Saturday, 22 July 2017

आदि शंकराचार्य - जिन्होंने पुनः वैदिक धर्म की पताका लहराई

आदि शंकराचार्य - जिन्होंने पुनः वैदिक धर्म की पताका लहराई
शिरीष सप्रे

भारतवर्ष आदि काल से ही असाधारण व्यक्तियों के प्रादुर्भाव की भूमि रही है। इन असाधारण व्यक्तियों में से एक हैं आदि शंकराचार्य, जिनका स्थान बहुत ही ऊंचा है। उनकी उपलब्धियां निश्चय ही अद्‌भुत थी। उन्होंने वैदिक धर्म की पताका फिर से संपूर्ण भारतवर्ष में लहराकर अल्प काल में ही इतिहास एवं संस्कृति की धारा ही बदल दी। चार्वाक, कापालिक, शाक्त, सांख्य, बौद्ध, आदि विभिन्न मतों का प्रभाव समाज में जिस कालखंड में था, धर्म के नाम पर अधर्म को स्वीकृति प्राप्त हो गई थी, वामाचार, व्यभिचार ने जडें जमा ली थी, ऐसी  विषम और भयावह स्थिति में आद्य शंकराचार्य ने वैदिक धर्म का, अद्वैत वेदांत का प्रचार कर वैदिक धर्म को पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त करवा लोगों को आध्यात्मिक शांति एवं परम सत्य का मार्ग दिखलाया। उन्होंने एक ही कल्याणकारी उपचार बतलाया वह था एकत्व का बोध, जिसे उपनिषदों में अद्वैत दर्शन कहा गया है।

भारत के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान में उनका योगदान अद्वितीय था। वैदिक धर्म का प्रसार आगे भी होता रहे इसके लिए उन्होंने भारत की चारों दिशाओं में चार मठों ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ), गोवर्धन (जगन्नाथपुरी, ओरिसा), श्रृंगेरी (कर्नाटक रामेश्वरम्‌), द्वारका (द्वारकाधीश गुजरात) चार धामों पर स्थापना की और अपने प्रमुख चार शिष्यों ः पद्यपाद, सुरेश्वर, तोटक और हस्तमालक आचार्यों को मठाधिपति नियुक्त किया। ये चारों धाम आज भी हमारी सांस्कृतिक एकता व अखंडता के प्रतीक हैं। कुंभ मेलों का प्रारंभ कर देश की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करने में अभूतपूर्व योगदान दिया। उपर्युक्त चार मठों से दशनामी संन्यासी परंपरा विकसित हुई। 1. ज्योतिर्मठ - इस मठ के संन्यासी गिरि, पर्वत एवं सागर हुए। 2. गोवर्धन मठ- वन एवं अरण्य संन्यासी हुए। 3. श्रृंगेरी मठ - पुरी, भारती एवं सरस्वती। 4. शारदा मठ - तीर्थ एवं आश्रम। इन्हीं दशनामियों से सात अखाडे बने, जो दशनामी नागा संन्यासियों के अखाडे कहे जाते हैं। 

आदि शंकराचार्य के अभ्युदय को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भगवान शिवशंकर ने अपने आविर्भाव के लिए स्वंय ही उचित स्थान, वंश और काल का निर्णय किया हो। केरल के आलुवा नगर से लगभग बीस कि.मी. की दूरी पर पेरियास या पूर्णा नदी के उत्तरी तट पर स्थित तथा एरनाकुलम जिले के अंतर्गत पावन कालटि गांव के एक नंबूदरीपाद ब्राह्मण परिवार में शंकर का जन्म हुआ। इस प्रकार से विश्वास किया जाता है कि, कालटि ऐसा पुण्य स्थल है जहां पांव रखनेवाले को यमपुरी से मुक्ति मिल जाती है। 'कालः टीकते इति कालटि" अर्थात्‌ जीव के सामने से काल हट जाता है, इसलिए यह गांव कालटि है। उनकी माता आर्यम्बा व पिता शिवगुरु और पितामह विद्याधर थे। दीर्घकाल तक कोई संतान न होने पर साध्वी आर्यम्बा ने पति शिवगुरु को सांत्वना देते हुए कहा ः हमें भगवान शिव की शरण लेना चाहिए, वही सारे विश्व के कल्पवृक्ष हैं। पति तथा पत्नी दोनो ने तृशूर (त्रिचूर) के वटकुंथन मंदिर में प्रतिष्ठापित भगवान महादेव शिव को पूजार्चन से प्रसन्न किया तो उनके वर प्रसाद से शंकर का जन्म हुआ। वे भगवान शंकर का अंशावतार माने जाते हैं। शंकर की जन्मस्थली कई ग्रंथों में प्रकीर्तित है।

