Tuesday, 23 May 2017

अनिल माधव दवे - अनंत की ओर प्रस्थान

अनिल माधव दवे - अनंत की ओर प्रस्थान 

मुझे आज भी याद है सन 1990 के गुरुपूर्णिमा उत्सव का कार्यक्रम (रविशंकर शुक्ल नगर (आर.एस.एस नगर, इंदौर) जहां अनिलजी का बौद्धिक मैंने पहली बार सुना था। बौद्धिक (भाषण) के पश्चात मेरी उनसे कुछ देर तक चर्चा भी हुई थी। उनका वह बौद्धिक उस समय भी उसी प्रकार से प्रभावी था जिस प्रकार से बाद के काल में भी रहा और वे इसी कला के लिए प्रसिद्ध भी हुए। अंतर केवल इतना हुआ कि 1990 के दशक में वे युवा थे इस कारण उनके उद्‌बोधन जोश और उल्लास से भरे रहते थे जो बाद के काल में समय के साथ  गंभीर होते चले गए। तत्पश्चात हमारी निकटता और घनिष्ठता बढ़ती चली गई। इसके पीछे दो प्रमुख कारण थे - पहला, वे स्कूल-कालेज के समय से ही मेरे सीनियर थे और उनका इस प्रकार से संघ का प्रचारक बनने और हमारे क्षेत्र, नगर (संघ की दृष्टि से अंबेडकर नगर) में संघ कार्य के लिए आना मुझे अभिभूत कर गया था। क्योंकि, किसी भी स्वयंसेवक के लिए संघ का प्रचारक अत्यंत सम्माननीय व्यक्ति होता है और वे उन्हें भाईसाहब कह कर ही संबोधित करते हैं। 

दूसरा कारण बने स्व. बाबासाहेब नातू जो हमारे घर सन्‌ 1956 से प्रचारक के रुप में आते रहते थे। वे उन्हें लेकर हमारे घर आए थे और उनसे कहा था यह मेरा घर है यहां किसी भी तरह का संकोच न करना और बस यह भी उनसे घनिष्ठता बढ़ने का एक बडा कारण बना और हमारे संबंध प्रगाढ़ होते चले गए। कुछ वर्षों तक इंदौर में कार्य करने के पश्चात वे संघ कार्य के लिए भोपाल चले गए और वहीं विभाग प्रचारक के रुप में कार्य करने लगे और मेरा उनसे संपर्क टूट सा गया परंतु, मेरा उनके घर-परिवार में आना-जाना बना रहा।

जब वे इंदौर में थे तब भी वे अत्यंत जिज्ञासू और अध्ययनशील प्रवृत्ति के थे। आगे जाकर उन्होंने कई पुस्तकें एवं लेख समय-समय पर लिखे। 'चरैवेती" के भोपाल में संपादक भी रहे। उनकी 'शिवाजी और सुराज" पुस्तक का विमोचन सरसंघचालक 'श्री मोहनरावजी भागवत" एवं तत्कालीन शिवसैनिक भू.पू. केंद्रिय मंत्री सुरेश प्रभु ने किया था। आमुख विश्व के सबसे बडे स्वयंसेवी संगठन के प्रमुख श्री मोहनरावजी भागवत तो, प्राक्कथन बाबासाहेब पुरंदरेजी और प्रस्तावना मोदीजी जो उस समय गुजराथ के मुख्यमंत्री थे ने लिखी थी। उनके जीवन एवं कार्यशैली पर छत्रपति शिवाजी का बहुत बडा प्रभाव था। सन्‌ 2003 में दिग्विजयसिंह की सरकार को हराकर भाजपा की सरकार बनाने के लिए उन्होंने जो चुनावी कार्यालय बनाया था उसका नाम 'जावली" ही रखा था। उनके द्वारा लिखी 'शिवाजी और सुराज" पुस्तक का यह अंश जो आज भी अत्यंत प्रासंगिक है और जिस वन एवं पर्यावरण विभाग के वे केंद्रिय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे से संबंधित है दे रहा हूं - 

