Friday, 12 May 2017

पुरातन संबंध है काशी का महाराष्ट्रीयों से

पुरातन संबंध है काशी का महाराष्ट्रीयों से

काशी नगरी अनादि काल से अक्षुण्ण होकर विश्व के प्राचीनतम नगरों में से एक होकर भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रुप में विख्यात है। काश्यां हि काशते काशी। काशी सर्वप्रकाशिका। इस प्रकार से आद्यशंकराचार्य ने काशी का वर्णन किया है। काशी उसे कहते हैं, जो प्रकाश देता है, प्रकाश का स्त्रोत है। चूंकि पुराकाल में काशी क्षेत्र से ज्ञान का प्रकाश फैला, सम्पूर्ण विश्व इस प्रकाश से ज्योतित हुआ, अतः इस क्षेत्र को काशी कहा जाने लगा। काश्य लोगों ने इस नगरी को बसाया ऐसा कहा जाता है। यहां ज्ञान का भंडार अपार है। यहीं शिवपुरी है। काशी को वाराणसी (बनारस) भी कहते हैं। असि एवं वरुणा दो नदियों के मध्य वाराणसी (इन दो नदियों का यहां संगम होता है इसलिए काशी को वाराणसी भी कहते हैं) स्थित होकर यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रुप में विख्यात है। 

यह पुरी सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग इन चारों युगों में अनादि काल से चली आ रही है। इसका वर्णन पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण में तो काशीखंड नामक एक बडे भाग में सविस्तार वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार काशी को दीवोदास ने पुनः बसाया था। काशी का एक नाम आनंदकानन भी है। लगता है काशी कभी अरण्य रहा होगा इसीलिए इसका यह नाम पडा होगा। गोस्वामी तुलसीदासजी के समय में यह नगर आनंदकानन के रुप में विख्यात था। इस नगर के कुछ अन्य नाम भी हैं, यथा केतुमती, पुष्पावती एवं रम्भा नगरी (रामनगर)। काशी के संंबंध में यह जनविश्वास है कि यह भूतभावन शंकर के त्रिशूल पर अवस्थित है। यह पृथ्वी पर स्थित नहीं है, अपितु पृथ्वी के ऊपर अवस्थित है। इसकी गणना सात पुरियों में की जाती है और सब में यह अनुपम एवं उच्च है। यहां शिव व माता अन्नपूर्णा का वास है। विश्वेश्वर द्वारा निर्मित इस काशी का प्रत्येक कंकड शिवस्वरुप तथा शिवमय हैयह लोकविश्वास है। काशी में गंगा उत्तरवाहिनी होती है। इस कारण से भी काशी को तीर्थस्थल माना जाता है। काशी बारा ज्योतिर्लिंग में से एक होकर यहां 84 घाट हैं।  

भारत का कोई भी मनीषी ऐसा न होगा जो कभी ना कभी काशी न आया हो पर यहां रहकर ज्ञानसाधना करनेवाले महापुरुषों की संख्या भी कम नहीं। महाराष्ट्र से निकलकर विभिन्न कारणों से काशी में स्थायी होनेवाले पंडितों की बडी संख्या है। इन मराठी पंडितों ने संस्कृत  विद्या के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा वर्षों से जतन कर रखी है। काशी की प्रसिद्धि में इन मराठी पंडितों का बडा योगदान रहा है। काशी के पंडितों का विषय निकला ही है तो सबसे पहले स्मरण हो आता है गागाभट्ट का। गागाभट्ट मूलतः पैठण के थे और वहां से स्थलांतरित होकर काशी आ गए थे। आज भी काशी में वसंतपूजा अथवा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में यदि इस भट्ट कुल का उपनयन हो चुका छोटा बच्चा भी उपस्थित हो तो सबसे पहले तिलक उसीको लगाया जाता है। इन्होंने ही महाराष्ट्र के मराठे क्षत्रिय हैं कि नहीं इस संबंध में जो संशय था उसका सप्रमाण खंडन कर छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक में वे अग्रणी हुए थे। पुराने ग्रंथों के आधार पर उन्होेंने 'राज्याभिषेक प्रयोगम" ग्रंथ लिखा था और तत्पश्चात भारत में हुए राज्याभिषेक इस ग्रंथ के आधार पर ही हुए। इन्हीं के साथ आए हुए दूसरे महाराष्ट्रीय विद्वान थे धर्माधिकारी। हिंदू कानूनों की मिताक्षर शाखा पर लिखे ग्रंथ आज भी प्रामाणिक माने जाते हैं।

