Friday, 2 June 2017

वर्षा ऋतु और उसके प्रतिनिधि

वर्षा ऋतु और उसके प्रतिनिधि
शिरीष सप्रे

महाकवि शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाट्य साहित्य की अद्‌भुत रचना 'मृच्छकटिकम्‌" (मिट्टी की गाडी) के पंचम अंक में वर्षा का अति सुंदर, मनोहारी वर्णन है। इसमें एक स्थान पर जलधाराओं के गिरने से उत्पन्न सहज ध्वनियों को एकदम निराली संगीतात्मक अभिव्यक्ति दी है। वर्षाऋतु में आकाश के बहुरुपिये मेघों का वर्णन करते हुए कहा गया है-एक दूसरे से मिले हुए चक्रवाक (एक जलपक्षी) के जोडों के समान, उडते हुए हंसों की भांति, (सागर की लहरों से इधर-उधर) फेंके गए मछलियों के झुंड तथा मगरों की तरह, उँचे-उँचें महलों जैसे, भिन्न-भिन्न विस्तृत आकारों को प्राप्त करनेवाले, हवा के झोंकों से छिन्न-भिन्न और उमडते हुए बादलों के द्वारा आकाश चित्रित सा सुशोभित हो रहा है।" वसंतसेना और चारुदत्त इस प्रणयी युगल की वर्षाऋतु में भेंट का वर्णन करते हुए शूद्रक नें 'मृच्छकटिकम्‌" में मेघों को श्रीकृष्ण की आकाश में उडनेवाले बगुलों के वक्राकार माला के शंखों की तो, बिजली को पीतांबर की उपमा दी है।
प्राचीन भारतीयों ने पर्जन्य देवता की आराधना, स्तवन किया है और मेघों को पर्जन्य देवता का, वर्षा ऋतु का प्रतिनिधि माना है। मत्स्यपुराण के अनुसार मेघ ब्रहांड के कवच से तैयार हुए हैं। मेघों को पर्जन्य (बादल, मेघ) देवता का प्रतिनिधि माना गया है। आकाश का 'प्रेमदूत" बनकर आनेवाले मेघों से संस्कृत साहित्य व्याप्त है। सूर्य जब मृग नक्षत्र में आता है तब वर्षा ऋतु आरंभ होती है और जब वह चित्रा नक्षत्र में जाता है तब वर्षाकाल समाप्त होता है। नौ नक्षत्रों को वर्षा के नक्षत्र माना गया है। वे हैं ः मृग,आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा, उत्तरा, हस्त से लेकर चित्रा। ऋगवेद के सातवें मंडल में पर्जन्य देवता के लिए सूक्त हैं। मेघ इंद्र के अधिकार में होकर वह उसकी इच्छानुसार बादलों को बरसने की आज्ञा देता है। लौकिक संकेत है कि इंद्र हसता है, धनुष्य का टंकार करता है वही मेघ गर्जना है। बादलों की गडगडाहट कवियों को कभी युद्ध के नगारों की आवाज के समान तो, कभी मंदिर में बजाए जानेवाले नगारों के समान, तो कभी उनको उसका आभास संगीतशाला में मृदंगनाद की ध्वनि के समान महसूस होता है। मेघ गर्जना होने पर पानी बरसेगा या सूखा पडेगा इस बारे में भी कुछ मान्यताएं हैं। 

वर्षा ऋतु का कालिदास ने 'जलदसमय" इस प्रकार से यथार्थ वर्णन किया है। वर्षाकाल का आरंभ कविप्रतिभा का वेगवान प्रवाह ही तो है। वर्षाकाल में कविप्रतिभा को नए अंकुर फूटते हैं और इसीमें से 'मेघदूत" जैसा कल्पनारम्य, भावमधुर गीतिकाव्य निर्मित होता है।  मेघ का यथार्थ रुप आकाश में स्वेच्छा से भ्रमण करने का है। विरही यक्ष का उसकी प्रिय पत्नी को संदेश लेकर जानेवाला 'मेघदूत" संस्कृत साहित्य में चिरस्मरणीय हो गया है। बादलों से आच्छादित सावन के महिने में जन्मे भगवान कृष्ण को उसके काले रंग के कारण 'मेेेघश्याम, घनश्याम" भी कहा जाता है। शंकराचार्यजी ने 'श्रीकृष्णाष्टक" में उन्हें 'मेघसुंदर" कहा है। मेघों को संस्कृत में 'सुदामन" नाम भी है। इसी कारण मेघों से संगती रखनेवाली बिजली को 'सौदामनी" कहते हैं। इनके अलावा विद्युत, तडित्‌, क्षणप्रभा, मेघज्योति, चंचला, चपला इस प्रकार के अर्थपूर्ण नाम भी हैं। मेघों ने संस्कृत एवं प्राकृत साहित्य को व्याप्त कर रखा है। मिथकों से लेकर काव्य तक इनका मार्गक्रमण हुआ है।

