Thursday, 17 August 2017

18 अगस्त पेशवा बाजीराव (प्रथम) जयंती
महान योद्धा अजेय बाजीराव पेशवा (प्रथम)
शिरीष सप्रे

विश्व का इतिहास कई महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन की दास्तां है, गवाह है। इतिहास गवाह है कि अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ने हमेशा से ही दूसरों के आक्रमणों, प्रयत्नों को सहा है परंतु, कभी स्वयं होकर किसी सभ्यता या संस्कृति को समाप्त करने के लिए सीमोल्लंघन कर उन्हें नष्ट करने का प्रयास नहीं किया है। हालांकि हिंदू सभ्यता में भी एक से बढ़कर एक वीर उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने समय समय पर उठकर इस प्रकार के आक्रांताओं का मुकाबला कर अपनी मातृभूमि की रक्षा की है। भारत के इतिहास में ऐसे ही एक महान योद्धा, हिंदूधर्म संरक्षक के रुप में प्रख्यात नाम है 18 अगस्त 1700 में पैदा हुए बाजीराव पेशवा (प्रथम)। जिन्होंने अपने अद्‌भुत पराक्रम द्वारा एक नया गौरवशाली इतिहास रचा। बीस वर्ष के अपने कार्यकाल में उन्होंने अपने धुआंधार विविध अभियानों में लगभग पौने दो लाख कि.मी. की घुडदौड कर 'देवदत्त सेनानी" के रुप में लोकप्रियता हासिल की तथा मराठा साम्राज्य की धाक पूरे भारत में निर्मित कर दी।

बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक की सनकी नीतियों से त्रस्त हो उसके सरदारों ने विद्रोह कर दिया और अपने में से ही एक हसन खां को जफर खां की उपाधि दी। 3 अगस्त 1347 को अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार से दक्षिण भारत में स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनत की नींव पडी। 1487 में बहमनी सल्तनत के सुल्तान मुहम्मदशाह तृतीय की मृत्यु के पश्चात उसके पांच प्रमुख सरदारों ने विद्रोह कर अपनी पांच सल्तनतें कायम कर ली। इनमें से एक थी बीजापुर की आदिलशाही (न्यायनिष्ठ)(1849) जिसका संस्थापक सुल्तान था सूबेदार युसूफ आदिलखां। वह स्वयं को आदिलशाह (न्यायनिष्ठ सुल्तान) कहलाता था। यूसुफ मूलतः तुर्किस्तान के शाही परिवार से था। अपने ही भाई द्वारा हत्या के डर से वह कुस्तुंतुनिया (इस्तंबूल) से भाग खडा हुआ और अपनी असलियत छुपाने के लिए गुलाम के रुप में बिक गया। गुलामों का व्यापारी अलाद्दीन उसे हिंदुस्तान ले आया और बहमनी राज्य के मंत्री महमूद गावान के हाथ बेच दिया। अपनी योग्यता के बल पर वह बहमनी सुल्तान मुहम्मद शाह तृतीय की नजरों में चढ़ा और सरदार बन गया। बीजापूर सूबे का सूबेदार यही यूसुफखां था। इसने अपने विश्वासपात्रों के रुप मे अफ्रीका के गुलामों को अपने मातहत रखा। इस प्रकार पंद्रहवी सदी के अंतिम काल से दक्षिणी हिंदुस्तान में अफ्रीकी गुलाम मूलतः बहमनी सल्तनत में लाए गए और उसके विघटन के बाद दक्षिण की पांचों मुस्लिम सल्तनतों में बढ़ते चले गए। अबीसीनिया के यह हबशी ही 'जंजीरा" और उसके आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा जमानेवाले सिद्दी थे।

