Saturday, 29 July 2017

लोकमान्य तिलक के साथी

1 अगस्त लोकमान्य तिलक पुण्यतिथि निमित्त
लोकमान्य तिलक के साथी 
शिरीष सप्रे

सूर्य के आसपास ग्रह-नक्षत्र घूमते हैं उसी प्रकार से लोकमान्य (बाल (केशव) गंगाधर) तिलक (23 जुलाई 1856 से 1 अगस्त 1920) के साथी, मित्र सैंकडों छोटे-बडे कार्यकर्ताओं की माला उनके आसपास घूमती रहती थी और जब तक लोकमान्य की कीर्ति तथा उनके कर्तृत्व का स्मरण रहेगा तब तक उनके साथीदारों की प्रेरक स्मृतियां भी जीवित रहेंगी। लोकमान्य ने अपने विविध आंदोलनों में भिन्न-भिन्न जाति, धर्म, प्रवृत्ति के लोगों को जोडा, उनको कार्य प्रवृत्त किया और उनके बाद भी ये लोग कार्यरत रहे। लोकमान्य तिलक के साथियों का परिचय करवा देने के लिए महामहोपाध्याय दत्तो वामन पोतदार (हिंदी को महाराष्ट्र की सबसे बडी दूसरी भाषा बनाने का श्रेय इन्हीं को है) ने थोडे से शब्दों में स्वयं के संस्मरणों सहित तिलक के साथियों के शब्दचित्र आत्मियता से 'लोकमान्य टिळकांचे सांगाती" (लोकमान्य तिलक के साथी) इस पुस्तक में सजीव किए हैं। इस ग्रंथ में सुनीसुनाई की अपेक्षा पक्के तौर पर प्रत्यक्ष देखी हुई विश्वसनीय बातें ग्रथित की गई हैं। इस ग्रंथ में कुल 111 लोगों से संबंधित संस्मरण हैं उनमें से कुछ चुनिंदा साथियों का उल्लेख नीचे के आलेख में किया गया है  -

1. रामकृष्ण गोपाल भांडारकर (1837-1925)ः पुणे का भांडारकर इन्स्टिट्‌यूट इन्हीं के स्मरणार्थ निर्मित किया गया है। पद्मभूषण से सम्मानित डा. भांडारकर प्राच्यविद्या क्षेत्र के ऋषी थे। भारतीय पांडित्य का ध्वज उन्होंने पूरे विश्व में फैलाया था। यह प्रख्यात प्राच्यविद्या-पंडित लोकमान्य तिलक से आयु में बडे थे और उनको तिलक की विद्वता के प्रति बडा आदर था। दुर्लभ पुस्तकों अथवा चर्चा के लिए तिलक उनके पास जाया करते थे। ओरायन, आर्टिक होम यह ग्रंथ लिखते समय भांडारकर ग्रंथालय का उन्हें बडा लाभ मिला था। लोकमान्य तिलक मंडाले जेल से छूटकर आने के पश्चात जब डॉ. भांडारकर से मिलने गए तो उन्होंने कहा 'अरे, कितना दुबला हो गया!" एक बार एक स्वयंसेवक डॉ. भांडारक से चंदा मांगने गया परंतु, विन्मुख लौट आया। परंतु, जब वह तिलक के साथ गया तो उन्होंने तत्काल पांच रुपये दे दिए और तिलक ने उन्हें रसीद दे दी थी।

भांडारकर की उपनिषदों में रुचि थी। मुंबई में स्थापित किए गए प्रार्थना समाज के वे मार्गदर्शक गुरु थे। महान सत्यभक्त, देशभक्त, समाज-सुधारक, शीलवान, विद्वान सद्‌गृहस्थ होने के कारण उनके पांडित्य का तेज अलग ही झलकता था। भांडारकर जातिभेद को नहीं मानते थे। स्त्री शिक्षा के वे समर्थक थे। महर्षि कर्वे ने जब विद्यापीठ प्रारंभ किया था तो उन्होंने उसका पहला कुलगुरु उन्हें ही चुना था। अपनी लडकी का पुनर्विवाह कर भांडारकर ने अपन कृतिशूर सुधारक हैं यह सबको दिखला दिया था। अंगे्रजी विद्या से लोग नास्तिक बन रहे हैं इस पर उन्हें बडा दुख होता था। मूर्तिपूजा पाप नहीं, परंतु वैसी श्रद्धा न होते वह दर्शाना पाप है, यह उनका मानना था। 

2. डा. एनी बेसेंट (1847-1933)ः एनी बेेसेंट एक विख्यात राजनीतिज्ञ, विद्वान विदुषी थी। मूलतः इंग्लैंड की होकर वे 1893 में भारत आ गई और यहीं स्थाई हो गई। बनारस में रहते उन्होंने सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की थी। गीता का अंगे्रजी में भाषांतर किया था। 1907 में थिऑसॉफिकल सोसायटी की अध्यक्ष बनी। एनी बेसेंट 1895 में पहली बार पुणे आई। उनका तिलक से परिचय राजनीति के कारण हुआ जो आगे चलकर बढ़ता ही गया। उन दोनो में परस्पर आदर भाव था। परंतु, कुछ मामलों में मतभेद भी थे। होमरुल आंदोलन में वे तिलक के साथ अग्रणी थी। उन्होंने 'न्यू इंडिया" वर्तमान पत्र निकाला था जिसमें वे सरकार की आलोचना किया करती थी। वे बहुत रचनात्मक लेखिका एवं प्रभावशाली वक्ता थी। 1917 में वे कोलकाता कांग्रेस की अध्यक्षा थी। एक बार महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा था कि, उन्होंने गहरी नींद में सोए भारतीयों को जगाया है। 

1916 की वसंत व्याख्यान माला में तिलक अध्यक्ष और एनी बेसेंट व्याख्याता के रुप में आए थे। (इस वसंत व्याख्यानमाला का एक लंबा इतिहास है इसके संस्थापक न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे थे। इसमें नेहरुजी, सुभाषचंद्र बोस, वीर सावरकर, अटलजी, शरद पवार, बाल ठाकरे, श्रीराम लागू, बलराज साहनी, डॉ. शंकरदयाल शर्मा आदि जैसी कई हस्तियों ने व्याख्यान दिए हैं।) इसमें एनी बेसेंट ने तिलक के प्रति आदर के उद्‌गार निकाले थे। उनका भाषण र्र्षीींीीश ेष ळपवळर (भारत का भविष्य) विषय पर था। इसमें गोरे लोग कालों पर किस प्रकार अन्याय कर रहे हैं यह बतलाकर भारत स्वाभिमानी बने का संदेश दिया था। भाषण समाप्त होते ही पर्जन्य वृष्टि होने लगी तब तिलक ने एक ही वाक्य में समारोप कर दिया कि, 'बिजली की गडगडाहट से परमेश्वर ने बेसेंट बाई के भाषण को सहमति दी होकर, वृष्टि रुप में वह तुम्हें आर्शीवाद दे रही है।"