''स्वराज के जंगलों में आम व कटहल के पेड हैं, जो जलपोत निर्माण में काम आ सकते हैं, परंतु उन्हें हाथ न लगाया जाए, क्योंकि ये पेड ऐसे नहीं हैं जो साल-दो साल में बडे हो जाएं। जनता ने उन पेडों को लगाकर अपने बच्चों की तरह पाल-पोसकर बडा किया है।""

विभिन्न क्षेत्रों के बारे में जानने की उनकी प्रवृत्ति आरंभ से ही थी जो आजीवन बनी भी रही। वे विविध विषयों में रुची रखते थे और रस लेते भी थे। जब वे इंदौर में प्रचारक के रुप में कार्यरत थे तब पत्रकार, पत्रकारिता और उनके पेशे को जानने, समझने के लिए वे इस पेशे से संबंधित कुछ लोगों से मिलना चाहते थे और जब यह इच्छा उन्होंने मेरे सामने जाहिर की तो मैंने उन्हें 'साप्ताहिक स्पूतनिक" के संबंध में जानकारी दी और उनकी बैठक मेरे निवास पर श्याम भैया के साथ रखवा दी थी। जो ढ़ाई-तीन घंटे तक चली जिसमें विचारों का भरपूर आदान-प्रदान हुआ था। इस संबंध में बहुत पूर्व एक लेख में इसका उल्लेख पहले भी मैं कर चूका हूं। इसी प्रकार से वे दैनिक भास्कर के संपादक मिश्रजी (उनके नाम का कुछ विस्मरण सा मुझे हो रहा है) से जो इलाहबाद निवासी थे और दैनिक स्वदेश इंदौर के आरंभिक दिनों में यहां भी कार्य कर चुके थे से भी मिलवाया था। उनके साथ भी उनकी लंबी बैठक एवं चर्चा हुई थी। मिश्रजी का निवास मेरे शॉपिंग कॉम्पेलक्स, ए. बी. रोड वाले कार्यालय के ऊपर ही था।

जब वे इंदौर में प्रचारक थे उस समय भी उनका स्वास्थ्य कुछ नाजुक और नासाज ही रहा करता था और अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में अत्याधिक कार्य करनेे और भोजन की अनियमितता भी उनके स्वास्थ्य को हानि पहुंचा रही थी। ऐसे में ही उनका एक ऑपेरशन इंदौर के भंडारी हॉस्पिटल में हुआ था। इस कारण उन्हें पथ्यवाले भोजन की आवश्यकता की पूर्ति एवं उनकी देखरेख मैं और मेरा परिवार किया करता था। इस कारण भी हमारी घनिष्ठता बढ़ती चली गई जो अंत तक बनी रही। उनके भोपाल जाने के पश्चात और अन्य कारणों से मेरा उनसे संपर्क जो टूट सा गया था वह फिर से सन्‌ 2006 में तब पुनर्जीवित हो उठा जब वे मुझे स्वामी ऐश्वर्यानंदजी सरस्वती के निवास पर मिले जो दक्षिण भारत के पू. स्वामी दयानंदजी सरस्वती के शिष्य हैं और अनिलजी भी उन पर श्रद्धा रखते थे।

वे अत्यंत धार्मिक एवं अध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे और साधु-संतों का साहचर्य उन्हें रास आता था। नर्मदा परिक्रमा जो उन्होंने जल-थल और वायु तीनो ही माध्यमों से की थी के दौरान वे आश्रमों में जाते, साधु-संतों से चर्चा किया करते थे। उनको यह संस्कार उनके माता-पिता से विरासत में मिले थे जिन पर उनकी अगाध श्रद्धा थी। उनके माता-पिता का चित्र कमरे में इस प्रकार से उन्होंने लगा रखा था कि प्रातः उठते से ही उनकी पहली दृष्टि उन्हीं पर पडती थी। इस बहुआयामी परंतु, अंतर्मुखी स्वभाव के चुनावी रणनीति में माहिर,व्यक्ति की कहानी साधारण से असाधारण बनने की है। यह सादगी पसंद पर्यावरण प्रेमी-संरक्षक, कर्मयोगी, अत्यंत प्रामाणिक, बुद्धिवादी, हितैषी प्रवृत्ति का चिंतक, ज्ञान का उपासक अचानक ही 18 मई को प्रातः नींद में ही ह्रदयाघात के कारण अनंत की ओर प्रस्थान कर गया। 

