Sunday, 29 October 2017

अद्वितीय है नमक

अद्वितीय है नमक
शिरीष सप्रे

नमक हमारे प्रतिदिन के आहार का एक अविभाज्य अंग है। नमक के बगैर तो हमारे भोजन की कल्पना भी हमारे लिए मुश्किल सी ही है, भोजन स्वादहीन सा ही जो हो जाता है। यह हमारे जीवन पद्धति का अविभाज्य भाग सा ही है। विभिन्न गुणधर्मोंवाले नमक के कई प्रकार और अलग-अलग स्वाद हैं। नमक को लेकर कई हिंदी फिल्मों का नामकरण भीहुआ है जैसे नमक हलाल, नमक हराम तो, मुंशी प्रेमचंद जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार ने इस नमक को लेकर 'नमक का दरोगा" जैसी अमर कथा की रचना की है। गांधीजी का नमक सत्याग्रह भी प्रसिद्ध है। जिसके कारण गांधीजी दुनिया की नजरों में आए और इस आंदोलन को यूरोप-अमेरिका की प्रेस ने भी भरपूर कवरेज दी थी। मशहूर टाइम पत्रिका ने इसे दुनिया के दस सबसे बडे आंदोलनों में शामिल किया है। टाइम का कहना है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम को इस आंदोलन से मजबूती मिली।

आज हमें आश्चर्य होगा किंतु इस साधारण से लगनेवाले नमक को लेकर 12 फीट (3.7मी.) ऊंची और लगभग 2300 कि.मी. लंबी एक बागड भारत में ब्रिटिशों ने खडी की थी, नमक की तस्करी को रोकने के लिए। जो उनकी इनलैंड कस्टम लाइन का एक भाग थी। 1803 में ब्रिटिशों द्वारा भारत से नमक की तस्करी को रोकने और उसके यातायात पर कर लगाने के लिए तत्कालीन पंजाब (मुलतान, वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा) से लेकर ओरिसा के सोनापूर गांव तक यह इनलैंड कस्टम लाइन खडी की गई थी। कुल 4000 कि.मी. लंबी यह कस्टम लाइन यानी भारतीयों के अधिकारों और मुक्त व्यापार नीति पर लगाया गया प्रचंड ऐसा मूर्त रुप था। उस जमाने में इस बागड की तुलना चीन की दीवार से की गई थी। नमक की चोरी करनेवाले तस्करों को रोकने के लिए ब्रिटिशों ने यह लाइन विकसित की थी। 1872 तक इनलैंड कस्टम विभाग में कस्टम अधिकारी, जमादार और गश्त लगाने वाले सामान्य रक्षक जैसे लगभग 14000 के आसपास लोग इस कस्टम लाइन की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए थे। 1879 में नमक के अंतरदेशीय आयात-निर्यात पर कर लगाया गया। जो सन्‌ 1946 तक चालू था। इसी नमक के कानून को तोडने के लिए गांधीजी ने उनकी विश्वप्रसिद्ध दांडी यात्रा निकाली थी। 

प्रतिदिन की रसोई के लिए उपयोग में आनेवाले इस नमक का भी एक बडा इतिहास है जो बडा ही रोचक भी है। नमक का शोध मानव संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी टप्पा माना जाता है। आश्चर्य होगा परंतु, इसको लेकर युद्ध तक हुए हैं, नमक की खोज के लिए अनेक अभियान भी हुए हैं। महाकवि होमर ने तो इसे 'डिव्हाईन सबस्टन्स" के रुप में गौरवान्वित किया हुआ है। बीसवी शताब्दी के प्रारंभ तक और आधुनिक भूगर्भशास्त्र द्वारा सिद्ध किए जाने तक तो पृथ्वी पर सर्वत्र नमक है यह ज्ञात ही नहीं था। भूगर्भशास्त्र और रसायन शास्त्र दोनो में ही नमक का महत्व अग्रक्रम पर रहा है। सॅलरी यानी वेतन शब्द साल्ट यानी नमक पर से ही रुढ़ हुआ है। इस नमक ने खाद्य संस्कृति तो निर्मित की ही साथ ही मनुष्य के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में अपना सहयोग दिया है। धार्मिक कार्यों में भी नमक का महत्व है। तांत्रिक विधियों में भी नमक को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। धीरे-धीरे जिसका नमक खाया उसे धोखा देना नैतिक अपराध माना जाने लगा। 

