Sunday, 27 August 2017

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 2 - मंगल का प्रतीक स्वस्तिक

हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 2 - 
मंगल का प्रतीक स्वस्तिक
शिरीष सप्रे

भारतीय दर्शन की तत्त्वता, विस्तृत चिंतन, कल्पना, संपूर्ण विश्व का सार, भारतीय संस्कृति की झलक उसके विभिन्न धर्मों में समान रुप से प्रयुक्त होनेवाले प्रतीक चिन्हों में निहित है। जिनकी रचना हमारे मंत्रसृष्टा ऋषियों ने अपने आध्यात्मिक अनुभवों और भावों को व्यक्त करने के लिए की। परंतु, इनका भाव समझने के स्थान पर हमने उन्हें केवल कर्मकांड तक ही सीमित करके रख दिया फलस्वरुप मूल्यहीनता उत्पन्न हो गई है। जिन प्रतीक चिन्हों को अल्पाधिक रुप में संपूर्ण विश्व के धर्मों में स्थान मिला हुआ है, जो मनुष्य को जीवन की सर्वोत्कृष्टता की ओर प्रेरित करते हैं, उनके मर्म को हमने भूला दिया है। इसलिए हमारे सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन में प्रयुक्त होनेवाले मंगलकारी स्वस्तिक का भावार्थ यहां प्रस्तुत है।

स्वस्तिक शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है। 'स्वस्तिक" शब्द 'सु, अस, क" से बना है। 'सु" का अर्थ 'अच्छा", 'अस" यानी 'सत्ता" या 'अस्तित्व" और 'क" का अर्थ 'कर्ता" या करनेवाला। इस प्रकार 'स्वस्तिक" का अर्थ हुआ 'अच्छा" या 'मंगल" करनेवाला। यही स्वस्तिक की भावना है। 'अमरकोश" में भी 'स्वस्तिक" का अर्थ 'आशीर्वाद", मंगल या पुण्य करनेवाला लिखा है। 'अमरकोश" के शब्द हैं- 'स्वस्तिक सर्वतोऋद्ध" अर्थात्‌ 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो"। इस प्रकार 'स्वस्तिक शब्द में किसी व्यक्ति विशेष का नहीं अपितु सम्पूर्ण के कल्याण या 'वसुधैवकुटुम्बकम्‌" की भावना निहित है। 'स्वस्तिक" शब्द की निरुक्ति है - 'स्वस्तिक क्षेम कायति इति स्वस्तिकः" अर्थात्‌ कुशलक्षेम या कल्याण का प्रतीक ही 'स्वस्तिक" है। स्वस्तिक में चार दिशाएं हैं, यानी स्वस्तिक का कार्य हुआ हर दिशा में व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देना।

स्वस्तिक का प्रारंभिक आकार एक खडी रेखा और उसके ऊपर दूसरी आडी रेखा के रुप में था। यह दो रेखाएं पुरुष और प्रकृति की प्रतीक हैं। इसमें खडी रेखा ज्योतिर्लिंग का प्रतीक है। वैदिक साहित्य में ज्योतिर्लिंग को विश्वोत्पत्ति का मूल कारण माना गया है। स्वस्तिक की खडी रेखा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है और आडी रेखा सृष्टि के विस्तार तथा विकास का द्योतक है। सृष्टि की रचना ईश्वर ने की और सभी देवताओं ने अपनी शक्ति देकर इसका विस्तार किया- यही स्वस्तिक का भाव है। स्वस्तिक का मध्य बिंदु विष्णु का नाभिकमल माना गया है और नाभिकमल से ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी का जन्म हुआ है। इसलिए स्वस्तिक को सृजन शक्ति का प्रतीक माना गया है। इसका आरंभिक आकार गणित के धन चिन्ह का है इसलिए स्वस्तिक जोड का, मिलन का प्रतीक है। धन चिंह की चारों भुजाओं के सिरों पर एक-एक रेखा जोडी दी जाए तो स्वस्तिक बन जाता है। 

स्वस्तिक महाप्रतीक है भारतीयता का, कर्मठता का, जागरुकता का। उसके पास तिरस्कार नहीं, ओछे लोगों के प्रति मात्र करुणा है। वह उनका संहार नहीं करता, वरन्‌ उनका सुधार करता है, जो अच्छे हैं वे आगे बढ़ें और बुरे हैं, वे सुधरें मगर वे भी आगे बढ़ें। इसीलिए स्वस्तिक जीवन, जागरण और कर्मयोग का महान संदेश वाहक है।

भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक चिन्ह को विष्णु, सूर्य, सृष्टि-चक्र तथा संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वानों ने इसे गणेश का प्रतीक मानकर इसे भी गणेशजी के समान प्रथम वंदनीय माना है। पुराणों में इसे सुदर्शन चक्र का प्रतीक माना गया है। वायवीय संहिता में स्वस्तिक को आठ यौगिक आसनों में एक बतलाया गया है। यास्काचार्य ने इसे ब्रह्म ही का स्वरुप माना है। स्वस्तिक में बननेवाले चार समकोणो को चार देवताओं का प्रतीक माना गया है। कुछ विद्वान इसकी चार भुजाओं को हिंदुओं के चार वर्णों की एकता का प्रतीक मानते है। इन भुजाओं को ब्रह्मा के चार मुख, चार हाथ और वेदों के रुप में भी स्वीकार किया गया है। स्वस्तिक का धनात्मक चिन्ह अधिकता या सम्पन्नता का प्रतीक है। एक पारंपरिक मान्यता के अनुसार चतुर्मास में स्वस्तिक व्रत करने तथा मंदिर में अष्टदल से स्वस्तिक बनाकर उसका पूजन करने से महिलाओं में वैधव्य का भय नहीं रहता। पद्‌म पुराण में इससे संबंधित कथा भी है।  

अत्यंत प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति में स्वस्तिक को मंगल का प्रतीक मानकर कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ करने के पूर्व स्वस्तिक चिन्ह को अंकित कर उसका पूजन किया जाता है। विद्वानों की धारणा है कि यह वेदों से भी प्राचीन है। स्वस्तिक में देवताओं की शक्ति और मनुष्य की शुभकामनाओं का सम्मिलित सामर्थ्य है। क्योंकि, वर्षा के मेघ, मेघों को गतिशील करनेवाली वायु, प्रकाश और उष्णता प्रदान करनेवाला सूर्य देवता, मनुष्य के शुभाशुभ कर्मों का ध्यान देनेवाले वरुण देवता, प्राणियों को धारण करनेवाली वसुंधरा पृथ्वी, सृष्टि के निर्माणकर्ता ब्रह्मा, पालनहार विष्णु, संहारक शिवजी, रिद्धी-सिद्धी के देवता गणेशजी सहित अनेक देवताओं की शक्ति का समावेश स्वस्तिक में है।

स्वस्तिक की आकृति आविष्कृत नहीं है। स्वस्तिक आकृति की उत्पत्ति 'ऊँ" प्रणव का ही एक रुप है, जो सर्वस्थ ब्रह्मांड में गूंजायमान है। अगर चार 'ऊॅँ" की आकृति को एक दूसरे की पीठ से जोड दिया जाए तो जो आकृति बनती है, वह स्वस्तिक की ही है। यह ऊँ का ही स्वरुप है, जो आज भी इस सृष्टि पर विद्यमान है। इस आकृति के निर्माण से दसों दिशा, नौ ग्रह, बारह राशि, तैंतीस करोड देवताओं का आवाहन बोध होता है। जैन, बौद्धधर्म के 24 तीर्थंकर, नवकार मंत्र का बोध कराता है। क्योंकि, स्वस्तिक की उत्पत्ति ऊँ से हुई है और हर भाषा में पहला अक्षर 'अ" विद्यमान है। सभी धर्मों में यह विद्यमान है। इसीलिए हर शुभ कार्य को करने के पूर्व स्वस्तिक की आकृति बनाई जाती है। इसे सर्वप्रथम इसलिए भी बनाया जाता है क्योंकि, इससे वास्तुदोष का निराकरण हो जाता है।

स्वस्तिक चिन्ह का प्रयोग मांगलिक कार्यों में वर्तमान में जितना व्यापक है उतना ही पहले भी था यह इतिहास सिद्ध है। सिंधुघाटी की सभ्यता में इसका उल्लेख पाया जाता है। उस समय पशुओं के शरीर पर यह चिन्ह अंकित किया जाता था। मोहनजोदडी की एक मुद्रा पर एक हाथी स्वस्तिक के आगे झुका हुआ दिखाया गया है। सिंधु घाटी से प्राप्त बर्तनों और मुद्राओं पर हमें स्वस्तिक की आकृतियां खुदी हुई मिली हैं जो इसकी प्राचीनता का ज्वलंत प्रमाण है। सिंधु 'पद्मपुराण" में वर्णित 16 चिन्हों में स्वस्तिक प्रमुख है। आज भी स्वस्तिक सनातनी हिंदु, जैन और बौद्ध धर्मों में समान रुप से अपनाया गया है। इसका प्रतीकार्थ भाव गहन है।