इस साहित्यकार द्वारा रचित एवं प्रकाशित साहित्य इस प्रकार से है ः - 1. सृजन से विसर्जन तक, 2. नर्मदा समग्र, 3. शताब्दी के पांच काले पन्ने(सन्‌ 1900 से सन्‌ 200), 4. सॅंभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से, 5. महानायक चंद्रशेखर आजाद, 6. रोटी और कमल की कहानी, 7. समग्र ग्रामविकास, 8. अमर कंटक से अमरकंटक तक,9. Beyond Copenhagen, 10. Yes I Can. So Can We.
e-mail : anilmdave@yahoo.com 

Friday, 12 May 2017

पुरातन संबंध है काशी का महाराष्ट्रीयों से

पुरातन संबंध है काशी का महाराष्ट्रीयों से

काशी नगरी अनादि काल से अक्षुण्ण होकर विश्व के प्राचीनतम नगरों में से एक होकर भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रुप में विख्यात है। काश्यां हि काशते काशी। काशी सर्वप्रकाशिका। इस प्रकार से आद्यशंकराचार्य ने काशी का वर्णन किया है। काशी उसे कहते हैं, जो प्रकाश देता है, प्रकाश का स्त्रोत है। चूंकि पुराकाल में काशी क्षेत्र से ज्ञान का प्रकाश फैला, सम्पूर्ण विश्व इस प्रकाश से ज्योतित हुआ, अतः इस क्षेत्र को काशी कहा जाने लगा। काश्य लोगों ने इस नगरी को बसाया ऐसा कहा जाता है। यहां ज्ञान का भंडार अपार है। यहीं शिवपुरी है। काशी को वाराणसी (बनारस) भी कहते हैं। असि एवं वरुणा दो नदियों के मध्य वाराणसी (इन दो नदियों का यहां संगम होता है इसलिए काशी को वाराणसी भी कहते हैं) स्थित होकर यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रुप में विख्यात है। 

यह पुरी सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग इन चारों युगों में अनादि काल से चली आ रही है। इसका वर्णन पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण में तो काशीखंड नामक एक बडे भाग में सविस्तार वर्णन मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार काशी को दीवोदास ने पुनः बसाया था। काशी का एक नाम आनंदकानन भी है। लगता है काशी कभी अरण्य रहा होगा इसीलिए इसका यह नाम पडा होगा। गोस्वामी तुलसीदासजी के समय में यह नगर आनंदकानन के रुप में विख्यात था। इस नगर के कुछ अन्य नाम भी हैं, यथा केतुमती, पुष्पावती एवं रम्भा नगरी (रामनगर)। काशी के संंबंध में यह जनविश्वास है कि यह भूतभावन शंकर के त्रिशूल पर अवस्थित है। यह पृथ्वी पर स्थित नहीं है, अपितु पृथ्वी के ऊपर अवस्थित है। इसकी गणना सात पुरियों में की जाती है और सब में यह अनुपम एवं उच्च है। यहां शिव व माता अन्नपूर्णा का वास है। विश्वेश्वर द्वारा निर्मित इस काशी का प्रत्येक कंकड शिवस्वरुप तथा शिवमय हैयह लोकविश्वास है। काशी में गंगा उत्तरवाहिनी होती है। इस कारण से भी काशी को तीर्थस्थल माना जाता है। काशी बारा ज्योतिर्लिंग में से एक होकर यहां 84 घाट हैं।  

