Sunday, 27 August 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 2 - मंगल का प्रतीक स्वस्तिक

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 2 - 
मंगल का प्रतीक स्वस्तिक
शिरीष सप्रे

भारतीय दर्शन की तत्त्वता, विस्तृत चिंतन, कल्पना, संपूर्ण विश्व का सार, भारतीय संस्कृति की झलक उसके विभिन्न धर्मों में समान रुप से प्रयुक्त होनेवाले प्रतीक चिन्हों में निहित है। जिनकी रचना हमारे मंत्रसृष्टा ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों और भावों को व्यक्त करने के लिए की। परंतु, इनका भाव समझने के स्थान पर हमने उन्हें केवल कर्मकांड तक ही सीमित करके रख दिया फलस्वरुप मूल्यहीनता उत्पन्न हो गई है। जिन प्रतीक चिन्हों को अल्पाधिक रुप में संपूर्ण विश्व के धर्मों में स्थान मिला हुआ है, जो मनुष्य को जीवन की सर्वोत्कृष्टता की ओर प्रेरित करते हैं, उनके मर्म को हमने भूला दिया है। इसलिए हमारे सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में प्रयुक्त होनेवाले मंगलकारी स्वस्तिक का भावार्थ यहां प्रस्तुत है।

स्वस्तिक शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है। 'स्वस्तिक" शब्द 'सु, अस, क" से बना है। 'सु" का अर्थ 'अच्छा", 'अस" यानी 'सत्ता" या 'अस्तित्व" और 'क" का अर्थ 'कर्ता" या करनेवाला। इस प्रकार 'स्वस्तिक" का अर्थ हुआ 'अच्छा" या 'मंगल" करनेवाला। यही स्वस्तिक की भावना है। 'अमरकोश" में भी 'स्वस्तिक" का अर्थ 'आशीर्वाद", मंगल या पुण्य करनेवाला लिखा है। 'अमरकोश" के शब्द हैं- 'स्वस्तिक सर्वतोऋद्ध" अर्थात्‌ 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो"। इस प्रकार 'स्वस्तिक शब्द में किसी व्यक्ति विशेष का नहीं अपितु सम्पूर्ण के कल्याण या 'वसुधैवकुटुम्बकम्‌" की भावना निहित है। 'स्वस्तिक" शब्द की निरुक्ति है - 'स्वस्तिक क्षेम कायति इति स्वस्तिकः" अर्थात्‌ कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही 'स्वस्तिक" है। स्वस्तिक में चार दिशाएं हैं, यानी स्वस्तिक का कार्य हुआ हर दिशा में व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देना।

स्वस्तिक का प्रारंभिक आकार एक खडी रेखा और उसके ऊपर दूसरी आडी रेखा के रुप में था। यह दो रेखाएं पुरुष और प्रकृति की प्रतीक हैं। इसमें खडी रेखा ज्योतिर्लिंग का प्रतीक है। वैदिक साहित्य में ज्योतिर्लिंग को विश्वोत्पत्ति का मूल कारण माना गया है। स्वस्तिक की खडी रेखा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है और आडी रेखा सृष्टि के विस्तार तथा विकास का द्योतक है। सृष्टि की रचना ईश्वर ने की और सभी देवताओं ने अपनी शक्ति देकर इसका विस्तार किया- यही स्वस्तिक का भाव है। स्वस्तिक का मध्य बिंदु विष्णु का नाभिकमल माना गया है और नाभिकमल से ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी का जन्म हुआ है। इसलिए स्वस्तिक को सृजन शक्ति का प्रतीक माना गया है। इसका आरंभिक आकार गणित के धन चिन्ह का है इसलिए स्वस्तिक जोड का, मिलन का प्रतीक है। धन चिंह की चारों भुजाओं के सिरों पर एक-एक रेखा जोडी दी जाए तो स्वस्तिक बन जाता है। 