मानव जीवन के लिए अमूल्य और उपकारी ऐसे नमक का शोध कोली समाज ने लगाया। सर्वप्रथम यह शोध कच्छ में लगा। कच्छ कारण साल्ट डेजर्ट के नाम से जाना जाता है। फिर धीरे-धीरे जहां अनुकूल किनारे और वातावरण था वहां नमक की खेती का उद्योग फैलने लगा। कोली समाज के जो परिवार नमक की खेती की ओर बढ़े उन्हीं में से आगरी समाज का उदय हुआ। कोली और आगरी मूलतः एक ही समाज के घटक। इनकी एकता बतलानेवाली पुराणकथा इस प्रकार है - अगस्त्य ऋषि के आंगले और मांगले ऐसे दो पुत्र थे और इनसे क्रमशः आगरी और कोली समाज का जन्म हुआ।

कच्छ के रण में लगभग 4 फीट गहराई तक नमक है और मीलों तक मिट्टी या जमीन दिखलाई नहीं पडती। नमक के कारण यहां की हवा भी शुष्क है। सीमा सुरक्षा बल के जवानों ने आने-जाने के लिए नमक को बीच में से काटकर एक सडक का निर्माण किया है। एक और अद्‌भुत विशेषता इस स्थान पर देखने को मिलती है। वह है सामान्यतः दूर की वस्तुएं छोटी दिखलाई पडती हैं किंतु इस रेगिस्थान में दूर स्थित छोटीसी झाडी बहुत बडा पेड दिखाई पडता है। परंतु, जैसे-जैसे हम उसके निकट पहुंचते हैं वह झाडी छोटी दिखलाई लगने लगती है। रेगिस्थानी क्षेत्र होने के कारण बालू भरी आंधियां चलना स्वाभाविक है। जब यहां तेज हवाएं चलती हैं तो जैसे मधुर संगीत सुनाई देता है। प्रकृति की इन आश्चर्यजनक घटनाओं को देखकर किसी महान शक्ति के अस्तित्व में कोई संदेह नहीं रह जाता। भारत में प्रकृति की अनेक ऐसी अनेक अमूल्य धरोहरें हैं।

Thursday, 19 October 2017

पर्वों का पर्व महापर्व है - दीपावली

पर्वों का पर्व महापर्व है - दीपावली
शिरीष सप्रे

उत्साह का पर्व है दीपावली, 'तमसोमा ज्योतिर्गमय" की भावना से जुडा हुआ 'प्रकाश पर्व" है 'दीपावली"। इस पावन मंत्र को लेकर आनेवाले कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्र्योदशी से लेकर शुक्ल पक्ष की दूज तक का पंचदिवसीय समय दीपावली के नाम से पुकारा जाता है। दीपों की कतार को प्रज्वलित करने का, जगमगाने का पर्व है दीपावली। वात्सायन कामसूत्र के अनुसार 'यक्षरात्रि" तथा राज मार्तंड के आधार पर 'सुखरात्रि" कहते हैं। निर्णय सिंधु काल तत्व विवेचन के अनुसार यह पर्व चतुर्दशी, अमावस्या और कार्तिक प्रतिपदा इन तीन दिनों तक मनाया जानेवाला कौमुदी उत्सव के नाम से प्रसिद्ध है।

