Friday, 23 June 2017

अनन्य साधारण कागज हमें कैसे मिला

अनन्य साधारण कागज हमें कैसे मिला

वैसे देखा जाए तो हम सब अपने दैनिक जीवन में कागज का उपयोग धडल्ले से करते हैं जैसेकि लिखने के लिए कापी, डायरी आदि के लिए, नोट, टिकीट, निमंत्रण पत्रिका, फोटो कापी आदि के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के कागज हम बेझिझक उपयोग में लाते हैं। इस निर्जीव परंतु बहुउपयोगी कागज पर कोई सृजनशील व्यक्ति सुंदर कविता रच सकता है, विचारणीय लेख लिख सकता है,चित्रकारी कर लोगों को लुभा सकता है। आज हम इस कागज के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसे इस कागज की वर्षाकाल के बहते पानी में बहुतों ने कागज की नाव भी तैराई होगी, का उत्पत्ति का इतिहास बडा रोचक है।

प्राचीनकाल के मनुष्य ने जब सोचना-विचारना प्रारंभ किया तब आने वाली पीढ़ियों को अपने विचारों, परिवेश के संबंध में जानकारी देने के लिए उन्हें अंकित या लिपिबद्ध करने के तरीके ढूंढते हुए उन्हें वे जिन गुफाओं में निवास करते थे उनके पत्थरों पर चित्र उकेरने का काम आरंभ किया। जैसे-जैसे सभ्यता विकसित होती गई वैसे-वैसे नए तरीके अपनाते हुए उसने जस्ते, पीतल, तांबे आदि की चादरों का उपयोग प्रारंभ किया। बाइबल में जस्ते के उपयोग महत्वपूर्ण चीजों को अंकित करने के लिए किए जाने का उल्लेख मिलता है। हिंदुस्थान और मध्यएशिया के प्राचीन लोग भूर्जपत्र पर लिखते थे। (भूर्ज नामक वृक्ष हिमालय में करीब 4000 मीटर की ऊंचाई पर मिलते हैं। इसकी भीतरी छाल जो कई मीटर लंबी निकलती है कागज की तरह होती है जिसे 'कालिदास" ने 'भूर्जत्वक" कहा है।) 'अगरु" या 'अगर"पत्र भी प्राचीन भारत की लेखन सामग्री है। पूर्वोत्तर भारत में इसका उपयोग बहुतायत से हुआ है।

रोम के निवासी वृक्ष की अंदरुनी छाल का प्रयोग भी लिखने के लिए करते थे। इस अंदरुनी को वे 'लाइबर" कहते थे। लाइबर लेटिन भाषा का शब्द है। इस लेटिन शब्द से अंग्रेजी का 'लाइब्रेरी" शब्द बना है। ताड पत्रों का उपयोग भी हमारे देश के साथ ही श्रीलंका और मिस्त्र के लोगों ने किया था। इन पर लिखे पुराने अभिलेख आज भी देश में मिलते हैं। ताड पत्तों को एक रस्सी से बांधकर एक किताबसी तैयार कर ली जाती थी। पेड के पत्ते को अंग्रेजी में लीफ कहते हैं। इसी पर से एक पन्ने को लीफ कहा  जाने लगा। 
प्राचीन सुमेरिया के निवासियों द्वारा मिट्टी के पट्टियों पर अंकित अभिलेख मिलते हैं। मिट्टी की पट्टियों का असीरिया और बेबिलोन में भी होता था। पुरातत्त्ववेत्ताओं ने ऐसी पट्टियां खोज भी निकाली हैं। ई. पू. तीसरी सहस्त्राब्दि में मिस्त्र के निवासी लेखन के लिए पेपीरस का उपयोग करते थे। लेखन के लिए इसका उपयोग भूमध्यसागरीय क्षेत्र में ईसा की दसवीं शताब्दी तक रहा। अंग्रेजी शब्द 'पेपर" इसीसे निकला है। पेपीरस के अलावा पशुओं के चमडे पर भी लिखा जाता था। इन पर लेखन का जिक्र ई. पू. दूसरी सहस्त्राब्दि में मिलता है। इनका प्रयोग कागज का चलन शुरु हो जाने के बाद भी काफी समय तक मिलता है। प्राचीन यूनान और रोम के लोग लकडी की तख्तियों पर मोम या प्लस्तर लगाकर किसी धातु की छड या नुकीली हड्डी से लिखते थे। इस तरह की तख्तियां यूनान में ई. पू. 9वीं शताब्दी तक काम में आई और इंग्लैंड में 14वीं शताब्दी तक। ढ़ाई सौ ईस्वी वर्ष पूर्व में एक चीनी विद्वान मंग तियन ने ऊंट के बालों से ब्रश तैयार किया लिखने की स्याही और बुने हुए कपडे का आविष्कार भी तब तक हो चूका था। फिर चर्मपट्टे और पेपीरस की तरह कपडे का प्रयोग लिखाई के लिए होने लगा।

