Friday, 22 September 2017

नवरात्र पूजन

नवरात्र पूजन
शिरीष सप्रे

नवरात्र सृजन उत्सव सीखाता है। वर्षा ऋतु समाप्ति की ओर होती है। सृष्टि हरे रंग की अनेक छटाओं के दर्शन हमें कराती है। सारा वातावरण प्रसन्नता से भरा होता है ऐसे वातावरण में घटस्थापना होती है। बडे नगरों में अनेक स्थानों पर गरबा भी खेला जाता है। नवरात्र पूजन आदि शक्ति महामाया जगदम्बा की पूजा आराधना के लिए किया जाता है। नवरात्र शब्द में नव का अर्थ नौ की संख्या है। नवरात्र इन नवनामों के लिए विशेष रुप से प्रसिद्ध है- प्रथमंं शैलपुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघंटेति कुष्मांडेति चतुर्थकम्‌।। पंचम स्कंदमातेति, षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।। संसार की सभी स्त्रिया दुर्गारुप है, परंतु कन्या अवस्था में उनमें भगवती निवास करती है। अतः नवरात्री में कुमारी पूजन का विधान है।

देवी पूजन का अर्थ है - शक्ति की पूजा करना। हमारे पूर्वज सदा से शक्ति के उपासक रहे हैं। सिंहवाहिनी महिषासुर मर्दिनी की रणचंडी के रुप में पूजा सर्वत्र होती रही है। युद्ध क्षेत्र में जाने के पूर्व अधिकांश राजा शक्ति की पूजा करके जाते थे। पौराणिक युग में देवी की उपासना ने धीरे-धीरे एक पृथक मत धारण कर लिया जिसे शाक्त मत कहा गया है। विष्णु और शिव के अलावा शक्ति की महिमा सर्वाधिक है। शाक्तों ने देवी के अनेक नाम रखे। शक्ति ही सृष्टि का सृजन एवं संचालन करती है, ईश्वर की उपासना में शक्ति की उपासना भी शामिल है। दुर्गा की 9 शक्तियां हैं - जया, विजया, भद्रा, भद्रकाली, सुमुखी, दुर्मखी, व्याघ्रमुखी, सिंहमुखी और दुर्गा। हिंदू शास्त्रों में मां दुर्गा की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है। दुर्गा की उत्पत्ति धर्म की रक्षा करने एवं बुराई पर अच्छाई की विजय के लिए हुई है। शक्ति के विभिन्न रुपों के आधार पर उनकी उपासना श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है। दुर्गा सप्तशती में जगतजननी भगवती मां दुर्गाजी के 108 नामों का उल्लेख किया गया है।

भगवान राम के हाथों रावण का वध हो इस उद्देश्य से देवर्षि नारद ने श्रीराम को नवरात्र व्रत रखने के लिए कहा था। भगवान राम ने वह किया अष्टमी की मध्यरात्री में देवी ने भगवान राम को दर्शन देकर 'तुम्हारे हाथों रावण का वध होगा" का आशीर्वाद दिया था। बाद में राम ने वह व्रत पूर्ण कर दशमी के दिन लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान किया और रावण का वध किया और तभी से असत्य, अधर्म पर सत्य और धर्म की जय का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा।

संस्कृतिकोश में नवरात्र की जानकारी दी गई है। कोश में दुर्गापूजा के विषय में जानकारी इस प्रकार से दी गई है - आश्विन शुद्ध प्रतिपदा से नवमीनौदिनों तक दुर्गा नवरात्र मानी जाती है। नवरात्र में नित्य दुर्गा पूजा करना होती है। उसकी विधि इस प्रकार से है - गृहस्थ प्रातः जल में सफेद तिल डालकर उस जल से स्नान करे। फिर सपत्नीक बैठकर देशकालोच्चपूर्वक पूजा का संकल्प करे। तत्पश्चात गणपति पूजन, स्वस्तिवाचन आदि कर मिट्टी की वेदी पर एक कलश की स्थापना करे। उसके आसपास वेदी पर अनाज के बीजों की बुआई कर दें। कलश पर पूर्णपात्र में दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कर दें। उसके पश्चात षोडषोपचार पूजा करें .... देवी दूर्गा के पास अखंड दीप जलता रखें। फिर दुर्गास्त्रोत का पाठ करें। देवी दुर्गा पर ़फूलों की माला बांधें। अनेक स्थानों पर दुर्गोत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव भाद्रपद कृष्ण नवमी से आश्विन शुद्ध नवमी तक मनाएं, सप्तमी से तीन दिन मनाएं, अष्टमी से दो दिन अथवा नवमी को एक दिन तो भी मनाएं, इस प्रकार के विकल्प कालिका पुराण में बतलाए गए हैं।