सनातनियों के समान ही जैन और बौद्धधर्म के अनुयायी भी स्वस्तिक को मंगलकारी, शांति और समृद्धि प्रदान करनेवाला प्रतीक चिन्ह मानते हैं। जैनधर्म में स्वीकृत चौबीस चिन्हों में स्वस्तिक एक प्रधान चिन्ह है। जैन परम्परा में मांगलिक प्रतीक के रुप में स्वीकृत अष्ट मंगल द्रव्यों में स्वस्तिक का स्थान सर्वोपरि है। स्वस्तिक चिन्ह की चार रेखाओं को चार प्रकार के मंगल का प्रतीक माना जाता है। वे हैं - अरिहंत मंगल, सिद्ध मंगल, साहू मंगल और केवलिपण्णतों धम्मो मंगल। जैनधर्म जिस स्वस्तिक को पवित्र चिन्ह मानता है, उसकी आकृति में स्वस्तिक के ऊपर एक चंद्रबिंदु तथा चंद्रबिंदु के नीचे तीन बिंदु अंकित हैं। इसमें चंद्रबिंदु मुक्ति का प्रतीक है तथा अन्य तीन बिंदु ज्ञान, दर्शन और चरित्र के प्रतीक हैं। बौद्ध मान्यता के अनुसार पत्तों तथा पुष्पों यानी वनस्पति संपदा की उत्पत्ति का कारण स्वस्तिक ही है। बौद्ध मंदिरों में लगाए जानेवाले दीपकों पर भी स्वस्तिक चिन्ह अंकित किया जाता है। बौद्ध विहारों, स्तूपों, मंदिरों में स्वस्तिक चिन्ह मिलता है। बुद्ध की मूर्तियों पर उनके चित्रों पर भी प्रायः स्वस्तिक चिन्ह मिलते हैं। विदेशों में इस मंगल प्रतीक के प्रचार प्रसार में बौद्ध धर्म के प्रचारकों का बहुत योगदान रहा है।


कुल निष्कर्ष यह निकलता है कि स्वस्तिक मानव जीवन के अधिक निकट है और इसका प्रतीकार्थ भाव गहन है। स्वस्तिक की चार भुजाएं चारों दिशाओं की प्रतीक हैं। जो प्रेरित करती हैं कि हम चारों दिशाओं में बढ़ें। चार भुजाएं मानव जीवन का सार है, आधार हैं।  स्वस्तिक यह भी निर्देशित करता है कि, विभिन्न दिशाओं में हम अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए तेज, यश, सामर्थ्य को जुटाएं। स्वस्तिक की चार भुजाएं बीच में से पृथक-पृथक दिशा की ओर गमन करती हैं। जो इस बात की प्रतीक हैं कि आओ हम संगठित होकर  चारों दिशाओं में उद्यम के लिए गमन करें। समता, सहकार्य, एकता और संतुलन जैसे जीवन मुल्यों को स्थापित करें। 

Thursday, 17 August 2017

18 अगस्त पेशवा बाजीराव (प्रथम) जयंती
महान योद्धा अजेय बाजीराव पेशवा (प्रथम)
शिरीष सप्रे

विश्व का इतिहास कई महान सभ्यताओं के उत्थान और पतन की दास्तां है, गवाह है। इतिहास गवाह है कि अपने दीर्घकालीन इतिहास में हिंदू सभ्यता ने हमेशा से ही दूसरों के आक्रमणों, प्रयत्नों को सहा है परंतु, कभी स्वयं होकर किसी सभ्यता या संस्कृति को समाप्त करने के लिए सीमोल्लंघन कर उन्हें नष्ट करने का प्रयास नहीं किया है। हालांकि हिंदू सभ्यता में भी एक से बढ़कर एक वीर उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने समय समय पर उठकर इस प्रकार के आक्रांताओं का मुकाबला कर अपनी मातृभूमि की रक्षा की है। भारत के इतिहास में ऐसे ही एक महान योद्धा, हिंदूधर्म संरक्षक के रुप में प्रख्यात नाम है 18 अगस्त 1700 में पैदा हुए बाजीराव पेशवा (प्रथम)। जिन्होंने अपने अद्‌भुत पराक्रम द्वारा एक नया गौरवशाली इतिहास रचा। बीस वर्ष के अपने कार्यकाल में उन्होंने अपने धुआंधार विविध अभियानों में लगभग पौने दो लाख कि.मी. की घुडदौड कर 'देवदत्त सेनानी" के रुप में लोकप्रियता हासिल की तथा मराठा साम्राज्य की धाक पूरे भारत में निर्मित कर दी।

बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक की सनकी नीतियों से त्रस्त हो उसके सरदारों ने विद्रोह कर दिया और अपने में से ही एक हसन खां को जफर खां की उपाधि दी। 3 अगस्त 1347 को अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमन शाह के नाम से सुल्तान घोषित कर दिया। इस प्रकार से दक्षिण भारत में स्वतंत्र मुस्लिम सल्तनत की नींव पडी। 1487 में बहमनी सल्तनत के सुल्तान मुहम्मदशाह तृतीय की मृत्यु के पश्चात उसके पांच प्रमुख सरदारों ने विद्रोह कर अपनी पांच सल्तनतें कायम कर ली। इनमें से एक थी बीजापुर की आदिलशाही (न्यायनिष्ठ)(1849) जिसका संस्थापक सुल्तान था सूबेदार युसूफ आदिलखां। वह स्वयं को आदिलशाह (न्यायनिष्ठ सुल्तान) कहलाता था। यूसुफ मूलतः तुर्किस्तान के शाही परिवार से था। अपने ही भाई द्वारा हत्या के डर से वह कुस्तुंतुनिया (इस्तंबूल) से भाग खडा हुआ और अपनी असलियत छुपाने के लिए गुलाम के रुप में बिक गया। गुलामों का व्यापारी अलाद्दीन उसे हिंदुस्तान ले आया और बहमनी राज्य के मंत्री महमूद गावान के हाथ बेच दिया। अपनी योग्यता के बल पर वह बहमनी सुल्तान मुहम्मद शाह तृतीय की नजरों में चढ़ा और सरदार बन गया। बीजापूर सूबे का सूबेदार यही यूसुफखां था। इसने अपने विश्वासपात्रों के रुप मे अफ्रीका के गुलामों को अपने मातहत रखा। इस प्रकार पंद्रहवी सदी के अंतिम काल से दक्षिणी हिंदुस्तान में अफ्रीकी गुलाम मूलतः बहमनी सल्तनत में लाए गए और उसके विघटन के बाद दक्षिण की पांचों मुस्लिम सल्तनतों में बढ़ते चले गए। अबीसीनिया के यह हबशी ही 'जंजीरा" और उसके आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा जमानेवाले सिद्दी थे।

सबसे पहले हम 'जंजीरा" के अर्थ को समझ लें। 'जंजीरा" सागर के बीच में होनेवाले टापू या द्वीप को अरबी भाषा में 'जंजीर" कहा जाता है। दक्षिण भारत के पश्चिमी किनारे के उत्तरी हिस्से अर्थात्‌ कोंकण प्रदेश (महाराष्ट्र) के रायगढ़ जिले में 'मुरुड", 'राजापुरी खाडी" के मुंहाने पर अरब सागर पर बने हुए एक किले को 'जंजीरा" कहते हैं। पौने पांच सौ वर्ष इस किले को बनानेवाले सिद्दी बुरहानखां ने जब  इस किले को देखा तो उसके मुंह से निकल पडा 'जंजीरे माहरुब"। अर्थात्‌ उसको यह जलदुर्ग एक 'चंद्ररेखा" सा द्वीप लगा। सागर मध्य स्थित दुर्ग को संस्कृत में 'उद्‌धिमध्यस्त वरीदुर्ग" कहा जाता है। बुरहानखां द्वारा इसे बनाए जाने के पूर्व इसका स्वरुप कच्चा था। उसे उसके निर्माता कोली (जाति) के लोग स्थानीय बोली में मेढ़े कोट यानी लकडी के लठ्ठो को एक के ऊपर एक रखकर किया गया निर्माण कहते थे। संभव है संभ्रान्त उच्च कुलीन लोग उन दिनों 'जंजीरा" को 'उद्‌धिमध्यस्त वरीदुर्ग" कहते हों। किसी साहित्यकार, कवि ने अपनी रचना में उसका वर्णन इस प्रकार किया हो। वैसे दूर से यह किला एक विराट कछुए के आकार जैसा दिखाई देता है। अतः किसी ने इसे कच्छप दुर्ग भी कहा हो। जंजीरा के निर्माण की पृष्ठभूमि इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

बहमनी सल्तनत के विघटन के बाद बनी निजामशाही का संस्थापक था निजामुलमुल्क बहरी काबेरा मलिक अहमद। अरब सागर के किनारे का कोंकण इलाका अहमदनगर की इस निजामशाही के कब्जे में रहा। राजापुरी खाडी के मुहाने पर कोली नेता राम पाटिल ने निजामशाही से विधिवत अनुमति लेकर मेढ़े कोट यानी लकडी के लट्ठों से बना किला बनाया। राम पाटिल के बाद कोली नेता एतयार राव ने उस पर अधिकार जमाया और निजामशाही से स्वयं को स्वतंत्र समझने लगा। तब निजामशाही की ओर से सिद्दी पीरमखान को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा गया। आक्रमण में सारे कोली मार दिए गए और मेढ़े कोट निजामशाही के कब्जे में आ गया। पीरमखान के बाद आए बुरहान खान के दिमाग में मेढ़े कोट के स्थान पर पत्थरों का एक मजबूत किला बनाने का विचार आया। 1556 से 1571 तक सैंकडों कारीगरों-मजदूरों की दिन-रात की मेहनत से जंजीरा जैसा मजबूत सागर दुर्ग बनकर खडा हुआ।