कागज के शोध ने मानवी जीवन को अभूतपूर्व मोड दिया है। कोई संदेश भेजना, कोई जानकारी कई प्रतियों में तैयार करना, परंपरा से चले आ रहे किसी ज्ञान को लिखकर रखने की दृष्टि से कागज बहुत महत्वपूर्ण है। कागज के शोध के कारण एक क्रांतिसी ही आ गई। हमारे दैनिक जीवन में लगनेवाली कई बातों में से एक कागज अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस कागज का आविष्कार 105 ई. में एक चीनी विद्वान साइलून ने हान राजवंश के कार्यकाल में किया था। उसने पेडों की छाल पुराने कपडे और मछली पकडने के जाल में पानी मिलाकर लुगदी तैयार की और कागज बनाकर चीनी सम्राट को दिखाया। चीन के बाद 610 ई. में कागज बनाने की कला जापान पहुंच गई। 751 ई. में कागज समरकंद में भी बनाया जाने लगा। कागज के आविष्कार के बाद लगभग 1000 वर्ष पश्चात 12वीं शताब्दी में यह कला बगदाद, दमिश्क, मिस्त्र, मोरक्को होते हुए यूरोप पहुंची। यूरोप में कागज सबसे पहले सन्‌ 1151 में स्पेन में बनाया जाने लगा। 1276 में इटली में बनने लगा,1348 में फ्रांस, 1390 में जर्मनी, 1491 में पौलेंड, 1576 में रुस, 1635 में डेनमार्क और 1690 में नार्वे में कागज बनना शुरु हो गया। 
भारत में यह कला अरबों के माध्यम से पहुंची ऐसा यूपोपियन विद्वानों का मत है जिन्होंने इसे चीनियों से सीखा था। परंतु, ई. पू. 327 में सिकंदर के साथ आए निआर्कस का कहना है कि, हिंंदू लोग कपास को कूटकर कागज तैयार करते थे भले ही उसका उपयोग विस्तृत रुप से न होता हो। भारत में मुगल राजकाल में सोलहवीं शताब्दी में हाथकागज की निर्मिती होने लगी। उस जमाने में कागज तैयार करना एक कला मानी जाती थी और कागज बनानेवाले कागजी भरपूर पैसा कमाते थे। ये कागजी पंजाब और कश्मीर में बसे थे और मुगल साम्राज्य के संरक्षण में थे। अकबर का काल में यह आम उपयोग मेंं आने लगा था। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में कागज तैयार करने के कारखाने लगने से इस कला का पतन होना शुरु हो गया। हाथ कागज निर्माण के लिए लगनेवाला कच्चा माल बडे पैमाने पर इंग्लैंड भेजा जाने लगा। इस धंधे का पतन तेज गति से शुरु हो गया और 20वीं शताब्दी में तो उच्च दर्जे का कागज बनानेवाले कारीगर बेरोजगार हो गए।

Friday, 16 June 2017

ऋतुओं का अधिपति - भगवान वरुण



ब्रह्म पुराण में वरुण को सूर्य का एक अंग बतलाया गया होकर सूर्य के 108 नामों में से एक है। वर्ष के बारह महिनों में सूर्य ने विभिन्न बारह रुपों में विश्व को व्याप्त कर रखा है तथा भाद्रपद महिने में वह 'वरुण" नाम से दमकता है। 'वरुण" ऋतुओं के अधिपति होकर संसार के सभी जीवों के नैतिक मूल्यों का नियमन करते हैं और इसके लिए वह 'पाश" धारण करते हैं। इन्हें 'ऋतस्यगोप" भी कहा जाता है। वेद-पुराण काल से ही भगवान वरुण को समुद्र-सागर का अधिदेवता माना गया है। वे पर्जन्य के देवता भी हैं। उनका जल जगत पर शासन है। वे बादलों के रुप में संपूर्ण जगत को जल की आपूर्ति करते हैं। पुराण काल में वरुण देव समुद्री जीवन का एक अविभाज्य अंग थे। नाविक-मल्लाह, समुद्री व्यवसाय के लोग  समुद्री यात्रा के पूर्व 'शं नो वरुणः।।"" हे वरुण देवता, हमारी रक्षा कर, हमें मोक्ष दे (यानी सुख से हमारी यात्रा हो, हमारी रक्षा कर),जीवन, सुख, संतुष्टि, समृद्धि दे - का वरदान मांगा करते थे। भारतीय नौसना का ध्येय वाक्य भी यही है। 