प्राचीन संस्कृति को जीवित रखने के लिए हम दीपावली का पर्व हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाते हैं। वस्तुतः दीपावली का उत्सव पांच दिनों तक, पांच कृत्यों के साथ मनाया जाता है और पांचों दिन अपनेआप मेंं स्वतंत्र पर्व की हैसियत रखते हैं। यथा धनतेरस अर्थात्‌ धन-पूजा, नरक चतुर्दशी यानी नरकासुर पर विष्णु की विजय का उत्सव, लक्ष्मी पूजा 'श्री" का आवाहन पर्व, द्यूत दिवस अर्थात्‌ भाईदूज नाम से बहन-भाई के प्रेम का आदान-प्रदान का उत्सव। इसे यम द्वितीय भी कहते हैं। इन पांच दिनों में दीपदान, बलिपूजा, गाय-बैलों की पूजा, गोवर्धन पूजा, नव वस्त्र धारण करना, द्यूत क्रीडा, माला बांधना आदि कृत्य किए जाते हैं।
लक्ष्मी पूजन के समय, विशेषकर व्यापारी वर्ग 'शुभ", 'लाभ" अवश्य लिखता है। भारतीय संस्कृति का प्रतीक चिन्ह है 'स्वस्तिक"। इसे भी लक्ष्मी पूजन के समय अंकित करते हैं। 'शुभ",'लाभ" शब्दों में व्यापक अर्थ तथा सामाजिक भावनाएं छिपी हुई हैं। शुभ से तात्पर्य है कल्याणकारी। ऐसे कार्य जिनसे अधिकाधिक लोगों का कल्याण हो, मानवीय गरिमा तथा प्रतिष्ठा के अनुकूल हो। लाभ शब्द भौतिक उपलब्धियों का परिचायक है। यह समृद्धि में निरंतर वृद्धि का संदेश देता है। इस शब्द को अंकित कर हर आनेवाले की समृद्धि, वृद्धि की कामना के साथ मानो हम अपनी समृद्धि और उसकी वृद्धि की कामना रखते हैं। परस्पर लाभ के प्रयासों से सामाजिक बंधन सुदृढ़ होते हैं एवं उन्हें गतिशीलता मिलती है। जब तक हम एक दूसरे के लिए उपयोगी और लाभकारी नहीं होंगे, तब तक व्यवहारिक रुप से हम एक दूसरे के संबंधों का निर्वाह करने में भी असमर्थ रहते हैं।
इसके अलावा पर्वों का यह समूह अनेक महामानवों भगवान राम, कृष्ण, महाप्रतापी-दानवीर राजा बलि, धर्मराज युधिष्ठिर, भगवान बुद्ध, महावीर, सम्राट अशोक, सम्राट विक्रमादित्य और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती एवं वेदांत के प्रचारक स्वामी रामतीर्थ आदि की पावन स्मृति को अपने भीतर संजोए बैठा है। कार्तिक अमावस्या के ही दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंदसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से छूटकर अमृतसर वापिस आए थे। विख्यात स्वर्णमंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन प्रारंभ हुआ था।
यह पर्व मूलतः दीपोत्सव 'श्री" अथवा लक्ष्मी का आवाहन पर्व है। आद्यशक्ति, अच्युतप्रिया भगवती लक्ष्मी के पूजन का पर्व है। समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी रुपी रत्न भी एक था। इस रत्न का प्रादुर्भाव कार्तिक की अमावस्या को हुआ था। तभी से यह तिथि लक्ष्मी पूजन का पर्व बन गया। लक्ष्मी की चर्चा ऋग्वेद में सबसे पहले हुई है। 'श्री" धन की देवी है तथा भगवान विष्णु की पत्नी है। जब हरि ने बावन रुप धारण किया तो लक्ष्मी कमल के रुप में अवतरित हुई। जब विष्णु परशुराम के रुप में आए तो 'लक्ष्मी" 'धरनी" कहलाई। राम के साथ सीता तो कृष्ण के साथ रुक्मिणी बनकर वे सदैव विष्णु की पत्नी बनती चली आई हैं।
लक्ष्मी का जो वर्तमान स्वरुप, जनता में व्याप्त है उसके अनुसार वे कमल पर विराजती हैं उनके हाथ में कमल है, उल्लू उनका वाहन है और वे धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी हैं। लक्ष्मी केवल समृद्धि की देवी नहीं हैं। लक्ष्मी का भारतीय वाड्‌ग्‌मय में सर्वप्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद में प्राप्त होता है और उससे ज्ञात होता है कि उस समय लक्ष्मी का अर्थ अत्यंत व्यापक रुप में ग्रहण किया गया था। ऋग्वेद के 'श्री" सूक्त में लक्ष्मी के सत्तर नाम दिए गए हैं। जिन्हें पांच स्वरुप में बांटा गया है। ये हैं स्वरुपसूचक, श्री विग्रहपरक, पतिप्रेमप्रदर्शक, वैभवप्रतिपादक और भक्ताभिलाषक। इन नामों की परिधि बडी विशाल है। उनका प्राचीनतम नाम 'श्री" है इस संदर्भ में विद्वानों की यह मान्यता है कि 'श्री" शब्द का संदर्भ ऋगवेद में सौभाग्य के रुप में आया तथा कालांतर में अथर्वेद में उसका नारी के रुप में मानवीकरण हो गया। 'श्री" सूक्त में 15 मंत्र हैं। श्री सूक्त के अनुसार लक्ष्मी पद्‌मासना है, पद्‌मालया है, कमल में ही निवास करती है। कमल सौम्यता, समृद्धि एवं सौंदर्य तीनों का ही प्रतीक है और लक्ष्मी के साथ कमल का घनिष्ठ संबंध है।