बंगाल, बिहार, ओरिसा, असम, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में दुर्गोत्सव बडे पैमाने पर मनाया जाता है। इनमें से बंगाल में इसका प्रचार और लोकप्रियता विशिष्ट है। बंगाली लोगों का तो यह वर्ष का प्रमुख त्यौहार ही है। इस उत्सव के लिए दुर्गा की मिट्टी की दशभुजा मूर्ति बनाई जाती है। उसका रुप महिषासुरमर्दिनी का होता है। उसके अगल-बगल कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियां होती हैं। बंगाल में सर्वत्र व्यक्तिगत और सार्वजनिक ऐसी दोनो स्वरुप में देवी दुर्गा की मूर्तियों की स्थापना की जाती है।

कालिका पुराण के अनुसार महिषासुर ने इंद्र सहित सभी देवताओं को जीतकर स्वर्ग से निकाल बाहर किया था। महिषासुर से पीडित देवताओं ने ब्रह्माजी के साथ विष्णु और शिवजी को अपनी विपदा सुनाई। महिषासुर के अन्याय-अत्याचार से मुक्ति के लिए उन तीनों के तेज से आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को जगदम्बा मां दुर्गा प्रकट हुई। कात्यायन ऋषि ने सबसे पहले उनकी पूजा की इसलिए उन्हें कात्यायिनी भी कहा जाता है। जगदम्बा ने शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अष्टमी और नवमी तिथियों को कात्यायन ऋषि द्वारा की गई पूजा-अर्चना को स्वीकारा और दशमी को उन्होंने चिक्षुर-चामर आदि पंद्रह सेनानियों सहित महिषासुर का वध किया और अन्तर्धान हो गई। बंगाल में इस नवरात्री में महिष (भैंसे) की बलि की परंपरा है। शाक्त परंपरा में जीव बलि दी जाती है। जबकि वैष्णव सम्प्रदायवाले नारियल की बलि को ही उत्तम मानते हैं।


देवी भागवत में यह प्रमाण मिलता है कि, भारत में सबसे पहले सुयज्ञ नामक राजा ने दुर्गा पूजा प्रारंभ की। जबकि मार्कंडेय पुराण के अनुसार सुरथ नामक राजा और समाधि नामक वैश्य ने। नारदजी द्वारा श्रीराम को नवरात्र में मां जगदम्बा की पूजा के बारे में पहले ही बतलाया जा चुका है। नवरात्र में मां जगदम्बा की महापूजा से मनुष् को असीम कृपा प्राप्त होती है।

Friday, 15 September 2017

बहुगुणी-बहुउपयोगी फिटकरी की खोज का इतिहास
शिरीष सप्रे

फिटकरी के संबंध में मानव को लगभग तीन से चार हजार वर्ष पूर्व से जानकारी है। भारतीयों को प्राचीनकाल से ज्ञात था कि फिटकरी का उपयोग वस्त्रों पर रंग पक्का बैठाने के लिए किया जाता है। वराहमिहीर ने अपने लेखन में फिटकरी का उपयोग रंगबधक के रुप में किए जाने का उल्लेख किया हुआ है। संस्कृत में फिटकरी के आलकी, काक्षी, तुवरिका, सुराष्ट्रज आदि नाम हैं। भारत में पहले फिटकरी चीन से आयात की जाती थी। वैसे ही सौराष्ट्र में भी तैयार की जाती थी। फिटकरी को तैयार करने का पूर्वइतिहास तो ज्ञात नहीं है। परंतु, एक रोमन विद्वान प्लिनी ने 'अल्यूमेन" (यह लेटिन शब्द है) अर्थात्‌ फिटकरी का उल्लेख अनेक लवणों का मिश्रण के रुप में अपने एक ग्रंथ (ई. स. 23-79) में कर रखा है।