सबसे पहले सुरासुरो को जीतकर राजसूय यज्ञ जलाधीश वरुण ने ही किया था। वे पश्चिम दिशा के लोकपाल हैं। वरुण (नेपच्यून) सौरमंडल के आठवें ग्रह हैं। वे देवलोक में सभी सितारों का मार्ग निर्धारित करते हैं। सागरी जीवन पर समर्पित एक मराठी मासिक 'दर्यावर्दी" नाम से पिछले 75 से भी अधिक वर्षो से प्रकाशित होता रहा होकर समुद्री जीवन और मछलियों के संबंध में जानकारी प्रदान करता आ रहा है। मराठा नौसेना प्रमुख कान्होजी आंग्रे जितना बहादुर और यशस्वी दर्यावर्दी भारत में दूसरा पैदा नहीं हुआ है। कुछ विश्व प्रसिद्ध दर्यावर्दी हैं - सिंदबाद और कोलंबस। अरब नाविक सिंदबाद की सात यात्राएं (सेवन वॉयेजिज ऑफ सिंदबाद) एक प्रसिद्ध पुस्तक है जो कई भाषाओं में प्रकाशित हुई है।

ऋगवेद में और अन्य पुराणों जैसे पद्‌म पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत आदि धर्मग्रंथों-साहित्य में कई स्थानों पर भगवान वरुण का उल्लेख मिलता है। वेदों में वरुण को नैतिक शक्तियों का पोषक माना गया है। ऋगवेद के सूक्तों में उनके प्रति चरम की भक्ति भावना प्रकट होती है। उनको असुर की उपाधि भी दी गई है। वरुण का प्रकृति के अन्य देवताओं से घनिष्ठ संबंध आता है। पर्जन्य देवता इंद्र, अग्निदेवता, मित्र या आदित्य सूर्यदेवता इनके परम मित्र हैं। प्राचीन हिंदू वैचारिक और तात्त्विक मूल्यों के अनुसार 'वरुण" सारे विश्व को समालेनेवाला माना जाता था। वरुण को सभी देव-देवताओं का प्रमुख देवाधिपति माना जाता था तो, इंद्र महान योद्धा समझा जाता था। उसकी प्रसिद्धी पृथ्वी और अंतरिक्ष पर नियंत्रण रखनेवाला, दिन और रात का संचालक, अखंड ब्रह्मांड का नियंता के रुप थी। परंतु, बाद के काल में वह सागर और जल का अधिपति ही रह गया और उसका घनिष्ठ सहयोगी इंद्र देवाधिपति माना जाने लगा। परंतु, फिर भी उसका पहले का वर्चस्व कुछ अंशों में विश्व के पश्चिम विभाग के पालक के रुप में है। 

अग्नि पूजक पारसियों में वे 'अहरु मज्दा" के नाम से जाने जाते हैं। यूनान में उन्हें 'यूरेनस" के नाम से जाना जाता है। भगवान झूलेलाल को वरुण देवता का अवतार माना जाता है। परम पर पहुंच चूके भारतीय समाज में जल यानी वरुण देवता को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था और आज भी है। दक्षिण भारत में वरण को 'वरुणनन" के रुप में मान्यता है। अनावृष्टि के समय उनकी उपासना प्राचीन काल से होती चली आ रही है। विशेषकर बहुजन समाज में आज भी यदि वर्षा नहीं होती है तो, अनावृष्टि से बचने के लिए वरुण देवता की शरण लेने की प्रथा प्रचलित है। सभी धार्मिक एवं शुभ कार्यों, होम-हवन में अर्घ्य देते समय जल का उपयोग अपरिहार्य है। किसी भी स्थान को शुुुचिर्भूत यानी पवित्र करने के लिए जल का उपयोग हमारी धार्मिक संस्कृति में अनिवार्य है। जल के अनेक नामों में से एक नाम 'आप" भी है।

 यजुर्वेद के अनुसार 'ज मतलब जन्म देना, 'ल" मतलब पालन-पोषण करना। इस कारण वृक्ष और मानव इनके जन्म और पोषण के लिए पानी कारणीभूत है। वैसेही 'उदक" का अर्थ यजुर्वेद में वस्तु को स्पर्श कर उसका तेज बढ़ानेवाला दिया हुआ है। इस तेजमय पानी से पुण्यपुरुष, पितर-देवदेवताओं अर्घ्य-पाद्य स्नान, अर्पण करते हैं। ऋगवेद में वस्तुओं की अपवित्रता नष्ट करने के लिए 'आपसूक्त" बतलाया गया है। जल को पाप नष्ट करनेवाला, सुख के भंडार का पालन करनेवाला, वंशवृद्धि करनेवाला, प्रदीर्घ जीवन देनेवाला और प्राणी मात्र का आधार माना गया है।