3. रानडे महादेव गोविंद (1842-1901)ः इनके जितना विद्वान, विवेकी, हरफन मौला, कर्ताधर्ता पुरुष ढूंढ़े से भी अर्वाचीन महाराष्ट्र में नहीं मिलेगा। वे आजादशत्रु थे। विद्यापीठ के सभी पुरस्कार उन्होंने प्राप्त किए और 'प्रिन्स ऑफ गेज्यूएट" यह पदवी सार्थ की थी। उनका अधिकाशं समय पुणे-मुंबई में बीता। इस काल में विभिन्न सार्वजनिक आंदोलन उन्होंने खडे किए। वक्तृत्वोत्तेजक मंडली, सार्वजनिक सभा, सामाजिक परिषद, फीमेल हायस्कूल आदि संस्थाएं उन्हीं के कर्तृत्व के कारण समृद्ध हुई। प्रार्थना समाज के वे एक अध्वर्यु थे। कांग्रेस से तो उनका संबंध आरंभ से ही था। राजनीति में नरमपंथी और सुधारक इस प्रकार से उनका वर्णन किया जा सकता है। उनकी श्रद्धा थी कि अंग्रेजी राज ईश्वरी इच्छा  या कृपा के कारण आया है। परंतु, उनकी अंदरुनी प्रेरणा छत्रपति शिवाजी के चरित्र में दिख पडती है। इसका मूल उन्होेंने विद्यार्थी दशा में इतिहास पर लिखे निबंध में दिख पडता है। उनकी व्यापक विचारसरणी थी कि, पुराने में से अच्छा रखकर समाज का सर्वांगीण सुधार होना चाहिए।

देश के आर्थिक और कृषि संबंधी प्रश्नों पर वे अपनी पैनी दृष्टि रखते थे। उनके लेख और व्याख्यान इतने अभ्यासपूर्ण एवं संयमित होते थे कि, अंग्रेज राज्यकर्ताओं से लेकर हिंदुस्थान के तमाम विद्वतजन उनका अध्ययन करते थे। तिलक और रानडे के बीच राजनैतिक और सामाजिक मामलों में तीव्र मतभेद थे, तथापि वे झुकते थे तो सिर्फ रानडे के सामने। तिलक ने उनके संबंध में एक अद्वितीय मृत्युलेख लिखा था, आगे वे उनके दसवें पर भी मुंबई में उपस्थित रहे थे।

4. जोसेफ बॅप्टिस्टा (1864-1930)ः तिलक के साथीदार सभी जाति-धर्मों के लोग थे। उनमें अग्रणी थे प्रभावी वक्ता बॅरिस्टर बॅप्टिस्टा। ये ईसाई होने के बावजूद वे कहते थे ईसाइयों के लिए अलग मतदाता संघ नहीं होना चाहिए। उनके पूर्वज मराठा थे और इसका उन्हें गर्व था। एक बार उन्होंने तिलक के साथ पंगत में बैठकर अन्य लोगों के समान माथे पर तिलक लगवाकर भोजन भी किया था। इस प्रकार की घटना उस जमाने के हिसाब से दुर्लभ ही थी। 1898 में जब तिलक को कारावास हुआ था तो केंब्रिज यूनियन में उन्होंने इसके विरोध में आवाज उठाई थी। 1908 में एक मुकदमे के सिलसिले में वे तिलक के संपर्क में आए और फिर उनके संबंध अंत तक बने रहे। हाईकोर्ट की फीस कारागार से जब तिलक ने उन्हें भिजवाई तो उन्होंने वह उनके परिजनों को लौटा दी थी। होमरुल आंदोलन के प्रचार के लिए तिलक ने उन्हें विलायत भी भेजा था। वे मुंबई के मेयर भी रहे थे।

5. सर फिरोजशाह मेथा (1845-1915)ः दादाभाई नौरोजी के बाद मुंबई का नेतृत्व बॅरिस्टर मेथा के पास गया था। उनकी भव्य दाढ़ी-मूंछें और कलमदार चेहरा देखकर और बुलंद आवाज सुनकर लोग उन्हें मुंबई का सिंह कहते थे और यह पदवी उनके लिए सार्थ भी थी। तिलक और मेथा के बीच कभी बनी नहीं। तिलक की अपेक्षा वे गोखले को अधिक पसंद करते थे। कोलकोता कांग्रेस में जब बहिष्कार का प्रस्ताव आया तब तिलक और मेथा में जमकर वाक्‌युद्ध हुआ था। इतना होने पर भी तिलक मेथा के प्रति आदर रखते थे। तिलक द्वारा उन पर लिखा मृत्युलेख इस दृष्टि से पढ़ने योग्य है। जब मेथा बीमार थे तब तिलक उनसे मिलने गए भी थे। उस समय मेथा ने उद्‌गार निकाले थे 'तिलक और मैं यदि पांच मिनिट साथ बैठ जाएं तो हम एक हो जाएंगे।" परंतु, यह हो न सका। 

इस प्रकार से और भी अनेक लोग उनके निकट संपर्क में आए उनके साथी भी बने उनमें कुछ उनसे वैचारिक सहमति रखते थे तो कुछ मतभेद भी रखते थे। लेख की सीमा होने के कारण इस प्रकार के अनेक होने के कारण सभी के बारें में लिखना, बताना तो संभव नहीं फिर भी संक्षेप में कुछ इस प्रकार थे -  कर्मवीर विट्ठलराव शिंदे (1873-1944) इनको तिलक पर गर्व था। इतना ही नहीं कभी वे तिलक के पंज प्यारों में से एक थे। वे डिप्रेस्ड क्लास मिशन और अस्पृश्योद्धार कार्य के लिए जाने जाते थे। उन्हें मराठों के इतिहास पर बडा गर्व था। परंतु, एक बार उन्होंने दत्तो वामन पोतदार से कहा था, 'मराठा समाज ने मेरी कोई कदर नहीं की।" 1901 में जब वे युनिटेरियन शिष्यवृत्ति प्राप्त कर तौलनिक धर्मो के अध्ययन के लिए ऑक्सफोर्ड गए थे तो, जाने के पूर्व तिलक से मिलने गए थे और तिलक ने उन्हें प्रोत्साहन दिया था। अस्पृश्यता के प्रश्न पर तिलक और शिंदे में कुछ खास बनी नहीं। इतना होने पर भी तिलक के प्रति उनके मन में आदर था। यह प्रसिद्ध है कि, एक बार तिलक ने उद्‌गार निकाले थे कि, 'यदि अस्पृश्यता ईश्वर को मान्य है तो, मैं ईश्वर को भी नहीं मानूंगा।" फिर भी विट्ठलराव द्वारा आयोजित सहभोजन में शामिल होने के लिए वे तैयार हो गए थे। जब किर्लोस्कर थियेटर में सख्ती से शिक्षा के निमित्त सभा आयोजित की गई तो उन पर अंडे फेंके गए तब भी विट्ठलराव उनके बगल में मंच पर बैठे रहे थे।