स्वस्तिक महाप्रतीक है भारतीयता का, कर्मठता का, जागरुकता का। उसके पास तिरस्कार नहीं, ओछे लोगों के प्रति मात्र करुणा है। वह उनका संहार नहीं करता, वरन्‌ उनका सुधार करता है, जो अच्छे हैं वे आगे बढ़ें और बुरे हैं, वे सुधरें मगर वे भी आगे बढ़ें। इसीलिए स्वस्तिक जीवन, जागरण और कर्मयोग का महान संदेश वाहक है।

भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिन्ह को विष्णु, सूर्य, सृष्टि-चक्र तथा संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने इसे गणेश का प्रतीक मानकर इसे भी गणेशजी के समान प्रथम वंदनीय माना है। पुराणों में इसे सुदर्शन चक्र का प्रतीक माना गया है। वायवीय संहिता में स्वस्तिक को आठ यौगिक आसनों में एक बतलाया गया है। यास्काचार्य ने इसे ब्रह्म ही का स्वरुप माना है। स्वस्तिक में बननेवाले चार समकोणो को चार देवताओं का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वान इसकी चार भुजाओं को हिंदुओं के चार वर्णों की एकता का प्रतीक मानते है। इन भुजाओं को ब्रह्मा के चार मुख, चार हाथ और वेदों के रुप में भी स्वीकार किया गया है। स्वस्तिक का धनात्मक चिन्ह अधिकता या सम्पन्नता का प्रतीक है। एक पारंपरिक मान्यता के अनुसार चतुर्मास में स्वस्तिक व्रत करने तथा मंदिर में अष्टदल से स्वस्तिक बनाकर उसका पूजन करने से महिलाओं में वैधव्य का भय नहीं रहता। पद्‌म पुराण में इससे संबंधित कथा भी है।  

अत्यंत प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल का प्रतीक मानकर कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ करने के पूर्व स्वस्तिक चिन्ह को अंकित कर उसका पूजन किया जाता है। विद्वानों की धारणा है कि यह वेदों से भी प्राचीन है। स्वस्तिक में देवताओं की शक्ति और मनुष्य की शुभकामनाओं का सम्मिलित सामर्थ्य है। क्योंकि, वर्षा के मेघ, मेघों को गतिशील करनेवाली वायु, प्रकाश और उष्णता प्रदान करनेवाला सूर्य देवता, मनुष्य के शुभाशुभ कर्मों का ध्यान देनेवाले वरुण देवता, प्राणियों को धारण करनेवाली वसुंधरा पृथ्वी, सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्मा, पालनहार विष्णु, संहारक शिवजी, रिद्धी-सिद्धी के देवता गणेशजी सहित अनेक देवताओं की शक्ति का समावेश स्वस्तिक में है।

स्वस्तिक की आकृति आविष्कृत नहीं है। स्वस्तिक आकृति की उत्पत्ति 'ऊँ" प्रणव का ही एक रुप है, जो सर्वस्थ ब्रह्मांड में गूंजायमान है। अगर चार 'ऊॅँ" की आकृति को एक दूसरे की पीठ से जोड दिया जाए तो जो आकृति बनती है, वह स्वस्तिक की ही है। यह ऊँ का ही स्वरुप है, जो आज भी इस सृष्टि पर विद्यमान है। इस आकृति के निर्माण से दसों दिशा, नौ ग्रह, बारह राशि, तैंतीस करोड देवताओं का आवाहन बोध होता है। जैन, बौद्धधर्म के 24 तीर्थंकर, नवकार मंत्र का बोध कराता है। क्योंकि, स्वस्तिक की उत्पत्ति ऊँ से हुई है और हर भाषा में पहला अक्षर 'अ" विद्यमान है। सभी धर्मों में यह विद्यमान है। इसीलिए हर शुभ कार्य को करने के पूर्व स्वस्तिक की आकृति बनाई जाती है। इसे सर्वप्रथम इसलिए भी बनाया जाता है क्योंकि, इससे वास्तुदोष का निराकरण हो जाता है।