वरुण उनपचास मरुत गणों में से एक हैं। ब्रह्माजी ने ही उन्हें जलाधिपति की उपाधि प्रदान की थी। यह आख्यायिका पद्मपुराण के अनुसार इस प्रकार से है - दक्ष प्रजापति की साठ लडकियों में से दो अदिती एवं दिती और तेरह लडकियों का विवाह कश्यप के साथ  उन्होंने कर दिया। अदिती से देवता गणों का जन्म हुआ तो, दिती से दैत्यगणों का। जब दैत्यगण देवताओं को अत्याधिक यंत्रणाएं देने लगे तब अदिती ने अपने बच्चों की रक्षा के लिए सूर्यदेवता की आराधना की। सूर्यदेव ने अपनी सहस्त्रों किरणों के तेज से उसके गर्भ में प्रवेश किया और भगवान मार्तंड का जन्म हुआ। सुरासुर में हुए घनघोर युद्ध में भगवान मार्तंड ने अपने नेत्रों के तेज से सभी असुरों को भस्म कर डाला। अपने पुत्रों का इस प्रकार का अंत देखकर दिती अत्यंत शोकाकुल हो गई और भूलोक पर आ सरस्वती नदी के तट पर पुष्कर तीर्थ पर उसने घोर तपस्या की और ज्येष्ठ पूर्णिमा का व्रत किया। उसकी सौ वर्षों की तपस्या से प्रसन्न हो भगवान सूर्यनारायण ने  इंद्र का नाश हो इतने तेजस्वी पुत्र का वर उसे दिया व गर्भ धारणा हो गई। सौ वर्षों तक उसने अपने गर्भ की रक्षा की।

इस कारण इंद्र को अपना स्थान शाश्वत रहेगा कि नहीं का भय उत्पन्न हो गया। वह तपोवन में जाकर दिती की सेवा करने लगा। जब सौ वर्ष पूर्ण होने में एक ही दिन बचा था तभी उसने दिती के गर्भ में प्रवेश किया और अपने वज्र से उस गर्भ के सात टुकडे कर दिए। उन सात टुकडों के उसने पुनः सात टुकडे कर दिए। इस प्रकार कुल उनपचास टुकडे हो गए। पूर्णिमा व्रत का वह फल होने के कारण गर्भ के वे सारे उनपचास अर्भक इंद्र के वज्र के आघात को सहकर भी ब्रह्मदेव के प्रभाव से अवध्य ठहरे। जब ये अर्भक जोर-जोर से रोने लगे तब इंद्र ने उनको सांत्वना देते हुए कहा 'मा रुद्‌ध्वम" (रोओ मत)। इस संबोधन के कारण वे दिती के पुत्र 'मरुत" नाम से जाने लगे और अन्य देवताओं के समान वे धर्मज्ञानी हुए तथा यज्ञभाग के अधिकारी बने। 'वरुण" इन्हीं उनपचास मरुत गणों में से एक है। ब्रह्माजी ने ही उन्हें जलाधिपति का पद प्रदान किया है। 

अपने को जीवन देनेवाले, अपनी रक्षा करनेवाले वरुण देवता की प्रतिमा भले ही वर्तमान युग में घर-घर में ना हो परंतु, हो सकता है किसी जमाने में हो। वेदकाल और प्राचीन काल में जब भारत में समुद्री व्यवसाय चरम पर था तब समुद्री जीवन से जुडे लोग वरुण देवता को बहुत मानते थे। आधुनिककाल की भारतीय समुद्री संस्थाओं ने वरुण देवता का पुनरुस्थापन अपने रक्षणकर्ता और समृद्धिदाता के रुप में किया है। भारत की प्रसिद्ध समुद्री कंपनी सिंधिया शिपिंग नेविगेशन ने प्रारंभ से वरुणदेवता का प्रतीक अपनाया हुआ है। 'वरुणा शिपिंग कंपनी" के नाम से भी एक भारतीय कंपनी है। इंडोनेशिया में भी 'जलनाथ शिपिंग कंपनी" नाम से एक कंपनी है।  