सबसे पहले हम 'जंजीरा" के अर्थ को समझ लें। 'जंजीरा" सागर के बीच में होनेवाले टापू या द्वीप को अरबी भाषा में 'जंजीर" कहा जाता है। दक्षिण भारत के पश्चिमी किनारे के उत्तरी हिस्से अर्थात्‌ कोंकण प्रदेश (महाराष्ट्र) के रायगढ़ जिले में 'मुरुड", 'राजापुरी खाडी" के मुंहाने पर अरब सागर पर बने हुए एक किले को 'जंजीरा" कहते हैं। पौने पांच सौ वर्ष इस किले को बनानेवाले सिद्दी बुरहानखां ने जब  इस किले को देखा तो उसके मुंह से निकल पडा 'जंजीरे माहरुब"। अर्थात्‌ उसको यह जलदुर्ग एक 'चंद्ररेखा" सा द्वीप लगा। सागर मध्य स्थित दुर्ग को संस्कृत में 'उद्‌धिमध्यस्त वरीदुर्ग" कहा जाता है। बुरहानखां द्वारा इसे बनाए जाने के पूर्व इसका स्वरुप कच्चा था। उसे उसके निर्माता कोली (जाति) के लोग स्थानीय बोली में मेढ़े कोट यानी लकडी के लठ्ठो को एक के ऊपर एक रखकर किया गया निर्माण कहते थे। संभव है संभ्रान्त उच्च कुलीन लोग उन दिनों 'जंजीरा" को 'उद्‌धिमध्यस्त वरीदुर्ग" कहते हों। किसी साहित्यकार, कवि ने अपनी रचना में उसका वर्णन इस प्रकार किया हो। वैसे दूर से यह किला एक विराट कछुए के आकार जैसा दिखाई देता है। अतः किसी ने इसे कच्छप दुर्ग भी कहा हो। जंजीरा के निर्माण की पृष्ठभूमि इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

बहमनी सल्तनत के विघटन के बाद बनी निजामशाही का संस्थापक था निजामुलमुल्क बहरी काबेरा मलिक अहमद। अरब सागर के किनारे का कोंकण इलाका अहमदनगर की इस निजामशाही के कब्जे में रहा। राजापुरी खाडी के मुहाने पर कोली नेता राम पाटिल ने निजामशाही से विधिवत अनुमति लेकर मेढ़े कोट यानी लकडी के लट्ठों से बना किला बनाया। राम पाटिल के बाद कोली नेता एतयार राव ने उस पर अधिकार जमाया और निजामशाही से स्वयं को स्वतंत्र समझने लगा। तब निजामशाही की ओर से सिद्दी पीरमखान को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा गया। आक्रमण में सारे कोली मार दिए गए और मेढ़े कोट निजामशाही के कब्जे में आ गया। पीरमखान के बाद आए बुरहान खान के दिमाग में मेढ़े कोट के स्थान पर पत्थरों का एक मजबूत किला बनाने का विचार आया। 1556 से 1571 तक सैंकडों कारीगरों-मजदूरों की दिन-रात की मेहनत से जंजीरा जैसा मजबूत सागर दुर्ग बनकर खडा हुआ।

जंजीरा दुर्ग इतना मजबूत और महत्वपूर्ण था कि, दक्षिण हिंदुस्तान पर अपनी धाक जमानेवाले छत्रपति शिवाजी महाराज ने मई 1669, 1675 और फिर 1678 में दो बार जंजीरा को अपने अधिकार में करने के लिए सैनिकी अभियान चलाए पर सफल न हो सके। उनके पश्चात छत्रपति संभाजी भी सफलता न प्राप्त कर सके। 1633 में निजामशाही शाहजहां के शासनकाल में मुगलों के कब्जे में आ गई और सिद्दी मुगलों के ताबेदार हो गए। औरंगजेब की मृत्यु के बाद सिद्दी घराने के वंशजों ने स्वतंत्र हो स्वयं की जंजीरा सल्तनत बना ली। जंजीरा जैसा दृढ़ दुर्ग कहीं मराठों के कब्जे में ना चला जाए इसलिए पुर्तगालियों और अंग्रेजों ने समय समय पर सिद्दियों की मदत की जिसके कारण जंजीरा अजेय बना गया।