स्वस्तिक चिन्ह का प्रयोग मांगलिक कार्यों में वर्तमान में जितना व्यापक है उतना ही पहले भी था यह इतिहास सिद्ध है। सिंधुघाटी की सभ्यता में इसका उल्लेख पाया जाता है। उस समय पशुओं के शरीर पर यह चिन्ह अंकित किया जाता था। मोहनजोदडी की एक मुद्रा पर एक हाथी स्वस्तिक के आगे झुका हुआ दिखाया गया है। सिंधु घाटी से प्राप्त बर्तनों और मुद्राओं पर हमें स्वस्तिक की आकृतियां खुदी हुई मिली हैं जो इसकी प्राचीनता का ज्वलंत प्रमाण है। सिंधु 'पद्मपुराण" में वर्णित 16 चिन्हों में स्वस्तिक प्रमुख है। आज भी स्वस्तिक सनातनी हिंदु, जैन और बौद्ध धर्मों में समान रुप से अपनाया गया है। इसका प्रतीकार्थ भाव गहन है।

सनातनियों के समान ही जैन और बौद्धधर्म के अनुयायी भी स्वस्तिक को मंगलकारी, शांति और समृद्धि प्रदान करनेवाला प्रतीक चिन्ह मानते हैं। जैनधर्म में स्वीकृत चौबीस चिन्हों में स्वस्तिक एक प्रधान चिन्ह है। जैन परम्परा में मांगलिक प्रतीक के रुप में स्वीकृत अष्ट मंगल द्रव्यों में स्वस्तिक का स्थान सर्वोपरि है। स्वस्तिक चिन्ह की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल का प्रतीक माना जाता है। वे हैं - अरिहंत मंगल, सिद्ध मंगल, साहू मंगल और केवलिपण्णतों धम्मो मंगल। जैनधर्म जिस स्वस्तिक को पवित्र चिन्ह मानता है, उसकी आकृति में स्वस्तिक के ऊपर एक चंद्रबिंदु तथा चंद्रबिंदु के नीचे तीन बिंदु अंकित हैं। इसमें चंद्रबिंदु मुक्ति का प्रतीक है तथा अन्य तीन बिंदु ज्ञान, दर्शन और चरित्र के प्रतीक हैं। बौद्ध मान्यता के अनुसार पत्तों तथा पुष्पों यानी वनस्पति संपदा की उत्पत्ति का कारण स्वस्तिक ही है। बौद्ध मंदिरों में लगाए जानेवाले दीपकों पर भी स्वस्तिक चिन्ह अंकित किया जाता है। बौद्ध विहारों, स्तूपों, मंदिरों में स्वस्तिक चिन्ह मिलता है। बुद्ध की मूर्तियों पर उनके चित्रों पर भी प्रायः स्वस्तिक चिन्ह मिलते हैं। विदेशों में इस मंगल प्रतीक के प्रचार प्रसार में बौद्ध धर्म के प्रचारकों का बहुत योगदान रहा है।


कुल निष्कर्ष यह निकलता है कि स्वस्तिक मानव जीवन के अधिक निकट है और इसका प्रतीकार्थ भाव गहन है। स्वस्तिक की चार भुजाएं चारों दिशाओं की प्रतीक हैं। जो प्रेरित करती हैं कि हम चारों दिशाओं में बढ़ें। चार भुजाएं मानव जीवन का सार है, आधार हैं।  स्वस्तिक यह भी निर्देशित करता है कि, विभिन्न दिशाओं में हम अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए तेज, यश, सामर्थ्य को जुटाएं। स्वस्तिक की चार भुजाएं बीच में से पृथक-पृथक दिशा की ओर गमन करती हैं। जो इस बात की प्रतीक हैं कि आओ हम संगठित होकर  चारों दिशाओं में उद्यम के लिए गमन करें। समता, सहकार्य, एकता और संतुलन जैसे जीवन मुल्यों को स्थापित करें। 

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