Monday, 12 June 2017

अनिल माधव दवे - एक अद्‌भुत व्यक्तिमत्व

अनिल माधव दवे - एक अद्‌भुत व्यक्तिमत्व

ई.स. 1990च्या गुरुपौणिर्ंमा उत्सवात आमच्या कॉलोनीत (रविशंकर शुक्ल नगर- आर.एस.एस. नगर, इंदुर) श्रीअनिल माधव दवे यांचे बौद्धिक झाले होते. त्या नंतर माझी त्यांच्याशी चर्चा ही झाली होती. त्यांचे ते बौद्धिक बहुतच प्रभावी होते आणि नंतर ते त्यांच्या याच कले करिता चांगलेच ओळखले ही जाऊ लागले. पुढ़े जाऊन त्यांच्या भाषणांमध्यें अंतर इतकेच पडले की ज्यावेळेस ते तरुण होते  त्यावेळेस त्यांचे बौद्धिक किंवा भाषण अत्यंत उल्हास आणि जोमाचे असे पण वयोमाना प्रमाणे तितकेच गंभीर होत चालले गेले. त्या नंतर त्यांचे आणि माझे संबंध अधिकच प्रगाढ़ होत चालले गेले. या मागे दोन प्रमुख कारणे होती - पहिल, ते शाळा-कॉलेजात माझे सीनीयर होते आणि त्यांचे या प्रकारे आमच्याच भागात, नगरातच (संघाच्या दृष्टिने आंबेडकर नगर) संघाच्या प्रचारकाच्या रुपात येणे बघून मी अभिभूतच होऊन गेलो होतो. दूसरे कारण झाले स्व. बाबासाहेब नातू जे आमच्या घरी 1956 पासून संघ प्रचारकाच्या रुपात येऊन राहिले होते. ते अनिलजींना आमच्या येथे घेऊन आले व त्यांना म्हणाले होते हे माझे घर आहे येथे कसला ही संकोच करु नकोस व त्या नंतर या कारणामुळेच आमचे संबंध अधिकच वाढ़त गेले. काही वर्षे इंदुर मध्यें कार्य केल्या नंतर ते संघकार्याकरिता भोपाळला चालले गेले व तेथे विभाग प्रचारकाच्या रुपात कार्य करु लागले. त्यामुळे त्यांचे आणि माझे संबंध काही अंशी संपुष्टात आले. पण माझे त्याच्या कुंटुंबात येणे-जाणे मात्र चालत राहिले. 

ज्या वेळेस ते इंदुर मध्यें प्रचारक म्हणून कार्य करित होते त्या वेळेस देखील ते अत्यंत जिज्ञासू व अभ्यासू प्रवृत्तीचे होते. पुढ़े जाऊन त्यांनी कित्येक पुस्तके व लेख लिहिले. 'चरैवेती"चे भोपाळ मध्यें संपादक म्हणून देखील कार्य केल. त्यांच्या 'शिवाजी और सुराज" या पुस्तकाचे विमोचन सरसंघचालक 'श्री मोहनरावजी भागवत" व तात्कालिक शिवसैनिक, भू. पू. केंद्रिय मंत्री 'श्री सुरेश प्रभु" यांनी केले होते. आमुख विश्वातील सगळ्यात मोठे स्वयंसेवी संगठनाचे प्रमुख 'श्री मोहनरावजी भागवत" तर प्राक्कथन 'बाबासाहेब पुरंदरेजी" आणि प्रास्ताविक मोदीजी यांनी (गुजराथचे तात्कालिक मुख्यमंत्री) लिहिल्या होत्या. त्यांच्या जीवना व कार्यशैलीवर 'छत्रपती शिवाजींचा" बहुत मोठा प्रभाव होता. ई. स. 2003 मध्यें दिग्विजयसिंहच्या सरकारच्या पराभवा करिता आणि भाजपच सरकार प्रस्थापित करण्याकरिता त्यांनी जे चुनावी कार्यालय स्थापित केले होते त्याचे नाव 'जावली"च ठेवले होते. त्यांनी लिहिलेल्या 'शिवाजी और सुराज" या पुस्तकाचा हा काही भाग जो आज देखील प्रासंगिक आहे व ते ज्या 'वन व पर्यावरण विभागाचे" केंद्रिय राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) होतेशी संबंधित आहे तो या प्रमाणे आहे - 

''स्वराज के जंगलों में आम व कटहल के पेड हैं, जो जलपोत निर्माण में काम आ सकते हैं, परंतु उन्हें हाथ न लगाया जाए, क्योंकि ये पेड ऐसे नहीं हैं जो साल-दो साल में बडे हो जाएं। जनता ने उन पेडों को लगाकर अपने बच्चों की तरह पाल-पोसकर बडा किया है।""