गांधीवादी और खादीधारी पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर (1867-1968) तिलक के चाहनेवाले में से एक थे। तथापि वेदअध्ययन और उनका प्रचार यही उनका कार्य था और इस क्षेत्र में उनका कार्य महर्षि पद को शोभायमान हो ऐसा था। सदाशिवशास्त्री गोपाल (गीतावाचस्पति) भिडे (1876-1939) जो स्वयं भी गीता पर प्रभावी प्रवचन देते थे और वेदोपनिषद का उन्हें गाढ़ा अभ्यास था उन्हें 'गीता रहस्य" के कुछ विचार मान्य नहीं थे फिर भी तिलक लिखित 'गीता-रहस्य" के कर्मयोग का उन्होंने आजीवन प्रचार किया। जब से 'केसरी" निकाल गया तब से उनके साथी चिंतामण गंगाधर भानु तिलक थे। उन्होंने गीता रहस्य की निर्भीक आलोचना की क्योंकि, उन्हें तिलक का कर्मपर अर्थ मान्य नहीं था जो स्वयं भी उत्तम वक्ता थे। इसी प्रकार के तिलक के एक और साथी थे विष्णुबुवा जोग (1867-1920) जो तिलक के जीवन में आए कुछ सत्पुरुषों में से एक थे और कीर्तनकार थे, तिलक को वे चलता-फिरता विठोबा यानी भगवान विट्ठल कहते थे और उन्हें भी तिलक के गीता रहस्य पर बडा गर्व था तथापि उन्हें इस ग्रंथ के सभी मत मान्य नही ंथे। उनका कहना था, 'तिलक ने कम से कम 'ज्ञानेश्वरी" तो भी ढ़ंग से पढ़ना चाहिए थी।" अंत में काशीनाथ ठकुजी जाधव जो मराठा समाजांतर्गत तिलक के जो पक्के अनुयायी थे उनमें से एक थे और जब तिलक विदेश से वापिस आए तब उनका जाहिर सम्मान समारोह आयोजित किया गया था उसके प्रमुख थे। जब कुछ लोगों ने विरोध दर्शाया तो उन विरोधकों को मुंहतोड जवाब देकर उस आयोजन को सफल कर दिखलाया था।

Saturday, 22 July 2017

आदि शंकराचार्य - जिन्होंने पुनः वैदिक धर्म की पताका लहराई

आदि शंकराचार्य - जिन्होंने पुनः वैदिक धर्म की पताका लहराई
शिरीष सप्रे

भारतवर्ष आदि काल से ही असाधारण व्यक्तियों के प्रादुर्भाव की भूमि रही है। इन असाधारण व्यक्तियों में से एक हैं आदि शंकराचार्य, जिनका स्थान बहुत ही ऊंचा है। उनकी उपलब्धियां निश्चय ही अद्‌भुत थी। उन्होंने वैदिक धर्म की पताका फिर से संपूर्ण भारतवर्ष में लहराकर अल्प काल में ही इतिहास एवं संस्कृति की धारा ही बदल दी। चार्वाक, कापालिक, शाक्त, सांख्य, बौद्ध, आदि विभिन्न मतों का प्रभाव समाज में जिस कालखंड में था, धर्म के नाम पर अधर्म को स्वीकृति प्राप्त हो गई थी, वामाचार, व्यभिचार ने जडें जमा ली थी, ऐसी  विषम और भयावह स्थिति में आद्य शंकराचार्य ने वैदिक धर्म का, अद्वैत वेदांत का प्रचार कर वैदिक धर्म को पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त करवा लोगों को आध्यात्मिक शांति एवं परम सत्य का मार्ग दिखलाया। उन्होंने एक ही कल्याणकारी उपचार बतलाया वह था एकत्व का बोध, जिसे उपनिषदों में अद्वैत दर्शन कहा गया है।

भारत के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान में उनका योगदान अद्वितीय था। वैदिक धर्म का प्रसार आगे भी होता रहे इसके लिए उन्होंने भारत की चारों दिशाओं में चार मठों ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ), गोवर्धन (जगन्नाथपुरी, ओरिसा), श्रृंगेरी (कर्नाटक रामेश्वरम्‌), द्वारका (द्वारकाधीश गुजरात) चार धामों पर स्थापना की और अपने प्रमुख चार शिष्यों ः पद्यपाद, सुरेश्वर, तोटक और हस्तमालक आचार्यों को मठाधिपति नियुक्त किया। ये चारों धाम आज भी हमारी सांस्कृतिक एकता व अखंडता के प्रतीक हैं। कुंभ मेलों का प्रारंभ कर देश की सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करने में अभूतपूर्व योगदान दिया। उपर्युक्त चार मठों से दशनामी संन्यासी परंपरा विकसित हुई। 1. ज्योतिर्मठ - इस मठ के संन्यासी गिरि, पर्वत एवं सागर हुए। 2. गोवर्धन मठ- वन एवं अरण्य संन्यासी हुए। 3. श्रृंगेरी मठ - पुरी, भारती एवं सरस्वती। 4. शारदा मठ - तीर्थ एवं आश्रम। इन्हीं दशनामियों से सात अखाडे बने, जो दशनामी नागा संन्यासियों के अखाडे कहे जाते हैं। 

आदि शंकराचार्य के अभ्युदय को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं भगवान शिवशंकर ने अपने आविर्भाव के लिए स्वंय ही उचित स्थान, वंश और काल का निर्णय किया हो। केरल के आलुवा नगर से लगभग बीस कि.मी. की दूरी पर पेरियास या पूर्णा नदी के उत्तरी तट पर स्थित तथा एरनाकुलम जिले के अंतर्गत पावन कालटि गांव के एक नंबूदरीपाद ब्राह्मण परिवार में शंकर का जन्म हुआ। इस प्रकार से विश्वास किया जाता है कि, कालटि ऐसा पुण्य स्थल है जहां पांव रखनेवाले को यमपुरी से मुक्ति मिल जाती है। 'कालः टीकते इति कालटि" अर्थात्‌ जीव के सामने से काल हट जाता है, इसलिए यह गांव कालटि है। उनकी माता आर्यम्बा व पिता शिवगुरु और पितामह विद्याधर थे। दीर्घकाल तक कोई संतान न होने पर साध्वी आर्यम्बा ने पति शिवगुरु को सांत्वना देते हुए कहा ः हमें भगवान शिव की शरण लेना चाहिए, वही सारे विश्व के कल्पवृक्ष हैं। पति तथा पत्नी दोनो ने तृशूर (त्रिचूर) के वटकुंथन मंदिर में प्रतिष्ठापित भगवान महादेव शिव को पूजार्चन से प्रसन्न किया तो उनके वर प्रसाद से शंकर का जन्म हुआ। वे भगवान शंकर का अंशावतार माने जाते हैं। शंकर की जन्मस्थली कई ग्रंथों में प्रकीर्तित है।