भारत का कोई भी मनीषी ऐसा न होगा जो कभी ना कभी काशी न आया हो पर यहां रहकर ज्ञानसाधना करनेवाले महापुरुषों की संख्या भी कम नहीं। महाराष्ट्र से निकलकर विभिन्न कारणों से काशी में स्थायी होनेवाले पंडितों की बडी संख्या है। इन मराठी पंडितों ने संस्कृत  विद्या के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा वर्षों से जतन कर रखी है। काशी की प्रसिद्धि में इन मराठी पंडितों का बडा योगदान रहा है। काशी के पंडितों का विषय निकला ही है तो सबसे पहले स्मरण हो आता है गागाभट्ट का। गागाभट्ट मूलतः पैठण के थे और वहां से स्थलांतरित होकर काशी आ गए थे। आज भी काशी में वसंतपूजा अथवा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में यदि इस भट्ट कुल का उपनयन हो चुका छोटा बच्चा भी उपस्थित हो तो सबसे पहले तिलक उसीको लगाया जाता है। इन्होंने ही महाराष्ट्र के मराठे क्षत्रिय हैं कि नहीं इस संबंध में जो संशय था उसका सप्रमाण खंडन कर छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक में वे अग्रणी हुए थे। पुराने ग्रंथों के आधार पर उन्होेंने 'राज्याभिषेक प्रयोगम" ग्रंथ लिखा था और तत्पश्चात भारत में हुए राज्याभिषेक इस ग्रंथ के आधार पर ही हुए। इन्हीं के साथ आए हुए दूसरे महाराष्ट्रीय विद्वान थे धर्माधिकारी। हिंदू कानूनों की मिताक्षर शाखा पर लिखे ग्रंथ आज भी प्रामाणिक माने जाते हैं।

विदर्भ से आकर काशी में स्थायी हुए नीलकंठ दैवज्ञ अकबर के दरबार के मुख्य पंडित थे। उन्होंने अरबी ज्योतिष का अध्ययन कर ताजिक नीलकष्टी या नीलकंठी ग्रंथ लिखा था। इस परिवार ने ज्योतिषशास्त्र के ज्ञान को और समृद्ध करने में अपना योगदान दिया था। जब मराठी शक्ति का ह्यस हो गया और काशी जीतने का स्वप्न मराठों का समाप्त हो गया तब बाजीराव पेशवा द्वितीय के साथ महाराष्ट्रीय पंडित भी यहां आ गए थे। 1791 में अंग्रेजों ने काशी में संस्कृत पाठशाला स्थापित की। आगे जाकर यह पाठशाला शासकीय संस्कृत महाविद्याल में रुपांतरित हो गई। और भी आगे जाकर यह 'सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय" में रुपांतरित हो गई। रानी विक्टोरिया की स्वर्ण जयंती के निमित्त सरकार ने संस्कृत के पंडितों को 'महामहोपाध्याय" की पदवी देना आरंभ किया। 19वी शताब्दी में प्रसिद्धी पाई वैद्यनाथशास्त्री पायगुंडे और उनके सुपुत्र बालशास्त्री पायगुंडे ने। इनके अलावा काशीनाथशास्त्री अष्टपुत्रे, जगन्नाथशास्त्री गाडगील, राजरामशास्त्री कार्लेकर पंडित भी प्रसिद्ध हुए थे। राजाराम शास्त्री तो आजमगढ़ के जिला न्यायाधीश भी रहे।

इनके अलावा काशी के दो और  प्रसिद्ध व्यक्तित्व थे - महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री जो मूलतः कोंकण महाराष्ट्र वेलेणेश्वर के थे एवं बालसरस्वती बाळशास्त्री रानडे। बापू शास्त्रीजी उनके द्वारा शुरु किए गए 'दृक्सिद्ध पंचांग" के कारण प्रसिद्ध हुए। उन्होंने 16 पुस्तकें भी लिखी थी जिनमें अंगगणित व बीजगणित पर अंगे्रजी में लिखी पुस्तकें भी हैं। 1880 में बाळशास्त्री रानडे ने ज्योतिष्येम यज्ञ किया था। काशी के सभी बडे पंडितों ने यज्ञ में अध्वर्यू, ब्रह्म, आचार्य की जिम्मेदारियां सम्भाली थी। तत्पश्चात काल में काशी के प्रसिद्ध महाराष्ट्रीय पंडितों में दिवाकरशास्त्री भट्ट, नागरेश्वरशास्त्री धर्माधिकारी, रामचंद्रशास्त्री काळे, दामोदरशास्त्री भारद्वाज, तात्याशास्त्री पटवर्धन आदि हुए। बीसवीं शताब्दी में काशी के प्रवचनकार भाऊशास्त्री वझे का महाराष्ट्र में भी बडा नाम था। आयुर्वेद और फलज्योतिष के क्षेत्र में भी महाराष्ट्रीयों ने बडा नाम कमाया है। अमृशास्त्री चांदोरकर और उनके सुपुत्र ने, त्रिंबकशास्त्री धन्वंतरी का अवतार माने जाते थे।