जंजीरा दुर्ग इतना मजबूत और महत्वपूर्ण था कि, दक्षिण हिंदुस्तान पर अपनी धाक जमानेवाले छत्रपति शिवाजी महाराज ने मई 1669, 1675 और फिर 1678 में दो बार जंजीरा को अपने अधिकार में करने के लिए सैनिकी अभियान चलाए पर सफल न हो सके। उनके पश्चात छत्रपति संभाजी भी सफलता न प्राप्त कर सके। 1633 में निजामशाही शाहजहां के शासनकाल में मुगलों के कब्जे में आ गई और सिद्दी मुगलों के ताबेदार हो गए। औरंगजेब की मृत्यु के बाद सिद्दी घराने के वंशजों ने स्वतंत्र हो स्वयं की जंजीरा सल्तनत बना ली। जंजीरा जैसा दृढ़ दुर्ग कहीं मराठों के कब्जे में ना चला जाए इसलिए पुर्तगालियों और अंग्रेजों ने समय समय पर सिद्दियों की मदत की जिसके कारण जंजीरा अजेय बना गया।

इसी सिद्दी सुल्तान के आतंक और अत्याचार से त्रस्त हो छत्रपति शाहू के पेशवा बालाजी विश्वनाथ कोंकण से पलायन कर सत्रहवीं सदी के अंत में देश (दक्खन का पठार) पर पहुंचे थे। उनके जैसे अनेकों को अपनी जान-माल की रक्षा के लिए अपनी जन्मभूमि से भागना पडा था। पेशवा भला इस इतिहास कैसे भूलते? 8 फरवरी 1727 को शिवरात्री पर सिद्दी की फौजों ने चिपलून के पास भगवान परशुराम के पवित्र मंदिर पर हमला कर उसका विध्वंस कर खूब लूटखसोट की थी। भगवान परशुराम का यह ख्यात पवित्र मंदिर छत्रपति, पेशवा और अनेक मराठा सरदारों के लिए श्रद्धेय ब्रह्मेंद्रस्वामी के अधिकार एवं व्यवस्था में था। अतः सिद्दी को सबक सीखाने की इच्छा सभी में तीव्रतर थी। अपनी शक्ति बढ़ी है इसलिए जंजीरा राज्य को निगलने की शाहू या बाजीराव की नवीन योजना नहीं थी तो, 1718 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ द्वारा दिल्ली में मुगल बादशाह के सामने जो लिखित मांगें पेश की गई थी, उनमें भी स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि, ''हबशियों के कब्जे में हमारे जो गढ़-किले हैं वे सब हमें दिए जाएं और जो मुल्क है वह भी दिया जाए। यदि वह देने को राजी ना हो तो बादशाही फौजों के द्वारा दबाव डालकर, ताकीद देकर वे हमें सौंप दिए जाएं।""

सिद्दी को सबक सीखाना भी अब आवश्यक हो चूका था अतः छत्रपति शाहू ने 'जंजीरा मुहिम" को हाथ में लेने का निश्चय किया। संयोग से सिद्दी रसूलखान की अकस्मात्‌ मृत्यु हो गई। उसके छः बेटों में से बडे अब्दुल्ला की ताजपोशी हो गई परंतु, सत्ता की राजनीति में उसकी हत्या हो गई। अब्दुल्ला का बेटा रहमान अपने पिता हश्र देखकर डर गया और भागकर मराठों की छावनी में जा पहुंचा। परिस्थितियों को अनुकूल देख बाजीराव ने छत्रपति के विश्वसनीय फत्तेसिंह भोंसले को साथ ले 26 अपैल 1733 को कूच कर दिया। सिद्दी की नौसेना के जहाजों पर कब्जा कर लिया और रायगढ़ को भी जीत लिया। परंतु, मरहठों की आपसी धडेबंदी से जंजीरा मुहिम ने अपनी गंभीरता खो दी। बाजीराव इससे व्यथित हो गए। आपसी फूट के चलते मराठों का जीतना असंभव सा हो गया था। अतः बाजीराव ने 1 दिसंबर 1733 को अंग्रेजों की मध्यस्थता से जंजीरा के सिद्दी से संधि कर ली। संधि के अनुसार मराठों की शरण में आए रहमान को गद्दी पर बैठाया गया। बैठे ठाले समय काटना बाजीराव के स्वभाव में नहीं था अतः जंजीरा से वापस आकर वे अप्रैल 1734 में खानदेश चल गए। इस समझौते की स्याही सूखने भी नहीं पाई थी कि सिद्दी रायगढ़ को पुनः हासिल करने के लिए आगे बढ़ा। छत्रपति के आदेश पर मराठा सेनाएं आगे बढ़ी। रायगढ़ में दोनो सेनाओं में जमकर लढ़ाई हुई, जिसमें एक प्रमुख सिद्दी सरदार अंबर अफवानी के मारे जाने पर सिद्दी फौजें आए रास्ते से भाग खडी हुई। अपने घर पहुंचे सिद्दी ने अंग्रेजों-पुर्तगालियों की सहायता एवं मार्गदर्शन प्राप्त कर लिया। अब बरसात का मौसम था अतः विवश हो मराठा सेनाओं को वापिस जाना पडा। 