पर्जन्य देवता का दूसरा प्रतिनिधी है मंडूक यानी मेंढ़क। ऋगवेद में पर्जन्य देवता के साथ ही मंडूक देवता के लिए भी सूक्त हैं। पर्जन्य देवता के आने की आहट सुनते ही सुप्तअवस्था में निश्चल पडे मंडूक शब्द करने लगते हैं। वर्षा ऋतु उन्हें अपने प्रेमवर्षा से भिगो देती है और फिर वे एकदूसरे की ओर आकृष्ट होते हैं। यह उनका प्रणयाराधन काल भी होता है। इस समय मेंढ़क कूदने लगते हैं और एकदूसरे की आवाजों का अनुसरण भी इस प्रकार से करने लगते हैं मानो एकाद्य शिष्य गुरु का करता है। पर्जन्य नक्षत्र और वाहन इस पर से वर्षा का अनुमान लगाने की प्रथा भारतीयों में प्राचीनकाल से ही हैैैैैैैैैैैैैै। मेंढ़क, भैंस और हाथी वाहन हो तो भरपूर पानी बरसता है एवं  मोर, गधा, चूहा हो तो मध्यम पानी बरसता है। घोडा वाहन हो तो पर्वतीय क्षेत्रों में पानी बरसता है। सियार या मेढ़ा हो तो पानी की राह देखना पडती है। 

पानी बरसे इसलिए लोक संस्कृति में विविध विधियां निर्मित की गई हैं। दंतकथाओं में इस प्रकार के भी उल्लेख मिलते हैं कि, प्राचीनकाल में वर्षा हो इसलिए राजा लोग उत्तम, सुलक्षणी पुरुष को चुनकर उसकी बलि देते थे। वर्षा के आगमन से मेंढ़कों का संबंध देखकर जनमानस में कुछ विधियां निर्मित की गई हैं। जैसेकि, मध्यप्रदेश में मेंढ़क को पकडकर उसके पैरों में रस्सी बांधकर नीम के पेड से उलटा लटका दिया जाता है। इसके पीछे धारणा यह है कि, मेंढ़क को कष्ट देने से वरुण देवता को मेंढ़क की दया आएगी और वह पानी बरसा देगा। कहीं-कहीं मेंढ़क की पूजा भी की जाती है। छोटे बच्चों को गांव में नग्न घूमाना। अतिवृष्टि पर उपचार के लिए पर्जन्य शांति नामका एक विधि भी किया जाता है। 

तांत्रिक विद्या के अनुसार मेंढ़क समृद्धि, सौभाग्य एवं प्रजनन क्षमता का प्रतीक है। हो सकता है आपको आश्चर्य हो पर उत्तरप्रदेश के नगर लखीमपूर जिले के ओयल में अद्‌भुत रचना वाला मेंढ़क का मंदिर भी है परंतु यहां के पीठासीन देवता शिवजी हैं और इससे जुडी एक पौराणिक कथा भी है। मेंढ़क जल और भूमि दोनो पर निवास कर सकनेवाला उभयचर प्राणी है और प्राणियों की उत्क्रांति में उसका महत्वपूर्ण स्थान है। मेंढ़क की त्वचा धूप नहीं सहन कर सकती इसलिए मेंढ़क वर्षाकाल को छोडकर लंबे समय तक निष्क्रिय, निश्चल और लगभग निष्प्राणसी अवस्था में लगभग छिपकर रहता है।

पर्जन्य देवता के अग्रदूत हैं - नर्तनोत्सुक हमारा राष्ट्रीय पक्षी मोर, सारस, मेघों से संगति रखनेवाले और उसकी दिशा में उडान भरनेवाले नयनसुख देनेवाली बगुलों की कतारें। अपवाद है तो, हंस जिन्हें वर्षा ऋतु पसंद नहीं, वे उडकर मानसरोवर की ओर निकल जाते हैं। वर्षा ऋतु से संबंधित एक ओर पक्षी है - चातक। इसका एक संस्कृत नाम है 'वापीहा" - जलाशयों को टालनेवाला। हिंदी में इसे 'पपीहा" भी कहते हैं। यह कोयल की जाति का होकर एक गूढ़ पक्षी है। इसका रहवास पर्वत की गुफाओं और ऊंचे वृक्षों पर होता है। वसंत और वर्षा ऋतु में आम के पेडों पर बैठकर सुरीली ध्वनी में बोलता है। प्रवाद है कि, यह केवल आकाश से गिरनेवाले पानी को ही पीता है प्यास से मर जाने पर भी तालाब, नदी आदि के जल में अपनी चोंच नहीं डूबोता है। बहुत से लोग तो यह भी मानते हैं कि यह केवल स्वाती नक्षत्र में गिरे पानी को ही पीता है। संस्कृत एवं अन्य भाषा के कवियों ने इसका बडा मान रखा है और इसे लेकर कई उक्तियों की रचना की है। 

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