फिटकरी की खोज की इतिहास में कई कथाएं सुनाई पडती हैं। एक कथा के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप में उपयोग में लाई जानेवाली फिटकरी का अधिकांश भाग कुस्तुनतुनिया के आसपास की भूमि से निकाला जाता था। वहां पर इसकी बहुतसी खदानें थी। जब वहां तुर्कों ने अधिकार कर लिया तो उन्होंने बडी होशियारी से फिटकरी की सारी खदानों पर अधिकार जमा लिया और सारी दुनिया  में फिटकरी के निर्माता बन बैठे। इसके पूर्व वहां इटलीवासी जॉन डी कैस्ट्रो जो कपडों और रंगाई के साजो सामान का व्यापारी था उसे अपने व्यवसाय के सिलसिले में फिटकरी के बारे में कुछ ज्ञान हो गया था। परंतु, तुर्कों के कब्जे के बाद वह वहां से भागकर इटली लौट आया। इसीको इटली में फिटकरी का व्यवसाय आरंभ करने का श्रेय जाता है। इस संबंध में जानकारी बडी रोचक है -

एक बार जब वह टोल्फा शहर के निकट की पहाडियों पर घूम रहा था तभी उसकी दृष्टि वहां पर उगी उसी प्रकार की घास पर पडी जैसीकि उसने कुस्तुनतुनिया की फिटकरी की खदानोंवाले क्षेत्र में देखी थी। जिज्ञासावश उसने कुछ पत्थर उठाए और एक टुकडा मुंह में रख लिया, उसे उसका स्वाद वैसा ही लगा जैसाकि वहां के पत्थरों का था। उसने उनको गौर से देखा और उसके ध्यान में आ गया कि वास्तव में उसने फिटकरी की खदान ढूंढ़ निकाली है। वह अपनी खोज की जानकारी देने के लिए पोप के दरबार में पहुंचा। उसने निवेदन किया कि, हमें तुर्कों को फिटकरी के बदले नियमित रुप से सोना देना पडता है। परंतु, अब उन्हें यह देने की आवश्यकता नहीं होगी। क्योंकि, मैंने उन पहाडियों का पता लगा लिया है जहां इतनी फिटकरी है कि हम स्वयं ही सारी दुनिया को उसकी पूर्ति कर सकते हैं। वहां पानी भी प्रचुर भी मात्रा में है। निकट ही बंदरगाह भी है। जहां से जहाजों पर माल लादा जा सकेगा। यह खनिज हमें पर्याप्त मात्रा में धन भी दिलवा देगा और जो तुर्कों के विरुद्ध युद्ध में काम भी आएगा।

पोप ने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया फिर भी कैस्ट्रो ने हार न मानी और वह निरंतर पोप से कहता रहा और अपनी बात पर डटा रहा। अंततः बडी ही अन्यमनस्कता से पोप ने उसकी बात मान ली। पोप ने कुछ ऐसे होशियार लोगों को उसके साथ निरीक्षण के लिए भेजा जो कभी कुस्तुनतुनिया की खदानों में काम कर चूके थे। खोजी दल ने पाया कि यह भूमि ठीक वैसीही है जैसीकि एशिया के उन पहाडियों की है जहां फिटकरी प्राप्त होती है। परमात्मा की दयालुता का गुणगान करने के पश्चात उन्होंने पत्थरों से ऐसी फिटकरी बनाई जो एशिया में प्राप्त फिटकरी से उच्च दर्जे की थी। सारी जानकारी मिलने के बाद पोप ने जरा भी देर ना की और फिटकरी निर्माण का कारखाना आरंभ कर दिया।