जब मराठा शक्ति का उत्तर हिंदुस्थान में दबदबा था तब मराठा सरदारों ने काशी में घाट, मंदिर और वाडों का निर्माण कर काशी की शोभा बढ़ाई थी। औरंगजेब ने काशी विश्वेश्वर को गिराकर वहां मस्जिद बनाई थी उसके निकट ही रानी अहिल्याबाई होलकर ने नया विश्वेश्वर मंदिर का निर्माण किया था। उन्होेंने दशाश्वमेश घाट के निकट नया घाट बनाया था। औरंगजेब ने काशी में गिराए दूसरे प्रसिद्ध मंदिर बिंदुमाधव का नवनिर्माण और उसके निकट दो घाटों की निर्मिती की थी। नागपूर के भोसले और बडोदा के महाराज गायकवाड ने भी मंदिरों का निर्माण किया था। इसी प्रकार अन्य मराठा शासकों और सरदारों ने विशाल वाडों का निर्माण किया था। परंतु, राजेरजवाडों की टक्कर के सुंदर गंगामहल मंदिर का निर्माण एक मराठी कथावाचक जिसने बाद में सन्यास लेकर अपना नाम 'तारकाश्रम" रख लिया, किया था। उसने लगभग सौ सन्यासी रह सकें ऐसे 'तारकमठ" की निर्मिती भी की थी। गंगामहल और ग्वालियर के महाराज सिंधिया द्वारा बनाए गए बालाजी मंदिर में शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाखां शहनाई बजाया करते थे। उन्हें वहां साक्षात्कार भी हुआ था।

पेशवा, पंतप्रतिनिधि और महाराष्ट्र के राजघरानों की अनेक स्त्रियों ने अपने जीवन का अंतिम समय काशी में बिताया था। मराठों का एक सपना था कि काशी उनके कब्जे में हो परंतु, यह कभी साकार न हो सका। सैंकडों वर्षों तक महाराष्ट्र से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने के लिए काशी आते रहे, मान्यता प्राप्त करते रहे और अपने मूलस्थानों पर जाकर विद्यादान करते रहे। पेशवाओं के प्रसिद्ध न्यायाधीश रामशास्त्री प्रभुणे ने काशी में ही शिक्षा प्राप्त की थी। आचार्य विनोबा भावे संस्कृत सीखने के लिए काशी में ही आ कर रहे थे।

Saturday, 6 May 2017

नृसिंह अवतार कथा

नृसिंह अवतार कथा 
शिरीष सप्रे

'नृसिंह" शब्द का 'नृ" जीववाची, 'सिं" बंधवाची और 'ह" विनाशवाची है। 'नृसिंह" शब्द का अर्थ हुआ जीवों के बंध विमोचन करनेवाला। नृसिंह देवता का उल्लेख वेदों में नहीं मिलता। परंतु, नृसिंहकोषकार का कहना है कि, ऋगवेद के प्रथमाष्टक के 7वें अध्याय दूसरे सर्ग में 'द्वै विरुपे चरतः" इस शब्द से आरंभ होनेवाला 11 ऋचाओं का सूक्त है। यह सूक्त श्रीनृसिंह को उद्देशित है। इसमें का वर्णन श्रीनृसिंह मंत्रराज पद से संबंधित होकर नीरा नरसिंहपूर (पुणे) और वहां के मंदिर को अनुलक्षित होने का श्रीकृष्णाचार्य दंडवते ने सप्रमाण सिद्ध किया हुआ है। इस क्षेत्र का आकार सिंह के नख जैसा होने के कारण नृसिंह देवता से संबंधित इस प्रकार का उचित स्थान है। नृसिंह का उल्लेख उपनिषदों में है। वेदों का अंतिम भाग यानी वेदान्तरुप उपनिषद।