विदर्भ से आकर काशी में स्थायी हुए नीलकंठ दैवज्ञ अकबर के दरबार के मुख्य पंडित थे। उन्होंने अरबी ज्योतिष का अध्ययन कर ताजिक नीलकष्टी या नीलकंठी ग्रंथ लिखा था। इस परिवार ने ज्योतिषशास्त्र के ज्ञान को और समृद्ध करने में अपना योगदान दिया था। जब मराठी शक्ति का ह्यस हो गया और काशी जीतने का स्वप्न मराठों का समाप्त हो गया तब बाजीराव पेशवा द्वितीय के साथ महाराष्ट्रीय पंडित भी यहां आ गए थे। 1791 में अंग्रेजों ने काशी में संस्कृत पाठशाला स्थापित की। आगे जाकर यह पाठशाला शासकीय संस्कृत महाविद्याल में रुपांतरित हो गई। और भी आगे जाकर यह 'सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय" में रुपांतरित हो गई। रानी विक्टोरिया की स्वर्ण जयंती के निमित्त सरकार ने संस्कृत के पंडितों को 'महामहोपाध्याय" की पदवी देना आरंभ किया। 19वी शताब्दी में प्रसिद्धी पाई वैद्यनाथशास्त्री पायगुंडे और उनके सुपुत्र बालशास्त्री पायगुंडे ने। इनके अलावा काशीनाथशास्त्री अष्टपुत्रे, जगन्नाथशास्त्री गाडगील, राजरामशास्त्री कार्लेकर पंडित भी प्रसिद्ध हुए थे। राजाराम शास्त्री तो आजमगढ़ के जिला न्यायाधीश भी रहे।

इनके अलावा काशी के दो और  प्रसिद्ध व्यक्तित्व थे - महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री जो मूलतः कोंकण महाराष्ट्र वेलेणेश्वर के थे एवं बालसरस्वती बाळशास्त्री रानडे। बापू शास्त्रीजी उनके द्वारा शुरु किए गए 'दृक्सिद्ध पंचांग" के कारण प्रसिद्ध हुए। उन्होंने 16 पुस्तकें भी लिखी थी जिनमें अंगगणित व बीजगणित पर अंगे्रजी में लिखी पुस्तकें भी हैं। 1880 में बाळशास्त्री रानडे ने ज्योतिष्येम यज्ञ किया था। काशी के सभी बडे पंडितों ने यज्ञ में अध्वर्यू, ब्रह्म, आचार्य की जिम्मेदारियां सम्भाली थी। तत्पश्चात काल में काशी के प्रसिद्ध महाराष्ट्रीय पंडितों में दिवाकरशास्त्री भट्ट, नागरेश्वरशास्त्री धर्माधिकारी, रामचंद्रशास्त्री काळे, दामोदरशास्त्री भारद्वाज, तात्याशास्त्री पटवर्धन आदि हुए। बीसवीं शताब्दी में काशी के प्रवचनकार भाऊशास्त्री वझे का महाराष्ट्र में भी बडा नाम था। आयुर्वेद और फलज्योतिष के क्षेत्र में भी महाराष्ट्रीयों ने बडा नाम कमाया है। अमृशास्त्री चांदोरकर और उनके सुपुत्र ने, त्रिंबकशास्त्री धन्वंतरी का अवतार माने जाते थे।

जब मराठा शक्ति का उत्तर हिंदुस्थान में दबदबा था तब मराठा सरदारों ने काशी में घाट, मंदिर और वाडों का निर्माण कर काशी की शोभा बढ़ाई थी। औरंगजेब ने काशी विश्वेश्वर को गिराकर वहां मस्जिद बनाई थी उसके निकट ही रानी अहिल्याबाई होलकर ने नया विश्वेश्वर मंदिर का निर्माण किया था। उन्होेंने दशाश्वमेश घाट के निकट नया घाट बनाया था। औरंगजेब ने काशी में गिराए दूसरे प्रसिद्ध मंदिर बिंदुमाधव का नवनिर्माण और उसके निकट दो घाटों की निर्मिती की थी। नागपूर के भोसले और बडोदा के महाराज गायकवाड ने भी मंदिरों का निर्माण किया था। इसी प्रकार अन्य मराठा शासकों और सरदारों ने विशाल वाडों का निर्माण किया था। परंतु, राजेरजवाडों की टक्कर के सुंदर गंगामहल मंदिर का निर्माण एक मराठी कथावाचक जिसने बाद में सन्यास लेकर अपना नाम 'तारकाश्रम" रख लिया, किया था। उसने लगभग सौ सन्यासी रह सकें ऐसे 'तारकमठ" की निर्मिती भी की थी। गंगामहल और ग्वालियर के महाराज सिंधिया द्वारा बनाए गए बालाजी मंदिर में शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाखां शहनाई बजाया करते थे। उन्हें वहां साक्षात्कार भी हुआ था।

पेशवा, पंतप्रतिनिधि और महाराष्ट्र के राजघरानों की अनेक स्त्रियों ने अपने जीवन का अंतिम समय काशी में बिताया था। मराठों का एक सपना था कि काशी उनके कब्जे में हो परंतु, यह कभी साकार न हो सका। सैंकडों वर्षों तक महाराष्ट्र से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी आते रहे, मान्यता प्राप्त करते रहे और अपने मूलस्थानों पर जाकर विद्यादान करते रहे। पेशवाओं के प्रसिद्ध न्यायाधीश रामशास्त्री प्रभुणे ने काशी में ही शिक्षा प्राप्त की थी। आचार्य विनोबा भावे संस्कृत सीखने के लिए काशी में ही आ कर रहे थे।

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