इसी सिद्दी सुल्तान के आतंक और अत्याचार से त्रस्त हो छत्रपति शाहू के पेशवा बालाजी विश्वनाथ कोंकण से पलायन कर सत्रहवीं सदी के अंत में देश (दक्खन का पठार) पर पहुंचे थे। उनके जैसे अनेकों को अपनी जान-माल की रक्षा के लिए अपनी जन्मभूमि से भागना पडा था। पेशवा भला इस इतिहास कैसे भूलते? 8 फरवरी 1727 को शिवरात्री पर सिद्दी की फौजों ने चिपलून के पास भगवान परशुराम के पवित्र मंदिर पर हमला कर उसका विध्वंस कर खूब लूटखसोट की थी। भगवान परशुराम का यह ख्यात पवित्र मंदिर छत्रपति, पेशवा और अनेक मराठा सरदारों के लिए श्रद्धेय ब्रह्मेंद्रस्वामी के अधिकार एवं व्यवस्था में था। अतः सिद्दी को सबक सीखाने की इच्छा सभी में तीव्रतर थी। अपनी शक्ति बढ़ी है इसलिए जंजीरा राज्य को निगलने की शाहू या बाजीराव की नवीन योजना नहीं थी तो, 1718 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ द्वारा दिल्ली में मुगल बादशाह के सामने जो लिखित मांगें पेश की गई थी, उनमें भी स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि, ''हबशियों के कब्जे में हमारे जो गढ़-किले हैं वे सब हमें दिए जाएं और जो मुल्क है वह भी दिया जाए। यदि वह देने को राजी ना हो तो बादशाही फौजों के द्वारा दबाव डालकर, ताकीद देकर वे हमें सौंप दिए जाएं।""

सिद्दी को सबक सीखाना भी अब आवश्यक हो चूका था अतः छत्रपति शाहू ने 'जंजीरा मुहिम" को हाथ में लेने का निश्चय किया। संयोग से सिद्दी रसूलखान की अकस्मात्‌ मृत्यु हो गई। उसके छः बेटों में से बडे अब्दुल्ला की ताजपोशी हो गई परंतु, सत्ता की राजनीति में उसकी हत्या हो गई। अब्दुल्ला का बेटा रहमान अपने पिता हश्र देखकर डर गया और भागकर मराठों की छावनी में जा पहुंचा। परिस्थितियों को अनुकूल देख बाजीराव ने छत्रपति के विश्वसनीय फत्तेसिंह भोंसले को साथ ले 26 अपैल 1733 को कूच कर दिया। सिद्दी की नौसेना के जहाजों पर कब्जा कर लिया और रायगढ़ को भी जीत लिया। परंतु, मरहठों की आपसी धडेबंदी से जंजीरा मुहिम ने अपनी गंभीरता खो दी। बाजीराव इससे व्यथित हो गए। आपसी फूट के चलते मराठों का जीतना असंभव सा हो गया था। अतः बाजीराव ने 1 दिसंबर 1733 को अंग्रेजों की मध्यस्थता से जंजीरा के सिद्दी से संधि कर ली। संधि के अनुसार मराठों की शरण में आए रहमान को गद्दी पर बैठाया गया। बैठे ठाले समय काटना बाजीराव के स्वभाव में नहीं था अतः जंजीरा से वापस आकर वे अप्रैल 1734 में खानदेश चल गए। इस समझौते की स्याही सूखने भी नहीं पाई थी कि सिद्दी रायगढ़ को पुनः हासिल करने के लिए आगे बढ़ा। छत्रपति के आदेश पर मराठा सेनाएं आगे बढ़ी। रायगढ़ में दोनो सेनाओं में जमकर लढ़ाई हुई, जिसमें एक प्रमुख सिद्दी सरदार अंबर अफवानी के मारे जाने पर सिद्दी फौजें आए रास्ते से भाग खडी हुई। अपने घर पहुंचे सिद्दी ने अंग्रेजों-पुर्तगालियों की सहायता एवं मार्गदर्शन प्राप्त कर लिया। अब बरसात का मौसम था अतः विवश हो मराठा सेनाओं को वापिस जाना पडा। 