नृसिंह अवतार की कथा प्रथम महाभारत में मिलती है और बाद में 18 पुराणों में आई हुई है। शुंग राजवंश के राजा पुष्यमित्र (इ. पू. 187-151) वैदिक यज्ञसंस्था और भागवत धर्म का समर्थक था। उसके काल में वैदिक धर्म और भक्तिपंथ का समन्वय करके  वह लोकप्रिय करने के लिए पुराणों की निर्मिती हुई। महाभारत के सभापर्व, आरण्यक पर्व और हरिवंश भाग 1 में हिरण्यकशिपू वध के लिए नृसिंहावतार कथा आई हुई है। इसी प्रकार से पुराणों और उपपुराणों में श्रीनृसिंह देवता का माहात्म्य, अवतारकथा और मूर्तिशास्त्र-मंदिर निर्माण आदि जानकारी मिलती है। पुराणों में भगवान नृसिंह अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। लिंग पुराण के 95वे अध्याय में नृसिंह ने हिरण्यकशिपू को किस प्रकार से मारा इसका वर्णन आया हुआ है। 96वे अध्याय में शंकरजी ने शरभ का रुप विक्राल रुप लेकर कौन-कौन से पराक्रम किए उनका वर्णन है। शरभोपनिषद / लिंगपुराण के अनुसार -
गर्व से उन्मत हुए हिरण्यकशिपू का वध करने के लिए भगवा विष्णु ने नृसिंह रुप धारण किया और अपने नखों से उसका ह्रदय विदीर्ण कर दिया फिर भी उनके क्रोध का शमन नहीं हुआ। उनकी दहाडों से सभी भयभीत हो गए। इंद्र आदि देवताओं ने उनका अनेक प्रकार से स्तवन किया। फिर भी भगवान नृसिंह शांत न हुए। ब्रह्मदेव सहित सभी देवताओं ने शंकरजी से विनती की तब शंकरजी ने शरभ का रुप धारण किया। वह कथा इस प्रकार से हैः 

भगवान नृसिंह का वीर्य दमन करने के लिए शंकरजी ने अपने भैरव स्वरुप वीरभद्र का स्मरण किया। वीरभद्र प्रकट हुए तब अनेक गण उत्पन्न हुए। वीरभद्र ने शंकरजी के कहने पर नृसिंह के क्रोध को शांत करने के लिए उन्हें बोध दिया। कर्तव्यपूर्ति हो चूकी इसलिए उग्र स्वरुप का त्याग करें कहा। परंतु, अहंकारयुक्त भाष्य कर नृसिंह ने नकार दिया। तब वीरभद्र ने शरभ का महा भयानक रुप धारण किया। शरीर पशू का, दो पंख, चार हाथ. चोंच और नख इस प्रकार का यह रुप था। उसने नृसिंह को पराजित कर उसका चमडा सिर निकाल लिया। यह सिर शिवजी ने धारण की हुई माला में डाल लिया और चमडा ओढ़न के लिए ले लिया। तत्पश्चात्‌ शिवजी ने सभी देवताओं से कहा कि, शिव और विष्णु एक ही है। नृसिंह अवतार समाप्ति के पश्चात विष्णू और शिव में एक रुपता आ गई। इसके बाद शिवजी ने कहा कि, यदि मेरे भक्तों को सिद्धी चाहिए हो तो वे नृसिंह पूजन करें। विष्णूधर्मोत्तरपुराण में  शिव और विष्णु इन देवताओं की एकात्मता नृसिंह रुप में आई हुई है यह कहा गया है।

सभी पुराणों की कथाओं में मिलनेवाली समानता को दृष्टि में रखकर संक्षेप में नृसिंहावतार कथा इस प्रकार से है - पवित्र पुष्कर क्षेत्र में कश्यप ने अश्वमेध यज्ञ किया। अश्व छोडने के पश्चात विधिपूर्वक सुर्वणाच्छित पांच आसन रखे थे। मुख्य चार ऋत्विजों के लिए वे थे। सौत्य सोम सेवन वाले दिन दिती के गर्भ से निकला गर्भ आसन पर जा बैठा और अपने पिता महर्षि कश्यप के समान वह आख्यान देने लगा। उसे देखकर ऋषियों ने हिरण्यकशिपू कहकर उसका जयघोष किया। तब से उसका यही नामकरण हो गया। कश्यप और दिती को दो पुत्र हिरण्यकशिपू एवं हिरण्याक्ष तथा पुत्री सिंहिका थी। स्वर्ग स्थित देवताओं व पृथ्वी के मनुष्यों को कष्ट देनेवाले महाबलाढ्य दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को रसातल में पहुंचा दिया तब श्रीविष्णु ने हिरण्याक्ष से युद्ध कर उसे मार डाला और पृथ्वी को स्वस्थान पर स्थापित किया।