शीघ्र ही पोप को इस व्यवसाय से अच्छा खासा धन मिलने लगा। उसने गर्वपूर्वक यह घोषणा करवा दी कि इस उद्योग से प्राप्त धन  तुर्कों के खिलाफ युद्ध में किया जाएगा। इस घोषणा के पश्चात उसने फिटकरी निर्माण का स्वामित्व अपने कब्जे में ले लिया और घोषित कर दिया कि यदि कोई अन्य व्यक्ति फिटकरी बनाने का काम करेगा तो वह अपराधी माना जाकर दंड का भागी होगा। उसने तुर्कों से फिटकरी खरीदना भी अपराध घोषित कर दिया। इन घोषणाओं का उल्लंघन करनेवाले को चर्च के नियमों के मुताबिक बहिष्कृत कर दिया जाएगा। कैथोलिक पंथियों को तो इस विधान का भय था परंतु, प्रोटेस्टंटों ने परवाह नहीं की। एक कहानी बतलाती है कि, एक प्रकृति विज्ञानी अंग्रेज प्रोटेस्टंट सर थामस कैलोनर ने इस आदेश की परवाह नहीं कि और अपने यहां उसने फिटकरी निर्माण के लिए एक सयंत्र स्थापित कर लिया। उसकी कथा भी कुछ-कुछ ऊपर वर्णित कैस्ट्रो की कथा से मिलती-जुलती सी ही है।

गायसबरों (यार्कशायर) के आसपास टहलते हुए एक दिन पेडों की पत्तियों को देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि ये हरी पत्तियां कुछ असाधारण सी कांति लिए हुए थी। उसने ध्यान से देखा तो पाया कि, बलूत के पेड की जडें बडी चौडी थी और जमीन में काफी नीचे तक धंसी हुई थी। उन मजबूत जडों में रस भी था। आसपास की जमीन पर सफेद चिकनी मिट्टी जमकर भी कडी नहीं हुई थी और स्वच्छ रातों में यह शीशे की तरह चमकती प्रतीत होती थी।

तत्काल कैलोनर को याद हो आया कि, इटली के फिटकरी बहुल इलाके की जमीनें भी कुछ इसी प्रकार की थी। उसे संदेह हुआ कि कहीं यहां फिटकरी की खदाने तो मौजूद नहीं है। परीक्षण करने के पश्चात उसके ध्यान में आ गया कि, यहां की जमीन में फिटकरी के पत्थर मौजूद हैं। उसकी प्रसन्नता की सीमा ना रही उसने निश्चय कर लिया कि, वह यहां फिटकरी निर्माणशाला स्थापित करेगा। परंतु, समस्या यह थी कि, उसे फिटकरी निर्माण की तकनीकी जानकारी पूर्णतः नहीं थी। फिटकरी निर्माण की तकनीक प्राप्त करने के लिए यह जानते हुए भी कि पोप द्वारा स्थापित कारखानों की कडी घेराबंदी रहती है बिना पकडे जाने के डर के इटली जा पहुंचा।


वहां उसने दो तीन कारीगरों को उचित मूल्य चूकाने का वादा कर इंग्लैंड चलने के लिए राजी कर लिया। इन आदमियों को बडे-बडे बैरलों मेें छिपाकर बैठा दिया गया और बंदरगाह पर 'टू इंग्लैंड" का लेबल चस्पाकर जहाज में लाद दिया गया। इस तरह खतरा और जान की बाजी लगाकर कुशल कारीगर गायसबरों पहुंच गए। इन कारीगरों की सहायता से कैलोनर ने फिटकरी बनाने का कारखाना स्थापित कर लिया। स्थानीय लोगों को भी फिटकरी निर्माण की तकनीक सीखाई गई। जब यह समाचार पोप को पता चला तो क्रोधित हो उसने उन लोगों को शाप दिए और भला वह इससे अधिक कर भी क्या सकता था। कैलोनर का व्यवसाय चल पडा। राज्य की ओर से एकाधिकार भी प्राप्त हो गया। परंतु, अनहोनी को भला कौन टाल सकता है। जब राजा चार्ल्स को धन की आवश्यकता महसूस हुई तो उसने फिटकरी की खदानों पर अपना कब्जा जमा लिया। कैलोनर क्रोधित तो बहुत हुआ परंतु, कर ही क्या सकता था इसलिए चुप्पी साधकर बैठ गया।