शंकर एक अद्‌भुत बालक थे और अत्यंत प्रारंभिक वर्षों में ही उनके अंदर की विलक्षण बौद्धिक प्रतिभा और ह्रदय की विशालता प्रकट हो गई थी। बाल्यकाल से ही वह श्रुतधर थे, काव्य-पुराण को श्रवण मात्र से ही समझ लिया करते थे। शंकर के जीवन की विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख एक संस्कृत श्लोक में इस प्रकार किया गया है- 'आठ वर्षो की आयु में उन्होंने चारों वेदों का अध्ययन कर लिया। बारह वर्ष की आयु में वह सभी शास्त्रों में पारंगत हो गए थे, सोलह वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपना भाष्य लिखकर पूरा कर दिया था और बत्तीस वर्ष की आयु में इस संसार से प्रस्थान कर गए।" गुरु गृह निवास के नियमानुसार ब्रह्मचारी के रुप में शंकर एक दिन भिक्षा मांगने  किसी दरिद्र ब्राह्मण के द्वार पर जा पहुंचे वहां भिक्षा के रुप में आंवला देनेवाली निर्धन ब्राह्मण पत्नी की दरिद्रता दूर करने के लिए तत्काल महालक्ष्मी की स्तुती की जो कनकधारा के नाम से प्रसिद्ध है। कहते हैं कि शंकर की स्तुती से प्रसन्न होकर महालक्षमी ने आंवला के आकार की सुवर्ण खंडों की वर्षा कर दी। इस प्रकार शंकर ने धर्म सेवा के पथ में जो पृथक कार्य किया वह दरिद्रता से छुटकारा दिलाने का था। मकर प्रसंग के माध्यम से माता के वात्सल्य मोह को रुपांतरित कर उनसे संन्यास की अनुमति प्राप्त कर विविध ज्ञान संपादन करने और सुयोग्य गुरु को ढूंढने के लिए वे बाहर निकले। 

शंकर को गुरु मिले श्रीआचार्य गोविंदपाद। शंकर ने उनसे शिष्य बना लेने की प्रार्थना की। समाधिभंग होने पर आचार्य गोविंद ने उनसे प्रश्न किया 'कौन हो तुम?" उत्तर में शंकर ने उन्हें 'दशश्लोकी" नाम से प्रसिद्ध दस श्लोकों में ब्रह्म का स्वरुप बतलाया, शंकर के मुख से अद्वैत की इतनी सत्य व्याख्या सुनकर आचार्य गोविंद विव्ह्लल हो गए। उनकी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि, उन्हें ज्ञात है कि महादेव शिव ही शंकर का रुप धारण कर वेदांत का ज्ञान देने के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं। 

आपका मूल मंत्र था 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवोब्रह्मैव नापरः"। 'प्रज्ञानं ब्रह्म" (ऋगवेद), 'अहं ब्रह्मास्मि" (यजुर्वेद), 'त्वमसि" (सामवेद) और 'अयमात्माब्रह्म" (अथर्ववेद) इन चार महावाक्यों का उपदेश कर विश्व मानव की आध्यात्मिक शक्ति को जागृत किया। आद्यशंकराचार्य ने पंच देवों के साथ गंगा, यमुना, नर्मदा एवं द्वादश ज्योतिर्लिगों जैसे महान तीर्थ धामों की सुंदर स्तुति रचनाएं की। इससे राष्ट्र की भावनात्मक एवं भौगोलिक एकता का चिरंतन बोध जनता को हुआ। 

दिग्विजयी शंकर भारतवर्ष की परिक्रमा करते रहे और विजय प्राप्त करते रहे प्रयाग में कुमारिल भट्ट तो महेश्वर में मंडन मिश्र जैसे उद्‌भट विद्वानों एवं उच्च कोटि के तार्किकों को शास्त्रार्थ में परास्त करने के पीछे विभिन्न मत-मतांतरों का खंडन कर उनमें वेदांत के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना था। पुनः सनातन धर्म की प्रतिष्ठापना करना था। आद्यशंकराचार्य ने सर्वजन हिताय संपूर्ण राष्ट्र का कई बार परिभ्रमण किया और लोगों को वेदांत विज्ञान के निहितार्थ का बोध कराया। उन्होंने सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की, उसकी सुषुत्म आत्मा को जगाया और कालांतर में उसमें जो विकार आ गए थे उन्हें दूर किया। सनातन धर्म के शाश्वत सत्य का मार्ग खोज निकालनेवालों में आद्यशंकराचार्य का स्थान अत्यंत ऊंचा है। 

Saturday, 15 July 2017

चातुर्मास पर्व

चातुर्मास पर्व
शिरीष सप्रे

हिंदू धार्मिक संकल्पनाओं के अनुसार आषाढ़ शुद्ध एकादशी (ग्यारस) (देवशयनी एकादशी) से कार्तिक शुद्ध एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) इन चार महिनों के काल को चातुर्मास या चतुर्मास कहते हैं। चातुर्मास का हिंदू, जैन और बौद्धधर्म में बहुत महत्व है। जैन धर्म में पर्यूषण पर्व इन्हीं दिनों में आता है। चार महिनों का यह कालखंड हिंदुओं के दृष्टिकोण से व्रत-उपवास कर पुण्यसंचय का काल है। कल्पना की जाती है कि, देवशयनी एकादशी को देवता सो जाते हैं और प्रबोधिनी एकादशी को उठ जाते हैं। इन चार महिनों के कालखंड में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं। इस अवधि में कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है। विवाहादि सभी शुभ कार्य नहीं होते हैं। चातुर्मास के दौरान हिंदू स्त्री-पुरुष अनेक प्रकार के व्रत-उपवास रखते हैं। अनेक लोग दाढ़ी नहीं बनाने के नियम का पालन करते हैं। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ भी किया जाता है। इस काल में चूंकि, भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजमान रहकर निद्रा लेते हैं और उनके स्पर्श से पृथ्वी पर के सभी जलों में उनके तेज का अंश उतर जाता है इस कारण वह सहज रुप से अत्यंत पवित्र बन जाता है इसीलिए इस काल में सरोवर, समुद्र, नदी, तालाबों में स्नान करना पुण्यकारक माना जाता है। समुद्र संगम, नदियों के संगम स्थलों पर और गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा जैसी पवित्र नदियों में स्नान को शुभ माना जाता है।

हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार 'पुनरपि जननं, पुनरपि मरणम्‌" के फेर से बचने का मार्ग केवल मनुष्य योनि को ही उपलब्ध है। इसके लिए सद्‌गुरु के मार्गदर्शन में यदि योग्य पद्धति से अभ्यास किया जाए और सद्‌गुरु की कृपा प्राप्त हो जाए तो मुक्ति का लाभ मिल सकता है। इन चार महिनों में नामस्मरण करना चाहिए, धार्मिक ग्रंथों का पठन, अध्ययन करना चाहिए, शरीर और मन को काबू में रखने के लिए कुछ नियम बनाकर उनका पालन करना चाहिए। इस अवधि में सत्य का आचरण करते हुए दूसरों को दुख पहुंचे ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। जिस वर्ष अधिक मास आता है उस वर्ष चातुर्मास पांच महिनों का होता है।
चातुर्मास के काल में भगवान शिव और विष्णु की पूजा का बहुत महत्व है। श्रावण का महिना शिवजी के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सावन सोमवारों का तो अत्याधिक महत्व है। इस काल में शिवजी का पंचामृत से अभिषेक कर पूजा करना चाहिए और शिवलिंग पर सफेद सुगंधित फूलों और बेल को चढ़ाना चाहिए। भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम की पूजा करना चाहिए। भगवान विष्णु को तुलसी और चंपक पुष्प प्रिय हैं उन्हें चढ़ाना चाहिए। चातुर्मास में जप का महत्व है और वह फलदायी भी होता है। इन महिनों में दान का बहुत महत्व है और उसमें भी अन्नदान का इसके अतिरिक्त वस्त्र दान, संपत्ति दान, छत्र दान, जलदान, आदि करना चाहिए। चातुर्मास के दौरान अपनी प्रिय वस्तुओं का त्याग करना चाहिए। कौनसी वस्तु का त्याग करने से कौनसा फल मिलता है इसका खुलासा स्कंद पुराण में मिलता है। 

चातुर्मास के अनुष्ठान में साधु-सन्यासी एक ही स्थान पर रहते हैं। सन्यास नियमों के अनुसार सन्यासियों को सतत प्रवास ही करते रहना चाहिए। किसी स्थान पर अधिक ठहरना नहीं चाहिए। उपनिषदों आदि में सन्यासियों के लिए जो कसौटियां बतलाई गई हैं वे अत्यंत कठोर हैं। किसी भी रहवासी क्षेत्र में केवल भिक्षा के लिए ही जाए। वह एकाकी ही रहे। किसी भी गांव में एक रात और नगर में पांच रातों से अधिक ना रहे। निर्जन क्षेत्र में अपने लिए मठ या आश्रम ना बनाए। आपात स्थिति के अतिरिक्त अपने लिए मार्ग में कुछ भी ना रखे। जहां तक संभव हो पका हुआ अन्न ना ले। स्वस्थ और युवा सन्यासी को किसी के भी घर में नहीं रहना चाहिए। ना ही कोई वस्तु लेना चाहिए ना ही कोई देना चाहिए। अन्य प्राणियों के कल्याण के लिए दीनता का आचरण करना चाहिए। स्वाद में रुचि रखनेवाला और वस्त्रों का संग्रह करनेवाला असंयमी प्रवृत्तिवाला पतन को प्राप्त होता है। 

इन नियमों का पालन करते हुए भ्रमण करना वर्षाकाल में सन्यासियों के लिए संभव नहीं। पुराने समय में जंगल बहुत घने थे क्योंकि, मनुष्य का हस्तक्षेप अधिक नहीं था, जितना वह लेता था उतना ही लौटाने की प्रवृत्ति भी रखता था इस कारण ऋतु चक्र गडबडाया हुआ भी नहीं था। शीत और ग्रीष्म ऋतु का कष्ट तो सन्यासी को सहन करने और तितिक्षा का अभ्यास दृढ़ करने का उसे निर्देश था। परंतु, वर्षा ऋतु उसके प्रवास को बाधित कर देती थी। नाना प्रकार के संकट वर्षाकाल में उत्पन्न हो जाते थे। इसलिए सन्यासियों को एक ही स्थान पर रहने के निर्देश थे।

चातुर्मास का विधान जीवन का सम्मान करते हुए तप-तितिक्षा साधने के लिए हैं। भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं की परंपरा का सूत्रपात धर्म प्रचार के लिए किया। उनके लिए विवेक सम्मत मर्यादाएं भी तय की। उल्लेख मिलते हैं कि उनके भिक्षु वर्षाकाल में एक स्थान पर नहीं रहते थे जबकि अन्य संप्रदायों के श्रमण एक ही जगह पर रहकर उपदेश देते थे। बौद्ध भिक्षुओं के लिए यह उस समय उचित भी था क्योंकि आरंभ में भगवान बुद्ध विशेष प्रसिद्ध भी नहीं थे इसलिए यह व्यवहारिक रुप से संभव ही नहीं था कि, वे वर्षा काल में एक ही स्थान पर स्थिर रहें। लेकिन आगे जाकर टीका-टिप्पणियों से बचने के लिए सावधानी बरतते हुए भगवान बुद्ध ने नियम बनाया कि भिक्षु वर्षा ऋतु में एक ही स्थान पर रहे।

वस्तुतः घर परिवार, सांसारिकता को छोडकर त्यागी बैरागी का जीवन जीने की परंपरा वैदिक संस्कृति का भाग नहीं थी। यह तो जैनों-बौद्धों की देन है और श्रमण के नाम से इनका उल्लेख किया जाता है। वैदिक परंपरा ऋषियों की परंपरा है और ऋषि प्रायः गृहस्थ ही होते थे। अरुंधती, मैत्रेयी, गार्गी, शतरुपा, अहिल्या, आदि ऋषि पत्नियां ही थी और ऋषि दपंत्ति वैभवशाली आश्रमों में रहते हुए सांसारिक भोगों के साथ आत्मिक आनंद भी प्राप्त करते थे। उस काल में यज्ञ याग की प्रधानता माननेवाले सन्यासियों के चातुर्मास के संबंध में कहते हैं कि यह श्रमणों और बौद्ध भिक्षुओं की देन है। 

वैदिक यानी सनातनियों में कई संप्रदाय हैं जैसेकि वेदांत, भागवत, शैव, योग, कबीर, नानक, सतनामी आदि पुराने-नए सभी संप्रदायों के सन्यासी चातुर्मास करते हैं। लेकिन अधिकांश सन्यासियों ने चातुर्मास की अवधि कम कर रखी है। वैसे यह ठीक भी है आधुनिक काल में जब ऋतुओं की बाधाएं कम हो गई हैं तो एक ही स्थान पर रहना आवश्यक भी नहीं। परंतु, आज भी जैन संप्रदाय के मुनि ही सबसे अधिक नियमपूर्वक चातुर्मास करते हैं। क्योंकि, पारंपरिक मर्यादाओं का आत्यंतिक आग्रह रखनेवाले जैन साधु अब भी चार महिने एक ही स्थान पर रहते हैं।  जैन मुनि कहीं आने-जाने के लिए वाहनों का उपयोग नहीं करते। गिने-चुने साधु ही हैं जो प्रवास संबंधी विधि-निषेधों की परवाह नहीं करते। 