ऋग्वेद की लक्ष्मी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह केवल धन की ही देवी नहीं थी, वह राष्ट्र की सौंदर्य और समृद्धि दोनो की अधिष्ठात्री देवी थी। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त के अनुसार, हिरण्यवर्णा हरिणां सुवर्णा रजतस्त्रजां। चन्द्रां हिरण्यमयी लक्ष्मीं जात वेदो म आवह।। अर्थात्‌ तपे हुए सोने के समान कांतिवाली, मनोहर रुपवाली, सोने तथा चांदी के आभूषणों से शोभित, सूर्य के समान प्रकाशवाली पर चंद्रमा के समान शीतल किरणों से प्रभाववाली सुवर्णांगिना लक्ष्मी का हम आवाहन करते हैं। लक्ष्मी के स्वभाव में धन का गर्व और तेज है तो साथ ही ऋग्वेद के एक अन्य सूक्त में उनके ह्रदय में माता की उदारता, शांति भावना भी दर्शाई गई है। सूक्तकार ने धन ऐश्वर्य के साथ-साथ दानवृत्ति के समन्वय को प्रस्तुत किया है। ऋग्वेदोक्त लक्ष्मी की करुणा असीम बतलाई गई है। ऋग्वेदिक लक्ष्मी मंगलकारी और पूर्णकामा है और उर्वरता की देवी है।
पर्वों का पर्व महापर्व है - दीपावली
शिरीष सप्रे
उत्साह का पर्व है दीपावली, 'तमसोमा ज्योतिर्गमय" की भावना से जुडा हुआ 'प्रकाश पर्व" है 'दीपावली"। इस पावन मंत्र को लेकर आनेवाले कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्र्योदशी से लेकर शुक्ल पक्ष की दूज तक का पंचदिवसीय समय दीपावली के नाम से पुकारा जाता है। दीपों की कतार को प्रज्वलित करने का, जगमगाने का पर्व है दीपावली। वात्सायन कामसूत्र के अनुसार 'यक्षरात्रि" तथा राज मार्तंड के आधार पर 'सुखरात्रि" कहते हैं। निर्णय सिंधु काल तत्व विवेचन के अनुसार यह पर्व चतुर्दशी, अमावस्या और कार्तिक प्रतिपदा इन तीन दिनों तक मनाया जानेवाला कौमुदी उत्सव के नाम से प्रसिद्ध है।
प्राचीन संस्कृति को जीवित रखने के लिए हम दीपावली का पर्व हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाते हैं। वस्तुतः दीपावली का उत्सव पांच दिनों तक, पांच कृत्यों के साथ मनाया जाता है और पांचों दिन अपनेआप मेंं स्वतंत्र पर्व की हैसियत रखते हैं। यथा धनतेरस अर्थात्‌ धन-पूजा, नरक चतुर्दशी यानी नरकासुर पर विष्णु की विजय का उत्सव, लक्ष्मी पूजा 'श्री" का आवाहन पर्व, द्यूत दिवस अर्थात्‌ भाईदूज नाम से बहन-भाई के प्रेम का आदान-प्रदान का उत्सव। इसे यम द्वितीय भी कहते हैं। इन पांच दिनों में दीपदान, बलिपूजा, गाय-बैलों की पूजा, गोवर्धन पूजा, नव वस्त्र धारण करना, द्यूत क्रीडा, माला बांधना आदि कृत्य किए जाते हैं।
लक्ष्मी पूजन के समय, विशेषकर व्यापारी वर्ग 'शुभ", 'लाभ" अवश्य लिखता है। भारतीय संस्कृति का प्रतीक चिन्ह है 'स्वस्तिक"। इसे भी लक्ष्मी पूजन के समय अंकित करते हैं। 'शुभ",'लाभ" शब्दों में व्यापक अर्थ तथा सामाजिक भावनाएं छिपी हुई हैं। शुभ से तात्पर्य है कल्याणकारी। ऐसे कार्य जिनसे अधिकाधिक लोगों का कल्याण हो, मानवीय गरिमा तथा प्रतिष्ठा के अनुकूल हो। लाभ शब्द भौतिक उपलब्धियों का परिचायक है। यह समृद्धि में निरंतर वृद्धि का संदेश देता है। इस शब्द को अंकित कर हर आनेवाले की समृद्धि, वृद्धि की कामना के साथ मानो हम अपनी समृद्धि और उसकी वृद्धि की कामना रखते हैं। परस्पर लाभ के प्रयासों से सामाजिक बंधन सुदृढ़ होते हैं एवं उन्हें गतिशीलता मिलती है। जब तक हम एक दूसरे के लिए उपयोगी और लाभकारी नहीं होंगे, तब तक व्यवहारिक रुप से हम एक दूसरे के संबंधों का निर्वाह करने में भी असमर्थ रहते हैं।