Saturday, 2 September 2017

संत शिरोमणि नामदेव

संत शिरोमणि नामदेव
शिरीष सप्रे

ज्ञानदेव यानी संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव यह समकालीन संत होकर उनके कार्य परस्पर संबधित होकर पूरक भी थे। नामदेव की  भगवान विट्ठल के प्रति भक्ति देखकर ज्ञानदेव स्तिमित थे, तो ज्ञानेश्वर के ज्ञान के तेज से नामदेव चकित थे। परस्पर का प्रेम चारधाम की यात्रा के निमित्त वृद्धिंगत हो गया था। उत्तर भारत के तीर्थक्षेत्रों के दर्शन के पश्चात ज्ञानेश्वरादि अपने बंधुओं के साथ नामदेव महाराज पंढ़रपूर लौटने के तत्काल बाद ही ज्ञानेश्वर ने अपना अवतार कार्य समाप्त करने का निश्चय कर लिया। अपना जीवित कार्य समाप्त हो गया है इसका भान ज्ञानदेव को हो गया था और संजीवन समाधि लेने का निश्चय उन्होंने कर लिया। नामदेव के वर्णनानुसार ज्ञानेश्वर ने जीवन का प्रत्येक क्षण जगत्‌उद्धार के लिए खर्च किया। ज्ञान का भंडार ज्ञानेश्वरी के रुप में जनता को समर्पित किया। कार्तिक वद्यत्रयोदशी शक 1218 को असंख्य संतों और वारकरियों की उपस्थिति में ज्ञानेश्वर ने संजीवन समाधि ले ली। इस समय उनके बंधुओं समवेत नामदेव भी उपस्थित थे। इन्हीं के साथ अन्य संत मंडली के रुप में विसोबा खेचर, चांगदेव, चोखामेला, परिसा भागवत, सावता माली, नरहरि सोनार जैसे अनेक समकालीन संत भी इस समाधि उत्सव में उपस्थित थे।

नामदेवराय ज्ञानदेव की संगत के स्नेहल भक्त थे इसीलिए नामदेव ने स्वयं की आंखों से देखकर समाधि उत्सव का वर्णन जिन 250 अभंगों में किया है वही समाधि उत्सव के प्रसंग का मुख्य आधार है। ज्ञानेश्वर के प्रति नामदेव के मन में विलक्षण श्रद्धा की भावना थी इस कारण अपने इस महान संत मित्र के वियोग से नामदेव दुखी हो गए थे। एक भजन में वे कहते हैं - सूर्य के अस्त होने के पश्चात सब ओर अंधकार फैल जाता है। ज्ञानेश्वर द्वारा समाधि लेने के पश्चात मेरे सामने अंधकार फैल गया है। अब मार्ग दिखलाने का कार्य कौन करेगा? ज्ञानदेव आनंद का सागर, उसमें मैं मछली के समान निश्ंिचत था, परंतु ज्ञानेश्वर ने समाधि ले ली और यह सुख का सागर गायब हो गया है। पानी से निकली मछली जिस प्रकार पानी के बिना छटपटाती है वैसी ही अवस्था मेरी हो गई है। ज्ञानेश्वर के वियोग के कारण मेरा मन छटपटा रहा है।