चातुर्मास की चर्या निर्धारित है। इस अवधि में सन्यासी, भिक्षु या मुनि को नगर-ग्राम की सीमा से बाहर निकालने की मनाही है। जहां  वे ठहरे हुए हैं वहीं गृहस्थों, शिष्यों को नियमित उपदेश, ग्रंथ पाठ उनकी विवेचना, योगाभ्यास आदि करते रहते हैं। 

Monday, 10 July 2017

शिवलिंग पूजन का महत्व

शिवलिंग पूजन का महत्व
शिरीष सप्रे

लिंग पूजा की परंपरा भारतवर्ष में अतिप्राचीनकाल से ही चली आ रही है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक हमारे यहां असंख्य शिवलिंग हैं, जो एक बहुत बडी संख्या में शिवालयों में स्थापित हैं। भगवान शिवशंकर की मूर्ति की अपेक्षा शिवलिंग का अर्चन ही अधिक होता है। विभिन्न स्थानों पर की गई खुदाई में बडी मात्रा में शिवलिंग मिलते रहे हैं। संसार में शिवलिंगों की संख्या इतनी अधिक है कि, उनकी गणना असंभव सी ही है। क्योंकि, यह समस्त पृथ्वी लिंगमयी और समस्त जग ही लिंगमय है। मोहनजोदडो तथा हडप्पा की खुदाई में भी शिवलिंग मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि, हमारे यहां लिंग पूजन की परंपरा अतिप्राचीन है। शिव पुराण, लिंगपुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण, कूर्म पुराण और ब्रह्मपुराण तो मुख्य रुप से शैव साहित्य ही हैं, जिनमें लिंग पूजा की बडी महिमा प्रकट गई है। स्कंद पुराण में कहा गया है - लयनाल्लिंगमुच्यते अर्थात जिसमें लय और प्रलय होता है, उसे ही लिंग कहते हैं।

शिवलिंग पूजन के महत्व के विषय में इस प्रकार कहा गया है - यो न पूजयेत लिंग ब्रह्मादीनां प्रकाशकम्‌। शास्त्र विल्सर्व वेन्तापि चतुर्वेदः प्रशस्तु सः।। ब्रह्मज्ञान को प्रकाशित करनेवाला जो शिवलिंग का पूजन नहीं करता वह चारों वेदों, शास्त्रों का ज्ञाता तथा सर्ववेत्ता होेने पर भी पशु समान है। वेद, शिवपुराण, उपनिषद, आयुर्वेद आदि में अनेक प्रकार के शिवलिंगों की पूजा करने का विधान समग्र रुप से वर्णित है। शिव पुराण में लिंग पूजन परंपरा के इतिहास का अवतरण निम्न प्रकार से है - 'लिंगनां च क्रमं वक्ष्ये यथावच्छृणुतः द्विजाः"। ब्राह्मणों. मैं लिंगों को यथावत क्रम तुमसे कहता हूं। सुनो, सर्वप्रथम शंकर का  लिंग प्रणवमंत्र ओंकार ही है। यह समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है। शिव का सूक्ष्म लिंग प्रणव का द्योतक है। प्रणव का स्वरुप भी है।

भारतवर्ष में कुल द्वादश शिवलिंग हैं, जो विभिन्न कथाओं द्वारा उत्पन्न हुए हैं और जिनकी लोक में सर्वाधिक मान्यता है। इन  द्वादश ज्योतिर्लिंगों के स्मरण मात्र से मनुष्य सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। जो मानव कल्याण के हेतु विभिन्न स्थानों पर प्रतिष्ठित हैं। - सौराष्ट्रे सोमनाथञ्च, श्री शैले मल्लिकार्जुनम्‌, ओंकारे परमेश्वरम्‌।। केदारं हिमवत्पृष्ठे, डाकिन्यां, भीमशंकरम्‌,वारणस्यां तु विश्वेशं,त्र्यंबकम्‌, गौतमी तटे।। वैद्यनाथं चिताभूमौ, नागेशं दारुकाननं सेतु बंधे तु रामेशं घुष्मेशं च शिवालये।। प्रातःकाल जो मनुष्य इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों का नामोच्चरण या स्मरण करता है उसके समस्त पाप दूर हो जाते हैं तथा सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। देश के बारह विभिन्न स्थानों पर स्थित शिव के बारह ज्योतिर्लिंग हमारी राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुए हैं।

लिंग का सामान्य अर्थ चिन्ह होता है। इस अर्थ में लिंग पूजन, शिव के चिन्ह या प्रतीक के रुप में ही होता है। अब प्रश्न उठता है कि, लिंग पूजन केवल शिव का ही क्यों होता है, अन्य देवताओं का क्यों नहीं? कारण यह है कि, शिव को आदि शक्ति के रुप में स्वीकारा गया है, जिसकी कोई आकृति नहीं होती। इस रुप में शिव निराकार है। कालांतर में शिव ने आकृति धारण की कैलाश पर्वत पर निवास किया, सती और बाद में पार्वती से विवाह भी किया। उस स्थिति में उनकी प्रतिमाएं भी मिलती हैं और साकार रुप में उनका पूजन भी किया जाता है। किंतु, निराकार स्वरुप में शिव के चिन्ह या प्रतीक का ही पूजन किया जा सकता है और वही शिवलिंग है।

शिव के निराकार स्वरुप को शब्दों में प्रणव रुप में 'ऊँ" माना जाता है। इसलिए 'ऊँ" के ऊपर के चंद्र चिन्ह के प्रतीक स्वरुप, शिवलिंग के ऊपर कुछ भाग उभरा रखा जाता है। मिट्टी से बने शिवलिंग पर भी मिट्टी की एक गोली बनाकर रखने का स्पष्ट विधान है। शिवलिंग में तीन प्रमुख देवताओं के अतिरिक्त महादेवी पार्वती का भी निवास माना गया है। यह इस प्रकार से है - शिवलिंग के नीचे के भाग में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और सबसे ऊपर स्वयं शिव का निवास माना गया है। संपूर्ण लिंग शंकर का रुप है। शिवलिंग की अर्चना ब्रह  और माया की अर्चना है। उसीसे त्रिदेव की भी पूजा हो जाती है। ब्रह्म और माया की अर्चना हो जाती है। आजकल शिवलिंग का जो आकार प्रतिष्ठित किया जाता है वही लिंग ब्रह्मांड का प्रतीक है। शिव पुराण और लिंग पुराण में लिंग का जो स्वरुप वर्णित है वह रुप ब्रह्मांड के आकार का ही द्योतक है। शिवलिंग को शिव के अंग विशेष के रुप में ग्रहण करना या स्वीकारना मूर्खता और अज्ञानता का द्योतक है। शिवलिंग को ब्रह्मांड का आकार  या रुप समझना चाहिए। 