इसके अलावा पर्वों का यह समूह अनेक महामानवों भगवान राम, कृष्ण, महाप्रतापी-दानवीर राजा बलि, धर्मराज युधिष्ठिर, भगवान बुद्ध, महावीर, सम्राट अशोक, सम्राट विक्रमादित्य और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती एवं वेदांत के प्रचारक स्वामी रामतीर्थ आदि की पावन स्मृति को अपने भीतर संजोए बैठा है। कार्तिक अमावस्या के ही दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंदसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद से छूटकर अमृतसर वापिस आए थे। विख्यात स्वर्णमंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन प्रारंभ हुआ था।
यह पर्व मूलतः दीपोत्सव 'श्री" अथवा लक्ष्मी का आवाहन पर्व है। आद्यशक्ति, अच्युतप्रिया भगवती लक्ष्मी के पूजन का पर्व है। समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में लक्ष्मी रुपी रत्न भी एक था। इस रत्न का प्रादुर्भाव कार्तिक की अमावस्या को हुआ था। तभी से यह तिथि लक्ष्मी पूजन का पर्व बन गया। लक्ष्मी की चर्चा ऋग्वेद में सबसे पहले हुई है। 'श्री" धन की देवी है तथा भगवान विष्णु की पत्नी है। जब हरि ने बावन रुप धारण किया तो लक्ष्मी कमल के रुप में अवतरित हुई। जब विष्णु परशुराम के रुप में आए तो 'लक्ष्मी" 'धरनी" कहलाई। राम के साथ सीता तो कृष्ण के साथ रुक्मिणी बनकर वे सदैव विष्णु की पत्नी बनती चली आई हैं।
लक्ष्मी का जो वर्तमान स्वरुप, जनता में व्याप्त है उसके अनुसार वे कमल पर विराजती हैं उनके हाथ में कमल है, उल्लू उनका वाहन है और वे धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी हैं। लक्ष्मी केवल समृद्धि की देवी नहीं हैं। लक्ष्मी का भारतीय वाड्‌ग्‌मय में सर्वप्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद में प्राप्त होता है और उससे ज्ञात होता है कि उस समय लक्ष्मी का अर्थ अत्यंत व्यापक रुप में ग्रहण किया गया था। ऋग्वेद के 'श्री" सूक्त में लक्ष्मी के सत्तर नाम दिए गए हैं। जिन्हें पांच स्वरुप में बांटा गया है। ये हैं स्वरुपसूचक, श्री विग्रहपरक, पतिप्रेमप्रदर्शक, वैभवप्रतिपादक और भक्ताभिलाषक। इन नामों की परिधि बडी विशाल है। उनका प्राचीनतम नाम 'श्री" है इस संदर्भ में विद्वानों की यह मान्यता है कि 'श्री" शब्द का संदर्भ ऋगवेद में सौभाग्य के रुप में आया तथा कालांतर में अथर्वेद में उसका नारी के रुप में मानवीकरण हो गया। 'श्री" सूक्त में 15 मंत्र हैं। श्री सूक्त के अनुसार लक्ष्मी पद्‌मासना है, पद्‌मालया है, कमल में ही निवास करती है। कमल सौम्यता, समृद्धि एवं सौंदर्य तीनों का ही प्रतीक है और लक्ष्मी के साथ कमल का घनिष्ठ संबंध है।
ऋग्वेद की लक्ष्मी की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह केवल धन की ही देवी नहीं थी, वह राष्ट्र की सौंदर्य और समृद्धि दोनो की अधिष्ठात्री देवी थी। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त के अनुसार, हिरण्यवर्णा हरिणां सुवर्णा रजतस्त्रजां। चन्द्रां हिरण्यमयी लक्ष्मीं जात वेदो म आवह।। अर्थात्‌ तपे हुए सोने के समान कांतिवाली, मनोहर रुपवाली, सोने तथा चांदी के आभूषणों से शोभित, सूर्य के समान प्रकाशवाली पर चंद्रमा के समान शीतल किरणों से प्रभाववाली सुवर्णांगिना लक्ष्मी का हम आवाहन करते हैं। लक्ष्मी के स्वभाव में धन का गर्व और तेज है तो साथ ही ऋग्वेद के एक अन्य सूक्त में उनके ह्रदय में माता की उदारता, शांति भावना भी दर्शाई गई है। सूक्तकार ने धन ऐश्वर्य के साथ-साथ दानवृत्ति के समन्वय को प्रस्तुत किया है। ऋग्वेदोक्त लक्ष्मी की करुणा असीम बतलाई गई है। ऋग्वेदिक लक्ष्मी मंगलकारी और पूर्णकामा है और उर्वरता की देवी है।

