Monday, 10 July 2017

शिवलिंग पूजन का महत्व

शिवलिंग पूजन का महत्व
शिरीष सप्रे

लिंग पूजा की परंपरा भारतवर्ष में अतिप्राचीनकाल से ही चली आ रही है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक हमारे यहां असंख्य शिवलिंग हैं, जो एक बहुत बडी संख्या में शिवालयों में स्थापित हैं। भगवान शिवशंकर की मूर्ति की अपेक्षा शिवलिंग का अर्चन ही अधिक होता है। विभिन्न स्थानों पर की गई खुदाई में बडी मात्रा में शिवलिंग मिलते रहे हैं। संसार में शिवलिंगों की संख्या इतनी अधिक है कि, उनकी गणना असंभव सी ही है। क्योंकि, यह समस्त पृथ्वी लिंगमयी और समस्त जग ही लिंगमय है। मोहनजोदडो तथा हडप्पा की खुदाई में भी शिवलिंग मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि, हमारे यहां लिंग पूजन की परंपरा अतिप्राचीन है। शिव पुराण, लिंगपुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण और ब्रह्मपुराण तो मुख्य रुप से शैव साहित्य ही हैं, जिनमें लिंग पूजा की बडी महिमा प्रकट गई है। स्कंद पुराण में कहा गया है - लयनाल्लिंगमुच्यते अर्थात जिसमें लय और प्रलय होता है, उसे ही लिंग कहते हैं।

शिवलिंग पूजन के महत्व के विषय में इस प्रकार कहा गया है - यो न पूजयेत लिंग ब्रह्मादीनां प्रकाशकम्‌। शास्त्र विल्सर्व वेन्तापि चतुर्वेदः प्रशस्तु सः।। ब्रह्मज्ञान को प्रकाशित करनेवाला जो शिवलिंग का पूजन नहीं करता वह चारों वेदों, शास्त्रों का ज्ञाता तथा सर्ववेत्ता होेने पर भी पशु समान है। वेद, शिवपुराण, उपनिषद, आयुर्वेद आदि में अनेक प्रकार के शिवलिंगों की पूजा करने का विधान समग्र रुप से वर्णित है। शिव पुराण में लिंग पूजन परंपरा के इतिहास का अवतरण निम्न प्रकार से है - 'लिंगनां च क्रमं वक्ष्ये यथावच्छृणुतः द्विजाः"। ब्राह्मणों. मैं लिंगों को यथावत क्रम तुमसे कहता हूं। सुनो, सर्वप्रथम शंकर का  लिंग प्रणवमंत्र ओंकार ही है। यह समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है। शिव का सूक्ष्म लिंग प्रणव का द्योतक है। प्रणव का स्वरुप भी है।

भारतवर्ष में कुल द्वादश शिवलिंग हैं, जो विभिन्न कथाओं द्वारा उत्पन्न हुए हैं और जिनकी लोक में सर्वाधिक मान्यता है। इन  द्वादश ज्योतिर्लिंगों के स्मरण मात्र से मनुष्य सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। जो मानव कल्याण के हेतु विभिन्न स्थानों पर प्रतिष्ठित हैं। - सौराष्ट्रे सोमनाथञ्च, श्री शैले मल्लिकार्जुनम्‌, ओंकारे परमेश्वरम्‌।। केदारं हिमवत्पृष्ठे, डाकिन्यां, भीमशंकरम्‌,वारणस्यां तु विश्वेशं,त्र्यंबकम्‌, गौतमी तटे।। वैद्यनाथं चिताभूमौ, नागेशं दारुकाननं सेतु बंधे तु रामेशं घुष्मेशं च शिवालये।। प्रातःकाल जो मनुष्य इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों का नामोच्चरण या स्मरण करता है उसके समस्त पाप दूर हो जाते हैं तथा सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। देश के बारह विभिन्न स्थानों पर स्थित शिव के बारह ज्योतिर्लिंग हमारी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुए हैं।

लिंग का सामान्य अर्थ चिन्ह होता है। इस अर्थ में लिंग पूजन, शिव के चिन्ह या प्रतीक के रुप में ही होता है। अब प्रश्न उठता है कि, लिंग पूजन केवल शिव का ही क्यों होता है, अन्य देवताओं का क्यों नहीं? कारण यह है कि, शिव को आदि शक्ति के रुप में स्वीकारा गया है, जिसकी कोई आकृति नहीं होती। इस रुप में शिव निराकार है। कालांतर में शिव ने आकृति धारण की कैलाश पर्वत पर निवास किया, सती और बाद में पार्वती से विवाह भी किया। उस स्थिति में उनकी प्रतिमाएं भी मिलती हैं और साकार रुप में उनका पूजन भी किया जाता है। किंतु, निराकार स्वरुप में शिव के चिन्ह या प्रतीक का ही पूजन किया जा सकता है और वही शिवलिंग है।