बाजीराव के पिताश्री पेशवा बालाजी विश्वनाथ और नौसेना प्रमुख सरखेल कान्होजी आंग्रे में घनिष्ठ मित्रता थी। उनकी अगली पीढ़ी में भी सौहार्द यथावत रहा। ऐसे में जनवरी 1735 में बाजीराव कुलाबा पहुंचे और आंगे्र बंधुओं के आपसी विवाद का समाधान करने हेतु पद और अधिकार क्षेत्र का बंटवारा किया। अगस्त में सतारा पहुंच बाजीराव ने शाहु से विचार-विमर्श किया और विजयादशमी पर उत्तर हिंदुस्थान की ओर कूच कर गए। बंटवारे से आंगे्र बंधुओं का विवाद समाप्त नहीं हुआ, अपितु संभाजी आंगे्र ने सिद्दी सात से मित्रता कर ली। आंगे्र भाइयों की आपसी फूट का लाभ उठाते हुए सिद्दी सात ने मानाजी पर हमला बोल दिया। इस संकटपूर्ण स्थिति में मानाजी आंगे्र के लिए एक ही आशा का केंद्र था - पेशवा बाजीराव। 

मानाजी ने बाजीराव को तत्काल सहायता हेतु पत्र लिखा। तब तक बाजीराव उत्तर हिंदुस्थान के लिए रवाना हो चूके थे। ऐसे में मानाजी की गुहार सुनकर पेशवा बाजीराव के अनुज चिमाजी अप्पा 13 अप्रैल 1736 को सतारा से दौड चले और कुलाबा होते हुए 18 अप्रैल को चरई के निकट श्रीगांव पहुंचे जहां दोनो सेनाएं आमने-सामने हुई। घनघोर लडाई में सिद्दी सात सरदार याकूब खान जब मारा गया तो मराठों का मनोबल ऊंचा उठा। शीघ्र ही मराठा वीर नानाजीराव सुर्वे से सीधी लढ़ाई में सिद्दी सात भी मारा गया। वैसे चरई की यह लडाई कोई बहुत बडी नहीं थी। फिर भी सिद्दी सात के मारे जाने से उसका बहुत बडा महत्व था। सिद्दी सात ने ही 1727 की शिवरात्रि पर चिपलुन के भगवान परशुराम मंदिर का विध्वंस किया था। इस जालिम की यह कुख्याति थी कि वह भयंकर अत्याचारी था। मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट करना, देवता प्रतिमा के अभिषेक पात्र को अपने पीकदान के रुप में इस्तेमाल कर हिंदू धर्म का अपमान करने में उसे गर्व था।  अपने हरम हेतु सुंदर हिंदू ललनाओं का विशेषतः उच्च वर्ण की नारियों का अपहरण करवाता, उन्हें दासी-लौंडी बनाकर रखता। हिंदुओं को अपमानित करने के मंतव्य से वह इन धर्मभ्रष्ट की गई ललनाओं को हिंदू वेशभूषा में रहने, बिंदी लगाने को प्रोत्साहित करता था। सिद्दी सात की दुष्ट प्रकृति के कारण ही उसे उन दिनों दैत्य की संज्ञा दी जाती थी और उसके मारे जाने पर उसे रावण वध बतलाया गया।