Saturday, 7 October 2017

प्राचीन भारतीय अस्त्र-शस्त्र

प्राचीन भारतीय अस्त्र-शस्त्र
शिरीष सप्रे

हमारे पूर्वज विज्ञाननिष्ठ, बुद्धिवादी थे जो विभिन्न अस्त्र-शस्त्र के निर्माणकर्ता-अनुसंधानकर्ता भी थे। वस्तुतः हम शक्ति के उपासक रहे हैं। भले ही अभी हम यह भूला बैठे हैं। हमारे यहां तो शस्त्र पूजन की परंपरा ही है और विजयादशमी यानी दशहरे पर हम शस्त्र पूजन करते भी हैं। यदि हम गंभीरता से ध्यान देंगे तो पाएंगे कि हमारे सभी देवी-देवता किसी ना किसी अस्त्र-शस्त्र के साथ होते हैं और उनकी पहचान उनके अस्त्र-शस्त्रों से ही होती भी है। जैसेकि, हनुमानजी गदा के साथ, भगवान परशुरामजी की तो पहचान ही परशु से होती है जो उन्हें शिवजी ने प्रदान किया था। भगवान राम की तो कल्पना ही बिना धनुष-बाण के कठिन सी ही है और इधर भगवान कृष्ण तो कहलाते ही सुदर्शनधारी हैं। चक्र भगवान विष्णु के हाथों में भी हमेशा ही रहता है। अन्य प्रमुख देवी-देवताओं की ओर देखें तो पाएंगे कि, इंद्र-वज्र, देवी दुर्गा-शूल, अन्य देवी-देवता भी किसी ना किसी अस्त्र-शस्त्र के साथ ही हमें नजर आएंगे।
प्राचीन भारत के हमारे पूर्वज जो आर्य कहलाते हैं। आर्य का अर्थ ही होता है ः श्रेष्ठ। वे न केवल धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में वरन्‌ अस्त्र-शस्त्र संचालन में भी कुशल और नवनवीन अस्त्र-शस्त्रों के अनुसंधान में भी अग्रणी थे। हमारे प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों के संचालन और उनकी प्रहारक, संहारक क्षमता की एक झलक हम रामायण-महाभारत इन धारावाहिकों में देख भी चूके हैं। कुछ प्रसिद्ध नाम देखिए- ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपत, आदि। ब्रहास्त्र की काट तो ब्रह्मास्त्र ही है। महाभारत काल में पाशुपत केवल अर्जुन के पास ही था और यह अखिल विश्व का नाश कर सकता है। नारायणास्त्र भी पाशुपत के समान ही विकराल अस्त्र है इसका कोई प्रतिकार नहीं कर सकता था और इसका प्रतिकार केवल नम्रतापूर्वक आत्म समर्पण है।
उपर्युक्त नामों पर से ही यह ध्यान में आ गया होगा कि, अस्त्र उसे कहते हैं जिसे मंत्रों द्वारा दूर फैंकते हैं। शस्त्र घातक आयुध हैं जिनके प्रहार से मृत्यु हो सकती है। इन्हें ही अधिक उपयोग में लाया जाता है। अस्त्रों को दो विभागों में बांटा गया है, वे आयुध जो मंत्रों द्वारा संचालित होते हैं, देवी होते हैं और प्रत्येक अस्त्र पर विभिन्न देवी-देवता का अधिकार होता है। इनका संचालन मंत्र-तंत्र द्वारा होता है। वस्तुतः इन्हें दिव्य अथवा मांत्रिक कहा जा सकता है। इनमें से कुछ का वर्णन हम ऊपर कर ही चूके हैं।