विविध विषयांबद्दलचे ज्ञान, माहित्यां, सूचना समजावून घेण्याची उत्सुकता, रस घेण्याची प्रवृत्ती त्यांच्या मध्यें सुरुवाती पासूनच होती जी शेवट पर्यंत राहिली. जेव्हां ते इंदुर मध्यें प्रचारक होते तेव्हां 'पत्रकार, पत्रकारिता आणि त्यांचा पेशा" जाणून, समझावून घेण्याकरिता या व्यवसायाशी संबंधित काही लोकांशी त्यांची भेटण्याची इच्छा होती. त्यांनी जेव्हां ती इच्छा माझ्या समोर प्रकट केली तेव्हां मी त्यांची गाठभेट इंदुर-लखनऊहून प्रकाशित होणाऱ्या साप्ताहिक वृतपत्राचे मालक श्री श्याम अवस्थीं बरोबर माझ्या निवासस्थानावर घडवून आणली. त्यांची ही वार्ता चांगली दोन-तीन तास चालली. या प्रकारेच दैनिक भास्कर इंदुरचे तत्कालीन संपादक विनोद मिश्र (त्यांच्या नावाचे मला थोडेसे विस्मरण होत आहे) जे अलाहबादाचे राहणारे होते व दैनिक स्वदेशच्या इंदुर संस्करणाच्या आरंभिक दिवसांमध्यें त्यांनी कांही दिवस येथे देखील कार्य केले होते यांच्या बरोबर भेट घडवून आणली होती. त्यांचा फ्लैट माझ्या शापिंग कॉम्पेक्स ए. बी. रोड इंदुरवरील कार्यालयाच्या वरच होता. त्यांच्या बरोबर पण त्यांची दीर्घ चर्चा झाली होती.

जेव्हां ते इंदुर मध्यें नगर प्रचारक होते तेव्हां देखील त्यांची प्रकृती थोडीशी नाजुकच राहत असे. त्यावेळेस अत्यंत विपरीत परिस्थितीं मध्यें कार्य केल्यामुळे व जेवणाची अनियमितता त्यांच्या तब्येतीस हानि पोहोचवित होती. अशातच त्यांच एक ऑपरेशन इंदुरच्या भंडारी हॉस्पिटल मध्यें झाले होते. या मुळे त्यांच्या पथ्यवाल्या भोजनाची व्यवस्था व देखरेख मी आणि माझे कुटुंब पाहत असे. या मुळे देखील त्यांच्या माझ्या संबंधांचे घानिष्ठ्य वाढ़ीस लागले आणि हे शेवटपर्यंत राहिले. त्यांच्या भोपाळला जाण्या नंतर व आणखीनही कांही कारणांमुळे त्यांच्याशी माझा संपर्क जवळपास तुटल्या सारखाच झाला. तो पुन्हा 2006 मध्यें पुनरुज्जीवित झाला जेव्हां ते मला स्वामी ऐश्वर्यानंदजी सरस्वती यांच्या येथे भेटले. जे दक्षिण भारताचे पू. स्वामी दयानंदजी सरस्वती यांचे शिष्य आहेत व अनिलजी पण त्यांच्या वर श्रद्धा ठेवित असत.

ते अत्यंत धार्मिक आणि अध्यात्मिक प्रवृत्तीचे होते व त्यांना साधु-संतांचे सान्निध्य आवडत असे. त्यांनी नर्मदा परिक्रमा जमीन, पाणी व वायु या तीन्हीं माध्यमांनी केली होती. या दरम्यान ते साधु-संतांच्या आश्रमांमधून जात व त्यांच्याशी चर्चा करित असत. त्यांच्यात हे संस्कार त्यांच्या आई-वडिलां मुळे आले होते व त्यांची त्यांच्यावर अगाध श्रद्धा होती. त्यांच्या खोलीत त्यांच्या आई-वडिलांचे चित्र या पद्धतीने लागले होते की सकाळी उठल्या बरोबर त्यांची दृष्टि त्यांच्या चित्रावरच पडत असे. या बहुआयामी पण अंतर्मुखी स्वाभावाचे निवडणूकीच्या रणनीतित निपुण माणसाची कहाणी सामान्यापासून असामान्य बनण्याची आहे. साधेपणा पसंत करणारा, पर्यावरणाचा प्रेमी-संरक्षक, कर्मयोगी, अत्यंत प्रामाणिक, बुद्धिवादी, दुसऱ्यांच भल इच्छिणारा चिंतक, ज्ञानउपासक अचानकच 18 मे ला सकाळी झोपेतच ह्रदयाघाताने अनंताकडे प्रस्थान करुन गेला. 

या साहित्यकाराने रचलेल व प्रकाशित झालेल साहित्य या प्रकारे आहे -  1. सृजन से विसर्जन तक, 2. नर्मदा समग्र, 3. शताब्दी के पांच काले पन्ने(सन्‌ 1900 से सन्‌ 200), 4. सॅंभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से, 5. महानायक चंद्रशेखर आजाद, 6. रोटी और कमल की कहानी, 7. समग्र ग्रामविकास, 8. अमर कंटक से अमरकंटक तक, 9. Beyond Copenhagen, 10. Yes I Can. So Can We.  g§nH©$ …  e-mail : anilmdave@yahoo.com 

