Friday, 23 June 2017

अनन्य साधारण कागज हमें कैसे मिला

अनन्य साधारण कागज हमें कैसे मिला

वैसे देखा जाए तो हम सब अपने दैनिक जीवन में कागज का उपयोग धडल्ले से करते हैं जैसेकि लिखने के लिए कापी, डायरी आदि के लिए, नोट, टिकीट, निमंत्रण पत्रिका, फोटो कापी आदि के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के कागज हम बेझिझक उपयोग में लाते हैं। इस निर्जीव परंतु बहुउपयोगी कागज पर कोई सृजनशील व्यक्ति सुंदर कविता रच सकता है, विचारणीय लेख लिख सकता है,चित्रकारी कर लोगों को लुभा सकता है। आज हम इस कागज के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसे इस कागज की वर्षाकाल के बहते पानी में बहुतों ने कागज की नाव भी तैराई होगी, का उत्पत्ति का इतिहास बडा रोचक है।

प्राचीनकाल के मनुष्य ने जब सोचना-विचारना प्रारंभ किया तब आने वाली पीढ़ियों को अपने विचारों, परिवेश के संबंध में जानकारी देने के लिए उन्हें अंकित या लिपिबद्ध करने के तरीके ढूंढते हुए उन्हें वे जिन गुफाओं में निवास करते थे उनके पत्थरों पर चित्र उकेरने का काम आरंभ किया। जैसे-जैसे सभ्यता विकसित होती गई वैसे-वैसे नए तरीके अपनाते हुए उसने जस्ते, पीतल, तांबे आदि की चादरों का उपयोग प्रारंभ किया। बाइबल में जस्ते के उपयोग महत्वपूर्ण चीजों को अंकित करने के लिए किए जाने का उल्लेख मिलता है। हिंदुस्थान और मध्यएशिया के प्राचीन लोग भूर्जपत्र पर लिखते थे। (भूर्ज नामक वृक्ष हिमालय में करीब 4000 मीटर की ऊंचाई पर मिलते हैं। इसकी भीतरी छाल जो कई मीटर लंबी निकलती है कागज की तरह होती है जिसे 'कालिदास" ने 'भूर्जत्वक" कहा है।) 'अगरु" या 'अगर"पत्र भी प्राचीन भारत की लेखन सामग्री है। पूर्वोत्तर भारत में इसका उपयोग बहुतायत से हुआ है।

रोम के निवासी वृक्ष की अंदरुनी छाल का प्रयोग भी लिखने के लिए करते थे। इस अंदरुनी को वे 'लाइबर" कहते थे। लाइबर लेटिन भाषा का शब्द है। इस लेटिन शब्द से अंग्रेजी का 'लाइब्रेरी" शब्द बना है। ताड पत्रों का उपयोग भी हमारे देश के साथ ही श्रीलंका और मिस्त्र के लोगों ने किया था। इन पर लिखे पुराने अभिलेख आज भी देश में मिलते हैं। ताड पत्तों को एक रस्सी से बांधकर एक किताबसी तैयार कर ली जाती थी। पेड के पत्ते को अंग्रेजी में लीफ कहते हैं। इसी पर से एक पन्ने को लीफ कहा  जाने लगा। 
प्राचीन सुमेरिया के निवासियों द्वारा मिट्टी के पट्टियों पर अंकित अभिलेख मिलते हैं। मिट्टी की पट्टियों का असीरिया और बेबिलोन में भी होता था। पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ऐसी पट्टियां खोज भी निकाली हैं। ई. पू. तीसरी सहस्त्राब्दि में मिस्त्र के निवासी लेखन के लिए पेपीरस का उपयोग करते थे। लेखन के लिए इसका उपयोग भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ईसा की दसवीं शताब्दी तक रहा। अंग्रेजी शब्द 'पेपर" इसीसे निकला है। पेपीरस के अलावा पशुओं के चमडे पर भी लिखा जाता था। इन पर लेखन का जिक्र ई. पू. दूसरी सहस्त्राब्दि में मिलता है। इनका प्रयोग कागज का चलन शुरु हो जाने के बाद भी काफी समय तक मिलता है। प्राचीन यूनान और रोम के लोग लकडी की तख्तियों पर मोम या प्लस्तर लगाकर किसी धातु की छड या नुकीली हड्डी से लिखते थे। इस तरह की तख्तियां यूनान में ई. पू. 9वीं शताब्दी तक काम में आई और इंग्लैंड में 14वीं शताब्दी तक। ढ़ाई सौ ईस्वी वर्ष पूर्व में एक चीनी विद्वान मंग तियन ने ऊंट के बालों से ब्रश तैयार किया लिखने की स्याही और बुने हुए कपडे का आविष्कार भी तब तक हो चूका था। फिर चर्मपट्टे और पेपीरस की तरह कपडे का प्रयोग लिखाई के लिए होने लगा।