ज्ञानेश्वर की समाधि के पश्चात आए हुए विदेशी आक्रमण के समय देवताओं, धर्म और देश के प्रति गर्व की भावना जगाकर हिंदूधर्म की अस्मिता टिकाए रखने का अलौकिक और महान कार्य संत नामदेव ने किया। नामदेव की गणना संत पंचायतन में की जाती है। संत पंचायतन में उन्हें ज्ञानदेव, एकनाथ, रामदास और तुकाराम के साथ परिगणित किया गया है। संत तुकाराम ने उन्हें अपना आध्यात्मिक आदर्श माना है। नामदेव की महिमा का बखान इस प्रकार किया जा सकता है कि, भागवत धर्म का आधार ज्ञानदेव ने रचा तो, उस धर्म का विस्तार नामदेव ने किया। ऐसे भयाकुल और कठिन कालखंड में जब विदेशी आक्रमकों के भयंकर हमलों से भारत खिलखिला हो रहा था, समाज अपनी सामाजिकता खो बैठा था। जातिभेद से निर्मित अमानवीयता पराकाष्ठा पर पहुंच चूकी थी तो, दूसरी ओर हिंदूधर्म के स्वघोषित धर्मरक्षक वर्ग धर्मरक्षा के नाम पर कर्मकांड का खुला पुरस्कार कर रहे थे। इस कारण समाज में अंधश्रद्धा चरम पर थी, सामान्य जनता की मति कुंठित हो गई थी। राजनैतिक अस्थिरता और निर्बलता के कारण उद्‌भुत आर्थिक संकट के गर्त में देश जा रहा था तब मराठी संतों ने कार्य कर भारत का एक प्रकार से पुनरुत्थान किया। भागवत धर्म के आंदोलन के माध्यम से किए हुए ऐतिहासिक कार्य में नामदेव का नाम अग्रणी है, सुवर्णाक्षरों से लिखा हुआ है। देवगिरी के यादव साम्राज्य के अंत के पश्चात भारत के सभी संतों ने नामदेव के कार्य का उत्तराधिकार आगे चलाया है।

गुजरात, राजस्थान, पंजाब, उत्तरप्रदेश जैसे महत्वपूर्ण प्रदेशों में 'बीठल बिनु संसार नहीं।" इस प्रकार का विट्ठल राग अलापते भागवत धर्म का बीजारोपण किया। इस बीज के आधार से ही गुजरात में नरसी मेहता, राजस्थान में मीराबाई, पंजाब में गुरु नानक, उत्तरप्रदेश में कबीर, मलूकदास ने उसकी परवरिश, सेवा की, पल्लवित किया, बहार पर लाए। उनके कार्य का अनन्य साधारणत्व इस पर से ध्यान में आता है कि उनके मंदिर इन प्रदेशों में मिलते हैं। अनेक प्रदेशों के कार्यों में से उनका पंजाब में का कार्य सर्वाधिक वैशिष्ट्‌य पूर्ण है। वहां के लगभग 18 वर्षों के निवास में भागवत धर्म के आध्यात्मिक और नैतिक जीवन के विचारप्रणाली का प्रसार किया। समाज के जातिभेदों को छोड देने का उपदेश दिया।


नामदेव कहते हैं ः हरि नांव जाती, हरि नांव पाती। का करौ जाती, का करौ पाती।। उनकी इस सीख से ही उनको माननेवाला एक बडा वर्ग तैयार हुआ। इस पद पर से पता चलता है कि भक्तिसंप्रदाय की सीख लोगों के मनमस्तिष्क में उतारने के लिए उन्होंने हिंदीभाषा जानबूझकर सीखी थी। उनके हिंदी पदों को तत्कालीन समाज में मान्यता मिली इतनी कि आगे चलकर पंजाब में बने सिक्ख धर्म के गुरुग्रंथ साहिब में उनको स्थान मिला। नामदेव के हिंदी पदों की विशिष्टता यह है कि वे गेय स्वरुप में हैं। नामदेव का समग्र जीवन भक्ति से ओतप्रोत था। नामदेव ने नाम साधना को बडा महत्व दिया था। उस जमाने में जब आज के समान यातायात के साधन उपलब्ध नहीं थे उस समय उन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में प्रवास कर भागवत धर्म की पताका पूरे हिंदुस्थान में फहराई। उस काल में आवश्यकता थी राष्ट्रीय एकता की, समाज के मानसिक धैर्य को बढ़ाने की इसी में से भारतीय संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन हुआ। नामदेव के इन्हीं कार्यों के कारण वे संत शिरोमणि कहलाए।