Friday, 2 June 2017

वर्षा ऋतु और उसके प्रतिनिधि

वर्षा ऋतु और उसके प्रतिनिधि
शिरीष सप्रे

महाकवि शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाट्य साहित्य की अद्‌भुत रचना 'मृच्छकटिकम्‌" (मिट्टी की गाडी) के पंचम अंक में वर्षा का अति सुंदर, मनोहारी वर्णन है। इसमें एक स्थान पर जलधाराओं के गिरने से उत्पन्न सहज ध्वनियों को एकदम निराली संगीतात्मक अभिव्यक्ति दी है। वर्षाऋतु में आकाश के बहुरुपिये मेघों का वर्णन करते हुए कहा गया है-एक दूसरे से मिले हुए चक्रवाक (एक जलपक्षी) के जोडों के समान, उडते हुए हंसों की भांति, (सागर की लहरों से इधर-उधर) फेंके गए मछलियों के झुंड तथा मगरों की तरह, उँचे-उँचें महलों जैसे, भिन्न-भिन्न विस्तृत आकारों को प्राप्त करनेवाले, हवा के झोंकों से छिन्न-भिन्न और उमडते हुए बादलों के द्वारा आकाश चित्रित सा सुशोभित हो रहा है।" वसंतसेना और चारुदत्त इस प्रणयी युगल की वर्षाऋतु में भेंट का वर्णन करते हुए शूद्रक नें 'मृच्छकटिकम्‌" में मेघों को श्रीकृष्ण की आकाश में उडनेवाले बगुलों के वक्राकार माला के शंखों की तो, बिजली को पीतांबर की उपमा दी है।
प्राचीन भारतीयों ने पर्जन्य देवता की आराधना, स्तवन किया है और मेघों को पर्जन्य देवता का, वर्षा ऋतु का प्रतिनिधि माना है। मत्स्यपुराण के अनुसार मेघ ब्रहांड के कवच से तैयार हुए हैं। मेघों को पर्जन्य (बादल, मेघ) देवता का प्रतिनिधि माना गया है। आकाश का 'प्रेमदूत" बनकर आनेवाले मेघों से संस्कृत साहित्य व्याप्त है। सूर्य जब मृग नक्षत्र में आता है तब वर्षा ऋतु आरंभ होती है और जब वह चित्रा नक्षत्र में जाता है तब वर्षाकाल समाप्त होता है। नौ नक्षत्रों को वर्षा के नक्षत्र माना गया है। वे हैं ः मृग,आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वा, उत्तरा, हस्त से लेकर चित्रा। ऋगवेद के सातवें मंडल में पर्जन्य देवता के लिए सूक्त हैं। मेघ इंद्र के अधिकार में होकर वह उसकी इच्छानुसार बादलों को बरसने की आज्ञा देता है। लौकिक संकेत है कि इंद्र हसता है, धनुष्य का टंकार करता है वही मेघ गर्जना है। बादलों की गडगडाहट कवियों को कभी युद्ध के नगारों की आवाज के समान तो, कभी मंदिर में बजाए जानेवाले नगारों के समान, तो कभी उनको उसका आभास संगीतशाला में मृदंगनाद की ध्वनि के समान महसूस होता है। मेघ गर्जना होने पर पानी बरसेगा या सूखा पडेगा इस बारे में भी कुछ मान्यताएं हैं। 

वर्षा ऋतु का कालिदास ने 'जलदसमय" इस प्रकार से यथार्थ वर्णन किया है। वर्षाकाल का आरंभ कविप्रतिभा का वेगवान प्रवाह ही तो है। वर्षाकाल में कविप्रतिभा को नए अंकुर फूटते हैं और इसीमें से 'मेघदूत" जैसा कल्पनारम्य, भावमधुर गीतिकाव्य निर्मित होता है।  मेघ का यथार्थ रुप आकाश में स्वेच्छा से भ्रमण करने का है। विरही यक्ष का उसकी प्रिय पत्नी को संदेश लेकर जानेवाला 'मेघदूत" संस्कृत साहित्य में चिरस्मरणीय हो गया है। बादलों से आच्छादित सावन के महिने में जन्मे भगवान कृष्ण को उसके काले रंग के कारण 'मेेेघश्याम, घनश्याम" भी कहा जाता है। शंकराचार्यजी ने 'श्रीकृष्णाष्टक" में उन्हें 'मेघसुंदर" कहा है। मेघों को संस्कृत में 'सुदामन" नाम भी है। इसी कारण मेघों से संगती रखनेवाली बिजली को 'सौदामनी" कहते हैं। इनके अलावा विद्युत, तडित्‌, क्षणप्रभा, मेघज्योति, चंचला, चपला इस प्रकार के अर्थपूर्ण नाम भी हैं। मेघों ने संस्कृत एवं प्राकृत साहित्य को व्याप्त कर रखा है। मिथकों से लेकर काव्य तक इनका मार्गक्रमण हुआ है।