शिव के निराकार स्वरुप को शब्दों में प्रणव रुप में 'ऊँ" माना जाता है। इसलिए 'ऊँ" के ऊपर के चंद्र चिन्ह के प्रतीक स्वरुप, शिवलिंग के ऊपर कुछ भाग उभरा रखा जाता है। मिट्टी से बने शिवलिंग पर भी मिट्टी की एक गोली बनाकर रखने का स्पष्ट विधान है। शिवलिंग में तीन प्रमुख देवताओं के अतिरिक्त महादेवी पार्वती का भी निवास माना गया है। यह इस प्रकार से है - शिवलिंग के नीचे के भाग में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और सबसे ऊपर स्वयं शिव का निवास माना गया है। संपूर्ण लिंग शंकर का रुप है। शिवलिंग की अर्चना ब्रह  और माया की अर्चना है। उसीसे त्रिदेव की भी पूजा हो जाती है। ब्रह्म और माया की अर्चना हो जाती है। आजकल शिवलिंग का जो आकार प्रतिष्ठित किया जाता है वही लिंग ब्रह्मांड का प्रतीक है। शिव पुराण और लिंग पुराण में लिंग का जो स्वरुप वर्णित है वह रुप ब्रह्मांड के आकार का ही द्योतक है। शिवलिंग को शिव के अंग विशेष के रुप में ग्रहण करना या स्वीकारना मूर्खता और अज्ञानता का द्योतक है। शिवलिंग को ब्रह्मांड का आकार  या रुप समझना चाहिए। 

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड मूल रुप में केवल अंडाकार ज्योतिपुंज के रुप में था। वर्तमान विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है। इसी ज्योतिपुंज को आदिशक्ति या शिव कहा जा सकता है, जो बाद में बिखरकर अनेक ग्रहों-उपग्रहों में बदल गई। 'एकोहम्‌ बहुस्यामि" का भी यही साकार रुप और प्रमाण है। इस स्थिति में मूल अंडाकार ज्योतिपुंज का प्रतीक सहज रुप में वही आकृति बनती है, जिसको हम लिंग रुप में पूजते हैंं। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से भी यदि हम संपूर्ण ब्रह्मांड की आकृति को देखें तो वह निश्चित ही शिवलिंग की आकृति से मिलती-जुलती नजर आएगी। इस तरह शिवलिंग का पूजन, वस्तुतः आदिशक्ति का और उस वर्तमान ब्रहांड का पूजन है, जो आदिशक्ति का ही बिखरा हुआ रुप है। अतः शिवधर्मा सनातनः और लिंगार्चन एक ही बात है।   

शिव लिंगों का वर्गीकरण दो प्रकार का है एक, पाषाण शिवलिंग दूसरा, पार्थिव शिवलिंग। पाषाण शिवलिंग में नर्मदा नदी से प्राप्त शिवलिंग मार्बल आदि पाषाण से निर्मित शिवलिंग हैं। पार्थिव शिवलिंग के अंतर्गत गुड के शिवलिंग, यवशिष्ट के शिवलिंग, मिट्टी के शिवलिंग, नवनीत के शिवलिंग हरिद्रा के शिवलिंग हैं। पारदशिवलिंग की पूजा और उपासना से तीनो लोकों में प्रतिष्ठित समस्त शिवलिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है। पारद शिवलिंग की पूजा से समस्त प्रकार की आधि और व्याधि का नाश होता है। वह मनुष्य को पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होकर शिव सायुज्य को प्राप्त करता है। शास्त्रों में अन्य अनेक वस्तुओं से बने लिंगों का भी उल्लेख मिलता है, जिनके पूजन से अलग-अलग प्रकार के फल मिलते हैं। उदाहरणार्थ ः पुष्पों से बने शिवलिंग के पूजन से भूमि लाभ होता है। रजोमय लिंग विद्या देनेवाला होता है। अनाज से निर्मित लिंग परिवार को सुख देता है। मिश्री से बने लिंग का पूजन करने से स्वास्थ्य लाभ होता है। अष्टधातु से निर्मित लिंग सर्वसिद्धि देनेवाला होता है, आदि। मंदिरों में सामान्यतः पाषाण निर्मित शिवलिंग ही मिलते हैं, जिनकी लंबाई, चौडाई और पूजन की विस्तृत व्यवस्था शैव ग्रंथों में दी हुई है। सर्वश्रेष्ठ लिंग वे माने जाते हैं जो पवित्र नदियों में स्वनिर्मित रुप में प्राप्त होते हैं। नर्मदा नदी के तो सभी कंकर शंकर माने जाते हैं।

शिवलिंग पूजन परंपरा भारत ही नहीं अपितु बाहर भी कई देशों में प्रचलित थी। रोम, यूनान, मिस्त्र, जापान, चीन आदि कई देशों में  भी पुरातत्त्ववालों की खोजों में शिवलिंग पूजन के प्रमाण मिले हैं। 

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