाया उसे धोखा देना नैतिक अपराध माना जाने लगा। 

मानव जीवन के लिए अमूल्य और उपकारी ऐसे नमक का शोध कोली समाज ने लगाया। सर्वप्रथम यह शोध कच्छ में लगा। कच्छ कारण साल्ट डेजर्ट के नाम से जाना जाता है। फिर धीरे-धीरे जहां अनुकूल किनारे और वातावरण था वहां नमक की खेती का उद्योग फैलने लगा। कोली समाज के जो परिवार नमक की खेती की ओर बढ़े उन्हीं में से आगरी समाज का उदय हुआ। कोली और आगरी मूलतः एक ही समाज के घटक। इनकी एकता बतलानेवाली पुराणकथा इस प्रकार है - अगस्त्य ऋषि के आंगले और मांगले ऐसे दो पुत्र थे और इनसे क्रमशः आगरी और कोली समाज का जन्म हुआ।

कच्छ के रण में लगभग 4 फीट गहराई तक नमक है और मीलों तक मिट्टी या जमीन दिखलाई नहीं पडती। नमक के कारण यहां की हवा भी शुष्क है। सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने आने-जाने के लिए नमक को बीच में से काटकर एक सडक का निर्माण किया है। एक और अद्‌भुत विशेषता इस स्थान पर देखने को मिलती है। वह है सामान्यतः दूर की वस्तुएं छोटी दिखलाई पडती हैं किंतु इस रेगिस्थान में दूर स्थित छोटीसी झाडी बहुत बडा पेड दिखाई पडता है। परंतु, जैसे-जैसे हम उसके निकट पहुंचते हैं वह झाडी छोटी दिखलाई लगने लगती है। रेगिस्थानी क्षेत्र होने के कारण बालू भरी आंधियां चलना स्वाभाविक है। जब यहां तेज हवाएं चलती हैं तो जैसे मधुर संगीत सुनाई देता है। प्रकृति की इन आश्चर्यजनक घटनाओं को देखकर किसी महान शक्ति के अस्तित्व में कोई संदेह नहीं रह जाता। भारत में प्रकृति की अनेक ऐसी अनेक अमूल्य धरोहरें हैं।

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