पर्जन्य देवता का दूसरा प्रतिनिधी है मंडूक यानी मेंढ़क। ऋगवेद में पर्जन्य देवता के साथ ही मंडूक देवता के लिए भी सूक्त हैं। पर्जन्य देवता के आने की आहट सुनते ही सुप्तअवस्था में निश्चल पडे मंडूक शब्द करने लगते हैं। वर्षा ऋतु उन्हें अपने प्रेमवर्षा से भिगो देती है और फिर वे एकदूसरे की ओर आकृष्ट होते हैं। यह उनका प्रणयाराधन काल भी होता है। इस समय मेंढ़क कूदने लगते हैं और एकदूसरे की आवाजों का अनुसरण भी इस प्रकार से करने लगते हैं मानो एकाद्य शिष्य गुरु का करता है। पर्जन्य नक्षत्र और वाहन इस पर से वर्षा का अनुमान लगाने की प्रथा भारतीयों में प्राचीनकाल से ही हैैैैैैैैैैैैैै। मेंढ़क, भैंस और हाथी वाहन हो तो भरपूर पानी बरसता है एवं  मोर, गधा, चूहा हो तो मध्यम पानी बरसता है। घोडा वाहन हो तो पर्वतीय क्षेत्रों में पानी बरसता है। सियार या मेढ़ा हो तो पानी की राह देखना पडती है। 

पानी बरसे इसलिए लोक संस्कृति में विविध विधियां निर्मित की गई हैं। दंतकथाओं में इस प्रकार के भी उल्लेख मिलते हैं कि, प्राचीनकाल में वर्षा हो इसलिए राजा लोग उत्तम, सुलक्षणी पुरुष को चुनकर उसकी बलि देते थे। वर्षा के आगमन से मेंढ़कों का संबंध देखकर जनमानस में कुछ विधियां निर्मित की गई हैं। जैसेकि, मध्यप्रदेश में मेंढ़क को पकडकर उसके पैरों में रस्सी बांधकर नीम के पेड से उलटा लटका दिया जाता है। इसके पीछे धारणा यह है कि, मेंढ़क को कष्ट देने से वरुण देवता को मेंढ़क की दया आएगी और वह पानी बरसा देगा। कहीं-कहीं मेंढ़क की पूजा भी की जाती है। छोटे बच्चों को गांव में नग्न घूमाना। अतिवृष्टि पर उपचार के लिए पर्जन्य शांति नामका एक विधि भी किया जाता है। 

तांत्रिक विद्या के अनुसार मेंढ़क समृद्धि, सौभाग्य एवं प्रजनन क्षमता का प्रतीक है। हो सकता है आपको आश्चर्य हो पर उत्तरप्रदेश के नगर लखीमपूर जिले के ओयल में अद्‌भुत रचना वाला मेंढ़क का मंदिर भी है परंतु यहां के पीठासीन देवता शिवजी हैं और इससे जुडी एक पौराणिक कथा भी है। मेंढ़क जल और भूमि दोनो पर निवास कर सकनेवाला उभयचर प्राणी है और प्राणियों की उत्क्रांति में उसका महत्वपूर्ण स्थान है। मेंढ़क की त्वचा धूप नहीं सहन कर सकती इसलिए मेंढ़क वर्षाकाल को छोडकर लंबे समय तक निष्क्रिय, निश्चल और लगभग निष्प्राणसी अवस्था में लगभग छिपकर रहता है।

पर्जन्य देवता के अग्रदूत हैं - नर्तनोत्सुक हमारा राष्ट्रीय पक्षी मोर, सारस, मेघों से संगति रखनेवाले और उसकी दिशा में उडान भरनेवाले नयनसुख देनेवाली बगुलों की कतारें। अपवाद है तो, हंस जिन्हें वर्षा ऋतु पसंद नहीं, वे उडकर मानसरोवर की ओर निकल जाते हैं। वर्षा ऋतु से संबंधित एक ओर पक्षी है - चातक। इसका एक संस्कृत नाम है 'वापीहा" - जलाशयों को टालनेवाला। हिंदी में इसे 'पपीहा" भी कहते हैं। यह कोयल की जाति का होकर एक गूढ़ पक्षी है। इसका रहवास पर्वत की गुफाओं और ऊंचे वृक्षों पर होता है। वसंत और वर्षा ऋतु में आम के पेडों पर बैठकर सुरीली ध्वनी में बोलता है। प्रवाद है कि, यह केवल आकाश से गिरनेवाले पानी को ही पीता है प्यास से मर जाने पर भी तालाब, नदी आदि के जल में अपनी चोंच नहीं डूबोता है। बहुत से लोग तो यह भी मानते हैं कि यह केवल स्वाती नक्षत्र में गिरे पानी को ही पीता है। संस्कृत एवं अन्य भाषा के कवियों ने इसका बडा मान रखा है और इसे लेकर कई उक्तियों की रचना की है।