बाजीराव के पिताश्री पेशवा बालाजी विश्वनाथ और नौसेना प्रमुख सरखेल कान्होजी आंग्रे में घनिष्ठ मित्रता थी। उनकी अगली पीढ़ी में भी सौहार्द यथावत रहा। ऐसे में जनवरी 1735 में बाजीराव कुलाबा पहुंचे और आंगे्र बंधुओं के आपसी विवाद का समाधान करने हेतु पद और अधिकार क्षेत्र का बंटवारा किया। अगस्त में सतारा पहुंच बाजीराव ने शाहु से विचार-विमर्श किया और विजयादशमी पर उत्तर हिंदुस्थान की ओर कूच कर गए। बंटवारे से आंगे्र बंधुओं का विवाद समाप्त नहीं हुआ, अपितु संभाजी आंगे्र ने सिद्दी सात से मित्रता कर ली। आंगे्र भाइयों की आपसी फूट का लाभ उठाते हुए सिद्दी सात ने मानाजी पर हमला बोल दिया। इस संकटपूर्ण स्थिति में मानाजी आंगे्र के लिए एक ही आशा का केंद्र था - पेशवा बाजीराव। 

मानाजी ने बाजीराव को तत्काल सहायता हेतु पत्र लिखा। तब तक बाजीराव उत्तर हिंदुस्थान के लिए रवाना हो चूके थे। ऐसे में मानाजी की गुहार सुनकर पेशवा बाजीराव के अनुज चिमाजी अप्पा 13 अप्रैल 1736 को सतारा से दौड चले और कुलाबा होते हुए 18 अप्रैल को चरई के निकट श्रीगांव पहुंचे जहां दोनो सेनाएं आमने-सामने हुई। घनघोर लडाई में सिद्दी सात सरदार याकूब खान जब मारा गया तो मराठों का मनोबल ऊंचा उठा। शीघ्र ही मराठा वीर नानाजीराव सुर्वे से सीधी लढ़ाई में सिद्दी सात भी मारा गया। वैसे चरई की यह लडाई कोई बहुत बडी नहीं थी। फिर भी सिद्दी सात के मारे जाने से उसका बहुत बडा महत्व था। सिद्दी सात ने ही 1727 की शिवरात्रि पर चिपलुन के भगवान परशुराम मंदिर का विध्वंस किया था। इस जालिम की यह कुख्याति थी कि वह भयंकर अत्याचारी था। मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट करना, देवता प्रतिमा के अभिषेक पात्र को अपने पीकदान के रुप में इस्तेमाल कर हिंदू धर्म का अपमान करने में उसे गर्व था।  अपने हरम हेतु सुंदर हिंदू ललनाओं का विशेषतः उच्च वर्ण की नारियों का अपहरण करवाता, उन्हें दासी-लौंडी बनाकर रखता। हिंदुओं को अपमानित करने के मंतव्य से वह इन धर्मभ्रष्ट की गई ललनाओं को हिंदू वेशभूषा में रहने, बिंदी लगाने को प्रोत्साहित करता था। सिद्दी सात की दुष्ट प्रकृति के कारण ही उसे उन दिनों दैत्य की संज्ञा दी जाती थी और उसके मारे जाने पर उसे रावण वध बतलाया गया।

बाजीराव का लक्ष्य मात्र कोकण या महाराष्ट्र नहीं तो समूचे हिंदुस्थान को विदेशी-विधर्मियों से मुक्ति अर्थात्‌ वीर शिवाजी के हिंदवी स्वराज्य की हिंदुपदपादशाही के रुप में प्रस्थापित करने का था। इसलिए उनकी दृष्टि में जंजीरा मुहिम गौण थी और उनकी घुडदौड उत्तरी हिंदुस्थान की ओर दिल्ली की दिशा में रही। बाजीराव का रणघोष था - 'चलो दिल्ली - चलो दिल्ली।"

No comments:

Post a Comment