कुछ अस्त्र-शस्त्र ऐसे भी हैं जिनका वर्णन प्राचीन संस्कृत गं्रथों में भी मिलता है। शक्ति ः यह लंबाई में गजभर होती है, उसका मुंह सिंह के समान होता है। उसमें बडी तेज जीभ और पंजे होते हैं और रंग नीला होता है तथा छोटी-छोटी घंटियां लगी रहता हैं। इसे फेंकने के लिए दोनो हाथों को उपयोग में लाया जाता है। तोमर ः लोहे का बना होकर बाण रुप में होता है। इसका मुंह लोहे का बना होकर सांप की तरह होता है और धड लकडी का बना होता है। नीचे की ओर पंख लगाए जाते हैं जिससे यह सरलतापूर्वक उड सके। प्रायः यह डेढ़ गज लंबा होकर लाल रंग का होता है।
पाश ः यह दो प्रकार के होते हैं- वरुण पाश और साधारण पाश। ये इस्पात के महीन तारों को बंटकर बनाए जाते हैं। इनका एक सिरा त्रिकोणवत्‌ होता है। नीचे जस्ते की गोलिया लगी होती हैं। कहीं-कहीं इसका दूसरा वर्णन भी है। यह पांच गज का होता है और सन, रुई, घास या चमडे के तार से बनता है। इन तारों को बटकर इसे बनाते हैं। यमराज का पाश तो प्रसिद्ध ही है। ऋषि ः यह सर्वसाधारण शस्त्र है परंतु है बडा प्राचीन। कोई इसे तलवार का रुप भी बताते हैं। गदा ः इसका हाथ पतला और नीचे का हिस्सा वजनदार होता है। इसकी लंबाई जमीन से छाती तक होती है। इसका वजन बीस मन का होता है। हनुमानजी और भगवान के कृष्ण के बडे भ्राता बलराम गदा युद्ध में प्रवीण होकर भीम और दुर्योधन उन्हीं के शिष्य थे। महाभारत के जरासंध और शल्य भी गदायुद्ध में पारंगत थे। गदा भगवान विष्णु के साथ हमेशा होती है। मुशल ः यह गदा के समान होता है और दूर से फेंककर मारा जाता है।
मुदगर ः इसे साधारणतया एक हाथ से उठाते हैं। राक्षसों में यह बहुत प्रसिद्ध था। वज्र-कुलिश व अशनि ः इसके ऊपर के तीन भाग तिरछे-टेढ़े बने होते हैं। बीच का हिस्सा पतला होता है। पर हाथ बडा वजनदार होता है। यह इंद्र का प्रमुख हथियार है जैसाकि पूर्व में ही उल्लेखित किया जा चूका है। वज्र से जुडी महर्षी दधिचि की स्वंय की हड्डियों के दान की कथा भी जुडी हुई है। त्रिशूल ः इसके तीन सिर होते हैं। शिवजी का त्रिशूल तो प्रसिद्ध ही है। शूल ः इसका एक सिरा नुकीला तेज होता है। इसका भेद शरीर में होते ही प्राण पखेरु उड जाते हैं। कुंटा ः यह भाला है। पट्टिश ः यह एक प्रकार का कुल्हाडा ही है। शंकु बर्छी ः यह भाला है। परिघि ः इसके एक रुप में लोहे की मूठ है। दूसरे रुप में एक लोहे की छडी भी होती है और तीसरे रुप के सिरे पर वजनदार मुंह बना होता है। भिन्दिपाल ः यह लोहे का बना होता है। इसे हाथ से फेंकते हैं। इसके भीतर से भी बाण फेंकते हैं। नाराच ः यह एक प्रकार का बाण है। खड्‌ग ः यह बलिदान का शस्त्र है और दुर्गा चंडी के सामने विराजमान रहता है। चन्द्रहास ः यह टेढ़ी तलवार के समान वक्र कृपाण है।

अन्य प्रमुख अस्त्र-शस्त्र हैं असि-तलवार, धनुष्य-बाण आदि जो स्वयं में स्वतंत्र रुप से लेख के विषय हैं इसलिए इन पर हम नहीं लिख रहे हैं। इसके अतिरिक्त अन्य अस्त्र-शस्त्र भी हैं जिनका वर्णन लेख की सीमा को देखते हुए यहां नहीं किया जा रहा है।