बाजीराव का लक्ष्य मात्र कोकण या महाराष्ट्र नहीं तो समूचे हिंदुस्थान को विदेशी-विधर्मियों से मुक्ति अर्थात्‌ वीर शिवाजी के हिंदवी स्वराज्य की हिंदुपदपादशाही के रुप में प्रस्थापित करने का था। इसलिए उनकी दृष्टि में जंजीरा मुहिम गौण थी और उनकी घुडदौड उत्तरी हिंदुस्थान की ओर दिल्ली की दिशा में रही। बाजीराव का रणघोष था - 'चलो दिल्ली - चलो दिल्ली।"
हमारे धार्मिक प्रतीक चिन्ह एवं पद्धतियां 1 -
असाधारण महत्व है तिलक का
शिरीष सप्रे

हिंदू परंपरा में मस्तक पर तिलक या टीका लगाना धार्मिक परंपरा के साथ जुडा हुआ है। पूजा और भक्ति का एक अभिन्न अंग है तिलक। प्रत्येक शुभ अवसर पर ऐसा करना प्रसन्नता, सात्विकता, यश का प्रतीक माना जाता है। भारतीय संस्कृति में पूजा-अर्चना, कथा, यज्ञ-हवन, संस्कार विधि, मंगल कार्य, शुभ कार्यों के आरंभ में, यात्रा गमन, किसी महत्वपूर्ण कार्य पर जाने, विजय अभियान पर निकलने, आदि में रोली, हल्दी, चंदन या कुमकुम का तिलक किया जाता है। तिलक को अक्षत से भी विभूषित किया जाता है। तीर्थों में देवदर्शन हेतु उपस्थित होने पर वहां माथे पर तिलक लगाकर शुभकामना दी जाती है। पर्व-त्यौहारों में, अतिथियों के आगमन पर तिलक लगाकर स्वागत किया जाता है। यह सब दिखने में सामान्य एवं औपचारिकता जैसा भले ही लगता हो परंतु, इसका महत्व असाधारण है।

परंतु, आश्चर्य की बात यह है कि, कई लोग जो अधिकतर मंगलवार और शनिवार को माथे पर तिलक लगाए घूमते हुए मिल जाएंगे।  जब उनसे पूछा जाए कि यह टीका लगाने का उद्देश्य क्या है? तो, अधिकांश लोग आपको अनभिज्ञ मिलेंगे। कुछ लोग यह उत्तर देंगे कि, मंदिर में पूजा या चढ़ावा चढ़ाने के बाद पुजारी माथे पर तिलक लगा देता है। कुछ कहेंगे कि चरणामृत लेने की तरह ही तिलक लगवाना एक धार्मिक क्रिया है, प्रवृत्ति है। कुछ लोग कहेंगे हमने तो कभी इस विषय पर विचार ही नहीं किया। कुछ लोगों के अनुसार माता-पिता एवं अन्य वरिष्ठ लोगों को पूजा के बाद तिलक लगाते देखा है इसलिए हम भी पूजा के पश्चात तिलक लगाते हैं।

वस्तुतः यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि, ललाट पर टीका या तिलक जिस स्थान पर लगाया जाता है, वह स्थान दोनो भौंहों की बीच नासिका के ऊपर प्रारंभिक स्थल पर है। यह हमारे चिंतन-मनन का स्थान है। यह चेतन-अवचेतन अवस्था में भी जागृत एवं सक्रिय रहता है, इसे भ्रू-मध्य या आज्ञाचक्र कहते हैं। शरीर शास्त्र के अनुसार यह स्थान पीनियल ग्रंथी का है। प्रकाश से इसका गहरा संबंध होता है। प्रयोगों में जब किसी व्यक्ति की आंखों पर पट्टी बांधकर, सिर को ढ़ंककर उसकी पीनियल ग्रंथी को उद्दीप्त किया गया, तो उसे मस्तक के अंदर प्रकाश की अनुभूति हुई। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि, ध्यान-धारणा के माध्यम से साधक में जो  प्रकाश का अवतरण होता है, उसका का कोई ना कोई संबंध इस स्थूल अवयव से अवश्य है। 

आज्ञाचक्र या पीनियल ग्रंथी के इस स्थान को तिलक के लिए चुना गया है ताकि इसे उद्दीपन मिलता रहे और वहां से संबंद्ध स्थूल सूक्ष्म अवयव जागरण की प्रक्रिया से जुडे रहें। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि, दोनो भौंहों के बीच कुछ अतिरिक्त संवेदनशीलता होती है। यदि हम आंखें बंद करके बैठ जाएं और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की ओर तर्जनी उंगली ले जाए तो, हमें वहां कुछ विचित्र अनुभव होता है। यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इसलिए उस केंद्र पर जब तिलक लगाया जाता है तो, उससे आज्ञाचक्र को नियमित रुप से उत्तेजना मिलती रहती है। इस आज्ञचक्र के एक ओर अजिमा नाडी होती है तथा दूसरी ओर वर्णा नाडी। इन दोनो के संगम बिंदु पर स्थित चक्र को निर्मल, विवेकशील, ऊर्जावान, जागृत रखने के साथ ही तनावमुक्त रहने हेतु ही तिलक लगाया जाता है। इस बिंदु पर सौभाग्यसूचक द्रव्य जैसे चंदन, केशर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से सात्विक एवं तेजपूर्ण होकर आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है, मन में निर्मलता, शांति एवं संयम में वृद्धि होती है।