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड मूल रुप में केवल अंडाकार ज्योतिपुंज के रुप में था। वर्तमान विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है। इसी ज्योतिपुंज को आदिशक्ति या शिव कहा जा सकता है, जो बाद में बिखरकर अनेक ग्रहों-उपग्रहों में बदल गई। 'एकोहम्‌ बहुस्यामि" का भी यही साकार रुप और प्रमाण है। इस स्थिति में मूल अंडाकार ज्योतिपुंज का प्रतीक सहज रुप में वही आकृति बनती है, जिसको हम लिंग रुप में पूजते हैंं। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से भी यदि हम संपूर्ण ब्रह्मांड की आकृति को देखें तो वह निश्चित ही शिवलिंग की आकृति से मिलती-जुलती नजर आएगी। इस तरह शिवलिंग का पूजन, वस्तुतः आदिशक्ति का और उस वर्तमान ब्रहांड का पूजन है, जो आदिशक्ति का ही बिखरा हुआ रुप है। अतः शिवधर्मा सनातनः और लिंगार्चन एक ही बात है।   

शिव लिंगों का वर्गीकरण दो प्रकार का है एक, पाषाण शिवलिंग दूसरा, पार्थिव शिवलिंग। पाषाण शिवलिंग में नर्मदा नदी से प्राप्त शिवलिंग मार्बल आदि पाषाण से निर्मित शिवलिंग हैं। पार्थिव शिवलिंग के अंतर्गत गुड के शिवलिंग, यवशिष्ट के शिवलिंग, मिट्टी के शिवलिंग, नवनीत के शिवलिंग हरिद्रा के शिवलिंग हैं। पारदशिवलिंग की पूजा और उपासना से तीनो लोकों में प्रतिष्ठित समस्त शिवलिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है। पारद शिवलिंग की पूजा से समस्त प्रकार की आधि और व्याधि का नाश होता है। वह मनुष्य को पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होकर शिव सायुज्य को प्राप्त करता है। शास्त्रों में अन्य अनेक वस्तुओं से बने लिंगों का भी उल्लेख मिलता है, जिनके पूजन से अलग-अलग प्रकार के फल मिलते हैं। उदाहरणार्थ ः पुष्पों से बने शिवलिंग के पूजन से भूमि लाभ होता है। रजोमय लिंग विद्या देनेवाला होता है। अनाज से निर्मित लिंग परिवार को सुख देता है। मिश्री से बने लिंग का पूजन करने से स्वास्थ्य लाभ होता है। अष्टधातु से निर्मित लिंग सर्वसिद्धि देनेवाला होता है, आदि। मंदिरों में सामान्यतः पाषाण निर्मित शिवलिंग ही मिलते हैं, जिनकी लंबाई, चौडाई और पूजन की विस्तृत व्यवस्था शैव ग्रंथों में दी हुई है। सर्वश्रेष्ठ लिंग वे माने जाते हैं जो पवित्र नदियों में स्वनिर्मित रुप में प्राप्त होते हैं। नर्मदा नदी के तो सभी कंकर शंकर माने जाते हैं।

शिवलिंग पूजन परंपरा भारत ही नहीं अपितु बाहर भी कई देशों में प्रचलित थी। रोम, यूनान, मिस्त्र, जापान, चीन आदि कई देशों में  भी पुरातत्त्ववालों की खोजों में शिवलिंग पूजन के प्रमाण मिले हैं। 

Saturday, 1 July 2017

संत ज्ञानेश्वर - ज्ञानियों का राजा

आषाढ़ एकादशी 4 जुलाई
संत ज्ञानेश्वर - ज्ञानियों का राजा

महाराष्ट्र के इतिहास में संत ज्ञानेश्वर का स्थान निःसंदेह अद्वितीय है। वे महाराष्ट्र का मानबिंदू हैं। संत एकनाथ ने उन्हें 'ज्ञानियों का शिरोमणि" तो संत कवि तुकाराम ने 'ज्ञानियों का गुरु राजा महाराव" के रुप में संबोधित किया है। करोडों वारकरियों (नियमित रुप से पंढ़रपूर की यात्रा के लिए जानेवाला विट्ठल भक्त) और मराठी भाषियों के ह्रदय में पिछली सात शताब्दियों से भी अधिक समय से वे विराजित हैं। उनकी लेखनी का जादू मराठीयों के मनों पर सवार है। उनके अमृत वचनों से उन्होंने अपनी जिव्हा पवित्र कर ली है।

उनकी 'ज्ञानेश्वरी" अथवा 'भावार्थदीपिका" यह 'गीता-टीका", भक्तिपरक महान भाष्य एक बहुत बडा चमत्कार ही तो है। उनके पिता विट्ठलपंत कुलकर्णी ने वैराग्य की तडप के कारण स्वामी रामानंद जो संत कवि कबीर के गुरु थे से काशी में सन्यास दीक्षा ले लीथी। उनका नाम सन्यास उपरांत 'चैतन्याश्रम" रखा गया था और अपने गुरु की ही आज्ञा से वे वापिस गृहस्थाश्रम में लौट आए थे (विस्तारभयावश वह कथा यहां नहीं दे रहा हूं)। परंतु, समाज ने उन्हें इस रुढ़ि के कारण नहीं स्वीकारा कि सन्यासी पुनः गृहस्थी में नहीं लौट सकता। जातिबहिष्कृत होने के पश्चात सद्‌ग्रंथों का अध्ययन करते हुए वे अपने दिन किसी तरह काटने लगे। क्रमशः उन्हें चार संताने निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव और मुक्ताबाई हुई। ये सभी भाई-बहन संत माने गए हैं।

महान सिद्ध योगी नाथ संप्रदाय के गहिनीनाथ ने निवृतिनाथ को दीक्षा देकर दीक्षामंत्र दिया था ः 'रामकृष्णहरि"। वे वैरागी बन गए। जब ज्ञानेश्वर 8 वर्ष के थे तब उन्होंने उनसे दीक्षा मांगी। निवृत्तिनाथ ने उन्हें दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। दोनो ही भाई विरक्त सन्यासी हो गए। निष्ठुर समाज द्वारा उनके परिवार को न स्वीकारने के कारण उनके माता-पिता ने प्रयागराज में डूबकर प्राण दे दिए। चारों ही भाई-बहन भिक्षाटन करके अपना पेट भर लेते थे। संत नामदेव को दीक्षा देनेवाले महात्मा विसोवा खेचर जो किसी समय ज्ञानेश्वर के कट्टर विरोधी और सदा उनके प्रति द्वेष भावना रखनेवाला व्यक्ति था उनके स्नेही स्वभाव, प्रेमभाव, विरोधी पर भी क्रोध न करने के कारण  और उनके सत्संग के प्रभाव से ही महात्मा बन गया था। वह कथा इस प्रकार से है -