शंकर एक अद्‌भुत बालक थे और अत्यंत प्रारंभिक वर्षों में ही उनके अंदर की विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा और ह्रदय की विशालता प्रकट हो गई थी। बाल्यकाल से ही वह श्रुतधर थे, काव्य-पुराण को श्रवण मात्र से ही समझ लिया करते थे। शंकर के जीवन की विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख एक संस्कृत श्लोक में इस प्रकार किया गया है- 'आठ वर्षो की आयु में उन्होंने चारों वेदों का अध्ययन कर लिया। बारह वर्ष की आयु में वह सभी शास्त्रों में पारंगत हो गए थे, सोलह वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपना भाष्य लिखकर पूरा कर दिया था और बत्तीस वर्ष की आयु में इस संसार से प्रस्थान कर गए।" गुरु गृह निवास के नियमानुसार ब्रह्मचारी के रुप में शंकर एक दिन भिक्षा मांगने  किसी दरिद्र ब्राह्मण के द्वार पर जा पहुंचे वहां भिक्षा के रुप में आंवला देनेवाली निर्धन ब्राह्मण पत्नी की दरिद्रता दूर करने के लिए तत्काल महालक्ष्मी की स्तुती की जो कनकधारा के नाम से प्रसिद्ध है। कहते हैं कि शंकर की स्तुती से प्रसन्न होकर महालक्षमी ने आंवला के आकार की सुवर्ण खंडों की वर्षा कर दी। इस प्रकार शंकर ने धर्म सेवा के पथ में जो पृथक कार्य किया वह दरिद्रता से छुटकारा दिलाने का था। मकर प्रसंग के माध्यम से माता के वात्सल्य मोह को रुपांतरित कर उनसे संन्यास की अनुमति प्राप्त कर विविध ज्ञान संपादन करने और सुयोग्य गुरु को ढूंढने के लिए वे बाहर निकले। 

शंकर को गुरु मिले श्रीआचार्य गोविंदपाद। शंकर ने उनसे शिष्य बना लेने की प्रार्थना की। समाधिभंग होने पर आचार्य गोविंद ने उनसे प्रश्न किया 'कौन हो तुम?" उत्तर में शंकर ने उन्हें 'दशश्लोकी" नाम से प्रसिद्ध दस श्लोकों में ब्रह्म का स्वरुप बतलाया, शंकर के मुख से अद्वैत की इतनी सत्य व्याख्या सुनकर आचार्य गोविंद विव्ह्लल हो गए। उनकी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि, उन्हें ज्ञात है कि महादेव शिव ही शंकर का रुप धारण कर वेदांत का ज्ञान देने के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं। 

आपका मूल मंत्र था 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवोब्रह्मैव नापरः"। 'प्रज्ञानं ब्रह्म" (ऋगवेद), 'अहं ब्रह्मास्मि" (यजुर्वेद), 'त्वमसि" (सामवेद) और 'अयमात्माब्रह्म" (अथर्ववेद) इन चार महावाक्यों का उपदेश कर विश्व मानव की आध्यात्मिक शक्ति को जागृत किया। आद्यशंकराचार्य ने पंच देवों के साथ गंगा, यमुना, नर्मदा एवं द्वादश ज्योतिर्लिगों जैसे महान तीर्थ धामों की सुंदर स्तुति रचनाएं की। इससे राष्ट्र की भावनात्मक एवं भौगोलिक एकता का चिरंतन बोध जनता को हुआ। 

दिग्विजयी शंकर भारतवर्ष की परिक्रमा करते रहे और विजय प्राप्त करते रहे प्रयाग में कुमारिल भट्ट तो महेश्वर में मंडन मिश्र जैसे उद्‌भट विद्वानों एवं उच्च कोटि के तार्किकों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के पीछे विभिन्न मत-मतांतरों का खंडन कर उनमें वेदांत के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना था। पुनः सनातन धर्म की प्रतिष्ठापना करना था। आद्यशंकराचार्य ने सर्वजन हिताय संपूर्ण राष्ट्र का कई बार परिभ्रमण किया और लोगों को वेदांत विज्ञान के निहितार्थ का बोध कराया। उन्होंने सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की, उसकी सुषुत्म आत्मा को जगाया और कालांतर में उसमें जो विकार आ गए थे उन्हें दूर किया। सनातन धर्म के शाश्वत सत्य का मार्ग खोज निकालनेवालों में आद्यशंकराचार्य का स्थान अत्यंत ऊंचा है। 

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