तिलक महज परंपरावश नहीं लगाया जाता। पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग है तिलक। इसका प्रयोजन बहुत गहन होता है। यह मस्तक पर इष्ट के प्रतीक के रुप में होता है, जो इष्ट की स्मृति को बनाए रखता है। माथे पर तिलक लगाना यह हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण परंपरा है। साधू-संत लगभग 80 प्रकार के तिलक लगाते हैं। माथे पर लगा तिलक विभिन्न मत-मतांतरों का भी परिचायक होता है। सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं- शैव - संप्रदाय के साधू चंदन की आडी रेखा या त्रिपुंड लगाते हैं। अधिकतर शैव सन्यासी त्रिपुंड तिलक लगाते हैं क्योंकि, यह शिवजी के श्रृंगार का एक भाग है। शाक्त - सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है। वैष्णव - संप्रदाय में 64 प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं ः लालाश्री तिलक, विष्णुस्वामी तिलक, रामानंद तिलक, श्यामश्री तिलक। गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु-सन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं। 

तंत्र शास्त्र के एक विशेषज्ञ के अनुसार टीका लगाने का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति को किसी भी तांत्रिक की सम्मोहिनी शक्ति से बचाना है। किसी भी व्यक्ति को सम्मोहित करने के लिए उसकी आंखों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है, किंतु माथे पर टीका लगा होने के कारण ेकेवल दो आंखों पर ध्यान केंद्रित करना असंभव हो जाता है। यही वजह है कि जब बौद्ध धर्म की महायान तांत्रिक साधना चरम पर थी तब वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों ने तिलक लगाने की परंपरा आरंभ की थी। टीका लगाने के संबंध में शैव परंपरा के मतावलंबियों की दूसरी ही धारणा है। उनका कहना है कि, माथे पर लगा तिलक तृतीय नेत्र का प्रतीक है। तीसरी दृष्टि मानव की सहप्रकृति है किंतु, कालांतर में वह दृष्टि धूमिल पडते-पडते समाप्त हो गई। माथे पर टीका लगाकर इसी समाप्तप्राय दृष्टि को जागृत करने का प्रयास किया जाता है।

तिलक द्रव्य के रुप में विभिन्न प्रकार की सामग्रियों को प्रयोग में लाया जाता है। प्रायः तिलक चंदन का लगाया जाता है। चंदन शीतल प्रकृति का होता है और जब माथे पर लगाया जाता है तो भाव यह रहता है कि चिंतन का केंद्र मस्तिष्क शीतल रहे। श्वेत और रक्तचंदन भक्ति के प्रतीक हैं। इनका प्रयोग भजनानंदी लोग करते हैं। गोरोचन व केशर ज्ञान और वैराग्य के प्रतीक हैं। ज्ञानी, तत्वचिंतक और विरक्त ह्रदयी लोग इसको उपयोग में लाते हैं। कस्तूरी ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य सभी का प्रतीक है। परम अवस्था प्राप्त योगियों द्वारा तिलक में इसका प्रयोग किया जाता है।

तिलक धारण में विभिन्न उद्देश्यों के लिए अलग-अलग उंगलियों के प्रयोग का विधान है। ज्ञान की उपलब्धि के लिए तर्जनी, ऐश्वर्य के लिए मध्यमा, धन-वैभव, सुख-शांति के लिए अनामिका उंगली निहित है। तर्जनी से लाल या श्वेत चंदन, मध्यमा से सिंदूर, अनामिका से केशर, कस्तूरी, गोरोचन का टीका लगाना चाहिए। इनके लिए क्रमशः पूर्व, उत्तर और पश्चिम दिशा निर्धारित है। इस ओर मुंह करके ही इनका तिलक धारण करना चाहिए। अंगूठे से भी तिलक करने की परंपरा है। ऐसा वे ही लोग करते हैं, जो सभी धर्मों और संप्रदायों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं। इस प्रकार यदि हम गौर करें तो पाएंगे कि तिलक या टीका धार्मिक प्रतीक होने के साथ ही साथ इसके पीछे विज्ञान और दर्शन भी है।