एक दिन मुक्ताबाई ने सोचा घर में परांठे बने, उसने ज्ञानदेव (ज्ञानेश्वर) के सामने यह इच्छा प्रकट की। ज्ञानेश्वर ने कहा कैसे बनाओगी परांठे? घर में तो तवा भी नहीं!सेंकोगी कैसे? फिर ज्ञानेश्वर कुम्हार के यहां पहुंचे तभी वहां उसी गांव का विसोवा खेचर जो उन चारों से पराकाष्ठा का द्वेष करता था जा पहुंचा और कुम्हार से कहा क्या तुम जानते नहीं हो कि, ये जाति भ्रष्ट हैं यदि तुम सहायता करोगे तो तुम भी बहिष्कृत कर दिए जाओगे। कुम्हार ने बर्तन नहीं दिया। ज्ञानेश्वर घर लौट आए। मुुक्ताबाई उदास हो गई। तब ज्ञानेश्वर ने कहा अच्छा तुम ऐसा करो मेरी पीठ पर ही परांठे सेंक लो। और आसान लगाकर प्राणायम साधा और सिर लटकाकर घुटने से लगा बैठ गए और अपनी पीठ ऊपर कर ली। उनकी पीठ तप रही थी। मुक्ताबाई ने उस पर सचमुच परांठे सेंकना आरंभ कर दिया। परांठे बनते देख विसोवा आश्चर्यचकित रह गया साथ ही थोडा सा डर भी गया कि कहीं यह कोई जादू-मंतर तो नहीं। फिर उसने भयभीत हो ज्ञानेश्वर से क्षमा मांगी। आगे चलकर उसने उन्हीं से दीक्षा भी ली और उन्हीं के प्रभाव से एक महात्मा भी बन गया।

जब यह खबर चारों ओर फैली तो अनेक लोग उनके समर्थन में आगे आने लगे। परंतु, रुढ़िवादी पंडितों ने अपनी जीद ना छोडी और ज्ञानेश्वर से कहा कि, यदि तुम पैठण के पंडितों से अपनी शुद्धि का प्रमाण पत्र ले आओ तो हम तुम्हारा बहिष्कार समाप्त कर यज्ञोपवीत का अधिकार दे देंगे। अस्तु, ये चारों बच्चे पैठण पहुंचे और वहां के पंडितों से शास्त्रार्थ प्रारंभ कर दिया। ज्ञानेश्वर ने कहा - सब प्राणियों में एक ही परमात्मा का वास है। अतः तुम यदि किसी को सताते हो तो अन्य प्राणियों को भी कष्ट होगा। हम भले ही बहिष्कृत हैं परंतु, क्या हमारे अंदर भगवान का स्वरुप विद्यमान नहीं? इस पर तर्कशास्त्री व्यंग्य से कहने लगे तो ठीक है, यहां एक भैंसा मौजूद है देखें हम यदि उस पर प्रहार करते हैं तो तुम पर भी कुछ प्रभाव होता है कि नहीं? ज्ञानेश्वर ने कहा अवश्य उसका प्रभाव मेरी देह पर भी होगा। 

एक बलवान व्यक्ति ने उस भैंसे की पीठ पर दंड प्रहार किया और फिर उसने ज्ञानेश्वर की पीठ से वस्त्र हटाकर देखा तो प्रहार का चिंह वहां भी मौजूद था। फिर भी कहा गया कि यह तो कुछ चमत्कार जैसा है। यदि तुम में सचमुच शक्ति है तो तुम इस भैंसे से वेद मंत्र  बुलवा के दिखाओ। ज्ञानेश्वर ने भैंसे को पुचकार कर कुछ कहा और क्या आश्चर्य कि, भैंसा वेदमंत्रों की ऋचाएं सुनाने लगा। स्तब्ध पंडितों के समुदाय को अंततः ज्ञानेश्वर का लोहा मानना पडा। उनकी शुद्धि स्वीकार की गई। परंतु, फिर भी यह शर्त रख ही दी गई कि चारों भाई-बहन आजीवन ब्रह्मचारी ही रहेंगे। सामान्य बातों की तरह उन्होंने यह शर्त भी स्वीकार ली। अंततः पैठण से शुद्धि का प्रमाण पत्र  प्राप्त कर आलंदी आ गए। सभी पंडितों ने उन्हें स्वीकार लिया। 

आज लगभग 750 वर्षों बीत जाने के बाद भी ज्ञानेश्वरी बडी ही आस्था से घर-घर में पढ़ी जाती है। ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव, योगवासिष्ठ-टीका, चांगदेव पासष्टी हरिपाठ के अतिरिक्त सैंकडों अभंग जो आज भी घरों में गाए जाते हैं। इतनी ग्रंथरचनाएं उन्होंने आयु के 21 वर्षों में पूर्ण कर ली थी। उन्होंने अपने जीवन का हर क्षण जगत्‌उद्धार के लिए खर्च किया। वे भक्तिपंथ के आधार थे, उन्होंने भक्तिपंथ का ध्वज फहराया। उनके द्वारा रचित 'पसायदान" एक श्रेष्ठ प्रार्थना है। इस विषय पर निबंध स्पर्धाएं आयोजित की जाती हैं। रामानुज, मध्व, वल्लभाचार्य, निंबार्क के समान ही ज्ञानेश्वर बहुत बडे चिंतक थे। साक्षात्कारी पुरुष थे। अत्यंत मेधावी भाष्यकार और स्वतंत्र ग्रंथ रचनाकार थे।

इस भरतभूमि में अहिंसा की प्रतिष्ठा बहुत प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। योगानुशासन बतलानेवाले पतंजली ने अहिंसा की महत्ता बतलाई है और 'बैरत्याग" को उसका रुप बतलाया है। मनु ने सभी वर्णों के लिए जो समान मूल्य बतलाए हैं उनमें अहिंसा को प्रधानता है। ज्ञानेश्वर भी अहिंसा के विलास को कुछ नियमों, व्रतों के बंधन नहीं डालते। उनका यह विधान देखिए जिसकी व्याप्ति जितनी बढ़ाएं उतनी बढ़ती जानेवाली है। ''तैसें दयालुत्व आपुले मने हातापायां आणिले मग तेथे निपजविले अहिंसेतें।।"" उनकी  अहिंसा की व्याप्ति का विधान तो देखिए, जिस प्रकार से विद्युत्गृह की शक्ति विभिन्न तारों में सर्वत्र घूमती है वैसे ही मानस की दयाबुद्धि प्रत्यक्ष कृति में लाना ही अहिंसा है। कितनी व्यापक और सर्वसमावेशक व्याख्या है।