अपने भाई की मृत्यु से संतप्त हिरण्यकशिपू ने कठोर तपश्चर्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर दिया और वर मांगा कि ''देवता, असुर, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, मानव, पिशाच इनमें से कोई भी मुझे मार न सके। शस्त्र, वृक्ष, गिली अथवा सूखी वस्तु, ना जल से न अग्नि से, ना लकडी से ना कीटक द्वारा, न पत्थर न वायु, ना पशु न मातृगणों (दुर्गा आदि) द्वारा किसी से भी मुझे मृत्यु ना आ सके। मुझे घर में न बाहर, दिन में न रात में मृत्यु नहीं चाहिए। इसी प्रकार महानाम, सचेतन अथवा अचेतन वस्तुओं द्वारा मेरी मृत्यु न हो। मेरा युद्ध में कोई प्रतिपक्षी ना हो। सभी प्राणियों का मैं अकेला अधिपति होऊं। वैसे ही तप तथा योग से प्रभावशाली बने लोगों का जो अणिमादी ऐश्वर्य जिसका कभी नाश नहीं होता मुझे प्राप्त हो ऐसा वर मुझे दो।"" ब्रह्माजी ने कहा यह वर बडा विलक्षण और दुर्लभ है। परंतु, तेरी तपश्चर्या से संतुष्ट होकर मैं तुझे यह देता हूं।

ब्रह्मदेव से वर प्राप्त होते ही उसका कृष हो चूका शरीर तेजस्वी हो गया और उसने महापराक्रमी देवताओं को हराकर उन्हें स्वर्ग से निष्काशित कर दिया। उसने सभीको जीतकर अपने अधीन कर लिया और स्वर्ग में रहने लगा। उसने आदेश दिया कि, दान आदि सारे कर्म मुझे अर्पण कर केवल मेरी ही पूजा करें। परंतु, जितेंद्रिय न होने के कारण वह तृप्त न हो सका। त्रिभुवन में अधर्म फैल गया। सभी पापवृत्ति की ओर मुडने लगे। सभी देवता ब्रह्माजी के पास गए सारी परिस्थितियों का वर्णन कर हिरण्यकशिपू के नाश का उपाय पूछने लगे। ब्रह्माजी ने कहा - 'उस महाअसुर का पुण्य भाग समाप्त होने जा रहा है। उसके नाश का उपाय पूछने के लिए तुम लोग विष्णुजी के पास जाओ वही उस दैत्य के नाश का उपाय बतलाएंगे।" सभी देवता विष्णुजी के पास गए और उनका स्तवन करने लगे। प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने कहा हिरण्यकशिपू को प्रल्हाद नामका बुद्धिमान विष्णु भक्त पुत्र होगा। वह उससे द्रोह करेगा तभी मैं उसका वध करुंगा। 

कुछ समय पश्चात हिरण्यकशिपू उपभोगों से तृप्त न होने के कारण विष्णु और अपने शत्रुओं का नाश करने के उद्देश्य से वन में तपश्चर्या करने के लिए गया। यह देखकर ब्रह्माजी चिंतित हो गए। तब तपश्चर्या में विघ्न डालने के लिए नारद पर्वत नामक एक मुनि को लेकर वहां पहुंचे। दोनो ने कलविंक (चिडिया) पक्षियों का रुप लेकर 'ऊं नमो नारायणाय" का उच्चारण तीन बार जोर से किया और उड गए। हिरण्यकशिपू क्रोधित हो गया और वापिस लौट आया। कुछ समय पश्चात वह फिर से तपश्चर्या करने के लिए मंदार पर्वत पर रहने लगा। तब इंद्र ने उसकी राजधानी पर आक्रमण कर दानवों का हरा दिया और उसकी पत्नी कयाधू को पकड लिया। नारद त्रिकालज्ञ होने के कारण यह जान की वह गर्भवती है उसे साथ ले अपने आश्रम कोटितीर्थ में ले आए। वह पसूत होने तक उसे 'ऊं नमो नारायण" का अष्टाक्षरी मंत्र देकर दिव्य ज्ञान का बारम्बार उपदेश दिया। इस कारण गर्भस्थ प्रह्लाद को गुह्य ज्ञान का अनुग्रह अपनेआप प्राप्त हो गया। प्रह्लाद ने अपनी बेजोड भक्ति से नारायण को प्रसन्न कर लिया।