कागज के शोध ने मानवी जीवन को अभूतपूर्व मोड दिया है। कोई संदेश भेजना, कोई जानकारी कई प्रतियों में तैयार करना, परंपरा से चले आ रहे किसी ज्ञान को लिखकर रखने की दृष्टि से कागज बहुत महत्वपूर्ण है। कागज के शोध के कारण एक क्रांतिसी ही आ गई। हमारे दैनिक जीवन में लगनेवाली कई बातों में से एक कागज अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस कागज का आविष्कार 105 ई. में एक चीनी विद्वान साइलून ने हान राजवंश के कार्यकाल में किया था। उसने पेडों की छाल पुराने कपडे और मछली पकडने के जाल में पानी मिलाकर लुगदी तैयार की और कागज बनाकर चीनी सम्राट को दिखाया। चीन के बाद 610 ई. में कागज बनाने की कला जापान पहुंच गई। 751 ई. में कागज समरकंद में भी बनाया जाने लगा। कागज के आविष्कार के बाद लगभग 1000 वर्ष पश्चात 12वीं शताब्दी में यह कला बगदाद, दमिश्क, मिस्त्र, मोरक्को होते हुए यूरोप पहुंची। यूरोप में कागज सबसे पहले सन्‌ 1151 में स्पेन में बनाया जाने लगा। 1276 में इटली में बनने लगा,1348 में फ्रांस, 1390 में जर्मनी, 1491 में पौलेंड, 1576 में रुस, 1635 में डेनमार्क और 1690 में नार्वे में कागज बनना शुरु हो गया। 
भारत में यह कला अरबों के माध्यम से पहुंची ऐसा यूपोपियन विद्वानों का मत है जिन्होंने इसे चीनियों से सीखा था। परंतु, ई. पू. 327 में सिकंदर के साथ आए निआर्कस का कहना है कि, हिंंदू लोग कपास को कूटकर कागज तैयार करते थे भले ही उसका उपयोग विस्तृत रुप से न होता हो। भारत में मुगल राजकाल में सोलहवीं शताब्दी में हाथकागज की निर्मिती होने लगी। उस जमाने में कागज तैयार करना एक कला मानी जाती थी और कागज बनानेवाले कागजी भरपूर पैसा कमाते थे। ये कागजी पंजाब और कश्मीर में बसे थे और मुगल साम्राज्य के संरक्षण में थे। अकबर का काल में यह आम उपयोग मेंं आने लगा था। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में कागज तैयार करने के कारखाने लगने से इस कला का पतन होना शुरु हो गया। हाथ कागज निर्माण के लिए लगनेवाला कच्चा माल बडे पैमाने पर इंग्लैंड भेजा जाने लगा। इस धंधे का पतन तेज गति से शुरु हो गया और 20वीं शताब्दी में तो उच्च दर्जे का कागज बनानेवाले कारीगर बेरोजगार हो गए।

No comments:

Post a Comment