प्रह्लाद जन्मतः वैष्णव था। स्व-परभेद से सहमत न होने के कारण वह असुर पुत्रों को विष्णुभक्ति का महत्व समझाया करता था। अपने शत्रु के बारे में प्रह्लाद का भक्तिभाव देखकर हिरण्यकशिपू ने उसे मारने के कई उपाय किए। परंतु, उसका बाल भी बांका न हुआ। प्रह्लाद ने अपने पिता को विष्णु माहामात्य विभिन्न प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया। उसने अपने पिता से कहा 'तात, मेरा नारायण सभी ओर है। उसका वास्तव्य कण-कण में है।" क्रोधित हो हिरण्यकशिपू ने कहा, 'वह हर स्थान पर है तो, इस खंबे में क्यों नहीं दिखता?" इतना कहकर उसने मुष्टिप्रहार उस स्तंभ पर किए। तभी एक अतिभयंकर ध्वनी हुई और ना मनुष्य और ना पशु ऐसा अद्‌भुत रुप धारण करनेवाले भगवान श्रीहरी-विष्णु उस स्तंभ से प्रकट हुए। उनका रुप भयंकर और रौद्र था। वह नरसिंह रुप था। स्तंभ से प्रकट होने के बाद उन्होंने हिरण्यकशिपू के सभा भवन को ध्वस्त कर क्षणार्ध में दैत्य सेना का संहार कर दिया।

क्रोधित हिरण्यकशिपू ने युद्ध आरंभ कर दिया। भगवान नरसिंह ने उसे अपने नखों से यमसदन भेज दिया। उसके शरीर के टुकडे-टुकडे कर दिए। नरसिंह के रौद्र रुप को देख सभी भयभीत हो गए। हिरण्यकशिपू के वध के पश्चात उनके क्रोध को शांत करने के लिए ब्रह्मादि देवताओं ने उन पर पुष्पवृष्टि की, उनकी स्तुति की - अहोवीर्यम्‌ अहोशौर्यम्‌ अहोबाहु पराक्रमम्‌। नृसिंह परमं दैवं अहोबलिम्‌ अहोबलम्‌।। फिर भी उनका क्रोध शांत न हुआ। श्रीलक्ष्मी माता ने भी उनका क्रोध शांत करने का प्रयत्न किया।  अंत में बाल प्रह्लाद ने बिना भयभीत हुए राजसिंहासन पर आसनस्थ नृसिंह को साष्टांग प्रणिपात किया। नृसिंह का क्रोध शांत हो उन्होंने उसे उठाकर अपनी जंघा पर बैठा लिया। देवता स्तुति करने लगे। प्रसन्न नरसिंह ने प्रह्लाद से वर मांगने को कहा। परंतु, नम्रतापूर्वक प्रह्लाद ने नकार दिया।

हिरण्यकशिपू के वध से रिक्त राजगद्दी पर नृसिंह ने प्रह्लाद का राज्याभिषेक किया और उसे राजधर्म का ज्ञान दिया। राजव्यवहार का उपदेश दिया। तत्पश्चात भगवान नरसिंह ने दक्षिण प्रवास के लिए प्रयाण किया। किसी भी प्रकार का आतिथ्य न स्वीकारने के कारण प्रह्लाद फलादि लेकर विश्वकर्मासहित उनके पीछे-पीछे चल पडा। मार्ग में जहां-जहां भगवाननृसिंह ने विश्राम किया वहां-वहां उसने विश्वकर्मा से मंदिरों की निर्मिती करवाई। श्रीशैल पर्वत पर की गुफा में नृसिंह प्रविष्ट हुए और श्रीहरी का यह अद्‌भुत विलक्षण अवतार समाप्त हुआ।